अध्याय 11 अस्सी शिकार और एक रहस्य
मगध साम्राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र में हो रही अराजक गतिविधियों और राजनीतिक उथल-पुथल से कोसों दूर, विराज लगभग पंद्रह दिनों के लंबे अंतराल के बाद अपनी शिकार यात्रा से वापस इंदौर शहर की ओर आ रहा था। उसके मन में संतोष की गहरी लहर थी, क्योंकि यह यात्रा उसके लिए केवल एक साधारण शिकार अभियान से कहीं अधिक सिद्ध हुई थी।
विराज के लिए यह यात्रा उम्मीद से कहीं-कहीं ज्यादा बेहतर किस्मत लेकर आई थी। उसने अपनी सारी गणनाओं को धूल चटा दिया था, और जो उसे प्राप्त हुआ, वह उसके प्रारंभिक लक्ष्यों से कहीं अधिक मूल्यवान था।
इस यात्रा के अप्रत्याशित सफल परिणाम के पीछे कई वजहें थीं, जिनमें से प्रत्येक ने मिलकर उसके भाग्य का दरवाजा खोल दिया था।
जब विराज इंदौर शहर से इस शिकार यात्रा के लिए निकला था, तो उसने अपना लक्ष्य केवल दो प्रमुख चीजों पर ही केंद्रित रखा था। सबसे पहले और सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य यह था कि उसे पहले चरण के आध्यात्मिक जानवरों का शिकार करके उनके शरीर के बहुमूल्य अंगों को इकट्ठा करना था, जिन्हें बेचकर वह अपनी आगे की साधना के लिए आवश्यक आध्यात्मिक जड़ी-बूटियाँ और सामग्रियाँ खरीद सके। और दूसरा लक्ष्य उसने यह बनाया था कि शिकार के दौरान प्रतिदिन नियमित रूप से वह अपनी तलवार की गहन साधना करेगा, ताकि अपने पिछले जन्म के कौशल को धीरे-धीरे जाग्रत कर सके।
पुनर्जन्म की यादें आने के बाद से विराज ने अभी तक एक बार भी तलवार का औपचारिक अभ्यास नहीं किया था, बल्कि उसका पूरा ध्यान संपूर्ण सूर्य साधना विधि का इस्तेमाल करके अपने शरीर के भीतर मौजूद सभी प्रकार की अशुद्धियों और आध्यात्मिक अवरोधों को पूरी तरह से बाहर निकालने में लगा हुआ था। उसने अपने शरीर को एक नया रूप देने की ठान ली थी, क्योंकि अब वह जानता था कि पुराने जन्म की कमजोर नींव ने ही उसे अंततः विनाश के कगार पर पहुँचा दिया था।
इसी कठोर साधना के परिणामस्वरूप उसने पूरी सफलता हासिल कर ली थी — वह लघु चरण योद्धा के शून्य स्तर से तीसरे स्तर तक पहुँच गया था। यह एक सामान्य योद्धा के लिए लगभग असंभव था, परंतु विराज का पुनर्जन्म उसे यह अद्भुत लाभ दे गया था।
इसके अलावा, वह लगातार विभिन्न मार्शल आर्ट्स का इस्तेमाल करके अपने शरीर को युद्ध की तीव्र गति और हर संभव स्थिति के अनुसार ढालने की कोशिश कर रहा था। वह चाहता था कि उसकी मांसपेशियाँ और नसें बिना किसी सोच-समझ के, बिना किसी देरी के, वही करें जो उसका मन लड़ाई के मैदान में चाहता है।
वैसे तो विराज अपने घर के सीमित आंगन में भी अपनी तलवार तकनीक का नियमित अभ्यास कर सकता था, परंतु उसके सूर्यकुल की सामान्य तलवार तकनीक भी इतनी घातक और प्रभावशाली थी कि उसे छिपाना आवश्यक हो गया था। यदि वह गलती से भी अपनी असली क्षमता का एक छोटा सा अंश भी आम लोगों के सामने प्रकट कर देता, तो इससे वहाँ आसपास के लोगों का ध्यान तो आकर्षित होता ही, लेकिन वह उनकी दृष्टि में केवल एक असाधारण युवा योद्धा मात्र होता। परंतु यदि उससे अनजाने में भी अपने सूर्यकुल की मुख्य तलवार तकनीक का उपयोग कर लेता, तो वहाँ उपस्थित हर व्यक्ति की आँखें उस पर टिक जातीं और विराज उस समय किसी का भी ध्यान अपनी ओर आकर्षित नहीं करना चाहता था। वह अभी छाया में रहकर अपनी नींव को पुख्ता करना चाहता था।
