अधूरी किताब – सीजन 2
एपिसोड 4 : आर्या का श्राप
बंगले के अंदर मौत जैसा सन्नाटा छाया हुआ था।
अनन्या और उसके मामा एक-दूसरे को भयभीत नजरों से देख रहे थे।
अधूरी किताब अब भी खुली हुई थी।
उसके पन्नों पर वही शब्द चमक रहे थे—
"वह जाग चुकी है..."
"आर्या वापस आ गई है..."
अचानक पूरे कमरे की लाइटें झिलमिलाने लगीं।
हालाँकि बंगले में वर्षों से बिजली नहीं थी।
फिर भी दीवारों पर नीली रोशनी फैलने लगी।
मानो किसी अदृश्य शक्ति ने पूरे घर को घेर लिया हो।
अनन्या की धड़कनें तेज हो गईं।
"मामा... आखिर यह आर्या कौन है?"
मामा के चेहरे पर डर साफ दिखाई दे रहा था।
उनके होंठ काँप रहे थे।
"जिस दिन यह नाम तुम्हारे सामने आएगा... मुझे पता था वह दिन कभी न कभी जरूर आएगा।"
"सच क्या है?"
मामा ने गहरी साँस ली।
फिर धीरे-धीरे बोलना शुरू किया।
"लगभग पच्चीस साल पहले..."
"वाराणसी के पास एक छोटा-सा गाँव था।"
"वहाँ एक लड़की रहती थी..."
"उसका नाम आर्या था।"
अनन्या ध्यान से सुनने लगी।
"आर्या बहुत सुंदर थी।"
"लेकिन उसकी सबसे बड़ी पहचान उसकी सुंदरता नहीं..."
"बल्कि उसकी बुद्धिमानी थी।"
"उसे किताबें पढ़ने का बेहद शौक था।"
"वह दिन-रात पुरानी लाइब्रेरी में बैठकर किताबें पढ़ती रहती थी।"
"एक दिन..."
"उसे लाइब्रेरी के तहखाने में एक रहस्यमयी किताब मिली।"
मामा की आवाज धीमी हो गई।
"वही किताब..."
"अधूरी किताब।"
अनन्या का दिल तेजी से धड़कने लगा।
आर्या ने जैसे ही किताब खोली...
उसे अंदर अजीब-अजीब बातें दिखाई देने लगीं।
पहले तो उसे लगा कि यह कोई सामान्य उपन्यास है।
लेकिन धीरे-धीरे उसे समझ आने लगा कि किताब में लिखी घटनाएँ सच हो रही थीं।
किताब जिस व्यक्ति के बारे में लिखती...
उसके साथ वही घटना घट जाती।
पहले उसने इसे संयोग समझा।
लेकिन जब बार-बार ऐसा होने लगा...
तो उसे एहसास हुआ कि किताब साधारण नहीं है।
वह जीवित थी।
और किसी अज्ञात शक्ति द्वारा संचालित थी।
"फिर क्या हुआ?"
अनन्या ने पूछा।
मामा की आँखों में दर्द उभर आया।
"फिर आर्या ने एक बहुत बड़ी गलती कर दी।"
"कौन-सी?"
"उसे प्रेम हो गया।"
अनन्या चुप हो गई।
"उस लड़के का नाम विवान था।"
"दोनों एक-दूसरे से बेहद प्यार करते थे।"
"लेकिन गाँव वालों को उनका रिश्ता पसंद नहीं था।"
"एक रात..."
"विवान अचानक गायब हो गया।"
"कई दिनों तक उसकी तलाश हुई।"
"लेकिन वह कहीं नहीं मिला।"
"तब आर्या ने अधूरी किताब खोली।"
"और पहली बार उसने अपनी किस्मत के बारे में पढ़ा।"
अनन्या की साँस अटक गई।
"क्या लिखा था?"
मामा ने धीरे से कहा—
'विवान मर चुका है।'
कमरे में सन्नाटा छा गया।
आर्या टूट गई।
उसने किताब को जलाने की कोशिश की।
नदी में फेंकने की कोशिश की।
लेकिन किताब हर बार वापस लौट आती।
फिर एक दिन...
किताब के आखिरी पन्ने पर एक नया संदेश उभरा।
"अगर तुम विवान को वापस चाहती हो..."
"तो अपनी आत्मा मुझे सौंप दो।"
अनन्या के रोंगटे खड़े हो गए।
"और उसने मान लिया?"
मामा ने सिर झुका लिया।
"हाँ।"
"उसने अपने प्रेम के लिए सब कुछ कुर्बान कर दिया।"
"लेकिन किताब ने उसे धोखा दिया।"
"विवान वापस नहीं आया।"
"बल्कि आर्या की आत्मा उसी किताब में कैद हो गई।"
अचानक...
कमरे की खिड़की अपने आप खुल गई।
तेज हवा अंदर घुस आई।
धड़ाम!
धड़ाम!
धड़ाम!
