अध्याय 13 भविष्य की तैयारी
रात के उस सन्नाटे भरे समय में, जब चारों ओर सब कुछ गहरी नींद में सो चुका था, विराज अपने कमरे में लेटा हुआ था — परंतु उसकी आँखें खुली थीं। वह गहन विचारों में खोया हुआ था, मानो कोई सागर उसके मन में उमड़ रहा हो, और अब तक के अपने जीवन — इस नए जीवन और पुराने जीवन — और अपने उद्देश्यों के बारे में गहराई से विचार कर रहा था। उसे क्या करना है? उसका अंतिम लक्ष्य क्या है? ये सब प्रश्न उसके मानसिक पटल पर एक-एक करके उभर रहे थे।
विराज का यह सोचना बिल्कुल गलत नहीं था, इसके पीछे एक पूर्ण, सुनियोजित योजना थी — ऐसी योजना जिसे बनने में सैकड़ों वर्ष लग गए थे, जिसे क्रियान्वित करने के लिए उसने अपना सब कुछ दाँव पर लगा दिया था।
दरअसल, विराज के पुराने जन्म में — जब वह बृहस्पति ग्रह पर था और उसने साधना के मार्ग में वह ऊँचाई छू ली थी जहाँ पहुँचकर वह महाशक्ति संत बन चुका था — तब सूर्यकुल की प्राचीन परंपराओं के अनुसार उसे मृत पूर्वजों की परीक्षा देनी पड़ी। यह कोई साधारण परीक्षा नहीं थी; इस परीक्षा में सूर्यकुल के सभी महान पूर्वज — वे सभी योद्धा और संत जो सदियों, सहस्राब्दियों पहले जीवित थे, जिन्होंने सूर्यकुल को गौरव के शिखर पर पहुँचाया था — स्वयं आकर उसकी परीक्षा लेते हैं। सूर्यकुल जब से बना था, तब से लेकर उस समय तक, इस परीक्षा को कभी भी किसी ने पार नहीं किया था — सैकड़ों पीढ़ियों में कोई भी योद्धा इस दुर्जेय परीक्षा का सामना नहीं कर पाया था। परंतु विराज ने वह कर दिखाया जिसे असंभव माना जाता था — वह इस परीक्षा को पार कर लेता है, और उसके पूर्वजों की आत्माएँ स्वयं उसकी प्रशंसा करती हैं।
परीक्षा जीतने के पश्चात, विराज को उसके कुल का पूरा ज्ञान हासिल होता है — वह अमूल्य, अपार ज्ञान जो उसके मृत पूर्वजों ने सदियों तक संजोकर रखा हुआ था, और जिसे केवल योग्यतम उत्तराधिकारी को ही प्रदान किया जाता था। उसी दौरान ही उसे अनंत प्रकाश तलवार तकनीक की पंद्रहों फॉर्मों का पता चलता है — वह तकनीक जो सूर्यकुल की सबसे गुप्त और सबसे घातक विद्या थी, जिसके बारे में बाहरी दुनिया में केवल किंवदंतियाँ प्रचलित थीं। और उसे यह भी पता चलता है कि महाशक्ति संत के ऊपर भी एक और चरण होता है — एक ऐसा चरण जिसके बारे में उसने कभी सोचा भी नहीं था।
सूर्यकुल बृहस्पति ग्रह का लंबे समय तक — वस्तुतः सहस्राब्दियों तक — स्वामी रहा था। उसने उस विशाल ग्रह पर अपना शासन स्थापित किया था, वहाँ की सभ्यता को विकसित किया था, और अपनी वीरता और ज्ञान से पूरे ब्रह्मांड में अपनी कीर्ति फैलाई थी। इसीलिए बृहस्पति ग्रह पर उपस्थित सम्पूर्ण ज्ञान — साधना का, तलवारों का, मंत्रों का, औषधियों का, और उससे भी परे का — लगभग अधिकतम ज्ञान सूर्यकुल के पास ही था।
उस समय विराज को यह पता चल चुका था कि अगर उसे साधना के मार्ग में और आगे बढ़ना है, उन ऊँचाइयों को छूना है जहाँ कोई योद्धा कभी नहीं पहुँचा, और अपनी अनंत प्रकाश तलवार तकनीक की सभी पंद्रह फॉर्मों का पूर्ण रूप से इस्तेमाल करना है, तो उसका यह वर्तमान शरीर — उसके लिए उपयुक्त नहीं था। उस शरीर ने अपनी अधिकतम क्षमता का उपयोग कर लिया था, वह अब और आगे नहीं जा सकता था।
