अगली सुबह सूरज की पहली किरण के साथ ही कृष्ण और रश्मि के बीच एक नई चर्चा शुरू हुई—हनीमून की प्लानिंग।
कृष्ण ने बेड पर ढेर सारे ट्रैवल ब्राउशर्स फैलाते हुए कहा, "रश्मि, पापा कह रहे थे कि पेरिस या स्विट्जरलैंड के टिकट्स बुक करवा देते हैं। क्या कहती हो?"
रश्मि, जो खिड़की से बाहर देख रही थी, मुस्कुराते हुए मुड़ी और बोली, "कृष्ण, हमने अपनी पूरी ज़िंदगी इन बड़े शहरों और विदेशों में बिताई है। क्या तुम नहीं चाहते कि हम अपनी ज़िंदगी की यह नई शुरुआत कहीं ऐसी जगह करें जहाँ सिर्फ शांति हो, सुकून हो और प्रकृति का असली रूप हो?"
कृष्ण को रश्मि की बात पसंद आई। वह खुद भी शोर-शराबे से दूर जाना चाहता था। उसने उत्साहित होकर कहा, "तुम सही कह रही हो! लोग पूरी दुनिया से छत्तीसगढ़ की खूबसूरती देखने बस्तर और सरगुजा आते हैं। हमारे अपने राज्य में ऐसी वादियाँ, झरने और घने पहाड़ हैं कि विदेशी जगहें भी उनके सामने फीकी पड़ जाएं। क्यों न हम इन हसीन वादियों के बीच ही अपना वक्त बिताएं?"
दोनों ने मिलकर तय किया कि वे छत्तीसगढ़ की उन अनछुई पहाड़ियों और जंगलों की तरफ जाएंगे, जहाँ मोबाइल का नेटवर्क कम और पंछियों की चहचहाहट ज़्यादा हो। उन्हें नहीं पता था कि 'सुकून' की यह तलाश उन्हें सीधे देवक़ेड़ा के उन रास्तों पर ले जाएगी, जहाँ 'भूखी दुल्हन' सदियों से किसी नए जोड़े का इंतज़ार कर रही थी।
अध्याय: अमीरी का घमंड और मौत का निमंत्रण
रश्मि ने मुस्कुराते हुए कृष्ण की ओर देखा और बोली, "अकेले जाने से अच्छा है हम अपने दोस्तों को भी साथ ले लें। तुम सुमित और सृष्टि को जानते ही हो, उनका लोहे (Lathan/Iron) का बड़ा व्यापार है और उन्हें छत्तीसगढ़ की हर लोकेशन की अच्छी समझ है। उनकी भी तो अभी महीना भर पहले शादी हुई है, हमारा अच्छा साथ हो जाएगा।"
कृष्ण की आँखों में भी चमक आ गई, "शानदार आइडिया है! और क्यों न हम मानव और आकृति को भी बुला लें? उनकी अभी सगाई हुई है, पर अगर वो हमारे साथ इस 'प्री-हनीमून' ट्रिप पर चलेंगे तो उन्हें भी एक-दूसरे को समझने का मौका मिलेगा।"
रश्मि ने तुरंत अपने दोस्त को फोन लगाया और किसी ऐसी जगह के बारे में पूछा जहाँ शांति और खूबसूरती दोनों हो। उसके दोस्त ने उत्साह में आकर देवक़ेड़ा के पास वाली उस पहाड़ी और वहां बनी पुरानी हवेली का ज़िक्र किया।
दोस्त ने फोन पर थोड़ा हिचकिचाते हुए कहा, "देख रश्मि, जगह तो जन्नत है, सुकून भी बहुत है... पर वहां के लोग एक पुरानी हवेली के बारे में कुछ अजीब बातें करते हैं। कहते हैं वहां कोई रूह रहती है और कुछ नियम-कायदे पालने पड़ते हैं।"
यह सुनकर रश्मि और कृष्ण खिलखिलाकर हँस पड़े। कृष्ण ने फोन छीनते हुए कहा, "अरे यार, ये नियम-कायदे और अंधविश्वास गरीब और कमज़ोर लोगों के लिए होते हैं। हम रईस लोग हैं, हम नियम पालने के लिए नहीं, नियम तोड़ने के लिए पैदा हुए हैं! हमारे पास पैसा है, पावर है और रसूख है। हमें कौन रोक सकता है?"
