सूर्यकुल का सूर्यास्त - 6 ALLA NOOR KHAN द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

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सूर्यकुल का सूर्यास्त - 6

अध्याय 6 नौकर के गाल पर सच

सभा भवन में सभी की बातें अभी चल ही रही थी, तभी विराज ने बड़े आलसी पन से कहा "क्या आप सब ने मुझे यही बेकार की बातें सुनने के लिए बुलाया है?"

विराज के मुख से यह शब्द निकलते ही पूरे सभागार में सन्नाटा छा गया, मानो किसी ने तेज बहती नदी के बीच एक बड़ा सा पत्थर फेंक दिया हो। 

यह सुनते ही मोहन की पत्नी के चेहरे का रंग कुम्हलाया हुआ सा हो गया। उसकी आँखों में आग सी लग गई थी। वह अब तक के सारे संयम को तोड़ते हुए विराज की तरफ अपना हाथ उठाकर अपनी उंगली से उसे इशारा करते हुए कहती है—"क्या तुम्हें लगता है कि तुम जैसे बेकार मुफ्तखोर घर जमाई के ऊपर हम अपना इतना कीमती समय बर्बाद करेंगे, या फिर तुम अपने आप को इतना महत्वपूर्ण मानते हो कि हम तुम पर अपना समय बर्बाद करेंगे?" अन्य महिलाएँ भी उसका समर्थन करते हुए अपने-अपने सिर हिला रही थीं।

विराज पर उनकी बातों का कोई असर नहीं हो रहा था। उसे चौहान परिवार के इन लोगों से मतलब नहीं था। उसके हृदय में न तो उनके प्रति प्रेम था, न घृणा, न आक्रोश, न कोई अपेक्षा। वह तो बस इन लोगों का एहसान मानता था कि उन्होंने उसे पाला है, उसे अपने साथ रखा है, उसे एक छत दी है, उसे भोजन दिया है। वरना रवीना को ही वह केवल अपना मानता है— और उसकी खातिर इन सब लोगों को बर्दाश्त करता है। क्योंकि रवीना ही उसकी एकमात्र कमजोरी है और एकमात्र ताकत भी।

विराज ने आगे कहा, "फिर आपने मुझे यहाँ क्यों बुलाया है? क्यों मेरा समय बर्बाद कर रहे हो और अपना समय बर्बाद कर रहे हो?" 

अभी भी विराज की इस तरह की उदासी भरी भावना को देखते हुए—सभी लोग एक दूसरे की ओर देख रहे थे। 

राधा सोच रही थी कि यह लड़का कितना ज्यादा घमंडी हो गया है। उसके मन में विचारों का एक पूरा तूफान उठ रहा था। 'पता नहीं इसे इतना घमंड कैसे आ रहा है? यह वही लड़का है जो कभी हमारे सामने सिर झुकाकर खड़ा रहता था, जो कभी एक शब्द बोलने से पहले हम सब की आँखों में देखता था। अब यही लड़का हमें अपनी औकात बता रहा है? यह बदलाव कैसे आया?' और फिर उसके मन में एक खयाल आया—'जरूर इसकी वजह रवीना ही होगी।'

उसके बड़े भाई मोहन का भी यही खयाल था, लेकिन उससे भी अधिक गहरा और विस्तृत। 'नालंदा गुरुकुल में रवीना की प्रसिद्धि दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। वहाँ के आचार्य उसकी प्रशंसा करते हैं, वहाँ के शिष्य उसे पाने की दृष्टि से देखते हैं। इसी कारण से विराज को अपने ऊपर घमंड होने लगा है। वह सोचता है कि रवीना की प्रतिभा का श्रेय उसे भी मिलना चाहिए। वह उसकी प्रसिद्धि और उपलब्धि का फायदा उठाना चाहता है।'