इसलिए इसके लिए उसे पुनर्जन्म मंत्र का इस्तेमाल करना होगा — और फिर से, एक नए शरीर के साथ, नई शुरुआत के साथ, पुनर्जन्म लेना होगा।
विराज जिस समय अपने सूर्यकुल के सभी वरिष्ठ योद्धाओं और पूर्वजों की आत्माओं के साथ मिलकर यह क्रिया कर रहा था, वह उसके अंतिम पल थे — उस जीवन के अंतिम क्षण, जब वह अपने सबसे कमजोर अवस्था में था। उसने अपनी अधिकांश शक्ति उस मंत्र को सक्रिय करने में लगा दी थी, और उसके सूर्यकुल के वरिष्ठ और पूर्वज भी उसे अपनी शेष शक्ति दे चुके थे, जिससे वे भी अपनी सबसे कमजोर स्थिति में आ गए थे — वे भी लगभग शक्तिहीन हो चुके थे।
परंतु उसके बृहस्पति ग्रह पर सभी संगठन जो कभी सूर्यकुल के अधीन थे, या जो उससे ईर्ष्या करते थे, या जो उसके पतन की प्रतीक्षा में बैठे थे — उनमें यह अफवाह फैल चुकी थी कि विराज साधना के मार्ग पर और भी अधिक ऊँचाइयों को हासिल करना चाहता था, कि वह किसी नई, अज्ञात विद्या की खोज में था, कि वह उस पार चला जाएगा जहाँ से कोई वापस नहीं लौटता। जिससे उन संगठनों को अपने अस्तित्व का डर सताने लगा — क्योंकि यदि विराज और भी शक्तिशाली हो गया, तो वे कभी भी उसके सामने टिक नहीं पाएँगे। उन संगठनों ने एक साथ मिलकर, विरोध की आग में जलते हुए, उसी कमजोर समय पर — जब विराज और उसका सूर्यकुल दोनों ही अपनी सबसे नाजुक अवस्था में थे — उन पर हमला कर दिया था।
परंतु आखिरी पलों में — तब विराज ने पुनर्जन्म मंत्र का इस्तेमाल किया और फिर से, एक नए अवतार में, इस मंगल ग्रह पर जन्म लेकर आ गया। उसने अपना पुराना शरीर, अपना पुराना ग्रह, अपना पुराना जीवन सब कुछ पीछे छोड़ दिया, और एक साधारण परिवार में एक साधारण बच्चे के रूप में जन्म लिया।
अब विराज को अपना लक्ष्य पता था — वह जानता था कि उसे आखिरकार करना क्या था, उसके सामने कौन सा मार्ग है और उसके अंत में क्या है।
विराज का मुख्य लक्ष्य साधना के मार्ग पर महाशक्ति संत योद्धा से आगे बढ़ना था — उस अज्ञात, अनछुए चरण को प्राप्त करना था, जहाँ सुर्यकुल के स्थापक पहुँचे थे, और अपने सूर्यकुल की अनंत प्रकाश तलवार तकनीक की सभी पंद्रह फॉर्मों पर पूर्ण महारत हासिल करना था — उस तकनीक को पूर्णता तक ले जाना जो उसके पूर्वजों ने उसे सौंपी थी।
रही बात बृहस्पति ग्रह पर जाकर अपने सूर्यकुल का बदला लेने की, तो वह यह तब तक नहीं कर सकता था जब तक वह फिर से महाशक्ति संत नहीं बन जाता। उसे अपनी वही शक्ति वापस पानी थी, उससे भी अधिक, तभी वह उन संगठनों का सामना कर सकता था जिन्होंने उसके कुल को नष्ट किया था।
अब, चूँकि विराज का जन्म मंगल ग्रह के इस विराज नामक युवक के रूप में हुआ था, और वह बृहस्पति ग्रह पर अभी वापस नहीं जा सकता था — क्योंकि वह दूरी, वह शक्ति का अंतर, और वह समय अभी अनुकूल नहीं थे — तो वह सोचता है कि वह इस नए विराज के जीवन में जो परिवार वाले हैं, जो उसके मित्र हैं, और जो उसके दुश्मन हैं — उन सभी से अपना हिसाब चुकता करे। इस मंगल ग्रह पर जो लोग उसके साथ अच्छा करेंगे, उन्हें वह सुरक्षा और समृद्धि देगा; जो लोग उसके साथ बुरा करेंगे, उनसे वह उचित बदला लेगा। और साथ ही, वह साधना के मार्ग पर निरंतर आगे बढ़ता रहे, बिना रुके, बिना थके।