विराज के पुनर्जन्म से पहले के जीवन में, सूर्यकुल की मुख्य धरोहर के रूप में एक दिव्य तलवार तकनीक सिखाई जाती थी, जिसे 'अनंत प्रकाश तलवार तकनीक' के नाम से जाना जाता था। यह तकनीक केवल एक साधारण युद्धकला नहीं थी, बल्कि यह एक ऐसा शस्त्र विज्ञान था जो आत्मा और शरीर दोनों को जला डालने की क्षमता रखता था।
इस तलवार तकनीक में कुल आठ फॉर्म हुआ करती थी, यही वह ज्ञान था जो सूर्यकुल के सामान्य सदस्यों और बाहरी लोगों को दिया जाता था। इन फॉर्मों को सूर्यकुल के सदस्यों के पदों और साधना स्तर के अनुसार क्रमशः सिखाया जाता था — योद्धा का स्तर जितना ऊँचा होता था, उसे उतनी ही अधिक फॉर्मों तक पहुँच प्रदान की जाती थी। यह एक सख्त पदानुक्रम था, जिसे तोड़ने का साहस कोई नहीं करता था।
पर यह कथन पूर्ण सत्य नहीं है, क्योंकि सूर्यकुल की अनंत प्रकाश तलवार तकनीक में वास्तव में आठ नहीं, बल्कि पंद्रह गुप्त फॉर्म थीं। इस दिव्य रहस्य का पता विराज को तब लगा जब उसने अपने जीवन के सबसे कठिन और भयावह परीक्षणों में से एक — मृत पूर्वजों की परीक्षा — को सफलतापूर्वक पार किया था।
उस समय उसे अपने सूर्यकुल की बाकी की अन्य छिपी हुई तलवार तकनीकों की फॉर्म और उनकी भयानक शक्तियों के बारे में भी ज्ञात हुआ था। वे फॉर्म इतनी विनाशकारी थीं कि केवल उनके नामों का उच्चारण भी वातावरण में गर्मी ला सकता था।
सूर्यकुल की अनंत प्रकाश तलवार तकनीक की प्रत्येक फॉर्म में 16 से लेकर अधिकतम तलवार के 30 हमले होते थे, इस तलवार तकनीक की फॉर्म के नाम —
प्रथम फॉर्म: एक प्रकाश — यह सबसे प्राथमिक, फिर भी सबसे शुद्ध रूप था, जिसमें तलवार की नोक एक ही बिंदु पर केंद्रित प्रकाश की किरण बन जाती थी।
द्वितीय फॉर्म: तीन दिशा — तलवार एक साथ तीन अलग-अलग दिशाओं में हमला करती थी, जिससे दुश्मन के लिए यह भेद पाना असंभव हो जाता था कि सच्चा वार कहाँ होगा।
तृतीय फॉर्म: सूर्य उदय — यह फॉर्म इतना दीप्तिमान होता था कि मानो सूर्य स्वयं अपनी पहली किरणों के साथ धरती पर अवतरित हो गया हो। तलवार का प्रत्येक वार दिन के उजाले की तरह अवरोधित करना असंभव होता था।
चतुर्थ फॉर्म: स्वर्णिम घेरा — तलवार चलाने वाला अपने चारों ओर सोने जैसा एक अभेद्य घेरा बना लेता था, जो उसे हर तरफ से होने वाले हमलों से बचाता था और साथ ही दुश्मन पर दबाव बनाता था।
पंचम फॉर्म: किरण प्रहार — तीव्रता की पराकाष्ठा, जहाँ तलवार से निकलने वाली हर किरण एक घातक प्रहार में बदल जाती थी। ये किरणें किसी भी दिशा से आ सकती थीं।
षष्ठम फॉर्म: प्रज्वलित वेग — इस फॉर्म में तलवार की गति इतनी अधिक बढ़ जाती थी कि हवा स्वयं जलने लगती थी। यह एक ऐसा आक्रमण था जिसे देखना और फिर बचना, दोनों ही लगभग असंभव थे।
सप्तम फॉर्म: सात सितारे — तलवार सात अलग-अलग दिशाओं से लगातार सात वार करती थी, जैसे आकाश में सात सितारों की एक साथ चमक हो। हर वार पिछले वार से अधिक शक्तिशाली होता था।
