सूर्यकुल का सूर्यास्त - 14 ALLA NOOR KHAN द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

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सूर्यकुल का सूर्यास्त - 14

अध्याय 14 राघव जोशी का अपमान

अगले दिन विराज इंदौर शहर की मुख्य बाजार से होकर गुजर रहा था। संकरी गलियाँ थीं, किंतु उन गलियों के दोनों ओर खड़े भव्य प्रासादों के कारण वे किसी स्वर्गीय पथ से कम नहीं लगती थीं। बाजार के फुटपाथ पर रंग-बिरंगे कपड़े, मसाले, आभूषण और हथियार बिक रहे थे। मिट्टी के बर्तनों की दुकानों से मिट्टी की सुगंध आती थी, वहीं मिठाई की दुकानों से घी और खोए की महक पूरे बाजार में बिखरी थी। दूकानों के आगे लकड़ी के छप्परनुमा ढांचे बने थे, जो धूप और बारिश से राहगीरों को बचाते थे। गलियों में बैलगाड़ियाँ और घोड़ागाड़ियाँ चलती थीं, और उनके घुंघरुओं की छम-छम ध्वनि पूरे वातावरण को संगीतमय बना देती थी। कहीं-कहीं पर पानी के फव्वारे भी बने थे, जिनके आसपास तरोताजा होने के लिए लोग इकट्ठा हो जाते थे। सड़कों के किनारे ताड़ के ऊंचे-ऊंचे पेड़ लगे थे।

तभी अचानक चलते-चलते सड़क के मोड़ पर विराज एक लड़कों के समूह से टकरा जाता है।

वह मोड़ काफी तीखा था। एक ओर से आता हुआ व्यक्ति दूसरी ओर से आने वाले को देख ही नहीं सकता था।

विराज का कंधा उस समूह में सबसे आगे चल रहे लड़के के कंधे से टकरा जाता है।

जिसके कारण वह लड़का लड़खड़ा जाता है परंतु कुछ ही समय में फिर से अपनी मूल अवस्था में आ जाता है।

परंतु इस टकराव से विराज को कुछ नहीं होता, वह स्थिर का स्थिर रहता है।

तभी उस लड़के के समूह में से एक और लड़का आगे आता है और विराज पर चिल्लाते हुए कहता है—"तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई राघव भाई से टकराने की!"

विराज को उनकी बातों से कोई फर्क नहीं पड़ रहा था। उसके चेहरे पर न तो क्रोध था, न दया, न ही उत्तेजना। जैसे उसके आसपास का पूरा कोलाहल उसके लिए अर्थहीन हो।

उसकी दृष्टि में ये वे लोग थे जिनसे कोई सार्थक संवाद संभव ही नहीं था। जैसे कोई विद्वान मूर्खों की सभा में अपनी विद्या व्यर्थ नहीं गंवाना चाहता, वैसे ही विराज भी इनसे कुछ कहना या इन्हें कुछ समझाना व्यर्थ समझ रहा था।

तभी एक लड़का और आगे आता है। वह कहता है, "तुम जानते हो राघव भाई कौन हैं? वह जोशी परिवार के लड़के हैं!"

बाजार में सड़क के बीच हो रहे तमाशे को देखकर वहां की जनता अचानक से आसपास से आ जाती है और उनकी बातें सुनने लगती है।

जैसे चींटियाँ गुड़ के टुकड़े को देखकर एकत्रित हो जाती हैं, वैसे ही लोग दूकानों से, मकानों से, गलियों से—हर तरफ से बहने लगे। 

तभी एक व्यक्ति धीरे से अपने पास खड़े व्यक्तियों से कहता है, "यह लड़का जोशी परिवार के बिगड़े हुए लड़कों में से एक है। इसका नाम राघव जोशी है। दिन भर अपने इन आवारा दोस्तों के साथ घूमता रहता है और सभी को परेशान करता रहता है। मुझे लगता है, आज जिस लड़के से यह लड़ रहे हैं, उस लड़के की किस्मत बड़ी खराब है जो इससे टकरा गया।"

तभी एक बुढ़ि चाची कहती है, "यह दूसरा वाला लड़का मुझे कुछ जाना-पहचाना सा क्यों लग रहा है? ऐसा लगता है मैंने इसे कहीं देखा है।"

तभी उसके पीछे से एक और औरत बोलती है, "अरे, यह तो चौहान परिवार का वही मशहूर मुफ्तखोर घर जमाई है!"

