बारिश हमेशा से नेहा को पसंद थी। उसे लगता था कि बारिश सिर्फ मौसम नहीं होती, बल्कि यादों का एक झोंका होती है जो पुराने पन्नों को फिर से खोल देती है।
उस शाम भी बारिश हो रही थी। नेहा अपने कमरे की खिड़की के पास बैठी थी। सामने मेज़ पर चाय का कप रखा था और हाथ में एक पुरानी डायरी थी। डायरी के पन्ने पीले पड़ चुके थे, लेकिन उनमें लिखी यादें आज भी उतनी ही ताज़ा थीं।
डायरी के पहले पन्ने पर एक नाम लिखा था— आरव।
नेहा मुस्कुरा दी।
पाँच साल पहले उसकी जिंदगी में आरव आया था। वह कोई फिल्मी हीरो नहीं था, न ही पहली नज़र में प्यार वाली कोई कहानी थी। दोनों की मुलाकात कॉलेज के पहले दिन हुई थी।
कॉलेज के ऑडिटोरियम में नए छात्रों का स्वागत समारोह चल रहा था। नेहा पीछे की सीट पर बैठी थी कि अचानक किसी ने पूछा—
"यह सीट खाली है?"
नेहा ने सिर उठाकर देखा। सामने एक लड़का खड़ा था, चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान।
"हाँ, बैठ जाइए।"
वह लड़का आरव था।
उस दिन बस इतनी ही बात हुई, लेकिन अगले कुछ दिनों में दोनों अक्सर मिलने लगे। कभी लाइब्रेरी में, कभी कैंटीन में और कभी कॉलेज के गलियारों में।
धीरे-धीरे दोस्ती गहरी होती गई।
आरव बहुत अलग था। उसे किताबें पढ़ना पसंद था, जबकि नेहा को कहानियाँ लिखना। वह अक्सर नेहा से कहता—
"तुम्हारी कहानियाँ एक दिन बहुत लोगों तक पहुँचेंगी।"
और नेहा हँसकर जवाब देती—
"और तुम उन कहानियों के पहले पाठक रहोगे।"
समय बीतता गया।
कॉलेज के तीन साल कब गुजर गए, दोनों को पता ही नहीं चला।
एक दिन कॉलेज का आखिरी समारोह था। सभी दोस्त एक-दूसरे से विदा ले रहे थे।
नेहा के मन में बहुत कुछ था जो वह आरव से कहना चाहती थी, लेकिन कह नहीं पा रही थी।
शायद आरव भी कुछ कहना चाहता था।
लेकिन उस दिन भी दोनों चुप रहे।
कुछ बातें दिल में ही रह गईं।
कॉलेज खत्म होने के बाद जिंदगी बदल गई।
आरव को दिल्ली में नौकरी मिल गई और नेहा अपने शहर में रहकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने लगी।
शुरुआत में दोनों की बातें होती रहीं।
रोज़ फोन।
रोज़ मैसेज।
रोज़ हँसी-मज़ाक।
लेकिन धीरे-धीरे जिम्मेदारियाँ बढ़ती गईं।
फोन कम होने लगे।
मैसेज छोटे होने लगे।
और फिर एक दिन बात पूरी तरह बंद हो गई।
नेहा ने कई बार सोचा कि वह आरव को फोन करे, लेकिन हर बार उसका आत्मसम्मान उसे रोक देता।
वह सोचती—
"अगर उसे मेरी परवाह होगी तो वह खुद फोन करेगा।"
उधर शायद आरव भी यही सोचता होगा।
दोनों इंतज़ार करते रहे।
और दूरी बढ़ती गई।
समय किसी के लिए नहीं रुकता।
पाँच साल बीत गए।
नेहा अब एक स्कूल में अध्यापिका थी। बच्चों को पढ़ाना उसे बहुत अच्छा लगता था।
लेकिन जिंदगी की भीड़ में भी एक कोना ऐसा था जहाँ आरव अब भी रहता था।
एक दिन स्कूल से लौटते समय नेहा की बस खराब हो गई।
मजबूरी में उसे पास के रेलवे स्टेशन पर रुकना पड़ा।
बारिश शुरू हो चुकी थी।
लोग इधर-उधर भाग रहे थे।
नेहा एक कोने में खड़ी होकर बारिश देख रही थी कि तभी किसी ने पीछे से आवाज़ दी—
"नेहा?"
उसने पलटकर देखा।
सामने आरव खड़ा था।
पाँच साल बाद।
वही मुस्कान।
वही आँखें।
बस चेहरे पर थोड़ी परिपक्वता आ गई थी।
कुछ पल दोनों एक-दूसरे को देखते रहे।
जैसे समय रुक गया हो।
"कैसी हो?" आरव ने पूछा।
नेहा ने मुस्कुराकर कहा—
"ठीक हूँ। तुम?"
"मैं भी।"
फिर दोनों हँस पड़े।
इतने सालों की दूरी के बाद भी बातचीत शुरू करने के लिए शब्द कम पड़ रहे थे।
स्टेशन के बाहर एक छोटी-सी चाय की दुकान थी।
दोनों वहाँ जाकर बैठ गए।
चाय के साथ यादों का सिलसिला शुरू हो गया।
कॉलेज की बातें।
दोस्तों की बातें।
कैंटीन की बातें।
लाइब्रेरी की बातें।
सब कुछ जैसे कल की बात हो।
फिर अचानक आरव चुप हो गया।
उसने धीरे से पूछा—
"क्या तुमने कभी मुझे याद किया?"
नेहा ने उसकी ओर देखा।
आँखों में हल्की नमी थी।
"कुछ लोगों को भुलाया नहीं जाता, आरव।"
आरव ने नजरें झुका लीं।
"मैंने बहुत बार तुम्हें फोन करने की कोशिश की थी।"
"फिर किया क्यों नहीं?"
"डर लगता था।"
"मुझे भी।"
दोनों फिर चुप हो गए।
कभी-कभी दो लोग एक-दूसरे से प्यार करते हैं, लेकिन अपने अहंकार और डर के कारण दूर हो जाते हैं।
शायद उनके साथ भी यही हुआ था।
बारिश तेज हो चुकी थी।
स्टेशन पर ट्रेन आने की घोषणा हुई।
आरव उठ खड़ा हुआ।
"मेरी ट्रेन आ गई।"
नेहा ने सिर हिला दिया।
दोनों प्लेटफॉर्म की ओर बढ़े।
ट्रेन धीरे-धीरे स्टेशन पर आकर रुकी।
आरव डिब्बे के दरवाज़े पर खड़ा हो गया।
ट्रेन चलने लगी।
अचानक उसने कहा—
"नेहा!"
"हाँ?"
"इस बार अगर मैं फोन करूँ तो उठाओगी?"
नेहा की आँखों में आँसू आ गए।
वह मुस्कुराई और बोली—
"इस बार इंतज़ार नहीं करवाऊँगी।"
ट्रेन आगे बढ़ गई।
नेहा प्लेटफॉर्म पर खड़ी रही।
लेकिन इस बार उसके चेहरे पर उदासी नहीं थी।
कुछ कहानियाँ खत्म नहीं होतीं।
वे बस सही समय का इंतज़ार करती हैं।
और शायद उनकी कहानी भी अब फिर से शुरू होने वाली थी।