अष्टम फॉर्म: सौर चक्रवात — एक भयानक चक्रवात जैसी आकृति बनती थी, जिसमें सौर ऊर्जा का एक विशाल भँवर दुश्मन को अपने भीतर खींचकर भस्म कर देता था।
नवम फॉर्म: प्रकाश का जाल — इतनी बारीक और जटिल तलवार चालें होती थीं कि पूरा वातावरण एक जाल में बदल जाता था। दुश्मन कहीं भी हिलता, तो स्वयं को कटा हुआ पाता था।
दशम फॉर्म: निर्बाध चमक — इस फॉर्म में तलवार चलाने वाला स्वयं प्रकाश बन जाता था। कोई भी बाधा, चाहे वह दीवार हो या ढाल, इसके सामने तुच्छ थी।
ग्यारहवीं फॉर्म: अनंत बिखराव — तलवार अनंत टुकड़ों में बिखर जाती थी, और फिर प्रत्येक टुकड़ा एक स्वतंत्र हथियार की तरह हमला करता था। यह सबसे जटिल और खतरनाक फॉर्मों में से एक थी।
बारहवीं फॉर्म: सूर्य का तेज — जब यह फॉर्म चलाया जाता था, तो मानो सूर्य स्वयं पृथ्वी पर उतर आया हो। इतना भयंकर प्रकाश और ऊष्मा उत्पन्न होती थी कि आसपास का सब कुछ पिघल जाता था।
तेरहवीं फॉर्म: सूर्य ग्रहण — प्रकाश का पूर्ण अभाव और अचानक आया अंधकार। यह फॉर्म छल और चालाकी का परिणाम था, जहाँ दुश्मन कुछ देख ही नहीं पाता था और तब तक उसकी गर्दन कट चुकी होती थी।
चौदहवीं फॉर्म: ब्रह्मांडीय ज्वाला — यह वह रूप था जहाँ केवल सूर्य ही नहीं, बल्कि पूरे ब्रह्मांड की ज्वालाएँ तलवार में समा जाती थीं। यह एक दिव्य और विनाशकारी फॉर्म थी।
पंद्रहवीं फॉर्म: पूर्ण शून्य प्रकाश — सबसे रहस्यमयी और अंतिम फॉर्म। इसमें प्रकाश और अंधकार के बीच का भेद मिट जाता था। जो कुछ भी इसके दायरे में आता था, वह न केवल भौतिक रूप से बल्कि आध्यात्मिक रूप से भी नष्ट हो जाता था।
अपने पिछले जन्म में विराज ने इस तलवार तकनीक की नौवीं और दसवीं फॉर्म पर पूर्ण महारत हासिल कर ली थी। परंतु वह उससे आगे नहीं बढ़ पाया था, क्योंकि उसका दुर्बल शरीर इन दिव्य तकनीकों को आगे सीखने के योग्य नहीं रह गया था। इस विफलता का मुख्य कारण यह था कि विराज ने अपने पुराने जन्म में जब से प्रथम बार साधना प्रारंभ की थी, तब से ही उसने अनगिनत गलतियाँ की थीं — छोटी-छोटी, सामान्य-सी लगने वाली गलतियाँ, जिन्होंने धीरे-धीरे उसकी साधना की बुनियाद को इस तरह कमजोर कर दिया जैसे घर की नींव में दीमक लग जाए। जब तक उसे इन गलतियों का अहसास हुआ, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। उस उम्र में उन त्रुटियों को सुधारना संभव ही नहीं था।
आप इसे इस प्रकार समझ सकते हैं कि पुराना विराज एक शक्तिशाली बृहस्पति ग्रह का योद्धा था, जहाँ आध्यात्मिक ऊर्जा अपने चरम पर होती है और योद्धा अकल्पनीय ऊँचाइयों को छूते हैं, जबकि नए विराज ने पुनर्जन्म लेते समय मंगल ग्रह पर अपनी नई यात्रा शुरू की थी, जहाँ की परिस्थितियाँ पूर्णतः भिन्न थीं।
मंगल ग्रह और बृहस्पति ग्रह पर साधना के प्रारंभिक चरणों में प्रगति करने का आधारभूत तरीका काफी हद तक समान है — दोनों ही स्थानों पर साधक को पहले अपने शरीर के भीतर आध्यात्मिक सागर का निर्माण करना होता है, फिर नसों का विकास करना होता है, और इसी क्रम में वह आगे बढ़ता है। परंतु यहाँ एक महत्वपूर्ण अंतर है: मंगल ग्रह की आध्यात्मिक ऊर्जा बृहस्पति की तुलना में अत्यधिक कमजोर है, जिसके कारण अधिकांश साधक महाशक्तिमान योद्धा के स्तर से आगे नहीं बढ़ पाते हैं। इसके विपरीत, बृहस्पति ग्रह पर आध्यात्मिक ऊर्जा इतनी अधिक प्रबल और सघन है कि साधक सहजता से महाशक्तिमान से आगे के दुर्लभ और दिव्य स्तरों तक पहुँच जाते हैं, बशर्ते उनकी नींव मजबूत हो।