अनन्या घबरा गई।
अधूरी किताब के पन्ने तेजी से पलटने लगे।
और फिर एक पन्ने पर रुक गए।
इस बार वहाँ एक तस्वीर उभर रही थी।
धीरे-धीरे।
मानो कोई अदृश्य हाथ उसे बना रहा हो।
कुछ ही सेकंड में तस्वीर पूरी हो गई।
अनन्या ने देखा—
तस्वीर में उसके माता-पिता थे।
और उनके पीछे...
एक लड़की खड़ी थी।
सफेद कपड़ों में।
लंबे बाल।
लाल आँखें।
आर्या।
"हे भगवान..."
मामा पीछे हट गए।
अनन्या की आँखें फैल गईं।
"मम्मी-पापा का इससे क्या संबंध था?"
मामा ने काँपती आवाज में कहा—
"तुम्हारे पिता इतिहासकार थे।"
"उन्होंने आर्या और इस किताब के बारे में शोध शुरू किया था।"
"उन्हें लगता था कि किताब को नष्ट किया जा सकता है।"
"लेकिन जितना वे सच के करीब पहुँचते गए..."
"उतना ही खतरा बढ़ता गया।"
"और फिर एक रात..."
"वे गायब हो गए।"
"कुछ दिनों बाद उनकी लाशें मिलीं।"
अनन्या की आँखों में आँसू भर आए।
"तो उनकी हत्या किसने की?"
मामा जवाब दे पाते उससे पहले...
कमरे में किसी लड़की की हँसी गूँज उठी।
हाहाहाहाहाहा...
हाहाहाहाहाहा...
अनन्या का खून जम गया।
यह वही हँसी थी।
जो उसने पहले भी सुनी थी।
कमरे का तापमान अचानक शून्य जैसा ठंडा हो गया।
दीवारों पर बर्फ जमने लगी।
और तभी...
कमरे के बीचोंबीच धुएँ का गुबार बनने लगा।
धीरे-धीरे।
धीरे-धीरे।
और फिर उसमें से एक आकृति उभरने लगी।
एक लड़की।
सफेद कपड़े।
लंबे काले बाल।
चेहरा पीला।
लाल आँखें।
आर्या।
इस बार वह पहले से कहीं अधिक स्पष्ट दिखाई दे रही थी।
अनन्या के पैरों तले जमीन खिसक गई।
"त... तुम..."
आर्या मुस्कुराई।
लेकिन उसकी मुस्कान बेहद भयावह थी।
"आखिरकार..."
"हम मिल ही गए।"
मामा घबराकर पीछे हट गए।
"नहीं..."
"यह संभव नहीं।"
आर्या ने उनकी ओर देखा।
उसकी आँखों में भयानक क्रोध था।
"तुम्हारे परिवार ने मुझे धोखा दिया।"
अनन्या सन्न रह गई।
"क्या मतलब?"
आर्या धीरे-धीरे उसकी ओर बढ़ी।
"तुम्हारे पिता ने मुझसे वादा किया था कि वे मुझे मुक्त करेंगे।"
"लेकिन उन्होंने मुझे फिर से कैद कर दिया।"
"उन्होंने किताब छीन ली।"
"और फिर उसे छिपा दिया।"
अनन्या की साँसें तेज हो गईं।
"तो क्या तुमने उन्हें मारा?"
कुछ सेकंड तक आर्या चुप रही।
फिर उसने कहा—
"नहीं।"
यह सुनकर दोनों हैरान रह गए।
"मैंने नहीं मारा।"
"उनकी हत्या किसी और ने की थी।"
अचानक पूरा बंगला काँप उठा।
मानो भूकंप आ गया हो।
दीवारों में दरारें पड़ने लगीं।
छत से मिट्टी गिरने लगी।
और उसी समय...
अधूरी किताब के पन्नों पर नए शब्द उभरने लगे।
एक-एक करके।
धीरे-धीरे।
"झूठ..."
"वह झूठ बोल रही है..."
अनन्या और आर्या दोनों किताब की तरफ देखने लगे।
फिर दूसरा वाक्य उभरा—
"असली हत्यारा जाग चुका है..."
और उसके नीचे—
"वह तुम्हें ढूँढ रहा है।"
कमरे की सारी खिड़कियाँ एक साथ टूट गईं।
काँच चारों ओर बिखर गया।
और बाहर अंधेरे में...
दो चमकती हुई सफेद आँखें दिखाई दीं।
वही सफेद आँखें...
जो अनन्या ने मणिकर्णिका घाट के मंदिर में देखी थीं।
वह काला साया।
वह रहस्यमयी आदमी।
वह बंगले के बाहर खड़ा था।
और इस बार...
वह मुस्कुरा रहा था।
अनन्या का दिल बैठ गया।
क्योंकि पहली बार उसके चेहरे का कुछ हिस्सा दिखाई दे रहा था।
और उसे देखकर उसके होश उड़ गए।
वह आदमी बिल्कुल उसके पिता जैसा दिख रहा था।
क्रमशः...
अगले एपिसोड 5 में सफेद आँखों वाले आदमी की पहचान, अनन्या के पिता का रहस्य और अधूरी किताब के असली मालिक का पहला बड़ा खुलासा होगा।