अधूरी किताब - सीजन 2 - एपिसोड 5 kajal jha द्वारा डरावनी कहानी में हिंदी पीडीएफ

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अधूरी किताब - सीजन 2 - एपिसोड 5


अधूरी किताब – सीजन 2
एपिसोड 5 : सफेद आँखों वाला आदमी
बंगले की टूटी हुई खिड़की के बाहर खड़ा वह आदमी धीरे-धीरे मुस्कुरा रहा था।
उसकी सफेद आँखें अंधेरे में चमक रही थीं।
अनन्या का पूरा शरीर काँप उठा।
क्योंकि वह चेहरा...
उसके पिता जैसा था।
बिल्कुल वैसा।
उसी तरह की नाक।
उसी तरह का चेहरा।
उसी तरह के बाल।
"नहीं..."
अनन्या के मुँह से निकला।
"यह नहीं हो सकता।"
उसके पिता की मौत बीस साल पहले हो चुकी थी।
फिर यह आदमी कौन था?
और वह उसके पिता जैसा क्यों दिख रहा था?
अचानक वह आदमी खिड़की के पास से गायब हो गया।
मानो कभी वहाँ था ही नहीं।
लेकिन अगले ही पल...
नीचे से कदमों की आवाज आने लगी।
ठक...
ठक...
ठक...
कोई सीढ़ियाँ चढ़ रहा था।
धीरे-धीरे।
हर कदम के साथ आवाज और करीब आती जा रही थी।
मामा का चेहरा पीला पड़ गया।
"वह यहाँ आ रहा है।"
अनन्या ने डरकर आर्या की तरफ देखा।
लेकिन इस बार आर्या भी घबराई हुई लग रही थी।
"यह अच्छा नहीं है।"
आर्या बुदबुदाई।
"बहुत बुरा होने वाला है।"
"वह कौन है?"
अनन्या ने पूछा।
आर्या ने जवाब नहीं दिया।
उसकी नजर दरवाजे पर टिकी हुई थी।
ठक...
ठक...
ठक...
आवाज अब बिल्कुल दरवाजे के बाहर पहुँच चुकी थी।
कमरे में सन्नाटा छा गया।
अचानक दरवाजा अपने आप खुल गया।
चीईईईं...
और उसके पीछे वही आदमी खड़ा था।
इस बार उसका पूरा चेहरा दिखाई दे रहा था।
अनन्या का दिल जोर से धड़कने लगा।
वह सचमुच उसके पिता जैसा दिखता था।
लेकिन उसकी आँखें...
पूरी तरह सफेद थीं।
और उसके चेहरे पर एक अजीब मुस्कान थी।
"अनन्या..."
उसने धीरे से कहा।
"मैं बहुत समय से तुम्हारा इंतजार कर रहा था।"
उसकी आवाज इंसानों जैसी नहीं थी।
ऐसा लग रहा था जैसे कई लोग एक साथ बोल रहे हों।
"तुम कौन हो?"
अनन्या ने काँपती आवाज में पूछा।
आदमी मुस्कुराया।
"मैं वह हूँ जिसे तुम्हारे पिता ने जगाया था।"
यह सुनकर सब चौंक गए।
"क्या मतलब?"
मामा ने पूछा।
आदमी धीरे-धीरे कमरे के अंदर आया।
"तुम लोग मुझे कई नामों से जानते हो।"
"किसी ने मुझे शाप कहा।"
"किसी ने अंधेरा कहा।"
"और किसी ने..."
उसने अधूरी किताब की तरफ देखा।
"...मुझे लेखक कहा।"
कमरे का तापमान अचानक गिर गया।
अनन्या की साँस रुक गई।
"लेखक?"
आदमी हँसा।
"हाँ।"
"इस किताब का असली लेखक।"
यह सुनते ही आर्या पीछे हट गई।
उसकी आँखों में डर दिखाई देने लगा।
"झूठ!"
वह चिल्लाई।
"तुम लेखक नहीं हो।"
आदमी ने उसकी तरफ देखा।
और उसकी मुस्कान और चौड़ी हो गई।
"सच से भागना बंद कर दो, आर्या।"
"तुम जानती हो मैं कौन हूँ।"
आर्या कुछ नहीं बोली।
लेकिन उसके चेहरे पर भय साफ दिखाई दे रहा था।
अनन्या का दिमाग तेजी से काम कर रहा था।
अब तक वह सोच रही थी कि आर्या ही सबसे बड़ी शक्ति है।
लेकिन अब लग रहा था कि कोई और भी है।
कोई ऐसा...
जो आर्या से भी ज्यादा शक्तिशाली है।
"अगर तुम लेखक हो..."
अनन्या ने कहा।
"तो किताब लिखता कौन है?"