मंगल ग्रह पर किसी भी साधक की साधना का क्रम निम्नलिखित होता है —
सबसे पहले लघु लड़ाकू योद्धा, उसके बाद उच्च लड़ाकू योद्धा, फिर शक्ति सम्राट योद्धा, उसके पश्चात् महाशक्ति सम्राट योद्धा, तत्पश्चात् शक्तिमान योद्धा, और अंततः महाशक्तिमान योद्धा तक की यात्रा होती है। यह मंगल ग्रह का अधिकतम संभव शिखर है।
इस साधना के समानांतर, जब योद्धा स्तरों में आगे बढ़ता है, तो उसके भौतिक शरीर का विकास और उसकी आध्यात्मिक साधना दो अलग-अलग परंतु एक दूसरे पर निर्भर दिशाओं में विकसित होते हैं। यह अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि कोई साधक केवल आध्यात्मिक साधना के मार्ग पर आगे बढ़ता है, अपनी शारीरिक और भौतिक शक्तियों पर विशेष ध्यान नहीं देता, तो उसकी नींव अधूरी और कमजोर रह जाती है।
इस शारीरिक और भौतिक साधना का भी एक निश्चित क्रम होता है, जिसे हर महत्वाकांक्षी योद्धा को समझना चाहिए —
शरीर और भौतिक साधना का पहला पड़ाव 'शरीर संशोधन अवस्था' कहलाता है। यह वह क्रिया है जिसमें योद्धा अपने शरीर को तत्वों के स्तर पर बदलना शुरू करता है।
शरीर संशोधन अवस्था को मुख्यतः चार भागों में विभाजित किया जाता है —
पहला: आध्यात्मिक सागर और नस संशोधन अवस्था — यह पूरी क्रिया उस समय घटित होती है जब साधक लघु चरण योद्धा बन रहा होता है। इसी अवस्था में उसके शरीर के भीतर आध्यात्मिक सागर का निर्माण और उससे जुड़ी हुई नसों की बुनियाद रखी जाती है। यह वह चरण है जहाँ विराज अभी खड़ा है।
दूसरा: त्वचा और मांसपेशी संशोधन अवस्था — यह पूरी क्रिया उच्च लड़ाकू योद्धा के स्तर तक पहुँचने के समय होती है। इस अवस्था में साधक की त्वचा अभेद्य ढाल की तरह कठोर होने लगती है और उसकी मांसपेशियाँ इस्पात से भी सघन हो जाती हैं।
तीसरा: हड्डी संशोधन अवस्था — यह पूरी क्रिया शक्ति सम्राट योद्धा के स्तर तक पहुँचने के समय घटित होती है। यहाँ साधक की हड्डियाँ अदृश्य रूप से टूटकर फिर से जुड़ती हैं, और हर बार वे अधिक मजबूत होती जाती हैं, जैसे कल्पना की गई हो।
चौथा: अंग संशोधन अवस्था — यह पूरी क्रिया महाशक्ति सम्राट योद्धा के स्तर तक पहुँचने के समय होती है। इस चरण में हृदय, यकृत, फेफड़े, वृक्क जैसे आंतरिक अंगों तक का संशोधन होता है, जिससे साधक का शरीर पूर्ण रूप से दिव्य आयाम छूने लगता है।
इन चार अवस्थाओं को पूरा करने के बाद शारीरिक और भौतिक साधना में दूसरा प्रमुख पड़ाव आता है। यह और भी अधिक गहन और खतरनाक है।
यहाँ सबसे महत्वपूर्ण बात यह है — यदि आप एक बार दूसरे पड़ाव में प्रवेश कर जाते हैं और उस स्तर की शारीरिक और भौतिक साधना प्रारंभ कर देते हैं, तो आप पहले पड़ाव की साधना में किसी भी प्रकार का बदलाव नहीं कर सकते। वह स्थाई हो जाती है, जैसे गीली मिट्टी पर बनाई गई मूर्ति जब सूख जाती है तो उसे फिर से गीला नहीं किया जा सकता। इसीलिए पहले पड़ाव की हर छोटी से छोटी प्रक्रिया को अत्यंत सावधानी और संपूर्णता के साथ करना अनिवार्य होता है।