यह सुनते ही, मानो किसी जादू से, सैकड़ों आंखों की पुतलियाँ एक साथ विराज पर केंद्रित हो गईं। 

तभी भीड़ के एक कोने में चार-पांच सुंदर लड़कियां खड़ी होती हैं। उन्हें भी पता चल जाता है कि राघव और उसके दोस्तों से जिस लड़के का विवाद चल रहा है, वह वह इंदौर शहर का मुफ्तखोर घर जमाई है।

एक लड़की अपनी दोस्त से कहती है, "अगर इस लड़के की साधना शून्य न होती, तो मैं इससे शादी कर लेती। यह कितना सुंदर है!"

उस लड़की ने यह बात ऐसी मोहक दृष्टि से कही मानो वह सपना देख रही हो। उसकी आंखें विराज के चेहरे से हट ही नहीं रही थीं। 

उसकी दोस्त भी आह भरते हुए कहती है, "तुम सही कह रही हो। अगर यह लड़का साधना में अच्छा होता, तो इंदौर शहर में हर कोई इसका दीवाना होता।"

दरअसल, इंदौर शहर में तीन सबसे शक्तिशाली परिवार थे। पहले नंबर पर गोयल परिवार आता था, दूसरे नंबर पर जोशी परिवार आता था, और तीसरे नंबर पर चौहान परिवार आता था।

अभी लोगों के बीच यह सब चर्चा चल ही रही थी तभी इन सब बातों पर ध्यान न देते हुए राघव विराज की तरफ उंगली करते हुए कहता है—"मैं नहीं जानता हूँ तुम कौन हो, परंतु तुम मुझसे टकराए हो तो तुम्हें इसका हरजाना भरना होगा। सभी के सामने घुटनों के बल बैठकर तुम्हें मुझसे माफी मांगनी होगी।"

उसने यह वाक्य इस ढंग से कहा मानो उसने कोई न्यायसंगत मांग रखी हो, कोई सौदा नहीं, बल्कि एक आदेश। उसके चेहरे पर एक विजयी मुस्कान थी, जैसे उसे पहले से ही पता हो कि अब विराज भय से कांप उठेगा, और जल्द ही उसे अपने घुटनों पर गिरते देखना उसके लिए एक अनोखी प्रसन्नता का विषय होगा। 

तभी उसका एक और साथी बीच में बोलते हुए कहता है, "राघव भाई ने तुम्हें बहुत छोटी सजा दी है। शायद उनका मूड आज बहुत अच्छा है, इसीलिए बस तुम्हें घुटनों पर बैठकर माफी मांगने को कह रहे हैं। वरना अब तक तो तुम्हें पीट-पीट कर इसी सड़क पर डाल दिया होता।"

विराज को इन लोगों की बातों से कोई फर्क नहीं पड़ रहा था। वह इन सब से बहुत ऊब चुका था। वह बिना कुछ कहे आगे की तरफ बढ़ने लगता है।

विराज को ऐसा करते देखकर, एक लड़का पीछे से उसके कंधे को पकड़ने की कोशिश करता है।

जैसे ही वह विराज के कंधे पर हाथ रखता है, विराज उस लड़के के हाथ को तेजी से पकड़ता है और उसे उठाकर आगे की तरफ जमीन पर पटक देता है।

विराज का हाथ बिजली की तरह फुर्तीला था—जैसे किसी सांप ने फन उठाया हो और बिना किसी चेतावनी के हमला कर दिया हो।

लड़का जमीन पर गिरते ही पूरी तरह से चित हो जाता है। दर्द से उसकी कराह निकल जाती है।

जमीन पर गिरने की आवाज इतनी भारी थी कि पास खड़े लोग पीछे हट गए। 

उस लड़के की कराह पूरे बाजार में गूंज रही थी— गहरी, जैसे कोई घायल पशु रो रहा हो। उसने अपनी पीठ पर हाथ डाला और कराहता रहा, "आह... आह..."

