रोशनी जिंदगी की कैसी कशमकश - 1 RAAHULL SHARMA द्वारा नाटक में हिंदी पीडीएफ

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रोशनी जिंदगी की कैसी कशमकश - 1

उत्तर प्रदेश के छोटे से गांव मेहनूपुर की मिट्टी की खुशबू कहानी
कहानी की शुरुआत: मेहनूपुर की गलियां
मेहनूपुर एक ऐसा गांव है जहां सूरज की पहली किरण के साथ ही हल की आवाजें गूँजने लगती हैं। वहाँ वह गरीब किसान रहता है, जिसका नाम शंकर है 
उसके पास जमीन का एक छोटा सा टुकड़ा है, जिससे बमुश्किल घर का गुजारा होता है
रोशनी का जन्म: इसी तंगी और गरीबी के बीच 'रोशनी' का जन्म होता है। वह बचपन से ही बहुत होनहार है।
सपना: जब गांव में कोई बीमार पड़ता है और इलाज के अभाव में दम तोड़ देता है, तो वह किसान अपनी बेटी की आँखों में एक सपना देखता है—उसे डॉक्टर बनाने का।रौशनी उसकी माता पिता यानि कि शंकर और कमला हमेशा ही सोचते हैं कि वाह अपनी बेटी को डॉक्टर ही बनाएंगे और उसके लिए वाह सब कुछ करेंगे जिसे वाह डॉक्टर बनायेंगे
शंकर और कमला का संघर्ष:
शंकर दिन-रात खेत में पसीना बहता है और कमला दूसरों के घरों का काम करके या सिलाई-कढ़ाई करके एक-एक पैसा ज़ोरती है। उनका एक ही मकसद है-रोशनी की पढ़ाई
रोशनी का बचपन:
रोशनी ने देखा है कि कैसे उसके पिता फटी हुई धोती पहनते हैं ताकि उसके स्कूल की फीस भरी जा सके। वो केरोसिन की ढिबरी (दीपक) की रोशनी में रात तक पढ़ती है। गांव वाले अक्सर शंकर का मज़ाक उड़ाते हैं, "अरे शंकर, किसान का बच्चा किसान ही बनेगा, डॉक्टर बनने में लाखों लगते हैं।" लेकिन शंकर बस मुस्कुरा कर रह जाता है।
एक दिल छू लेने वाला मॉड:
कहानी में एक मोड़ तब आता है जब गांव में किसी की मौत हो जाती है और शहर ले जाते-जाते रास्ते में ही उसकी मौत हो जाती है। उस दिन रोशनी अपने माँ-बाप के पएर चुकर कसम खाती है कि वो उनके सपने को जरूर पूरा करेगी।
कमला और शंकर का एक बेटा भी है और रोशनी का भाई जिसका नाम मेहुल है  5 साल का है और वह भी चाहता है कि उसकी बहन डॉक्टर बनी
मेहनती भाई: मेहूल
मेहूल का किरदार कहानी में एक मजबूत स्तंभ (Pillar) की तरह है। वह छोटा होने के बावजूद समझदार है। स्कूल से लौटकर वह सीधा खेतों में शंकर का हाथ बँटाता है ताकि शंकर थोड़ा विश्राम कर सकें। वह रोशनी का सबसे बड़ा 'सपोर्ट सिस्टम' है। रात को जब रोशनी पढ़ती है, तो मेहूल चुपके से उसके लिए पानी या कभी-कभी माँ से चोरी-छिपे गुड़ बचाकर लाता है ताकि रोशनी को पढ़ाई में ऊर्जा मिले।
रोशनी की दादी शंकर की मां इनमें सबके खिलाफ हैं उमा देवी
दादी उमा देवी का विरोध
घर के आंगन में अक्सर बहस छिड़ जाती है। उमा देवी अपनी पुरानी सोच के कारण कहती हैं:
"अरे शंकर! बिटिया पर इतना पैसा क्यों फूंक रहा है? चार अक्षर पढ़ लिए बहुत है, कल को पराए घर जाना है। चूल्हा-चौका ही तो करना है। इस पैसे को बचाकर इसकी शादी कर, और मेहूल को बड़ा आदमी बना!"
शंकर और कमला का जवाब
कमला, जो अमूमन शांत रहती है, अपनी सास को समझाते हुए कहती है— "माजी, रोशनी सिर्फ मेरी बेटी नहीं, इस गांव की उम्मीद बनेगी। हम नहीं चाहते कि जो लाचारी हमने झेली है, वो और कोई गरीब मां-बाप झेले।"
एक दिन शंकर किसी काम के सिलसिले में गांव से शहर जाता है और वह देखता है कि शहर में एक बहुत ही अच्छा स्कूल है और उसकी फीस भी कम है जिसे डॉक्टर की पढ़ाई होती है तब्बू निश्चि निश्चित करता है कि अपनी बेटी का दाखिला आईएसआई स्कूल में करवाएगा और वापस गांव आ जाता है
दृश्य: उम्मीदों की सुबह और काल का साया
शंकर जब शहर से लौटा था, तो उसके चेहरे पर वह चमक थी जो बरसों की मेहनत के बाद भी नहीं दिखी थी। उसने कमला से कहा, "कमला, अब हमारी रोशनी के सपनों को पंख लगेंगे। शहर का वह स्कूल नेक भी है और हमारे बजट में भी। कल ही हम उसे लेकर चलेंगे।" रोशनी और मेहूल की आँखों में उस रात नींद नहीं थी, बस सुनहरे भविष्य के सपने थे।
अगली सुबह, सूरज की पहली किरण के साथ ही रोशनी ने अपना सबसे अच्छा सूट पहना। कमला ने बेटी का माथा चूमा और शंकर ने अपनी फटी हुई जेब से वो जमा पूँजी निकाली जो उसने पाई-पाई जोड़कर बचाई थी। दादी उमा देवी अब भी आँगन में बैठकर बड़बड़ा रही थीं, "देख लेना, कुल की मर्यादा मिट्टी में मिलाओगे तुम लोग!" पर आज शंकर के संकल्प के आगे वह आवाज़ फीकी थी।
वह भयावह हादसा:
तीनों—शंकर, कमला और रोशनी—गाँव के चौराहे से एक टेंपो में सवार हुए। रास्ते में रोशनी खिड़की से बाहर देखते हुए सोच रही थी कि डॉक्टर बनकर वह अपने माता-पिता के हर दुख को हर लेगी। शंकर और कमला एक-दूसरे को देख मुस्कुरा रहे थे, मानो कह रहे हों कि उनकी तपस्या सफल होने वाली है।
तभी, मोड़ पर एक तेज़ रफ़्तार बस अनियंत्रित होकर आई। चीखने का वक्त भी नहीं मिला। एक ज़ोरदार धमाका हुआ, कांच के टूटने की आवाज़ गूँजी और सब कुछ धुंधला हो गया।
मंज़र मौत का:
सड़क पर सन्नाटा पसर गया था। धूल और धुएं के बीच रोशनी की आँखें खुलीं। उसके कान सुन्न थे। उसने देखा, उसके पिता सड़क के एक तरफ निढाल पड़े थे, उनके हाथ में वही कागज़ थे जो एडमिशन के लिए थे, अब वे खून से लाल हो चुके थे। पास ही कमला पड़ी थी, जिसकी साँसें थम चुकी थीं।
रोशनी ने कांपते हाथों से अपनी माँ को झकझोरा, "माँ... उठो माँ! देखो हम शहर पहुँच गए।" पर कोई जवाब नहीं आया। शंकर की आखिरी नज़र अपनी बेटी पर पड़ी, उनकी आँखों में एक अधूरा सपना और ढेर सारा दर्द था। अस्पताल पहुँचने से पहले ही शंकर और कमला ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।तब तक कोई एम्बुलेंस को फोन लगाता है और एम्बुलेंस अस्पताल में जाती है तब तक कमला और शंकर मर चुके हैं 
रोशनी अपने मारे हुए माता पिता के साथ गांव वापस एम्बुलेंस के साथ आती है
हृदयविदारक दृश्य: उजड़ गया मेहनूपुर का वह आँगन
एंबुलेंस की वह मनहूस आवाज़:
गाँव की धूल भरी सड़क पर एंबुलेंस का सायरन गूँजा। मेहूल, जो घर की देहली पर बैठा अपनी बहन और माता-पिता के लौटने का इंतज़ार कर रहा था, सायरन सुनते ही बाहर भागा। उसे लगा शायद वे लोग आ गए, पर सफेद गाड़ी को देख उसका दिल बैठ गया। दादी उमा देवी भी लाठी टेकती हुई बाहर आईं।
सपनों का अंत:
जैसे ही एंबुलेंस के पीछे का दरवाज़ा खुला, गाँव वालों की भीड़ जमा हो गई। पहले शंकर का बेजान शरीर नीचे उतारा गया, फिर कमला का। मेहूल अपनी जगह पर जैसे पत्थर का हो गया। उसकी आँखों के सामने पूरी दुनिया धुंधली हो गई। दादी उमा देवी ने जब अपने जवान बेटे और बहू की लाश देखी, तो उनके हाथ से लाठी छूट गई और वह वहीं ज़मीन पर ढह गईं। उनका गला रुंध गया, मानो चीख भी अंदर ही कहीं दफन हो गई हो।