यही वह घातक कमियाँ थीं जो विराज के पुराने जीवन में थीं — वे बचपन में की गई भूलें, जिनका पता उसे तब चला जब वह साधना की ऊँचाइयों पर पहुँच चुका था। तब तक बहुत देर हो चुकी थी। वह अपनी साधना को पूर्ववत नहीं कर सकता था, और यही कारण था कि वह नौवीं और दसवीं फॉर्म से आगे नहीं बढ़ सका।
वैसे, शरीर और भौतिक साधना के दूसरे पड़ाव के दो मुख्य चरण होते हैं —
पहला: आध्यात्मिक शक्ति का आगमन — यह महत्वपूर्ण क्रिया शक्तिमान योद्धा के स्तर तक पहुँचने के समय होती है। इस चरण में साधक का शरीर स्वयं ही बाहर से आध्यात्मिक शक्ति को ग्रहण करना और उसे अपने भीतर समाहित करना शुरू करता है।
दूसरा: आध्यात्मिक ऊर्जा में बदलाव — यह क्रिया महाशक्तिमान योद्धा के स्तर तक पहुँचने के समय घटित होती है। यहाँ साधक के भीतर की आध्यात्मिक ऊर्जा अपना मूल स्वरूप बदल लेती है, और यह तरल अवस्था से ठोस अवस्था में आ जाती है। यही वह चरण है जहाँ अधिकांश योद्धा असफल हो जाते हैं क्योंकि उनकी नींव इस परिवर्तन को सहन नहीं कर पाती।
क्योंकि विराज अभी लघु लड़ाकू योद्धा की साधना कर रहा था, और इस प्राथमिक अवस्था के साथ जुड़ी हुई शरीर और भौतिक साधना भी साथ-साथ चल रही थी। उसे दोनों पर समान ध्यान देना था, क्योंकि एक में चूक दूसरे की नींव को हिला सकती थी।
लघु लड़ाकू योद्धा की साधना में कुल दस चरण होते हैं — एक से दस तक। इन्हीं दस चरणों के अनुसार ही शरीर और भौतिक साधना का प्रत्येक पहलू कार्य करता है।
जब कोई योद्धा अपनी साधना प्रारंभ करता है, और शून्य स्तर से अपनी यात्रा आरंभ करता है, तो इस दौरान शरीर और भौतिक साधना के अंतर्गत उसके शरीर के भीतर सबसे पहले एक नए ब्रह्मांड की तरह आध्यात्मिक सागर का निर्माण होता है — एक अदृश्य सागर, जो भविष्य में उसकी सारी शक्ति का स्रोत बनेगा। इसके बाद उस सागर का आकार विस्तार पाने लगता है। यह विस्तार लगातार साधना के माध्यम से तीसरे स्तर तक निरंतर चलता रहता है।
चौथे स्तर से लेकर दसवें स्तर तक, शरीर संशोधन साधना के पहले चरण में, शरीर के अंदर पहले से बने आध्यात्मिक सागर से नसें पूरे शरीर में फैलनी शुरू होती हैं — जैसे किसी वृक्ष की जड़ें जमीन में हर दिशा में फैलती हैं। इस दौरान न केवल नसों का निर्माण होता है, बल्कि उनका सही आकार और संरचना भी निर्धारित होती है।
यहीं आकर निर्धारित होता है कि शरीर में आध्यात्मिक ऊर्जा कितनी विशाल मात्रा में और किस प्रकार से प्रवाहित और प्रभावी होगी — क्या वह तीव्र गति से बहेगी या धीमी, क्या वह हर कोने तक पहुँचेगी या सीमित रहेगी। नसों की बनावट और विस्तार ही यह तय करता है कि कोई योद्धा साधारण है या असाधारण।
चूँकि विराज शरीर संशोधन अवस्था के पहले हिस्से आध्यात्मिक सागर को पहले ही पार कर चुका है, अब उसका पूरा ध्यान और प्रयास अपनी नसों को सही दिशा में बनाने और उनका सही विकास करने में लगा हुआ है। यह वह चरण है जहाँ एक छोटी सी गलती बाद में बहुत बड़ी कीमत चुका सकती है।