इसी तरह के विचार विराज के लिए सभा में मौजूद सभी लोगों के मन में थे। सभा भवन में सभी लोग विराज के लिए अपमानित और आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल कर रहे थे और उसे खड़ी-खोटी सुना रहे थे। कोई कह रहा था, "बेकार का बोझ है हमारे घर पर", तो कोई कह रहा था, "इसकी वजह से ही रवीना का भविष्य अंधकारमय है।" 

चौहान परिवार के मुखिया दिनेश चौहान यह सब अपनी आँखों से देख रहे थे—हर शब्द को, हर इशारे को, हर भावना को—और मन ही मन प्रसन्न हो रहे थे। उनके चेहरे पर वह प्रसन्नता नहीं थी जो किसी अच्छी घटना पर होती है, बल्कि वह गहरी संतुष्टि थी जो तब होती है जब आपका कोई षड्यंत्र बिना आपके बोले ही सफल हो रहा हो। उनकी बहन राधा, उनका छोटा भाई मोहन—वह सब कर रहे थे जो वह करना चाहते थे, मानो वे उनके हाथ और पैर हों, उनकी आवाज हों। और उनके साथ परिवार के अन्य लोग उनके इस मौन अभियान का समर्थन कर रहे थे।

फिर उन्होंने अचानक अपना हाथ ऊपर किया। यह एक ऐसा संकेत था जिसकी प्रतीक्षा पूरे सभागार को थी।

और फिर सभी की निगाहें दिनेश की तरफ हो गई, उधर दिनेश विराज की तरफ देखते हुए कहता है, "रवीना से शादी करने के बाद तुम अब औपचारिक रूप से चौहान परिवार का हिस्सा बन चुके हो। अब इस उपनाम को हम चाहकर भी तुमसे अलग नहीं कर सकते हैं, क्योंकि तुमने खुद चौहान परिवार को अपनाया है।"

"परंतु हमारे सामने एक समस्या आ गई है। बेटी रवीना इस समय साधना के मार्ग पर तरक्की कर रही है। इससे हम परिवार वालों ने सोचा है कि हमें उसके लिए अधिक से अधिक मदद करनी चाहिए, और उसके लिए रास्ता आसान करना चाहिए। इसीलिए हम अपने सार्वजनिक कार्यों में कटौती करेंगे और रवीना की मदद करेंगे।"

दिनेश ने यह बात ऐसे कही मानो वह कोई बहुत बड़ा त्याग कर रहे हों, पर उनकी आँखों में चमक रही चालाकी इस बात को झुठला रही थी।

"हमारे परिवार के न चाहते हुए भी तुम्हारी शादी रवीना से हुई है, तो हम चाहते हैं कि तुमें भी रवीना के लिए त्याग करना चाहिए।"

यह कहते हुए दिनेश ने एक बार विराज की आँखों में देखा, यह देखने के लिए कि इस बात का उस पर क्या असर होता है। जब विराज के चेहरे पर कोई भाव नहीं आया, तो दिनेश ने आगे कहा।

"आज से चौहान परिवार तुम्हारा कोई खर्चा नहीं उठाएगा। आज से तुम्हें अपना और अपने नौकर का खर्चा खुद ही उठाना पड़ेगा।"

दिनेश ने यह बात कहते हुए अहंकार से भरकर एक गहरी साँस ली— फिर उसने अपनी साँस को धीरे-धीरे बाहर छोड़ते हुए आगे कहा, "यदि तुम अपना खर्चा उठाने में असमर्थ हो, तो हम तुम्हारे लिए मगध साम्राज्य की राजधानी में स्थित नालंदा गुरुकुल तक तुम्हें भेजने की व्यवस्था कर सकते हैं। फिर सुरेश पहले की भाँति तुम्हारा खर्चा उठा सकता है।"

दिनेश के शब्दों में मानो एक जाल बिछा हुआ था, और वह जानते थे कि विराज इस जाल से बाहर निकलने में असमर्थ होगा। उन्होंने दो रास्ते दिए थे—दोनों ही विराज के पतन के लिए, दोनों ही चौहान परिवार के उत्थान के लिए।