उनके इस अहंकार ने उस 'काली रात' की नींव रख दी थी। उन्हें नहीं पता था कि 'भूखी दुल्हन' को किसी के रसूख या पैसे से कोई मतलब नहीं है, उसे तो बस अपनी प्यास बुझाने के लिए नए शिकार चाहिए थे।
अध्याय: देवपुर की चौखट और शाही स्वागत
रायपुर से हवाई जहाज़ की छोटी सी उड़ान भरने के बाद, सभी दोस्त भिलाई पहुँचे। वहाँ से तीन आलीशान काली गाड़ियों का काफिला जंगलों और पहाड़ों को चीरते हुए देवपुर (देवक़ेड़ा) की ओर बढ़ा। जैसे-जैसे गाड़ियाँ गाँव के करीब पहुँच रही थीं, सड़कों के किनारे खड़े आदिवासी और ग्रामीण हाथ जोड़कर खड़े हो रहे थे।
गाँव पहुँचते ही एक बुजुर्ग आदमी, जिसका नाम रघु काका था, गाड़ियों के पास आया और झुककर अभिवादन किया। रघु काका सालों से रश्मि के परिवार की पुश्तैनी संपदा की देखरेख कर रहे थे।
रश्मि ने गर्व से अपने दोस्तों की तरफ देखा और कहा, "स्वागत है दोस्तों, देवपुर में! यहाँ की ये हज़ारों एकड़ ज़मीन, ये पहाड़ और वो सामने जो बड़ी हवेली दिख रही है, वो सब मेरे पूर्वजों की है। मेरे पिता यहाँ के किसी राजा से कम नहीं हैं।"
दोस्तों की आँखें फटी की फटी रह गईं। उन्हें अंदाज़ा नहीं था कि रश्मि का परिवार इतना रईस और प्रभावशाली है। रश्मि का पुश्तैनी घर किसी राजमहल जैसा था, जिसकी नक्काशी और ऊँची दीवारें उसकी शान बयान कर रही थीं। लेकिन उस भव्यता के पीछे एक अजीब सा सन्नाटा भी था।
रघु काका के चेहरे पर खुशी तो थी, लेकिन उनकी आँखों में एक अनजाना डर साफ़ दिख रहा था। उन्होंने दबी आवाज़ में कृष्ण और रश्मि से कहा, "बिटिया रानी, आप बहुत सालों बाद आई हैं। घर के भीतर आपका स्वागत है, लेकिन याद रखिएगा... आज रात अमावस शुरू हो रही है। सूरज ढलने के बाद हवेली की छत पर मत जाना और बाहर से आए मेहमानों को कहिए कि आज की रात शोर न करें।"
कृष्ण ने हँसते हुए रघु काका के कंधे पर हाथ रखा और कहा, "अरे काका, हम यहाँ जश्न मनाने आए हैं, मातम नहीं! हमारे पास दुनिया की सबसे महँगी बंदूकें और सुरक्षा है, हमें किसी भूत-प्रेत का डर नहीं।"
अध्याय: आधी रात का मातम और वहशी हंसी
दिन भर के सफर और जश्न की थकान के बाद, छहों दोस्त हवेली के आलीशान कमरों में गहरी नींद सो गए थे। बाहर देवपुर का जंगल खामोश था, लेकिन वह खामोश किसी बड़े तूफान के आने का संकेत दे रही थी।
जैसे ही घड़ी की सुइयों ने रात के 12 बजाए, हवेली के भारी दरवाजों के पीछे से एक अजीब सी आवाज गूँजने लगी। वह आवाज इतनी भयानक थी कि पत्थर का दिल भी कांप जाए। पहले ऐसा लगा जैसे कोई औरत बहुत दूर कहीं फूट-फूट कर रो रही है—उसका विलाप इतना गहरा था मानो सदियों का दर्द उसकी आवाज़ में सिमट आया हो।
लेकिन देखते ही देखते, वह रोना एक डरावनी और वहशी हंसी में बदल गया। वह हंसी हवेली की दीवारों से टकराकर गूँज रही थी। कभी लगता आवाज़ छत से आ रही है, तो कभी लगता कि कोई बंद कमरे के ठीक पीछे खड़ा हंस रहा है।
गाँव के बुजुर्ग, जो अपनी झोपड़ियों में दुबक कर बैठे थे, कांपते हुए एक-दूसरे से कह रहे थे, "ये उसी का बुलावा है... 'भूखी दुल्हन' जाग गई है। इतने सालों बाद इस हवेली में इंसानों की महक और शोर पहुँचा है, अब वह किसी को चैन से नहीं रहने देगी। यह किसी बड़े संकट की आहट है।"
हवेली के भीतर, गहरी नींद में सोए दोस्तों को इन आवाजों ने बेचैन तो किया, लेकिन थके होने के कारण किसी की आँख नहीं खुली। रात धीरे-धीरे बीत गई और सुबह का सूरज निकल आया, लेकिन वह रात अपने पीछे एक गहरा खौफ छोड़ गई थी।
अध्याय: जंगल का रक्तपात और खौफनाक सुबह
सूरज की पहली किरण के साथ देवपुर गाँव जाग तो गया था, चिड़ियाँ चहचहा रही थीं, लेकिन उस चहचहाहट में आज संगीत नहीं, बल्कि एक दहशत थी। तभी जंगल की पगडंडी से एक व्यक्ति पागलों की तरह दौड़ता हुआ गाँव की ओर आया। उसका शरीर पसीने से तर-बतर था और चेहरे पर मौत का खौफ साफ दिख रहा था।
गाँव के चौक पर रघु काका और अन्य ग्रामीण इकट्ठा हो गए। उस व्यक्ति को हांफते देख सब घबरा गए। रघु काका ने उसे पानी पिलाया और पूछा, "क्या हुआ सखू? तू इस तरह बदहवास क्यों भाग रहा है?"
सखू की आवाज़ कांप रही थी, वह चीखते हुए बोला, "गजब हो गया काका! अनर्थ हो गया! आज सुबह जब मैं अपनी गाय चराने जंगल की तरफ गया, तो वहाँ का नज़ारा देखकर मेरी रूह कांप गई। पूरे जंगल में हज़ारों पक्षी—तोते, मोर, कोयल—सब ज़मीन पर मरे पड़े हैं। ऐसा लग रहा है जैसे किसी ने एक ही रात में उन सबका खून पी लिया हो। किसी के शरीर पर घाव नहीं है, बस वे सूखे पत्तों की तरह बेजान पड़े हैं!"