इस आवश्यक प्रक्रिया के लिए उसे अत्यंत दुर्लभ आध्यात्मिक जड़ी-बूटियों और विशेष सामग्रियों की आवश्यकता होगी — ऐसी चीजें जो आम बाजार में साधारण धन से नहीं मिलतीं। और उन सभी आध्यात्मिक जड़ी-बूटियों एवं सामग्रियों को खरीदने के लिए जितनी अत्यधिक धनराशि चाहिए थी, उसके लिए ही उसे यहाँ, इस खतरनाक जंगल में आकर आध्यात्मिक जानवरों का शिकार करना पड़ा था।
इन पूरे पंद्रह दिनों की कठोर यात्रा में विराज ने लगभग अस्सी के करीब पहले चरण के आध्यात्मिक जानवरों का सफलतापूर्वक शिकार किया था। उसने जानबूझकर दूसरे चरण के किसी भी आध्यात्मिक जीव का शिकार नहीं किया था। इस निर्णय के पीछे एक प्रमुख कारण था — उसकी साधना अभी भी लघु लड़ाकू योद्धा के प्राथमिक चरण पर थी, और दूसरे चरण के जानवर उसके वर्तमान स्तर से कहीं अधिक शक्तिशाली होते हैं।
प्राकृतिक रूप से, सामान्य परिस्थितियों में पहले चरण का योद्धा दूसरे चरण के जानवर का शिकार करने का सपना भी नहीं देख सकता था। यह एक अलिखित नियम था। परंतु विराज का पुनर्जन्म हुआ था — वह अपने साथ पिछले जन्म का अनुभव, अपनी युद्ध कुशलता और अपनी तलवार तकनीक का ज्ञान लेकर आया था। इन सबके कारण, वह सैद्धांतिक रूप से इस सीमा को तोड़ सकता था। फिर भी, उसने ऐसा न करने का निर्णय लिया। इसके ठोस कारण थे।
पहला कारण यह था कि पहले चरण के आध्यात्मिक योद्धा और पहले चरण के आध्यात्मिक जानवर की मूल शक्ति लगभग बराबर होती है — एक सामान्य संतुलन जो प्रकृति ने स्वयं स्थापित किया है। परंतु यह भी सत्य है कि एक आध्यात्मिक योद्धा हथियारों, रणनीति और तलवार तकनीकों का उपयोग करता है। इन चीजों के कारण, एक प्रशिक्षित योद्धा अपने समकक्ष जानवर से अधिक शक्तिशाली साबित हो सकता है। विराज के लिए, पहले चरण के जानवरों का शिकार तेज़, सुरक्षित और प्रभावी था।
दूसरा और अधिक महत्वपूर्ण कारण यह था कि यदि विराज अभी दूसरे चरण के आध्यात्मिक जानवरों का शिकार करना शुरू कर देता, तो उसे प्रत्येक जानवर को मारने में बहुत अधिक समय लगने वाला था। हाँ, वह अपनी तलवार की बेहतरीन तकनीक और युद्ध कुशलता के कारण अंततः उन्हें हरा सकता था — इसमें उसे कोई संदेह नहीं था। लेकिन अभी उसके पास इतना कीमती समय नहीं था कि वह दूसरे चरण के शक्तिशाली जानवरों पर घंटों तक अपना समय बर्बाद करे। उसे इसी यात्रा के दौरान नियमित रूप से अपनी तलवार की साधना भी करनी थी, और साथ ही अपने शरीर को युद्ध की नई गतियों में ढालना भी था। इन सब कारणों से, उसने दूसरे चरण के शक्तिशाली जानवरों का पीछा करने के स्थान पर पहले चरण के अधिक संख्या में जानवरों का शिकार करना चुना — यह एक बुद्धिमान और दूरदर्शी निर्णय था।
अब रही बात उसकी किस्मत के चमकने की, तो उस दौरान जब विराज अपनी सफल शिकार यात्रा को समाप्त करके लौट रहा था, उसी समय अचानक उसके साथ एक अप्रत्याशित हादसा घटित हुआ — एक ऐसा संयोग, एक ऐसी दैवीय घटना, जिसके कारण उसकी किस्मत सचमुच चमक गई। वह हादसा क्या था, और कैसे एक साधारण शिकार यात्रा महज कुछ ही पलों में एक अभूतपूर्व भाग्य में बदल गई... यह कहानी का अगला हिस्सा है।