इसके अलावा, विराज के पुराने जीवन में कोई नारी नहीं थी — कोई पत्नी, कोई प्रेमिका, कोई साथी जिससे वह स्नेह या लगाव रख सके। वह पूरी तरह से अकेला था, केवल अपने कुल और अपनी साधना के प्रति समर्पित। परंतु इस जीवन में उसके साथ रवीना थी — जिसने उसका हाथ थामा था, जो उसके साथ विवाह के बंधन में बंध चुकी थी। और अब, जब विराज ने इस शरीर को अपना लिया है, तो वह उसे किसी भी कीमत पर अपने से अलग नहीं कर सकता था। रवीना उसकी जिम्मेदारी थी, उसकी सुरक्षा का प्रश्न था, और वह उसे कभी अकेला नहीं छोड़ेगा।
अगली सुबह, जब सूरज की पहली किरणें पृथ्वी पर आईं और पूरा घर रौशनी से नहा उठा, विराज अपनी नींद से जागता है। वह तुरंत अपने बिस्तर से उठता है, हल्का सा ताजगी महसूस करता है, और सीधे अपने घर के ऊपरी मंजिल के एक विशेष कमरे में चला जाता है।
इस कमरे को उसने पहले ही चुन लिया था — यह कमरा किसी भी अन्य कमरे से अलग था। इसमें कई सारी बड़ी-बड़ी खिड़कियाँ थीं, जो हर दिशा में खुलती थीं, जिससे सूरज का प्रकाश अधिकतम मात्रा में — लगभग पूरे दिन — इस कमरे के अंदर रहता था। सूर्य की वह स्वर्णिम रौशनी कमरे के हर कोने को छू जाती थी, मानो कोई दिव्य ऊर्जा हर जगह व्याप्त हो।
और उन खिड़कियों में बारीक नक्काशीदार जालियाँ लगी थीं, जिनसे होकर ठंडी, मंद-मंद हवा भी आती रहती थी — न तो बहुत तेज़ कि वह असहज करे, न बहुत धीमी कि वह महसूस न हो। वह हवा शरीर को स्पर्श करती थी, मानो कोई अदृश्य हाथ पुचकार रहा हो।
फिर वह कुछ आध्यात्मिक सामग्रियाँ — कुछ दुर्लभ पत्थर, कुछ पवित्र धातुओं के टुकड़े उस कमरे में लाता है। वह बड़ी सावधानी से, बिना कोई गलती किए, उन सामग्रियों को एक निश्चित ज्यामितीय पैटर्न में बिछाने लगता है। और धीरे-धीरे, जैसे कोई चित्रकार अपनी कलाकृति बनाता है, वह कमरे के चारों ओर एक जाल — एक अदृश्य, आध्यात्मिक जाल — बुनने लगता है। कुछ ही देर में, जैसे ही वह अपनी क्रिया पूरी करता है, वह जाल पूरी तरह से बनकर तैयार हो जाता है — मानो कोई मकड़ी ने अपना शानदार जाला बुना हो।
फिर विराज एक खाली गमला लेकर आता है — और उस जाल के ठीक बीचोंबीच उस गमले को रख देता है।
वैसे तो वह गमला उस जाल के बीच में रखा हुआ था — उसे कोई छू सकता था, कोई देख सकता था यदि वह जाल के अंदर होता। परंतु जाल के बाहर, और कमरे के बाहर से — यदि कोई व्यक्ति उस कमरे के दरवाज़े से अंदर झाँकता — तो उसे वह कमरा पूरी तरह से खाली नज़र आता। न वह जाल दिखाई देता था, न वह गमला दिखाई देता था, न कोई अन्य वस्तु। वह कमरा एकाएक निर्जन, खाली, बिना किसी विशेषता के प्रतीत होता था — मानो उसमें कभी कोई वस्तु रखी ही न गई हो।
दरअसल, विराज ने एक अत्यंत शक्तिशाली और दुर्लभ जाल बनाया था जिसे 'अज्ञात जाल' कहा जाता है। इस जाल का विशेष गुण यह होता है कि इसके अंदर अगर कुछ भी रखा हो — चाहे वह कोई अमूल्य खजाना हो, कोई जड़ी-बूटी हो, या कोई पौधा — तो उसकी आभा पूरी तरह से दब जाती है, और वह दृष्टि से भी ओझल हो जाता है। बाहर से देखने वाले व्यक्ति को उसके अस्तित्व का कोई एहसास नहीं होता — न तो उसकी उपस्थिति का, न उससे निकलने वाली ऊर्जा का, न उसके द्वारा उत्पन्न किसी भी तरह के प्रभाव का। यह जाल छिपने का एक उत्तम साधन था, और केवल उन्हीं लोगों को दिखाई देता था जो जाल के अंदर होते हैं।