विराज और वहाँ मौजूद सभी लोग जानते थे कि दिनेश ने जो कहा है, उसमें से आधी बातें झूठ हैं। वह तो बस एक मौका बना रहे थे, अस्थाई रूप से विराज को चौहान परिवार से अलग करने का।

यदि विराज पहला रास्ता चुनता है, जिसमें उसे अपना खर्चा स्वयं उठाना पड़ेगा, तो फिर इंदौर शहर का चौहान परिवार सभी से यह आसानी से कह सकता था कि उसकी बीवी रवीना तरक्की कर रही है, जिसके कारण वह उसका खर्चा उठा रही है और चौहान परिवार भी उसके सहारे विराज से अपना पल्ला झाड़ लेंगे। 

और दूसरा तरीका भी उन्हीं की तरफ प्रवाहित होता है। इस तरीके में विराज इंदौर शहर छोड़कर मगध साम्राज्य की राजधानी में उपस्थित नालंदा गुरुकुल चला जाएगा। चौहान परिवार के लिए यह स्थिति सबसे उच्चतम थी, जैसे कोई शिकारी अपने शिकार को बिल्कुल उस जाल में फँसा दे जहाँ वह चाहता था। इस स्थिति में, जब विराज इंदौर शहर में नहीं होगा, तो वहाँ की सारी जनता से वे यह कह सकते थे कि विराज कुछ भी करने और कमाने में असमर्थ था, इसीलिए वह अपनी बीवी के टुकड़ों पर पलने के लिए उसके पीछे-पीछे नालंदा गुरुकुल चला गया। और उसके नाम से जुड़ी बातों ने—जो पहले ही शहर में फैल चुकी थीं—इस बात की पुष्टि कर दी थी कि उसे 'मुफ्तखोर घर जमाई' कहा जाता था।

यह सब सुनने के बाद विराज हल्का सा मुस्कुराता है। वह अपनी जगह से खड़े होते हुए—धीरे-धीरे, संयतता से, जैसे कोई राजा अपने सिंहासन से उठता है—कहता है, "बस इतनी सी बात के लिए आप लोगों ने मुझे यहाँ तक लाने के लिए परेशान किया? यह तो आप उस नौकर के हाथ से कह सकते थे। मैं वहीं बता देता—मुझे आप लोगों के पैसों की जरूरत नहीं है।"

विराज के इस कथन ने पूरे सभागार में मानो भूकंप ला दिया। यह सुनकर सभी लोग उसकी तरफ आश्चर्य से देखने लगते हैं, मन ही मन सोचने लगते हैं।

दिनेश चौहान की भौंहें तन गईं, होंठ सिकुड़ गए, और उनकी आँखों में एक ऐसी आग भड़क उठी जो क्रोध से अधिक चकित थी। वह सोचने लगे—'यह बदतमीज कैसे इतना आत्मविश्वास दिखा सकता है? क्या इसे पता है कि यह किससे बात कर रहा है? ' उनकी उँगलियाँ उस मेज पर बैठ गईं जिसके सहारे वह बैठे थे, और धीरे-धीरे उनका रंग सफेद से काला होने लगा। पर उन्होंने अपने आप को संभाला, क्योंकि वह जानते थे कि एक मुखिया को कभी अपना आपा नहीं खोना चाहिए। 

राधा के मन में पहले तो आश्चर्य आया, फिर क्रोध, फिर एक अजीब सी घबराहट। 'यह लड़का पागल हो गया है। यह हमें अपनी औकात बता रहा है? यह वही लड़का है जिसे हमने अपनी कोठरी में रखा था, जिसे हमने अपने बचे हुए भोजन से पाला था? और आज यह हमारे सामने मुँह खोल रहा है?' उसकी आँखें विराज को भेदने की कोशिश कर रही थीं, मानो वह देखना चाहती हो कि इस लड़के के अंदर ऐसा क्या है जो इसे इतना निडर बना रहा है।