भीड़ में मौजूद जनता के मुंह खुले के खुले रह जाते हैं। किसी को भी विश्वास नहीं हो रहा था कि विराज ऐसा कुछ भी कर सकता था। चौहान परिवार का वह मुफ्तखोर घर जमाई जो इस बात के लिए मशहूर था कि वह कुछ भी नहीं कर सकता है और उसकी साधना शून्य है, उसने एक लघु योद्धा के चौथे स्तर के योद्धा को इतनी आसानी से पटक दिया।

यहां तक की राघव भी कुछ पलों के लिए स्तब्ध रह गया था। जैसे ही राघव और उसके बाकी दोस्तों को एहसास होता है कि अभी-अभी क्या हुआ है, वे चिल्लाते हुए विराज पर हमला कर देते हैं।

परंतु चंद मिनट में ही वे सब जमीन पर पड़े होते हैं।

यह कोई लड़ाई नहीं थी। यह तो मानो किसी वयस्क ने कुछ बच्चों को झकझोर कर अलग कर दिया हो। उनकी हालत गली के कुत्तों की तरह हो जाती है।

कुछ तो जमीन पर पड़े कराह रहे थे, कुछ अपने घुटनों के बल उठने की कोशिश कर रहे थे, तो कुछ ने हार मान ली थी और वहीं लेटे हुए थे। 

वहीं उनकी तुलना में विराज अभी भी ऐसा लग रहा था जैसे उसने कुछ किया ही नहीं है। उसके कपड़े अभी भी वैसे ही थे जैसे वह घर से पहन कर निकला था। एक भी सिलवट टेढ़ी नहीं हुई थी। एक भी धूल का कण उस पर नहीं चढ़ा था। विराज उसी सीधी मुद्रा में खड़ा था, उसकी सांस भी नहीं फूली थी, जैसे उसने अभी-अभी कुछ हाथ हिलाए हों, लड़ाई नहीं की हो। 

अभी विराज वहां से जाने ही वाला था कि तभी भीड़ को चीरते हुए एक और समूह वहां आता है। सबकी निगाहें इस नए आने वाले समूह की ओर मुड़ गईं। और उस समूह में से एक व्यक्ति चिल्लाते हुए कहता है कि यहां क्या चल रहा है?

भीड़ में से एक व्यक्ति कहता है, "यह तो बाजार रक्षक दल के मुखिया भानु हैं। वह अपने दल के साथ आ चुके हैं।"

उस व्यक्ति की आवाज में अब एक आश्वस्ति थी, मानो अब सब ठीक हो जाएगा।

तभी एक और व्यक्ति उसकी बात में आगे जोड़ते हुए कहता है, "उनके साथ दिव्य नीलामी कला केंद्र के प्रमुख जगदीश मित्तल भी हैं।" यह सुनकर भीड़ में एक नई लहर दौड़ गई। 

तभी तीसरा व्यक्ति बोलता है, "यह दोनों एक साथ क्या कर रहे हैं?"

सचमुच, यह एक अजीब संयोग था। बाजार रक्षक दल के मुखिया और दिव्य नीलामी कला केंद्र के प्रमुख—दोनों एक साथ बाजार में। 

तभी उसमें से एक और व्यक्ति अपनी बात कहता है, "जरूर कुछ जरूरी बातों पर एक-दूसरे से चर्चा कर रहे होंगे और बाजार में यह हालत देखकर वहां रुक गए होंगे और इधर की तरफ आ गए होंगे। वैसे भी बाजार रक्षक दल का काम ही है बाजार में शांति बनाए रखना।"

भानु वहां आते ही चारों तरफ देखता है और पूरी स्थिति को समझ जाता है।

उसकी निगाहें सबसे पहले जमीन पर पड़ी थी— चार युवक जमीन पर पड़े थे, उनमें से एक की कराह अभी भी जारी थी, दूसरा अपने घुटने को पकड़े बैठा था, तीसरे का चेहरा सूज गया था। फिर उसने उन्हें पहचाना—ये सब राघव जोशी के दोस्त थे। राघव स्वयं भी उनमें से एक था, उसके होठों पर खून के निशान थे और उसके कपड़े अस्त-व्यस्त हो गए थे। भानु ने एक नज़र विराज पर डाली—वह बिल्कुल शांत, बिल्कुल साफ, बिल्कुल अप्रभावित। भानु की प्रशिक्षित आंखों ने तुरंत पहचान लिया कि यहाँ असली शक्ति किसके पास है।

भानु राघव जोशी की पुरानी हरकतों से पूरी तरह अवगत था, परंतु जोशी परिवार का दबाव और उसके प्रमुखों के 'कुछ न करने' के निर्देश ने उसे अभी तक रोके रखा था।

भानु के दाँत कस गए। बहुत महीनों से वह चाहता था कि राघव को उसकी करतूतों का फल मिले। और आज राघव की यह हालत देखकर वह मन ही मन प्रसन्न हो रहा था।

