अध्याय 12 काल मुख घाटी का संकट
दरअसल, विराज की शिकार यात्रा पंद्रह दिन नहीं, बल्कि चौदह दिन में ही समाप्त हो गई थी। उसने जंगल में जितने दिन रहने की योजना बनाई थी, उससे एक दिन पहले ही उसका अभियान पूरा हो गया। और वह जंगल से बड़े आराम से, मानो कोई सामान्य यात्रा ही कर रहा हो, काल मुख घाटी से बाहर निकल रहा था, तभी अचानक उसका सामना तीसरे चरण के आध्यात्मिक काले भालू से हो गया।
उस तीसरे चरण के काले भालू ने, जो अपनी चालाकी और क्रूरता के लिए जाना जाता था, एक छोटे से दर्रे के पीछे से बिना कोई आवाज किए, बिल्ली की तरह चुपके से निकलकर विराज के ऊपर अचानक हमला कर दिया। यह हमला इतना अप्रत्याशित था कि कोई भी साधारण योद्धा उसकी चपेट में आ जाता। उस भयानक हमले में विराज तो अपने पुराने जन्म के अनुभव और सूझबूझ की बदौलत किसी तरह बच गया।
परंतु जिस साधारण घोड़े पर वह जंगल से बाहर निकल रहा था, उस तीसरे चरण के काले भालू का वह पहला ही हमला सीधा उस बेचारे घोड़े पर जा लगा। वह घोड़ा कोई प्रशिक्षित युद्ध-घोड़ा नहीं था, उसे इस तरह के आध्यात्मिक हमले का सामना करने का कोई अनुभव नहीं था। घोड़ा इस हमले से बचने के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं था, उसके पास न तो समय था और न ही क्षमता कि वह किसी तरह भाग सके। हमला इतना शक्तिशाली और सटीक था कि घोड़े की तुरंत वहीं मौत हो गई, उसकी आंखों में मृत्यु से पहले केवल भय और व्यथा झलक रही थी।
उसके बाद उस तीसरे चरण के काले भालू ने विराज को अपना शिकार बना लिया, जैसे कोई बिल्ली चूहे के साथ खेलती है। और फिर उसने विराज पर लगातार हमला करना शुरू कर दिया, बिना उसे कोई राहत दिए, बिना उसे सांस लेने का मौका दिए।
उस तीसरे चरण के काले भालू की सम्पूर्ण ताकत की तुलना अगर किसी मानव साधक से की जाए, तो वह शक्ति सम्राट योद्धा के पहले स्तर के बराबर होगी। यह कोई साधारण जानवर नहीं था, बल्कि एक आध्यात्मिक प्राणी था जिसने अपने कठोर तप और संघर्ष से इतनी शक्ति अर्जित कर ली थी।
और विराज तो अभी भी पहले चरण के योद्धा के रूप में अपनी यात्रा शुरू ही कर रहा था। यदि एक सामान्य योद्धा के रूप में उसकी ताकत का अनुमान लगाया जाए, तो विराज की वर्तमान स्थिति लघु लड़ाकू योद्धा के तीसरे स्तर पर है। यदि इन दोनों की तुलना की जाए, तो तीसरे चरण का वह काला भालू विराज को एक चुटकी में, बिना कोई अधिक प्रयास किए, मार सकता था। कहने का तात्पर्य यह था कि उस काले भालू के सामने, विराज किसी छोटे, असहाय खरगोश के समान था, जिसे वह काला भालू जब चाहे, जैसे चाहे, मार सकता था।
परंतु विराज के पास उसके पुराने जन्म का सम्पूर्ण अनुभव और ज्ञान था — वह ज्ञान जो सैकड़ों वर्षों के तप, संघर्ष और युद्धों से अर्जित किया गया था। जिसके कारण उसे मारना लगभग असंभव था, क्योंकि वह हर हमले का अनुमान लगा सकता था, हर चाल को पढ़ सकता था। लेकिन इस समय विराज के लिए भी उस तीसरे चरण के काले भालू को मारना भी उतना ही असंभव था।