रोशनी की हालत:
एंबुलेंस के एक कोने से रोशनी उतरी। उसके माथे पर पट्टी बँधी थी, हाथों और घुटनों पर खरोंचें थीं, पर वह बिल्कुल ठीक थी। लेकिन उसकी आँखों की चमक मर चुकी थी। वह एक ज़िंदा लाश की तरह लग रही थी। उसके कपड़ों पर अब भी उसके पिता के खून के छींटे थे।
दादी का विलाप और आक्रोश:
जब दादी को होश आया, तो उनका दुःख गुस्से में बदल गया। वह रोशनी की तरफ उंगली उठाकर चिल्लाईं, "कुलक्षणी! खा गई मेरे बेटे और बहू को! यही डॉक्टर बनाना चाहता था तुझे? देख ले... उनकी लाशें घर आई हैं! तू बच गई और उनको ले डूबी!" रोशनी चुपचाप खड़ी रही। न उसकी आँखों में आँसू थे, न ज़बान पर कोई शब्द। वह बस अपनी माँ के ठंडे हाथ को पकड़कर खड़ी थी, मानो कह रही हो— "माँ, मैं डॉक्टर बनने गई थी, पर तुम्हें बचा भी न सकी।"
याह सब देखकर मेहुल चौक जाता है
दृश्य: मासूम मेहूल का विलाप
मेहूल भागकर पहले शंकर के पैरों से लिपट गया। "बापू... बापू उठो! देखो मैं खेत से घास काट लाया हूँ। अब आपको धूप में नहीं जाना पड़ेगा। बापू, आँखें खोलो ना!" लेकिन शंकर की पत्थर सी हो चुकी आँखों में अब कोई हलचल नहीं थी।