वह राघव की ओर आता है। राघव अपनी जगह से खड़ा हो चुका होता है। वह भानु को देखकर प्रसन्न हो जाता है, उसे लगने लगता है कि भानु उसका समर्थन करेगा और इस लड़के को सजा देगा।

वह जल्दी से भानु की तरफ बढ़ता है और कहता है, "बाजार रक्षक दल के प्रमुख भानु जी, आपने देखा कि बाजार में मुझ पर हमला हुआ है। मैं इस लड़के के खिलाफ दंड की मांग करता हूँ।"

उसके स्वर में एक स्वाभाविक अधिकार था, मानो उसका मांग करना ही काफी होगा।

भानु उसकी तरफ देखते हुए मुस्कुराते हुए कहता है, "राघव, तुम औरों को बेवकूफ बना सकते हो, मुझे नहीं। मैं बिना जानकारी लिए यह बता सकता हूँ कि इस समय उस लड़के की कोई गलती नहीं होगी। शुरुआत तुमने ही की होगी। अगर तुम चाहते हो कि यह मामला यहीं खत्म हो जाए, तो चुपचाप से यहां से चले जाओ।"

वह जानता था कि भानु उसे पसंद नहीं करता, पर उसे उम्मीद थी कि उसके परिवार की खातिर भानु उसका समर्थन करेगा।

गुस्से में उसके दांत एक-दूसरे से रगड़ खा रहे थे, उसके जबड़े की मांसपेशियाँ सिकुड़ गई थीं। उसके हाथ मुट्ठी में बंद थे, उसके पूरे शरीर में क्रोध की अग्नि दहक रही थी। परंतु भानु के सामने वह कुछ नहीं कर सकता था। बाजार रक्षक दल के मुखिया के आदेश की अवहेलना करने का अर्थ था स्वयं के लिए परेशानी बढ़ाना। 

फिर राघव विराज की तरफ देखते हुए कहता है, "यह मामला अभी खत्म नहीं हुआ है। मैं वापस आकर अपना हिसाब चुकता करूंगा।"

उसकी आवाज में क्रोध था। वह विराज को ऐसे देख रहा था जैसे कोई सियार शेर को देखता है—क्रोध से भरा हुआ फिर भी सामने लपकने का साहस नहीं।

यह कहकर राघव अपने दोस्तों के साथ वहां से निकल जाता है।

राघव के वहां से चले जाने के बाद, भानु जोर से चिल्लाते हुए कहता है, "अब सभी लोग अपने-अपने दुकानों और कामों में लग जाएं। और जो बाजार में खरीदारी करने आए हैं, वे आराम से और सुरक्षित रूप से खरीदारी करें। यहां तमाशा खत्म हो चुका है।"

उसकी आवाज इतनी ऊंची थी कि पूरे बाजार में गूंज गई। लोग जैसे नींद से जागे—झटके से अपनी जगह से हिले। दुकानदार फिर से अपनी दुकानों की ओर दौड़ पड़े, ग्राहक अपनी खरीदारी में व्यस्त हो गए। जैसे कभी कुछ हुआ ही न हो।

पर उनमें से कुछ तो मुस्कुरा रहे थे—उन्हें आज एक ऐसा दृश्य देखने को मिला था जिसकी उन्होंने कभी उम्मीद नहीं की थी। 

उसके बाद भानु विराज की तरफ देखते हुए कहता है, "लड़के, मैं तुम्हें इतना बता देता हूँ—तुमने आज जो किया है, इसका परिणाम तुम्हें भुगतना पड़ेगा। राघव शांति से नहीं बैठेगा। वैसे, तुम कौन हो और किस परिवार से हो?"

भानु की आवाज में अब एक नई उत्सुकता थी। 

तभी उसके पीछे से जगदीश मित्तल की आवाज आती है—"यह चौहान परिवार का मशहूर दामाद विराज चौहान है।"

जगदीश मित्तल ने यह बात इतनी सहजता से कही, जैसे वह कोई मामूली जानकारी दे रहे हों। परंतु उनके शब्दों में एक व्यंग्य था—"मशहूर दामाद"—यह वाक्यांश उन्होंने जानबूझकर कहा था, क्योंकि पूरे इंदौर में विराज केवल 'मुफ्तखोर घर जमाई' के नाम से ही मशहूर था।

