अध्याय 15 जगदीश मित्तल की गणना
दिव्य नीलामी कला केंद्र के एक भव्य कमरे के बीच में दो लोग हाथों में गिलास पकड़े हुए फलों के शरबत को सुकून से पी रहे थे। कमरे के बीचों-बीच शीशम की लकड़ी से बनी एक विशाल मेज रखी थी, जिसके चारों ओर आरामदायक कुर्सियाँ थीं, जिन पर मुलायम गद्दे बिछे थे। मेज पर संगमरमर के बने गिलास रखे थे, जिनमें रंग-बिरंगे फलों का शरबत था—कुछ में अनार का लाल रस था, कुछ में आम का पीला, तो कुछ में अंगूर का हरा। शरबत की मीठी-मीठी खुशबू पूरे कमरे में फैली हुई थी, जिससे वातावरण और भी सुखद लग रहा था।
यह दोनों कोई और नहीं बल्कि जगदीश मित्तल और विराज चौहान थे।
विराज चौहान गिलास को ऐसे पकड़े हुए था जैसे कोई राजा अपना राजदंड पकड़ता है—हल्के से, शिथिल हाथों में, परंतु ऐसे कि कोई भी उससे वह गिलास छीनने की सोच भी न सके। उसका चेहरा बिल्कुल स्थिर था—न मुस्कान, न क्रोध, न उत्सुकता, न ऊब। बस एक शाश्वत शांति।
वहीं दूसरी तरफ जगदीश मित्तल जूस तो पी रहे थे। पर उनकी आंखें बार-बार विराज पर जा रही थीं। वे विराज के हर हाव-भाव को, हर सांस को, हर पलक झपकने को बारीकी से देख रहे थे—जैसे कोई जौहरी किसी नए हीरे का अध्ययन कर रहा हो।
मुख्य बाजार में जो हुआ था, उससे वे पूरी तरह से आश्चर्यचकित थे। वहाँ जिस तरह विराज ने राघव और उसके तीन साथियों को धूल चटाई थी, उसे देखकर जगदीश के होश उड़ गए थे।
लेकिन उन्होंने वहाँ अपने चेहरे पर जरा भी प्रतिक्रिया नहीं दी थी। यही उनकी कला थी— नीलामी व्यापारियों की कला, जहाँ भावनाओं को दिखाना कमजोरी माना जाता है, और हर परिस्थिति में शांत रहना सबसे बड़ा शस्त्र होता है। परंतु उस शांत मुखौटे के पीछे, उनका मन बवंडर की तरह उथल-पुथल मचा रहा था।
बाजार में हुई घटना उनके जहन में बार-बार आ रही थी। वे विश्वास नहीं कर पा रहे थे कि इंदौर शहर का सबसे बदनाम मुफ्तखोर घर जमाई अपने से ऊंची साधना रखने वाले व्यक्तियों को हरा सकता है। उन्होंने अपने मन में सौ बार उस घटना का विश्लेषण किया था।
जब वे मुख्य बाजार से दिव्य नीलामी कला केंद्र की तरफ आ रहे थे, विराज उनकी घोड़ागाड़ी में उनके साथ बैठा था, उसी समय उन्होंने यह जानने की कोशिश की थी कि विराज का साधना स्तर क्या है।
जब उन्हें पता चला कि विराज का साधना स्तर लघु लड़ाकू योद्धा के तीसरे स्तर को पार कर चुका है, तो वे बहुत आश्चर्यचकित हुए।
उस समय जगदीश के मन में एक ही प्रश्न था—'यह कैसे संभव है?' क्योंकि सुरेश ने उन्हें बताया था कि उसके दामाद का साधना स्तर शून्य है। और उन्होंने अब तक जितनी भी साधना विधियाँ विराज को लाकर दी थीं, उनमें से कोई भी उसके स्तर को नहीं बढ़ा पाई थी।
लगभग एक महीने पहले, जब सुरेश इंदौर शहर छोड़कर मगध साम्राज्य की राजधानी में स्थित नालंदा गुरुकुल के लिए निकला था, तो जाने से पहले सुरेश और उसकी मुलाकात हुई थी। जहाँ उनके बीच व्यापार को लेकर कुछ बातें हुई थीं, और कुछ सामान सुरेश ने उससे खरीदा था। उस समय भी सुरेश ने उसे बताया था कि उसके दामाद का साधना स्तर शून्य है ।
लेकिन अब विराज साधना के मार्ग पर आगे बढ़ रहा है। ऐसी कौन सी विधि या तरीका या खजाना इस लड़के के हाथ में आ गया है जिससे यह साधना के मार्ग पर आगे बढ़ने लगा है?
