शैतानी घाटी का सफर - 5 RAAHULL SHARMA द्वारा आध्यात्मिक कथा में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

शैतानी घाटी का सफर - 5

और ड्राइविंग सीट पर वही कालू ड्राइवर बैठा था, जिसका चेहरा अब आधा जला हुआ और खौफनाक था।
राम: "सौरभ! देखो वो बस!"


पर सौरभ जैसे पागल हो गया था। वो गाड़ी से बचने के बजाय, सीधा उस जलती हुई बस की तरफ भागा जा रहा था। उसका चेहरा बिल्कुल सपाट था।


मोनिका: "सौरभ! रुक जाओ! वो गाड़ी शैतानी है! पीछे हटो!"

लेकिन सौरभ को कुछ सुनायी नहीं दे रहा था। बस की रफ़्तार 100 से भी ऊपर थी। कालू ड्राइवर ने एक भयानक हंसी हंसी और बस का एक्सीलेटर पूरा दबा दिया।


धाऽऽऽम!

वो जलती हुई बस सौरभ को कुचलते हुए निकल गयी। एक पल के लिए पूरा मैदान रोशनी से भर गया, और अगले ही पल वो बस हवा में धुएं की तरह गायब हो गयी।


सौरभ का शरीर ज़मीन पर निर्जीव पड़ा था। उसने वहीं दम तोड़ दिया। सृष्टि ने जब ये देखा तो वो सदमे में वहीं बेहोश हो गयी।


अब सिर्फ राम, मेहुल, और मोनिका बचे थे। सातों दोस्तों में से अब सिर्फ चार ज़िंदा बचे थे, और उनमें से एक बेहोश थी।


रुका हुआ समय

राम ने थोड़ा पानी सृष्टि के चेहरे पर डाला, और धीरे-धीरे सृष्टि ने अपनी आँखें खोलीं। जैसे ही उसे सौरभ की मौत का मंज़र याद आया, वो चीखने लगी, पर मेहुल ने उसका मुंह बंद कर दिया।


मेहुल: "सृष्टि, हिम्मत मत हारो! हमें यहाँ से निकलना ही होगा, वरना हम में से कोई नहीं बचेगा।"


राम ने सोचा कि शायद सुबह होने वाली है, क्योंकि उन्हें लग रहा था कि वो घंटों से इस घाटी में भटक रहे हैं। उसने डरते हुए अपनी कलाई घड़ी (wrist watch) की तरफ देखा ताकि ये पता चल सके कि सूरज निकलने में कितनी देर है।


लेकिन जैसे ही उसने घड़ी देखी, उसके पैरों तले ज़मीन निगल गयी। उसका चेहरा सफेद पड़ गया और वो थर-थराने लगा।


मेहुल: "क्या हुआ राम? घड़ी क्यों देख रहा है?"


राम: (हकलाते हुए) "मेहुल... मोनिका... ये देखो। हमने बस का एक्सीडेंट देखा, विनोद की मौत देखी, अनामिका को खोया और अभी सौरभ भी चला गया... इतना सब होने के बाद भी..."


शैतानी घाटी: ठहरा हुआ समय


राम की आवाज़ में एक ऐसी कंपकंपी थी जिसे सुनकर मेहुल और मोनिका के रोंगटे खड़े हो गए। राम ने अपनी कलाई उनके सामने कर दी। साफ़-सुथरे डायल वाली उस घड़ी में सेकंड की सुई एक जगह पर अटकी हुई थी, जैसे किसी ने उसे ज़बरदस्ती पकड़ लिया हो।


राम: "मेहुल... मोनिका... देखो इसे। जब हम उस ढाबे पर थे, तब भी 8 बज रहे थे। हमने बस का एक्सीडेंट देखा, हम पहाड़ चढ़े, विनोद ने छलांग लगाई, अनामिका और सौरभ चले गए... हमें लग रहा है कि घंटों बीत गए, लेकिन इस घड़ी में एक मिनट भी आगे नहीं बढ़ा है!"


मेहुल ने झपटकर अपना फ़ोन निकाला। स्क्रीन की लाइट जली, तो उस पर भी वही समय चमक रहा था— 20:00 (रात के 8 बजे)।


मेहुल: (चीखते हुए) "यह मुमकिन नहीं है! मेरा फ़ोन नेटवर्क से टाइम अपडेट करता है, भले ही सिग्नल न हो। समय रुक कैसे सकता है?"