मोहन को तो ऐसा लगा जैसे किसी ने उसके सिर पर ठंडा पानी डाल दिया हो। उसके मन में विचार था—'यह वही विराज है जो कभी हमारे सामने बोलने से डरता था, जिसकी आवाज काँपती थी जब वह हमसे कुछ कहता था? यह वही विराज है जिसे हम 'मुफ्तखोर' कहकर बुलाते थे और वह एक शब्द नहीं बोलता था?'

अभी सभा भवन में विराज द्वारा कही गई बातों पर लोग आश्चर्यचकित थे और उनके समझ में नहीं आ रहा था कि यह कैसे हो सकता है कि विराज ने ऐसा किया जो उन्होंने अपने सपने में भी नहीं सोचा था। 

तभी विराज ने उस नौकर की तरफ इशारा किया जो उसके घर में उसे बुलाने आया था। यह नौकर कोई सामान्य नौकर नहीं था। यह मुखिया दिनेश चौहान का विश्वासपात्र नौकर था, जिसे परिवार के बहुत से रहस्यों का ज्ञान था, जिसकी बातों पर दिनेश पूरा भरोसा करते थे। सभी नौकरों में इसकी प्रतिष्ठा काफी अच्छी थी, इतनी अच्छी कि परिवार के सदस्य भी इसे एक 'सेवक' से अधिक कुछ मानते थे।

इसी प्रतिष्ठा के कारण वह विराज से इतनी घमंड में बात करता था।

नौकर के पास आते ही विराज ने तनिक भी देरी न की—बस एक झटके में उसके गाल पर एक जोरदार तमाचा मार दिया।

तमाचा इतना जोरदार था कि पूरे सभा भवन में उसकी आवाज गूँज गई। और फिर उस नौकर का शरीर सिहरते हुए, मानो उसके पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई हो, जमीन पर गिर गया। उसकी आँखों से आँसू नहीं निकले, बल्कि उसके चेहरे पर एक ऐसा भय था जो उसने कभी जीवन में अनुभव नहीं किया था। 

पूरे सभा भवन में सन्नाटा छा गया। इतना गहरा सन्नाटा कि उस नौकर के जमीन पर गिरने की आवाज भी मानो बार-बार गूँज रही थी।

मुखिया दिनेश की पत्नी—अपनी जगह से खड़ी हुई। उसका चेहरा क्रोध से लाल हो गया था। उसने अपनी उँगली विराज की ओर बढ़ाई, और विराज की तरफ चिल्लाते हुए कहा, "तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई हमारे निजी नौकर पर हाथ उठाने की?"

विराज ने उनकी तरफ कोई ध्यान नहीं दिया। विराज ने उस नौकर की तरफ देखते हुए—कहा, "तुम चौहान परिवार के एक अधीनस्थ हो, और मैं चौहान परिवार का एक सदस्य हूँ। अगली बार अगर मेरे सामने आए तो आदर भाव से रहना, वरना तुम अगले दिन का सूरज नहीं देख पाओगे। और अपने साथियों को भी यह बात बता देना।"

विराज के शब्दों में कोई शाप नहीं था, कोई अभिशाप नहीं था, बल्कि एक साधारण, सीधी-सादी सच्चाई थी। और इसी निडरता ने उस नौकर के रोंगटे खड़े कर दिए।

यह कहते हुए विराज वहाँ से चला गया।

वहाँ मौजूद सभी लोग उसकी तरफ चिल्लाते हुए रह गए, पर कोई भी कुछ नहीं कर पाया। 

फिर मोहन दिनेश की तरफ देखते हुए कहता है, "बड़े भाई, इस बच्चे के पंख बहुत बाहर निकल रहे हैं। आपको इसे रोकने के लिए कुछ करना होगा।"