जगदीश ने अपने दिमाग में हर संभावना को परखा था। क्या विराज को कोई गुप्त विधि मिल गई है? क्या उसे कोई प्राचीन खजाना हाथ लग गया है?
उसके मन में लगातार प्रश्नों का तूफान उठ रहा था, परंतु उसकी बाहरी मुद्रा बिल्कुल शांत थी। उसी शांत भाव से, उसी व्यापारिक दृष्टि से, वह विराज को देख रहा था—जैसे कोई जुआरी अपने सामने रखे ताश के पत्तों को देखता है, यह अनुमान लगाने की कोशिश कर रहा हो कि अगली चाल क्या होगी।
अंततः जगदीश अपने हाथ में पड़ा हुआ गिलास मेज पर रखते हुए विराज की तरफ देखते हुए पूछता है, "आखिरकार तुम मुझे क्यों ढूंढ रहे थे? ऐसा क्या काम आ गया है जिसके लिए तुम्हें मेरी जरूरत पड़ गई?"
उसकी आवाज में एक संयत अहंकार था—वैसा अहंकार जो कोई बुजुर्ग किसी युवा के प्रति रखता है, उसने अपने शब्दों को सावधानी से चुना था—बहुत अधिक तीखा नहीं कि सुरेश से संबंध खराब हो जाएं, परंतु इतना साफ कि विराज को अपनी जगह का एहसास हो जाए।
उसकी बातों में अभी भी एक घमंड था। वह विराज को यह दिखाना चाहता था कि भले ही वह इंदौर शहर के तीन सबसे शक्तिशाली परिवारों में से एक का दामाद है, और उसके ससुर सुरेश से उसके व्यापारिक संबंध हैं, परंतु उसकी इतनी हैसियत नहीं है कि वह उसका सम्मान हासिल कर सके। उसे जो भी मौका दिया जा रहा है, उसका मुख्य कारण बस उसके ससुर की वजह से है।
परंतु विराज की आंखों में जरा भी बदलाव नहीं आया। वह जानता था कि यह संसार कैसे काम करता है। उसने अपने पिछले जन्मों में हजारों जगदीश जैसे लोग देखे थे—लोग जो अपनी सीमित शक्ति के नशे में चूर होकर दूसरों को तुच्छ समझते हैं, जो यह भूल जाते हैं कि इस ब्रह्मांड में सबसे बड़ी शक्ति वह नहीं है जो बाहर दिखती है, बल्कि वह है जो अंदर छुपी होती है। विराज जगदीश के घमंड को ऐसे देख रहा था जैसे कोई वयस्क किसी बच्चे के गुस्से को देखता है—न डर से, न गुस्से से, बल्कि एक प्रकार की कोमल उदासीनता के साथ।
क्योंकि उसके लिए, जगदीश एक साधन था—एक उपकरण, जैसे कोई हल या कुल्हाड़ी। तुम उपकरण से प्रेम नहीं करते, तुम उपकरण से घृणा नहीं करते, तुम बस उसका उपयोग करते हो और फिर छोड़ देते हो।
वह अपने हाथ में पड़े हुए जूस के गिलास को नीचे रखता है, और अपने बाएं हाथ को उठाते हुए दाहिने हाथ में पहनी हुई भंडारण अंगूठी के अंदर से कुछ कागज बाहर निकाल लेता है। और उन्हें मेज पर रख देता है।
और फिर से अपने गिलास को उठाकर पीने लगता है।
यह सब देखकर जगदीश का दिमाग पूरी तरह से खराब हो जाता है। उसके समझ में नहीं आ रहा होता है कि अभी इस इक्कीस वर्ष के लड़के ने क्या किया। उसका व्यवहार तो ऐसा लग रहा है जैसे मैं खुद इसका नौकर हूँ और यह मेरा मालिक हो।
परंतु जगदीश उस समय अपने गुस्से को पी जाता है, और अपने भाव को एक कुशल व्यापारी की तरह बनाए रखता है। क्योंकि नीलामी के व्यापार में एक नीलामी घर के प्रमुख का व्यवहार उसके व्यापारिक सहयोगियों से अच्छा होना चाहिए, उसे हमेशा अपना व्यवहार विनम्र रखना चाहिए।
