छुअन - व्यक्तिगत भावना Shubham Anjaan द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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छुअन - व्यक्तिगत भावना

छुअन एक ऐसा लक्षण है जिससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि इंसान की मानसिकता कैसी है। छुअन को लोगों ने दो भागों में बांट दिया जाता है शहरी और देहाती। मतलब तुम्हारे छूने का तरीका बता देता है तुम्हारे भीतर का इरादा क्या है ये अक्सर औरतों के बारे में देखा जाता है कि वो बहुत जल्दी भांप लेती हैं, शायद उनमें सिक्स सेंश होता है।बहुत से लड़के आमतौर पर गले मिलने से कतराते हैं क्योंकि वो नहीं समझ पाते किस तरह से गले मिलना है, गले मिलने के भी कई तरीके है। अपनी माँ से कैसे गले मिलना है, बहन से कैसे मिलना है और गर्लफ्रेंड से कैसे मिलना है। मगर ये कहीं न कहीं आजकल मर्दों में भी देखा जाता है। उनके साथ भी ऐसी अजीबोगरीब घटनाएं हो रही हैं। ऐसी ही एक कहानी जो लगभग हकीकत को छूती हैं हां ये भी कह सकते हैं कि पूरी तरह से सत्य है। मगर इस कहानी के सभी किरदार काल्पनिक हैं और सबसे जरूरी बात ये है कि किसी व्यक्ति विशेष की ओर इंगित करते हुए नहीं लिखी गई है.. कोई अपने ऊपर न ले। 
ये कहानी आजकल आम है और किसी के साथ भी हो सकती है... आज से कुछ तीन साल पहले लोक डाउन के समय की है। मध्यप्रदेश और राजस्थान के बोर्डर पर बसा हुआ एक शहर मुरैना जो अपने आप में एक वजूद रखता है। मुरैना के एक गाँव अमालपुर जो चम्बल के बीहड़ में बसा हुआ है वहां घटित हुई है। एक लड़का था आदित्य जो बाहर बड़े शहर में पढ़ाई कर रहा था। लोक डाउन की वजह से घर आया हुआ था। गर्मी के दिनों में गाँव के लोगों के पास कोई विशेष काम नहीं होता करने को। या तो वे ताश खेलते हैं या फिर दोपहरी में सोते हैं और शाम को अपने मवेशियों में लग जाते हैं। लोक डाउन में जो भी बाहर शहर में कमाने गये हुए थे सभी लौट कर गाँव आ गए थे। अब इन दिनों एक खेल बहुत प्रचलित था लूडो का। वहां चौपाल लगी रहती थी ताश की और लूडो की। सभी अपने अपने मोबाइल में घुसे पड़े हैं। आदित्य को बाहर रहते हुए सिगरेट की आदत लग गयी थी। गाँव में एक दुकान थी बहुत पुरानी, वह वहां से सिगरेट खरीदता और चोरी चुपके अपने दोस्तों के साथ पीता। ऐसे ही दिन निकल रहे थे। एक आदमी सुभाष जो शादीशुदा था 35-40 वर्ष का होगा लगभग। मन्दिर की पूजा करता सुबह शाम। आदित्य और उसके दोस्त उसको भैया बुलाते थे। सभी बच्चे शाम में सुभाष के पास बैठते थे क्योंकि वो बड़ी रोमांचक किस्से कहानियाँ सुनाता था। एक दिन आदित्य का मोबाइल बजा उसने देखा एक अंजान नम्बर से काॅल आ रहा है शाम का समय था। 
आदित्य- हैलो कौन, उधर से आवाज नहीं आई, उसने काट कर दोबारा लगाया। 
सुभाष- हैलो, मैं सुभाष आज तुम आए नहीं बैठक में, 
आदित्य- पहले सोच में था इनके पास मेरा नम्बर कहाँ से आया, उधर से फिर आवाज आई क्या हुआ, तो उसने कहा आ रहा हूँ.... काॅल काट दिया। । 
वो एक रोज टहलते टहलते सड़क की ओर निकल गया। गाँव के बस स्टैंड पर बैठ कर सिगरेट जलाई और पीने लगा। 
पीछे से एक आवाज आई क्या हुआ आज अकेले ही। पहले तो वो कौंद गया उसने जल्दी से सिगरेट बुझाई और देखा तो सुभाष लेटरिन से आ रहा है। आदित्य ने डर कर कहा कुछ नहीं ऐसे ही चले आए थे
सुभाष ने एक सिगरेट निकाल के जलाई और पूछा पिओगे और कहा मुझे पता है तुम पीते हो। उसकी तरफ सिगरेट बढ़ा कर कहा लो पीओ मैं किसी से नहीं कहूंगा, आदित्य ने सिगरेट का कस मारा और मेज पर बैठ गया। सुभाष भी बगल में बैठ गया। 
सुभाष- और बताओ गर्लफ्रेंड है, बात करते हो? 