राधा अपनी जगह से कहती है, "बिल्कुल सही कहा मोहन भाई ने। आज उसने हमारे नौकर पर हाथ उठाया, कल हम पर ही हाथ उठाएगा। और उसने जो शब्द कहे—'अगले दिन का सूरज नहीं देख पाओगे'—यह तो खुली धमकी है। हम इस धमकी को हल्के में नहीं ले सकते।"

दिनेश की पत्नी ने भी अपनी आवाज मिलाते हुए कहा, "हाँ, बिल्कुल। यह हद हो गई। एक मुफ्तखोर घर जमाई हमारे सामने ऐसी बातें करेगा? यह तो हमारी इज्जत का सवाल है। अगर यह बात शहर में फैल गई तो हमारा क्या मुँह होगा लोगों के सामने?"

दिनेश को भी लगता है कि यह सब लोग जो कह रहे हैं वह सही है। विराज ने आज जो किया है वह निहायत ही गलत था, यह उनकी गरिमा को रौंदने जैसा था।

दिनेश ने अपनी मुद्रा सीधी की, अपनी आवाज को स्थिर किया, और राधा के पति की ओर देखते हुए कहा—"जीजा जी, आपने बताया था, उज्जैन शहर के मुख्य प्रशासनिक अधिकारी ने अपने बेटे की शादी का निमंत्रण हमारी रवीना के लिए भेजा है। क्या वह जानते हैं कि रवीना पहले से शादीशुदा है? अगर उनका पुत्र उससे शादी करता है तो वह दूसरा पति कहा जाएगा?"

दक्षिणी प्रांत में इंदौर शहर जैसे 9 शहर थे। ये 9 शहर एक विशाल क्षेत्र में फैले थे। पर इन सबका एक केंद्र था—उज्जैन शहर। दक्षिणी प्रांत के इन नौ शहरों की राजधानी उज्जैन शहर था।

क्योंकि मगध साम्राज्य काफी बड़ा साम्राज्य था, तो इसे कई प्रांतों में बाँट दिया गया था, दक्षिणी प्रांत को उज्जैन शहर द्वारा ही संभाला जाता था। कह सकते हैं कि इंदौर शहर उज्जैन शहर के अधीन एक शहर है। और अगर उज्जैन के मुख्य प्रशासनिक अधिकारी का समर्थन मिल जाए, तो इंदौर के चौहान परिवार का दर्जा रातों-रात बदल सकता था।

राधा का पति वहाँ मौजूद सभी लोगों को बताता है, "उज्जैन शहर के मुख्य शासकीय अधिकारी का सबसे बड़ा बेटा भी रवीना के साथ नालंदा गुरुकुल का शिष्य है। उसने रवीना बिटिया को वहाँ देखा है, और वह उस पर मोहित हो गया है। उसे रवीना बिटिया बहुत पसंद आ गई है, इसीलिए उसने अपने पिता के जरिए यह रिश्ता भिजवाया है।"

यह सुनने के बाद मोहन ने सबके चेहरे देखे और वह बोला, "हमारी रवीना की काबिलियत बढ़ती जा रही है। क्या इतनी जल्दी किसी अन्य रिश्ते में उसे बाँधना ठीक रहेगा? हमें उससे बेहतर रिश्ते भी मिल सकते हैं।"

सभी को मोहन की बात सही लगती है, क्योंकि रवीना अभी प्रसिद्धियों पर चढ़ती जा रही थी। 

राधा का पति इन आशंकाओं को समझता है और अपनी बात को आगे रखते हुए कहता है, "आप लोगों के मन में जो शंकाएँ हैं मैं उन्हें भली-भाँति समझता हूँ। इसीलिए मैंने मुख्य प्रशासनिक अधिकारी के बारे में पता किया है।"