आदमी मुस्कुराया।
"मैं।"
"हर शब्द।"
"हर कहानी।"
"हर मौत।"
"हर श्राप।"
"सब मैंने लिखा है।"
यह सुनते ही अनन्या के पैरों तले जमीन खिसक गई।
तभी अधूरी किताब अपने आप खुल गई।
पन्ने तेजी से पलटने लगे।
और अचानक एक पन्ने पर रुक गए।
उस पर नए शब्द उभरने लगे।
'लेखक झूठ बोल रहा है।'
कमरे में सन्नाटा छा गया।
आदमी की मुस्कान गायब हो गई।
फिर दूसरा वाक्य उभरा—
'सच्चा लेखक अभी जीवित है।'
इस बार आदमी का चेहरा बदल गया।
उसकी आँखों में क्रोध भर गया।
"चुप रहो!"
वह गरजा।
और अगले ही पल किताब हवा में उछल गई।
जैसे किसी अदृश्य शक्ति ने उसे पकड़ लिया हो।
अनन्या डरकर पीछे हट गई।
किताब के पन्ने तेजी से फड़फड़ाने लगे।
फिर एक तस्वीर उभरी।
एक पुरानी तस्वीर।
लगभग तीस साल पुरानी।
उस तस्वीर में चार लोग खड़े थे।
एक वृद्ध साधु।
एक युवा लड़की।
एक युवा आदमी।
और एक छोटा बच्चा।
अनन्या तस्वीर को ध्यान से देखने लगी।
अचानक उसका दिल रुक गया।
वह छोटा बच्चा...
कोई और नहीं...
बल्कि वही सफेद आँखों वाला आदमी था।
"यह कैसे संभव है?"
अनन्या बुदबुदाई।
तस्वीर के नीचे कुछ लिखा था।
'सन् 1993'
"लेकिन..."
अनन्या की आवाज काँप गई।
"अगर यह तस्वीर 1993 की है..."
"तो तुम इतने बूढ़े क्यों नहीं हुए?"
आदमी कुछ सेकंड तक चुप रहा।
फिर उसकी मुस्कान वापस आ गई।
"क्योंकि मैं इंसान नहीं हूँ।"
यह सुनकर पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया।
अचानक बाहर तेज बारिश शुरू हो गई।
बिजली कड़कने लगी।
धड़ाम!
एक जोरदार चमक पूरे कमरे में फैल गई।
और उसी रोशनी में अनन्या ने कुछ ऐसा देखा...
जिससे उसके होश उड़ गए।
आदमी का शरीर धीरे-धीरे बदल रहा था।
उसकी त्वचा काली पड़ रही थी।
उसका चेहरा विकृत होने लगा था।
और उसकी पीठ से काले धुएँ जैसी परछाइयाँ निकल रही थीं।
वह अब इंसान नहीं लग रहा था।
कुछ और बनता जा रहा था।
कुछ भयावह।
कुछ अमानवीय।
"भागो!"
आर्या अचानक चिल्लाई।
"अभी भागो!"
लेकिन बहुत देर हो चुकी थी।
क्योंकि उसी समय आदमी ने अपना हाथ आगे बढ़ाया।
और अनन्या के पैरों के नीचे की जमीन फट गई।
धड़ाम!
अनन्या चीख पड़ी।
वह सीधे नीचे गिरने लगी।
गहराई में।
अंधेरे में।
एक ऐसे अंधकार में जहाँ कोई रोशनी नहीं थी।
कोई आवाज नहीं थी।
कुछ भी नहीं था।
जब उसने आँखें खोलीं...
तो वह बंगले में नहीं थी।
मामा वहाँ नहीं थे।
आर्या भी नहीं थी।
वह एक विशाल लाइब्रेरी में खड़ी थी।
चारों तरफ अनगिनत किताबें थीं।
हजारों।
लाखों।
हर तरफ सिर्फ किताबें।
और उन सभी किताबों के कवर पर एक ही नाम लिखा था—
"अधूरी किताब"
अनन्या का दिल तेजी से धड़कने लगा।
तभी पीछे से एक आवाज आई—
"स्वागत है।"
वह घबराकर मुड़ी।
और सामने जो व्यक्ति खड़ा था...
उसे देखकर उसकी साँस रुक गई।
क्योंकि वह बिल्कुल उसकी तरह दिख रहा था।
वही चेहरा।
वही आँखें।
वही मुस्कान।
मानो वह खुद अपने सामने खड़ी हो।
उस रहस्यमयी लड़की ने मुस्कुराते हुए कहा—
"मैं असली अनन्या हूँ।"
क्रमशः...
अगले एपिसोड 6 में "असली अनन्या" का रहस्य, अनंत लाइब्रेरी और अधूरी किताब की दुनिया का सबसे बड़ा खुलासा शुरू होगा।