तभी मोनिका, जो अब तक सिसक रही थी, अचानक शांत हो गई। उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। उसने कांपती उंगली से आसमान की तरफ इशारा किया।
मोनिका: "चांद को देखो..."


तीनों ने ऊपर देखा। आसमान में आधा चाँद ठीक उसी जगह पर था जहाँ वह बस के रुकने के वक्त था। बादल ठहरे हुए थे, और घाटी में हवा का चलना भी बंद हो गया था। 

सन्नाटा इतना गहरा था कि उन्हें अपने ही दिल की धड़कनें किसी हथौड़े की तरह सुनाई दे रही थीं।


राम: "इसका मतलब... हम सिर्फ़ इस घाटी में कैद नहीं हैं, हम इस 'वक़्त' में कैद हो गए हैं। यहाँ सूरज कभी नहीं उगेगा। यहाँ कभी सुबह नहीं होगी!"


अदृश्य पदचाप और पुरानी यादें


तभी उस ठहरे हुए सन्नाटे में एक आवाज़ गूँजी।
'चप... चप... चप...'
जैसे कोई गीले पैरों से पत्थरों पर चल रहा हो। आवाज़ उसी दिशा से आ रही थी जहाँ सौरभ की लाश पड़ी थी। मेहुल ने हिम्मत जुटाकर टॉर्च की रोशनी वहाँ डाली।


वहाँ जो था, उसे देखकर मेहुल के हाथ से टॉर्च गिर गई। सौरभ की लाश वहाँ नहीं थी! सिर्फ़ ज़मीन पर खून के कुछ धब्बे थे, जो धीरे-धीरे धुंधले हो रहे थे।


मेहुल: "सौरभ? सौरभ कहाँ गया?"


शैतानी घाटी: टूटता भरोसा


सृष्टि की आवाज़ उस सन्नाटे में किसी बर्फीली हवा की तरह चुभ रही थी। उसका चेहरा पीला पड़ चुका था और उसकी आँखों में अब जीने की उम्मीद खत्म होती दिख रही थी।
सृष्टि: (कांपते हुए) "मुझे लगता है... हम में से कोई यहाँ से ज़िंदा बच कर नहीं जा सकता। राम... तुम्हारी वो चुनरी देखो!"
राम ने झटके से अपने हाथ में थामी हुई माता रानी की लाल चुनरी को देखा। उसका सिंदूरी रंग अब काला पड़ता जा रहा था, जैसे किसी ने उसे कोयले की राख में डुबो दिया हो। चुनरी के किनारे अब जलकर राख की तरह झड़ने लगे थे। 

वही चुनरी, जिसने सौरभ को मौत के मुँह से निकाला था, अब खुद अंधकार की चपेट में थी।


सृष्टि ने अपने गले में हाथ डाला। उसकी माँ का दिया हुआ वो पवित्र लॉकेट, जो कुछ देर पहले तक चमक रहा था, अब धुंधला (faded) और भद्दा पड़ चुका था।

उस पर जमी धूल और जंग साफ़ बता रही थी कि इस घाटी का शैतान अब उनके आखिरी सुरक्षा कवच को भी तोड़ रहा है।


राम: "नहीं! ऐसा नहीं हो सकता। यह चुनरी... यह तो हमारी आखिरी उम्मीद थी!"


सृष्टि: "उम्मीद खत्म हो चुकी है, राम। समय रुक गया है, हमारे रक्षक हमें छोड़ रहे हैं, और वो... वो हमारे मरे हुए दोस्तों के साथ कुछ कर रहा है। सौरभ की लाश का गायब होना कोई इत्तेफाक नहीं है।"


खून के धब्बे और एक नई आहट


तभी मेहुल, जो अभी तक सौरभ की गायब हुई लाश को देख रहा था, ज़मीन पर झुक गया। वो खून के धब्बे जो धुंधले पड़ रहे थे, अब हिलने लगे थे। ऐसा लग रहा था जैसे वो धब्बे ज़मीन पर कोई नक्शा या संदेश बना रहे हों।


मेहुल: "देखो! ये खून... ये उड़ नहीं रहा, ये रास्ता दिखा रहा है!"


खून के वो धब्बे एक कतार में पहाड़ी के ऊपर बने उस पुराने किले की तरफ बढ़ रहे थे। तभी किले के बुर्ज से एक चीख गूँजी। यह आवाज़ जानी-पहचानी थी, लेकिन इसमें इंसानियत नहीं थी।


"मेहुल... इधर आओ... यहाँ बहुत मज़ा आ रहा है..."