क्योंकि विराज को अपने पुराने जीवन की स्मृतियाँ आए हुए अभी कुछ ही महीने हुए थे, और उसका यह नया, युवा शरीर अभी भी पूरी तरह से उसके नियंत्रण में नहीं था। उसके नसों में प्रवाहित होने वाली आध्यात्मिक ऊर्जा की मात्रा भी सीमित थी, और उसकी मांसपेशियों की सहनशक्ति भी अभी विकसित नहीं हुई थी। इसीलिए विराज और उस काले भालू के बीच काल मुख घाटी में एक भीषण और लंबी लड़ाई शुरू हो गई।
उस लड़ाई के दरमियान, अपनी जान बचाने और प्रतिकार करने के लिए, विराज को ना चाहते हुए भी अनंत प्रकाश तकनीक की पहली फॉर्म 'एक प्रकाश' और अनंत प्रकाश तकनीक की चौथी फॉर्म 'स्वर्णिम घेरा' का इस्तेमाल करना पड़ा। ये दोनों तकनीकें अत्यधिक शक्तिशाली थीं, परंतु इनका उपयोग करने पर शरीर को भारी क्षति पहुँचती है। इन हमलों के कारण तीसरे चरण के काले भालू को गंभीर चोटें आईं — उसके शरीर पर गहरे घाव हो गए, उसका एक पंजा लगभग बेकार हो गया। परंतु लघु चरण के तीसरे स्तर पर होने के कारण, विराज को भी कई सारी आंतरिक चोटें आई थीं, उसके फेफड़े कमजोर पड़ गए थे, उसकी रीढ़ की हड्डी में दरार आ गई थी।
उस लड़ाई के दरमियान तीसरे चरण के काले भालू को आभास हो चुका था कि विराज को मारना इतना आसान नहीं है जितना उसने पहले सोचा था। यह मनुष्य छोटा था, परंतु उसके पास कोई अद्भुत ज्ञान था जिसे वह समझ नहीं पा रहा था। परंतु उस काले भालू ने, अपनी क्रूरता और हठधर्मिता के कारण, हमले जारी रखे। विराज भी उसका डटकर सामना करता रहा, चाहे उसका शरीर टूट रहा था, चाहे उसके हाथ काँप रहे थे।
तभी, उस काल मुख घाटी में लड़ते-लड़ते, अत्यधिक थकान और चोटों के कारण विराज का पैर फिसल जाता है। पसीने और खून से तर पत्थरों पर उसका पैर टिक नहीं पाता। और वह वहाँ दो विशाल पत्थरों की गहरी दरार के बीच नीचे अन्धकार में गिर जाता है। विराज पहले से ही अत्यधिक आध्यात्मिक ऊर्जा का इस्तेमाल करने के कारण बुरी तरह घायल था, उसके पास खुद को बचाने की भी शक्ति नहीं बची थी।
जैसे ही वह उस संकरी दरार से नीचे गिरता है, उसका शरीर कई बार नुकीले पत्थरों पर हल्का-हल्का टकराता है — एक बार उसकी पीठ, एक बार उसका कंधा, एक बार उसका सिर। और अंत में वह दरार के एक कोने में जाकर गिर जाता है, जहाँ थोड़ी समतल जमीन थी। उसका सिर पत्थर से टकराता है, और वह तुरंत बेहोश हो जाता है, उसके शरीर से खून रिस रहा होता है, उसकी साँसें धीमी पड़ जाती हैं।
इस घटना को देखकर वह तीसरे चरण का काला भालू बहुत अधिक क्रोधित हो जाता है। उसकी लाल आँखों से आग बरस रही थी। क्योंकि वह दरार इतनी संकरी थी कि वह विशालकाय भालू नीचे नहीं जा पा रहा था — उसका भारी शरीर उस छोटे से छेद में फँस जाता। और विराज नीचे उसकी पहुँच से बहुत दूर था, इतनी गहराई में कि उसकी आवाज भी शायद वहाँ तक नहीं पहुँचती थी। भालू को वहाँ जाने का कोई दूसरा रास्ता नज़र नहीं आ रहा था। उसने कई बार अपने पंजों से दरार को चौड़ा करने की कोशिश की, परंतु पत्थर अत्यधिक कठोर थे। कुछ देर हताश प्रयास करने के बाद, गुस्से और निराशा से भरा हुआ वह भालू वहाँ से चला जाता है, अपने घावों को चाटता हुआ जंगल की गहराइयों में लौट जाता है।