आदित्य- नहीं भैया कोई गर्लफ्रेंड नहीं है, 
सुभाष ने तंज़ कसते हुए कहा तो तुमने इतने दिन तक क्या? आदित्य चुप रहा.... 
सुभाष- तुम इतने सुन्दर, लम्बे-चौडे जवान लड़के हो तुम्हारी कोई गर्लफ्रेंड नहीं है शर्म की बात है, इससे तो मैं ही ठीक हूँ। 
आदित्य चुप था.... सुभाष ने आदित्य को सरकाते हुए बोला मैं तेरी गोद में सिर रख लूं, आदित्य समझ नहीं पा रहा था ये उसके साथ क्या हो रहा है। ये उसके लिए एक अजीब और नया अनुभव था.... सुभाष ने अपना एक हाथ आदित्य के गाल पर रखा और उसके छाती पर फेरने लगा और दूसरा हाथ उसके जांघ पर फेरने लगा। आदित्य अब कुछ सोचने समझने की हालत में नहीं था, उसकी धड़कन इतनी तेजी से धडक रही थी मानो के छाती फाड़ कर बाहर निकल जाएगी। उसके हाथ आदित्य को नौच रहे हों जैसे कोई मासूम चिड़िया किसी दरिंदे के हाथ लग गयी हो। सुभाष ने आदित्य का मुंह पकड़ा और अपनी ओर खींचने लगा। आदित्य ने ख़ुद को संभाला और खड़ा हुआ । वह इतनी तेजी से घर की तरफ भागा के आज उसके साथ उसैन वोल्ट भी भागता तो वो उसे भी पीछे छोड़ देता... भागते हुए सीधे अपने घर गया और छत पर जा कर लेट गया। अपनी माँ से कहा कोई आए तो कहना मैं घर पर नहीं हूँ, माँ ने पूछा क्या हुआ उसने कुछ नहीं कहा। कुछ देर बाद दरवाजा बजा, उसकी माँ ने कहा कौन है, उधर से आवाज आई मैं सुभाष। 
माँ- सुभाष, तुम इतनी रात में सब ठीक तो है। 
सुभाष- सब ठीक है चाची, वो मैं आदित्य के बारे में पूछ रहा था आज दिखा नहीं वो, 
माँ- पता नहीं कहाँ है शाम से ही गायब है। 
सुभाष- अच्छा कोई बात नहीं, चलो फिर आते हैं और चला गया.. करीब एक घंटे के बाद आदित्य नीचे आया तो माँ ने पूछा क्या हुआ सब ठीक है ना, तू हड़बड़ाहट में क्यूँ था, वो सुभाष भी आया था। तेरे बारे में पूछ रहा था। अरे कुछ नहीं माँ, ऐसे ही आया होगा और बाहर निकल गया। फिर एकांत में सिगरेट जलाई लेकिन उसके हाथ अभी भी कांप रहे थे‌। उसके दिमाग में वही मंजर घूम रहा था, आज क्या हो जाता भगवान बचा लिया तूने। फिर उसने अपने दोस्त को फोन किया, रवि कहाँ है तू जल्दी से मेरे घर आ। 
रवि कुछ कहता इससे पहले उसने फोन काट दिया। रवि भागते हुए आया, क्या हुआ तूने बात भी नहीं सुनी। 
आदित्य- रवि से लिपट कर रोया और सारी बात बताई, रवि ने कहा क्या चूतिया है तू पता तो है किसके बारे में बात कर रहा है कोई सुनेगा तो साले तुझे मार मार कर हालत खराब कर देगा। आदित्य ने कहा भाई माँ कसम ये सच है पहले तो रवि खुद असमंजस में था कि ये किस छुअन के बारे में बात कर रहा है। आदित्य मुझे समझ नहीं आ रहा है कि लड़का और लड़की का छूना अलग-अलग होता है क्या? उसके चेहरे पर जिज्ञासा भरा सवाल था। 