फिर विराज अपनी भंडारण अंगूठी से — उस नई अंगूठी से जो उसे उस गुफा में मिली थी — साधना ज्ञान के पौधे के बीज को धीरे से निकालता है और सावधानी से उस गमले की मिट्टी में डाल दिया, एक निश्चित गहराई में।
इसके बाद, वह अपनी उसी नई भंडारण अंगूठी के अंदर जो जड़ी-बूटियों के बक्से रखे हुए थे — उन सबको एक-एक करके बाहर निकाल लेता है। उन सारी आध्यात्मिक जड़ी-बूटियों को, उनके रंग, उनके गुण, उनके स्तर के अनुसार, एक निश्चित क्रम में रख देता है।
फिर विराज क्रमबद्ध तरीके से उन जड़ी बूटियों को अपनी आध्यात्मिक ऊर्जा से तरल अवस्था में बदलकर बूंद-बूंद करके सही मात्रा में गमले में डालने लगता है।
दरअसल, कल रात उसने इस विषय पर भी गहराई से विचार किया था। उसने सोचा था कि आखिर वह व्यक्ति, जिसका कंकाल उसे गुफा में मिला था, उसके पास इतनी दुर्लभ वस्तुएँ कैसे आईं, और वह किस उद्देश्य से वहाँ रहता था। और फिर उसे यह अंदाज पड़ गया था कि जिस व्यक्ति का वह कंकाल था, वह व्यक्ति निश्चित रूप से साधना ज्ञान के पौधे के बीज को अंकुरित करने की कोशिश कर रहा होगा।
परंतु वह अपने प्रयासों में सफल नहीं हो पाया होगा — क्योंकि शायद उसे इसका सही तरीका पता नहीं था। इसीलिए कई बार असफल होने के बाद, उसने हार मान ली होगी, और उस आखिरी साधना ज्ञान के पौधे के बीज को — जो शायद उसके पास बचा था — छोड़ दिया होगा, और उन सामग्रियों को भी जो उसने इकट्ठा किया था।
परंतु विराज — जिसके पास पुराने जन्म का सम्पूर्ण ज्ञान था, वो साधना ज्ञान के पौधे के बीज को अंकुरित करना जानता था।
इस सम्पूर्ण प्रक्रिया को करने में उसे पूरे बारह घंटे लग गए — सुबह से शाम तक, बिना रुके, बिना थके, बिना भोजन-पानी के। शाम ढलते-ढलते, जब सूरज की अंतिम किरणें क्षितिज में विलीन हो रही थीं, विराज पूरी तरह से थक चुका था। उसके शरीर से पसीना टपक रहा था, उसके हाथ काँप रहे थे, उसकी आध्यात्मिक ऊर्जा लगभग समाप्त हो चुकी थी। परंतु उसके चेहरे पर एक हल्की सी, संतुष्ट और शांत मुस्कान थी — क्योंकि वह जानता था, उसे पूरा विश्वास था, कि वह बीज निश्चित रूप से अंकुरित होगा। उसने सब कुछ सही किया था, बिल्कुल सही।
वैसे साधना ज्ञान का पौधा एक दिव्य, अलौकिक पौधा है। इसे विकसित होने में न्यूनतम बीस दिन लगते हैं, और इसमें पहले पत्ती आती है — एक छोटी सी, हल्की हरी, लगभग पारदर्शी सी पत्ती, जो सूरज की रोशनी में हीरों की तरह चमकती है।
उसके बाद, इस पौधे को न तो पानी देने की कोई आवश्यकता होती है, न ही किसी अन्य सामग्री या उर्वरक की। यह प्रकृति से स्वयं ही — अपने चारों ओर फैली आध्यात्मिक ऊर्जा को, वायु में उपस्थित सूक्ष्म कणों को, सूर्य के प्रकाश में समाई दिव्य शक्ति को — अवशोषित करके, ग्रहण करके, स्वतः ही विकसित होता रहता है, दिन-प्रतिदिन और अधिक बड़ा, अधिक शक्तिशाली होता जाता है।