भालू के चले जाने के काफी देर बाद, जब सन्नाटा पूरी तरह छा गया था और केवल ऊपर से हल्की हवा की आवाज़ आ रही थी, तब विराज की आँखें धीरे-धीरे खुल जाती हैं। पहले तो उसे कुछ दिखाई नहीं देता — चारों ओर अंधकार ही अंधकार था। वह अपने चारों ओर के वातावरण को ध्यान से देखता है, अपनी धुंधली होती आँखों को एक जगह टिकाता है, और तब उसे पता पड़ जाता है कि वह कहाँ है और क्या हुआ है। वह एक गहरी, लंबी सांस लेता है, अपने शरीर का आकलन करने की कोशिश करता है।
तभी उसके मुंह से हल्का सा खून आ जाता है — एक काला, गाढ़ा खून जो उसके आंतरिक अंगों के क्षतिग्रस्त होने का संकेत था। वह पूरी तरह समझ चुका था कि वह आंतरिक तौर पर गंभीर रूप से घायल हो चुका है। उसकी आंतों में मरोड़ थी, उसके फेफड़ों में पानी भर गया था, और उसकी रीढ़ में एक दरार थी जिससे हर साँस लेने पर दर्द होता था।
वह तुरंत, बिना समय गवाए, अपनी भंडारण अंगूठी में से कुछ औषधीय गोलियाँ निकालता है। और उन्हें अपने मुंह में रख लेता है, धीरे-धीरे उन्हें निगलता है।
औषधीय गोलियों ने तुरंत अपना असर दिखाना शुरू कर दिया। पहले तो उसे हल्की गर्मी महसूस हुई, फिर वह गर्मी उसकी हर नस में फैलने लगी, हर क्षतिग्रस्त कोशिका का पुनर्निर्माण करने लगी। मात्र तीस मिनट के भीतर ही वह पूरी तरह से ठीक हो चुका था — उसकी रीढ़ जुड़ गई थी, उसके फेफड़े साफ हो गए थे, उसकी आंतों ने अपना स्थान पा लिया था।
जिस समय विराज औषधीय गोलियाँ खाने के बाद आराम कर रहा था, अपनी शक्ति वापस पाने की कोशिश कर रहा था, उसी समय उसने यहाँ से निकलने के रास्ते के बारे में गहराई से सोच लिया था। ऊपर जाने का कोई मतलब नहीं था — वहाँ वह भालू अभी भी हो सकता था, और यह दरार चढ़ने योग्य भी नहीं थी।
वह धीरे-धीरे खड़ा होता है, अपने कपड़ों की धूल झाड़ता है, और एक तरफ बने संकरे से रास्ते की तरफ चल देता है। उसने ऊपर जाने के बजाय उन संकरी, अंधेरी दरारों से होकर निकलने का रास्ता चुना था — जो शायद कभी किसी नदी का मार्ग रहा होगा, या किसी भूमिगत गुफा तक जाता होगा।
लगभग एक घंटे बाद, अंधेरी और भूलभुलैया जैसी उन बंद गुफाओं के जाल से होता हुआ, वह ऐसी जगह पहुँचता है जो किसी के रहने के लायक लग रही थी। यहाँ एक छोटा सा कक्ष था, जिसकी दीवारों पर आदिम नक्काशी थी, और फर्श पर कुछ बिखरी हुई वस्तुएँ पड़ी थीं। परंतु इस स्थान को वीरान हुए काफी समय हो गया था, शायद सदियाँ बीत चुकी थीं।
तभी विराज की नज़र एक पत्थर के पलंग के ऊपर पड़े हुए एक कंकाल पर जाती है। हड्डियाँ पूरी तरह सूख चुकी थीं, कुछ तो चूर हो गई थीं। उस कंकाल को देखकर विराज बिल्कुल भी नहीं बता सकता था कि यह व्यक्ति अपने जीवन में किस चरण का योद्धा रहा होगा — समय ने उसकी सारी पहचान मिटा दी थी।