वह उन कागजों को उठाता है और उन्हें पढ़ने लगता है। जैसे-जैसे वह कागज पढ़ता जा रहा था, उसकी आंखें फटी की फटी रह जा रही थीं। उसके चेहरे पर एक नया भाव आता गया—आश्चर्य, और फिर एक अविश्वसनीय उत्तेजना।
दरअसल, इन कागजों के अंदर जल प्रवाह तलवार तकनीक का कुछ प्रारंभिक हिस्सा लिखा हुआ था। इसके साथ-साथ जल प्रवाह तलवार तकनीक की पहली फॉर्म भी लिखी हुई थी।
यह वह तलवार तकनीक थी जो विराज को काल मुख घाटी की गुफा से मिली थी।
और विराज अब इस तकनीक को बेचना चाहता था। इसके बदले उसे जो धन मिलेगा, वह औषधियाँ, दवाइयाँ, और गोलियाँ खरीद पाएगा —जो उसके साधना के मार्ग में आगे बढ़ने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
पूरी कागजों को पढ़ने के बाद जगदीश कागजों को फिर से मेज पर रखता है, और अपनी बात कहता है—"इन कागजों में जल प्रवाह तलवार तकनीक का प्रारंभिक ज्ञान लिखा हुआ है, परंतु उनसे इस तकनीक का सार हासिल नहीं किया जा सकता है। और इसमें केवल तलवार तकनीक की पहली फॉर्म ही लिखी हुई है। और ताज़ा स्याही और नरम कागज को देखकर मैं बता सकता हूँ कि आपने इन्हें कल रात ही लिखा है। और मुझे लगता है आपके पास इस तलवार तकनीक की पूरी जानकारी है।"
जगदीश की आवाज में अब एक नई धात थी—उत्सुकता के साथ मिश्रित सावधानी।
विराज जगदीश की तरफ देखता है और वही उदासीन भाव से कहता है, "मेरे पास इस तलवार तकनीक के सारे कागज हैं। मैंने जो लिखा है, वह इस तलवार तकनीक का केवल एक भाग है। और इस तलवार तकनीक में कुल पाँच फॉर्म हैं।"
जैसे ही जगदीश ने यह सुना, उसके मन में अत्यंत प्रसन्न भाव आ जाते हैं। इस छोटे से इंदौर शहर में ऐसी उच्च स्तर की तलवार तकनीक का पाया जाना बहुत बड़ी बात है। ऐसी तलवार तकनीकें तो केवल बड़े परिवारों के पास होती हैं, और यहाँ तक कि कुछ गुरुकुल भी इन तकनीकों को खरीदने में अपनी रुचि दिखा सकते हैं।
जगदीश जिज्ञासावश पूछता है, "क्या मैं जान सकता हूँ कि आपको यह जल प्रवाह तलवार तकनीक कहाँ से मिली?"
उसने अपना सिर थोड़ा आगे बढ़ा दिया था, अपनी आंखें थोड़ी और चौड़ी कर ली थीं, अपने हाथों को मेज पर रख दिया था—सब कुछ इस तरह से कि वह अधिक सौहार्दपूर्ण, अधिक मित्रवत, अधिक विश्वासनीय लगे। यह उसकी पुरानी चाल थी—पहले विश्वास जीतो, फिर रहस्य प्राप्त करो। उसने सोचा कि शायद विराज, इतनी बड़ी चीज देने की खुशी में, अपना मुंह खोल देगा।
दरअसल जगदीश यह जानना चाहता था कि विराज को यह तलवार तकनीक कहाँ से मिली। अगर यह तकनीक उसे मिल सकती है, तो कुछ और भी चीजें हो सकती हैं जो वह विराज के जरिए या उस स्थान के जरिए हासिल कर सकता है, जिससे विराज को यह मिली है। अगर वह ऐसा करता है, तो दिव्य नीलामी कला केंद्र में उसका दर्जा बढ़ सकता है, और उसे कोई बड़ा ओहदा मिल सकता है, या किसी बड़े शहर के नीलामी घर में उसे भेजा जा सकता है।
अभी जगदीश इन्हीं विचारों में खोया हुआ अपने भविष्य के सपने देख रहा था, तभी विराज ऐसा कुछ कहता है जो उसके सपनों को पूरी तरह से चूर-चूर कर देता है
"क्या यह जानना जरूरी है कि मुझे कहाँ से मिली, या आपके लिए इसे नीलामी करके पैसा कमाना ज्यादा महत्वपूर्ण है?"