आदित्य- देख, सुभाष ने मेरे गोद में सिर रखा और जिस तरह से उसने मुझे छुआ और वही दूसरी तरफ मैंने तेरे कंधे पर सिर रखा, तूने मेरी पीठ सहलाई। ये दोनों घटना दिखने में एक जैसी हैं मगर इनमें एक बहुत बड़ा अन्तर है छुअन का। अगर तू मुझे छूता है मुझे दोस्त जैसा महसूस होता है। उसकी छुअन में एक अजीब सी हरकत थी जो उसके नापाक इरादों की तरफ़ इशारा कर रही थी। 

सरल भाषा में यह है कि अगर किसी का छूना हमारा शरीर स्वीकार कर ले तो अच्छी छुअन है (गुड़ टच) या उस छुअन से तुम परिचित हो और यदि हमें कोई गलत इरादे से छूता है तो हमारा शरीर ये स्वीकार नहीं कर सकता और एक वजह ये भी है कि हम उस छुअन से परिचित नहीं है। (बेड़ टच) 
रवि- यानि कि तू ये कहना चाह रहा है कि मुझे तू छुए या मेरी गर्लफ्रेंड अंजली तो मुझे अच्छा लगता है और सुभाष छुए तो मुझे पता चल जाएगा कि इसके इरादे नेक नहीं है। 
फिर रवि ने कुछ सोचा और बोला हम तो उसे देव मानुष समझते थे वो तो दो धारी तलवार निकला। फिर रवि ने कहा चल मेरे साथ इस साले के हाथ पैर तोडते हैं... आदित्य ने मना किया नहीं भाई कोई भी हमारी बात का विश्वास नहीं करेगा। रवि ने कहा मैं एक दो लडकों को जानता हूँ, उनके साथ भी इसने ऐसी हरकत की है मगर आज तक यकीन नहीं हुआ, ये आदमी ऐसा कर सकता है। अब हम किसी से कुछ नहीं कहेंगे वरना बहुत बेइज्जती होगी। रवि ने छेडते हुए कहा तो तूने फिर जवाबी कार्रवाई में क्या किया, आदित्य बोला रूक जा भाई। वो बात सोचने से ही जान निकल जाती है। उस रात आदित्य को नींद भी नहीं आई। आगे कई दिनों तक वो सुभाष के सामने तक ना पड़ा। फिर वो बापिस शहर आ गया। मगर वो बात वही दफ़न हो गई। इस कहानी में ना आदित्य गलत है ना ही सुभाष। क्योंकि समाज lgbtq को नहीं मानता, वो इसे एक बीमारी समझते हैं, और आदित्य जैसे मासूम इसके शिकार बनते हैं। ये बात भी सही है कि अगर सुभाष गे है तो उसने शादी क्यों की। सबसे पहले सुभाष को स्वीकार करना होगा कि वो गे है.... गे होना अभिशाप नहीं है। ये भी समाज का हिस्सा हैं पुरूष और स्त्री की तरह। उनको भी सभी की तरह समान नज़रों से देखना चाहिए। सबसे पहले उन्हें भी खुद को अलग नहीं समझना चाहिए। 
           शुभम् अंजान