विराज चारों तरफ ध्यान से देखता है, तो उसे पत्थर के टूटे-फूटे बर्तन दिखाई देते हैं — कुछ कटोरे, कुछ घड़े, एक टूटी हुई कुल्हाड़ी। उन्हें देखकर भी साफ पता चल रहा था कि इन्हें यहाँ पड़े हुए सौ साल से ज्यादा हो चुके हैं, या उससे भी कहीं अधिक समय बीत चुका होगा, शायद पाँच सौ वर्ष भी। उस गुफा के अंदर विराज को कोई भी कीमती चीज़ दिखाई नहीं देती — सब कुछ टूट चुका था।
वह चारों तरफ अच्छी तरह देखने के बाद, यह सुनिश्चित कर लेने के बाद कि यहाँ कोई तत्काल खतरा नहीं है, पता नहीं क्या सोचते हुए — उस हड्डियों के कंकाल की तरफ चला जाता है।
वह अभी उस कंकाल को ध्यान से देख ही रहा था, उसकी हड्डियों की बनावट और उन पर पड़ी दरारों का निरीक्षण कर रहा था, तभी उसकी नज़र उस कंकाल की एक हाथ की उंगली पर जाती है। वहाँ, उस सूखी हुई हड्डी के चारों ओर, शायद उसने एक भंडारण अंगूठी पहनी हुई थी। परंतु लंबे समय से धूल और मिट्टी के जमाव के कारण वह दिखाई नहीं दे रही थी, और उसकी कोई चमक भी नहीं थी — वह एक साधारण, मुरझाई हुई धातु के टुकड़े जैसी लग रही थी।
विराज जैसे ही कंकाल का हाथ उठाता है, धूल छँट जाती है और वह भंडारण अंगूठी साफ-साफ दिखाई देने लगती है। उसकी सतह पर बेहद बारीक नक्काशी थी, जो केवल एक अनुभवी कारीगर ही कर सकता था। यह साधारण भंडारण अंगूठी नहीं थी, बल्कि एक उच्च कोटि की थी।
विराज उसे हड्डियों से सावधानीपूर्वक निकालता है, मानो किसी खजाने को छू रहा हो, और अपनी एक दूसरी उंगली में पहन लेता है। भंडारण अंगूठी का मालिक बहुत पहले मर चुका था, इसी वजह से अब उस अंगूठी के ऊपर कोई आध्यात्मिक प्रतिरोध नहीं था।
जैसे ही विराज की चेतना उस भंडारण अंगूठी के भीतर प्रवेश करती है, उसकी आँखें फटी की फटी रह जाती हैं।
यह भंडारण अंगूठी आम भंडारण अंगूठियों की तुलना में बहुत बड़ी थी — इसका आंतरिक क्षेत्रफल उसकी अपनी भंडारण अंगूठी से पचास गुना अधिक विशाल था। यह एक छोटे से कमरे के बराबर था, जिसमें सामान रखने के लिए अलग-अलग खंड बने हुए थे। इसके अंदर बहुत सारी आध्यात्मिक जड़ी-बूटियाँ भरी हुई थीं ।
आध्यात्मिक जड़ी-बूटियों पर अपनी नज़र डालने के बाद — उनकी गुणवत्ता, उनकी आयु, उनका स्तर जाँचने के बाद — विराज की नज़र दूसरी तरफ जाती है, जहाँ हथियार रखे हुए थे।
उसे भंडारण अंगूठी में एक उच्च आध्यात्मिक तलवार रखी हुई दिखाई देती है। वह तलवार इतनी सुंदर और इतनी शक्तिशाली लग रही थी कि उसे देखते ही विराज का हृदय तेज़ धड़कने लगा। इस उच्च आध्यात्मिक तलवार की गुणवत्ता को देखकर वह बता सकता था कि यह उच्च आध्यात्मिक तलवारों में भी श्रेष्ठ तलवार थी — इसकी धार इतनी तेज़ थी कि हवा को भी काट सकती थी, इसके ब्लेड पर अजीबोगरीब नक्षत्र उकेरे गए थे जो रोशनी में चमकते थे।
विराज ने मन-ही-मन सोच लिया था कि जब वह शक्ति सम्राट योद्धा बन जाएगा, उसकी शक्ति उस स्तर पर पहुँच जाएगी, तब वह इस तलवार का इस्तेमाल करेगा। अभी नहीं, अभी उसका शरीर इस तलवार के भार को वहन नहीं कर सकता था, उसकी आध्यात्मिक ऊर्जा इसकी प्यास नहीं बुझा सकती थी।
