अध्याय 6: अधूरेपन की पूर्णता
रूपा का डिजिटल दुनिया से अचानक गायब हो जाना भार्गव के लिए किसी सदमे से कम नहीं था। शुरुआती कुछ हफ्ते तो जैसे एक धुंध की तरह गुज़रे। वह बार-बार अपना फोन चेक करता, फेसबुक पर उसकी प्रोफाइल सर्च करता, और हर बार 'No Results Found' देखकर उसका दिल बैठ जाता। मुंबई की भीड़ में वह खुद को सबसे अकेला महसूस कर रहा था।
स्मृतियों का संदूक
महीने बीत गए। भार्गव ने अब उसे कॉल करना या मैसेज करना छोड़ दिया था। उसने समझ लिया था कि ज़बरदस्ती किसी की ज़िंदगी में अपनी जगह बनाना प्यार नहीं, बल्कि जिद है। उसने रूपा के साथ हुई हर बातचीत, उसके भेजे हुए वॉयस नोट्स और उसकी उन सादी तस्वीरों को अपने दिल के एक खास कोने में सहेज लिया था।
उसने अपनी नौकरी पर ध्यान देना शुरू किया, लेकिन उसकी शख्सियत बदल चुकी थी। अब वह पहले से ज़्यादा शांत और गंभीर रहने लगा था। उसने अपनी भावनाओं को शब्दों का रूप देना शुरू किया। जो बातें वह रूपा से नहीं कह पाया था, उन्हें उसने कहानियों और कविताओं में पिरोया। उसका वह 'एकतरफा प्यार' अब उसकी रचनात्मकता बन चुका था |
एक अनपेक्षित संदेश
लगभग एक साल बाद, एक रात जब भार्गव अपने ऑफिस का काम खत्म कर सोने की तैयारी कर रहा था, उसके फोन की स्क्रीन चमकी। एक अनजान नंबर से व्हाट्सएप पर एक फोटो आई थी।
वह एक शादी का कार्ड था। कार्ड पर नाम लिखा था— "रूपा संग विवेक"
भार्गव की आँखों में धुंधलका छा गया, पर इस बार दर्द से ज़्यादा एक अजीब सी शांति थी। नीचे एक छोटा सा मैसेज लिखा था:
"भार्गव जी, मुझे माफ कर दीजिएगा। उस दिन मैं डर गई थी। शायद मैं इस काबिल नहीं थी कि आपके उस निस्वार्थ प्यार को संभाल सकूँ। मेरी शादी तय हो गई है। पिताजी बहुत खुश हैं। मैं चाहती थी कि आप जानें कि आपने मुझे जो सम्मान और आत्मविश्वास दिया, उसी की बदौलत आज मैं अपने जीवन के इस नए सफर के लिए तैयार हूँ। आप हमेशा मेरे सबसे अच्छे 'अनकहे' दोस्त रहेंगे। खुश रहिएगा।"
प्यार की नई परिभाषा
भार्गव ने फोन हाथ में पकड़ा और बालकनी में आ गया। सामने समुद्र की लहरें शांत थीं। उसने कार्ड की फोटो को गौर से देखा। रूपा उस पीले रंग के जोड़े में बहुत सुंदर लग रही होगी, ठीक वैसी ही जैसी उसने सरसों के खेतों वाली तस्वीर में देखी थी।
उसने टाइप किया, *"बहुत-बहुत शुभकामनाएँ रूपा। तुम हमेशा खुश रहो, बस यही मेरी प्रार्थना थी और यही रहेगी। तुम्हें पाने की चाहत तो अब नहीं है, पर तुम्हें चाहने की चाहत हमेशा रहेगी।"*
उसने वह मैसेज भेजा और फिर उस नंबर को डिलीट कर दिया। उसे अब किसी संपर्क की ज़रूरत नहीं थी। उसने महसूस किया कि प्यार का मतलब हमेशा साथ होना नहीं होता। कभी-कभी किसी की खुशी में अपनी खुशी ढूँढ लेना ही प्यार की सबसे ऊँची अवस्था होती है।
उपसंहार
भार्गव आज भी मुंबई में रहता है। वह अब भी कभी-कभी मरीन ड्राइव पर बैठकर डूबते सूरज को देखता है। लोग पूछते हैं कि वह अकेला क्यों है, तो वह बस मुस्कुरा देता है। वह अकेला नहीं है; उसके पास रूपा की वो यादें हैं, वो बातें हैं और वो अहसास है जिसने उसे एक बेहतर इंसान बनाया।
उसका प्यार अधूरा था, पर उसका व्यक्तित्व अब पूरा था। फेसबुक की उस एक फ्रेंड रिक्वेस्ट ने उसे सिखा दिया था कि मोहब्बत में 'हासिल' करना ज़रूरी नहीं, 'महसूस' करना ही काफी है।
यूपी की सादगी और मुंबई की रफ्तार के बीच, एक डिजिटल धड़कन अब एक शांत संगीत बन चुकी थी— एक ऐसा संगीत जो सिर्फ भार्गव के दिल में बजता था।
समाप्त