लेकिन किसी भी साधक — चाहे वह कितना भी ताकतवर क्यों न हो — उसके लिए साधना ज्ञान का पौधा अत्यंत महत्वपूर्ण, लगभग अमूल्य होता है। यह किसी भी साधक को सबसे तेज़ गति से, सबसे सुरक्षित मार्ग से, महाशक्तिमान योद्धा बना सकता है।
परंतु विराज को वास्तव में इस पौधे की अपने लिए कोई आवश्यकता नहीं थी। विराज के पास अपने पुराने जन्म के ज्ञान के कारण और भी कई तरीके थे — कहीं अधिक उन्नत, कहीं अधिक प्रभावी, कहीं अधिक स्थायी तरीके — जिनसे वह साधना के मार्ग पर और अधिक बेहतर, और अधिक गहराई से चल सकता था। उसे इन पौधों की, इन सहारों की आवश्यकता नहीं थी; वह अपने आप में एक परिपूर्ण साधक था।
परंतु उसने इस साधना ज्ञान के पौधे को अंकुरित करने का एक दूसरा, अधिक गहरा कारण सोचा था।
उसे नहीं पता था कि उसकी पत्नी रवीना किस तरह की साधना विधि का इस्तेमाल कर रही थी, किन तकनीकों का अभ्यास कर रही थी। उसे नहीं पता था कि उसकी साधना का स्तर क्या था — वह किस चरण में थी, कितनी शक्तिशाली थी, किन क्षमताओं को विकसित कर चुकी थी।
यदि वह इस साधना ज्ञान के पौधे को उसे दे देता है — तो वह उसके बाद पूरी तरह से निश्चिंत हो सकता है कि उसकी पत्नी रवीना एक निश्चित समय आने पर महाशक्तिमान बन सकती है। और विराज ये भी जानता था कि रवीना इस पौधे का उपयोग ठीक से कर सकती है, क्योंकि उसके पास आचार्य विदुर जैसे गुरु का मार्गदर्शन था।
रवीना जब एक महाशक्तिमान बन जाएगी — तो वह मंगल ग्रह के सबसे शक्तिशाली लोगों में से एक बन जाएगी। उसका नाम उन महान योद्धाओं के साथ लिया जाएगा, जिनका सामना करने की कोई हिम्मत नहीं करता।
यदि देखा जाए तो, साधना ज्ञान का पौधा एक आध्यात्मिक विचित्र सामग्री है — अद्वितीय, अनोखी, बेजोड़। इसके फायदे तो असंख्य हैं, अगणित हैं — यह साधक को सीमाओं को पार करने की क्षमता देता है। परंतु इसके साथ एक बहुत बड़ा नुकसान भी जुड़ा हुआ है — इसका आकर्षण इतना प्रबल है कि कोई भी इसे पाने से अपने आप को रोक नहीं सकता।
मंगल ग्रह पर यह पौधा अत्यंत दुर्लभ है — इतना दुर्लभ कि शायद ही किसी के पास इसका एक भी बीज बचा हो। यदि इसकी मात्रा अधिक होती — यदि यह सुलभ होता — तो मंगल ग्रह की आध्यात्मिक ऊर्जा इतनी दुर्बल, इतनी क्षीण न होती। यह पौधा स्वयं ऊर्जा का सृजन करता है, उसे बढ़ाता है, उसे समृद्ध बनाता है।
अब, चूँकि यह पौधा अनोखा और अमूल्य है, तो हर कोई — हर साधक, हर योद्धा, हर कुल, हर संगठन — इसे पाना चाहेगा। और जिस साधक के पास भी यह होगा, हर कोई उससे इसे प्राप्त करना चाहेगा — कभी मोल-भाव करके, कभी धमकी देकर, कभी छल से, कभी बल से।
परंतु विराज को ऐसी कोई चिंता करने की आवश्यकता नहीं थी, न ही उसके मन में इस विषय को लेकर कोई भय था। क्योंकि रवीना आचार्य विदुर की मुख्य शिष्य थी — वह उस महान, प्रतापी, अजेय आचार्य की सबसे करीबी, सबसे प्रिय शिष्या थी। और उससे यह पौधा छीनने का प्रयास करना — उसकी संपत्ति को हथियाने का प्रयास करना — सीधे आचार्य विदुर की प्रतिष्ठा को ठेस पहुँचाने के समान होगा। और मंगल ग्रह पर ऐसा कोई भी व्यक्ति या संगठन नहीं था, जो आचार्य विदुर का सामना कर सके, जो उनके क्रोध को झेल सके। इसलिए, रवीना सुरक्षित थी, और उसके साथ वह पौधा भी सुरक्षित था।