विराज की आवाज में अब थोड़ा तीखापन था। जैसे वह एक ही बात को बार-बार दोहराने से ऊब चुका था।
यह सुनते ही जगदीश अपने होश में आ जाता है। उसे समझ में आ जाता है कि विराज से व्यापार करना जितना आसान वह समझ रहा था, उतना आसान नहीं है।
और विराज के साथ इन चंद बातों में वह यह भी जान चुका था कि विराज को स्पष्ट बोलना पसंद है, और यह सब चीजें उसके लिए महत्वपूर्ण नहीं हैं।
अब जगदीश का व्यवहार विराज के लिए बदल जाता है। अब वह एक सजग व्यापारी की तरह बात करने लगता है।
जगदीश कहता है, "किसी भी चीज को बेचने से पहले हम उसकी प्रामाणिकता जांचते हैं। उसी के बाद हम उसे बेचने का निर्णय लेते हैं।"
"क्योंकि अभी आपके द्वारा दी गई तलवार तकनीक अधूरी है। परंतु आपके ससुर सुरेश से हमारे व्यापारिक संबंध होने के नाते, हम यह मानकर चलते हैं कि आपके पास जल प्रवाह तलवार तकनीक के पूरे कागज हैं।"
जगदीश ने यहाँ एक चाल चली थी। वह जानता था कि विराज के पास पूरी तकनीक है—उसने पहले ही यह स्वीकार कर लिया था। परंतु वह इसे एक 'विश्वास' के रूप में प्रस्तुत कर रहा था, जैसे वह विराज पर एहसान कर रहा हो।
"अब आते है इसे बेचने की समस्याओं पर। सबसे पहले, हमारे दिव्य नीलामी कला केंद्र को यह पता लगाना होगा कि यह तलवार तकनीक हमारे मगध साम्राज्य या आसपास के अन्य साम्राज्यों में किसी परिवार, किसी गुरुकुल, या किसी शाही परिवार के पास तो नहीं है। यदि यह उनके पास नहीं पाई जाती, तो हम इसकी नीलामी कर सकते हैं।"
"यदि यह तलवार तकनीक किसी के पास पाई जाती है, तब भी हम इसकी नीलामी कर सकते हैं, पर यह नीलामी गुप्त रूप से होगी, और इसमें मिलने वाली राशि खुली नीलामी से अत्यंत कम होगी।"
विराज जगदीश से पूछता है, "नीलामी करने में कितना समय लगेगा?"
जगदीश विराज की तरफ उत्सुकता से देखते हुए सारी बातें उसे बता देता है—"चार हफ्ते बाद हम नीलामी कर सकते हैं। क्योंकि यह कोई सामान्य तलवार तकनीक नहीं है। जल प्रवाह तलवार तकनीक, उच्च तलवार तकनीकी श्रेणी में आती है, इसलिए इसे खरीदने वालों की संख्या बहुत ज्यादा होगी।"
"और जितने ज्यादा लोग नीलामी में आएंगे, आपको उतना ही ज्यादा मुनाफा होगा, और इस नीलामी घर को भी उतना ही ज्यादा कमीशन मिलेगा।"
यह बोलकर जगदीश हंसने लगता है।
उसकी हंसी शुरू में धीमी थी, फिर तेज हो गई, और फिर एक ठहाके में बदल गई।
यह पहली बार था जब इन दोनों की बातचीत के बीच जगदीश हंसा था। क्योंकि अब बात धन कमाने की थी, और कोई भी व्यापारी हो, जब बात धन कमाने की आती है, तो उसके लिए सबसे बड़ा हित धन कमाना ही होता है।
लेकिन विराज तो अब भी ऐसे ही बैठा हुआ था जैसे एक राजा बैठा हो।
कुछ पल हंसने के बाद जगदीश फिर से अपनी चर्चा के विषय पर आता है। वह विराज से पूछता है, "आप किस तरह से भुगतान लेना चाहेंगे? सिक्कों के रूप में लेना चाहेंगे, या आध्यात्मिक सामग्रियों के रूप में, या फिर औषधियों, दवाइयों, और गोलियों के रूप में? या फिर तीनों के रूप में?"
उसने तीन विकल्प दिए, और प्रत्येक विकल्प के अलग-अलग लाभ थे। सिक्के सबसे सुरक्षित और सबसे सामान्य विकल्प थे।
जगदीश विराज को परख रहा था—वह क्या चुनता है? क्या वह धन चाहता है, ज्ञान चाहता है, या शक्ति चाहता है?