भानु की आंखें एकदम फैल गईं। उसका मुंह हल्का सा खुल गया—जैसे उसने कोई असंभव बात सुन ली हो। वह विराज की ओर देखता है, फिर जगदीश की ओर, फिर विराज की ओर। उसकी भौंहें तन गईं। यह वही व्यक्ति है जिसके बारे में पूरा शहर कहता है कि इसकी साधना शून्य है—और इसने अभी-अभी राघव और उसके चार साथियों को इतनी आसानी से हरा दिया है? भानु ने अपने कानों पर विश्वास नहीं किया। वह अपनी ही सोच में खो गया, जैसे कोई गणित का कठिन प्रश्न हल कर रहा हो।

अगर वह यह बात इंदौर शहर में किसी को भी बताता, तो सब उसका मजाक उड़ाते और उस पर हंसते।

तभी विराज एक उदासीन भाव से भानु की तरफ देखते हुए कहता है, "मुझे उनसे डरने की जरूरत नहीं है।"

विराज के शब्द इतने शांत थे मानो वह कह रहा हो, 'आज मौसम अच्छा है।'

यह कहकर वह आगे बढ़ जाता है और जगदीश के पास जाकर खड़ा हो जाता है और उनसे कहता है, "मैं आप ही से मिलने के लिए दिव्य नीलामी कला केंद्र आ रहा था।"

दरअसल, जगदीश और विराज पहले भी मिल चुके थे। सुरेश और जगदीश के बीच व्यापारिक संबंध थे, जिसके कारण सुरेश अक्सर जगदीश से मिलता रहता था। इसी कारण से जगदीश और विराज की दो-तीन बार मुलाकात हो चुकी थी।

वैसे तो जगदीश विराज जैसे लोगों से मिलने में बिल्कुल भी रुचि नहीं दिखाते थे। उनके लिए इन जैसे लोगों से मिलना अपने समय की बर्बादी थी। उनका पूरा ध्यान अपने दिव्य नीलामी कला केंद्र के लिए अधिक से अधिक मुनाफा कमाने पर होता था।

परंतु सुरेश से उनके अच्छे व्यापारिक संबंध थे, इसीलिए वह एक बार सुरेश की खातिर विराज को समय देने के लिए राजी हो गए थे। अगर उन्हें इस बार विराज के साथ व्यापारिक समय बिताना अच्छा नहीं लगता, तो वे उसे अगली बार समय नहीं देंगे।

यह सब विचार करने के बाद, जगदीश विराज से कहता है, "चलो, हम दिव्य कला केंद्र में चलकर बात करते हैं। तुम मेरी घोड़ागाड़ी में मेरे साथ आ सकते हो।"

यह सुनने के बाद विराज और जगदीश घोड़ागाड़ी की तरफ चल देते हैं।

विराज ने कोई उत्तर नहीं दिया, बस जगदीश के पीछे-पीछे चलना शुरू कर दिया। उसके चेहरे पर अभी भी वही उदासीनता थी—न तो जगदीश के अहंकार से वह आहत हुआ था, न ही किसी बात से उसमें उत्तेजना आई थी। वह एक शांत सरोवर की तरह चल रहा था, जिसकी गहराई में क्या है, यह कोई नहीं जानता था।

भानु ने एक गहरी सांस ली और अपने सिपाहियों को इशारा किया—"बाजार के हर नुक्कड़ पर दो सिपाही तैनात करो, आज और सतर्कता रखो, कुछ भी असामान्य दिखे तो तुरंत मुझे खबर करो।" उसने आदेश दिए और स्वयं बाजार के बीचों-बीच खड़ा हो गया। परंतु उसका ध्यान बार-बार उस घोड़ागाड़ी पर जाता था, जो अब दूर जा रही थी, और उस गाड़ी में बैठा वह युवक—विराज चौहान—जिसने आज उसके सारे विश्वासों को हिला कर रख दिया था।

भानु ने मन ही मन सोचा—'यह लड़का कोई साधारण लड़का नहीं है। इसमें कुछ है, कुछ ऐसा जो पूरा शहर नहीं जानता। और यह रहस्य जितना बड़ा है, उतना ही खतरनाक।'

उसने अपने एक सिपाही को बुलाया और धीरे से कहा, "जाओ, इस लड़के के पीछे हमेशा एक परछाई की तरह रहो और मुझे हर पल की खबर देते रहो" सिपाही ने सिर झुकाया और चला गया।