"उज्जैन शहर का जो मुख्य प्रशासनिक अधिकारी है, उसकी बहन मगध साम्राज्य की उप शराब मंत्री की चौथी बीवी है। और कहा जाता है"—यह कहते हुए उसने अपनी आवाज को एक कानाफूसी जैसा बना लिया, मानो वह कोई बहुत बड़ा राज बता रहा हो—"और मैंने अपने सूत्रों से पता लगाया है तो मुझे पता चला है, उप शराब मंत्री अपनी उस चौथी बीवी पर बहुत ज्यादा मोहित है, जिसका फायदा वह उठाती है। उसी के कारण उज्जैन शहर के मुख्य प्रशासनिक अधिकारी को उज्जैन शहर का यह पद मिला है।" 

यह सुनने के बाद सभी की आँखों में चमक आ गई, क्योंकि मगध साम्राज्य में सबसे ज्यादा कर किसी चीज से आता था तो वह शराब से आता था। शराब पर इतना भारी कर लगा था कि उससे राज्य का एक बड़ा हिस्सा संचालित होता था। शाही परिवारों, बड़े परिवारों और समारोहों में शराब की बहुत डिमांड रहती थी, हर दावत में, हर उत्सव में, हर शाही आयोजन में शराब एक अनिवार्य तत्व था। तो उप शराब मंत्री का ओहदा बहुत बड़ा हो जाता है—इतना बड़ा कि उसकी एक बात से किसी का भी भला या बुरा हो सकता था। और एक छोटे से इंदौर शहर के चौहान परिवार को सीधा मगध साम्राज्य के मुख्य लोगों में से किसी एक का समर्थन हासिल होना—यह उनके लिए एक बहुत बड़ी बात थी, जैसे कोई साधारण योद्धा अचानक राजा का दाहिना हाथ बन जाए।

चारों तरफ 'हाँ-हाँ' की फुसफुसाहट शुरू हो गई। 

दिनेश के चेहरे पर भी हल्की सी मुस्कान आ गई और वह कहता है, "यह हमारे लिए एक अच्छी खबर है, परंतु हमें जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। एक महीने बाद मेरी माँ और इस इंदौर शहर के चौहान परिवार की राजमाता का डेढ़ सौवाँ जन्मदिन है। मैंने माँ को राजी कर लिया है कि वह इंदौर शहर में आकर अपना जन्मदिन मनाएँगी।"

"उस समय हम देखेंगे कि इससे अच्छा अगर कोई रिश्ता रवीना के लिए नहीं आता है, तो हम इस रिश्ते के साथ ही आगे बढ़ेंगे, और औपचारिक रूप से इसकी घोषणा कर देंगे। जब तक मैं चाहता हूँ कि आप सब लोग उज्जैन शहर के मुख्य प्रशासनिक अधिकारी के बारे में अधिक से अधिक जानकारियाँ हासिल करें। क्योंकि इस रिश्ते से हमें जोड़ना है तो हमें हर चीज का पता होना चाहिए।"

"और मुझे लगता है कि मेरी माँ को भी यह पसंद आएगा। लेकिन अभी यह बात हम उनको नहीं बताएँगे। और रही बात विराज की, तो वह तो एक मुफ्तखोर घर जमाई है—उसे क्या फर्क पड़ने वाला है? रवीना बिटिया जिस तरह से अपनी उपलब्धियाँ हासिल कर रही है और आगे जाकर और ज्यादा उपलब्धियाँ हासिल करेगी, वह अपने लिए एक पति क्या, 10 पति भी रख सकती है।" 

तभी राधा हँसते हुए कहती है—"वह चाहे अपने लिए कितने भी पति रखे, पर उससे सबसे ज्यादा फायदा तो हमारा ही होने वाला है।"

राधा के यह कहने के बाद धीरे-धीरे मुस्कान सभी के चेहरे पर फैल गई। हर व्यक्ति के मन में अपना-अपना हिसाब था, अपना-अपना फायदा था, अपनी-अपनी लालसा थी।