विराज जगदीश की तरफ देखता है और कहता है, "जल प्रवाह तलवार तकनीक द्वारा कमाई गई राशि आप अपने पास ही रखना। मैं जरूरत पड़ने पर आपको एक सूची दिया करूंगा, आप उसके अनुसार मेरी आवश्यकताओं की पूर्ति करते रहना।"
विराज की आवाज में एक गहरी गणना थी। उसने यह बात यूं ही नहीं कही थी—उसने सोच-समझकर यह बात कही थी। उसके मन में पहले से ही एक पूरी योजना थी, और वह उस योजना को अमल में ला रहा था। उसने सोचा था—अगर वह पैसा या अन्य चीजें दिव्य नीलामी कला केंद्र से ले लेता, तो बाकी की ज़रूरत की चीज़ों को उसे खुद ढूंढना पड़ता। और विराज को यह सब काम नहीं करना था। वह तो अपना ध्यान केवल साधना के मार्ग पर रखना चाहता था, इसीलिए उसने इस काम के लिए दिव्य नीलामी कला केंद्र को चुना था—वह उसके लिए यह सब काम करेगा।
विराज की बात सुनने के बाद जगदीश मन ही मन बहुत खुश होता है। उसे तो लग रहा था कि यह तो बहुत अच्छी बात है। सबसे पहले, वह तलवार तकनीक को बेचकर उसका कमीशन कमाएगा, और बचा हुआ सारा धन अपने पास ही रखेगा। और उसके बदले, सामने वाले को उसके द्वारा मंगाई गई चीजें वह उपलब्ध कराएगा—उस पर भी वह अपना कमीशन खाएगा। यह तो दो तरफ से उनका फायदा था।
परंतु यदि जगदीश को विराज के मन की बात पता चल जाती, तो वह पागल ही हो जाता। विराज ने एक तरह से उन्हें अपना अधीनस्थ बना लिया था, पर जगदीश को लग रहा था कि वह विराज को मूर्ख बना रहा है, जबकि वास्तव में विराज उसे अपनी सुविधा के लिए उपयोग कर रहा था। विराज ने एक ऐसा जाल बिछाया था जिसमें जगदीश खुद ही फंस रहा था, उसे पता भी नहीं चल रहा था।
इन सब बातों के बाद विराज अपनी अंगूठी में से एक सूची निकालता है, और जगदीश को दे देता है।
जगदीश जब उस सूची को पढ़ता है, तो उसकी आंखें फटी की फटी रह जाती हैं।
इस सूची में जितनी औषधियों, गोलियों, और जड़ी बूटियों की मांग लिखी हुई थी, वह लघु लड़ाकू योद्धाओं के चरण में इस्तेमाल होती थीं।
पर जगदीश को चकित करने वाली बात यह थी कि इसमें उसकी मात्रा बहुत अधिक थी। वह जानता था कि इतनी सारी मात्रा को कम से कम 15 लघु लड़ाकू योद्धा इस्तेमाल कर सकते थे।
और इनकी कीमत बहुत अधिक थी। परंतु यदि जल प्रवाह तलवार तकनीक को अगर गुप्त रूप से भी बेचा जाए, तो वह उसकी पूरी भरपाई कर सकती थी—बल्कि कुछ सोने के सिक्के बच भी सकते थे।
जगदीश सूची को लेकर बाहर जाता है और एक घंटे बाद वापस लौट आता है, और एक भंडारण अंगूठी उसके सामने रख देता है। और कहता है, "आपके द्वारा मंगाई गई सारी चीजें इस भंडारण अंगूठी में उपलब्ध हैं। यदि आपको किसी अन्य चीज की जरूरत हो, तो हम वह भी उपलब्ध करा सकते हैं।"
विराज को जगदीश के व्यवहार में परिवर्तन दिखाई दे रहा था। वह जानता था कि जगदीश अब उसे एक सामान्य ग्राहक नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण साझेदार समझने लगा है। लेकिन विराज के लिए, जगदीश अभी भी वही था—एक उपकरण।
विराज उस अंगूठी को उठाता है और कहता है, "अभी मुझे और किसी चीज की आवश्यकता नहीं है। नीलामी वाले दिन मैं स्वयं यहां आ जाऊंगा।"
यह कहकर वह नीलामी घर से निकल जाता है।