फिर उसकी नज़र एक और तलवार पर पड़ती है — यह आत्मा तलवार थी। विराज ने साँस रोक ली। आत्मा तलवार सभी तलवारों का श्रेष्ठतम रूप होती है। जब इस तलवार का निर्माण किया जाता है, तब एक आध्यात्मिक जानवर की सम्पूर्ण आत्मा — उसकी चेतना, उसकी शक्ति, उसके संस्कार — इसके भीतर स्थापित कर दी जाती है। प्रत्येक आत्मा तलवार का एक निश्चित स्तर होता है, जिसे समय के साथ बढ़ाया जा सकता है। इसे बढ़ाने का एकमात्र तरीका यह होता है कि यह अन्य आध्यात्मिक तलवारों को अपने भीतर सोख लेती है, उनकी शक्ति को पचा लेती है, और अधिक शक्तिशाली बनती जाती है।
प्रत्येक आत्मा तलवार अपने स्वामी योद्धा से मानसिक और आध्यात्मिक रूप से जुड़ी रहती है। जब उसका स्वामी युद्ध में मारा जाता है या किसी अन्य कारण से उसका देहांत हो जाता है, तो उसमें उपस्थित अन्य आत्मा तलवारों से प्राप्त की गई सारी अतिरिक्त शक्ति पुनः संसार में विलीन हो जाती है, प्रकृति को लौट जाती है, और वह तलवार अपनी प्रारंभिक, मूल अवस्था में आ जाती है — जैसे एक नवजात शिशु नया जीवन शुरू करता है।
चूँकि इस तलवार का स्वामी बहुत पहले मर चुका है, इसलिए अब कोई भी इस आत्मा तलवार का उपयोग कर सकता है। परंतु आत्मा तलवार का सही उपयोग करने के लिए, उसकी पूरी क्षमता को जगाने के लिए, विराज को महाशक्ति सम्राट चरण में पहुँचना होगा — जो उसके लिए अभी संभव नहीं था।
फिर उसकी नज़र कुछ प्राचीन दस्तावेजों पर पड़ती है। वह उन्हें धीरे से उठाता है, और ध्यानपूर्वक पढ़ने लगता है।
तब उसे पता चलता है कि यहाँ तीन तलवार तकनीकें रखी हुई हैं। तलवारों की पूरी व्याख्या, उनके उपयोग के नियम, उनकी सीमाएँ, उनकी फॉर्म — सब कुछ विस्तार से लिखा हुआ था।
फिर उसके बाद उसकी नज़र एक छोटे से डिब्बे पर पड़ती है। वह डिब्बे को खुलता है, उसके अंदर एक बीज निकलता है, वह बीज किसी अखरोट के आकार का था, परंतु उससे निकलने वाली आध्यात्मिक ऊर्जा इतनी प्रबल थी कि पूरा भंडारण कक्ष उससे प्रकाशित हो रहा था।
यह देखकर विराज बहुत चौंक जाता है — उसकी आँखें फिर से फटी रह जाती हैं, उसके मुँह से एक अचेतन ध्वनि निकलती है। क्योंकि उसे इस सांसारिक दुनिया में इस फल के बीज के प्राप्त होने की बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी। यह फल का बीज साधना ज्ञान के पौधे का बीज है — जो केवल देवताओं के बगीचों में पाया जाता है, इस मंगल ग्रह की पहुँच से कोसों दूर।
इन सब के बाद — सब कुछ देख लेने के बाद, हर वस्तु का मूल्यांकन कर लेने के बाद — विराज उस गुफा से बाहर निकल आता है, उस अंधकार को पीछे छोड़ता हुआ।
और फिर वह सीधा इंदौर शहर की ओर बढ़ने लगता है,।
आज — ठीक पंद्रहवें दिन — वह इंदौर शहर के मुख्य दरवाजे के सामने खड़ा होता है। उसके चेहरे पर एक संतुष्ट मुस्कान है, उसके कदमों में एक नया आत्मविश्वास है, और उसकी आँखों में एक नई चमक है। सूर्यास्त की सुनहरी रोशनी उसके चेहरे पर पड़ती है, और वह अपने घर की ओर कदम बढ़ाता है।