आशिकी.....अब तुम ही हो। - 11 vaishnavi Shukla द्वारा नाटक में हिंदी पीडीएफ

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आशिकी.....अब तुम ही हो। - 11

अब तक हमने पढ़ा की ...सनाया दादी जी की बात सुनकर गुस्से में महेश्वरी मेंशन से निकल जाती है।

अब आगे...!!

कुछ देर बाद

दृश्य: सनाया का घर।

सनाया कार से नीचे उतरती है , Sanaya के चेहरे पर गुस्सा और तमतमाहट साफ - साफ दिखाई दे रही थी ।

वह कार का दरवाजा इतनी जोर से बंद करती है की आवाज पूरे पोर्च में गूंज उठती है।

बिना पीछे देखे वह तेज कदमों से मुख्य दरवाजे की ओर बढ़ जाती है।

घर के अंदर।

विशाल हॉल के बीच में रखे क्रीम रंग के सोफे पर नैना खन्ना (सनाया की मॉम) आराम से बैठी किसी मैग्जीन के पन्ने पलट रही थी।

तभी उसकी नज़र सामने से गुजरती सनाया पर पड़ी।

नैना: सनाया...आ गई तुम।

लेकिन इससे पहले वह कुछ और पूछ पाती। सनाया सीढ़ियों से चढ़ते हुए अपने कमरे की तरफ बढ़ चुकी थी । कुछ ही सेकंड में उपर से जोरदार आवाज आती है।

धड़ाम।

कमरे का दरवाजा बंद हो चुका था ।

नैना ने गहरी सांस ली और मैग्जीन टेबल पर रख दी।

नैना :(सिर हिलाते हुए) हे भगवान...अब कहा आग लगाकर आई है ये लड़की।।

इधर दृश्य: मंदिर प्रांगण।

जन्माष्टमी की तैयारियां लगभग पूरी हो चुकी थी । मंदिर रंग बिरंगी झालरों ,फूलों और दीपो से सजा हुआ था। सोसायटी की कुछ महिलाएं और बच्चे भी वहीं मौजूद थे ।।

मंदिर के एक कोने में बैठी श्रद्धा बड़ी  तंलीयता से फूलों की रंगोली बना रही थी जबकी प्रीति उसकी मदद कर रही थी।

प्रीति:(उसे देखते हुए) यार, मुझसे ये सब क्यों नही होता।, मुझसे तो सीधी लाइन भी न खींची जाती।

श्रद्धा:(मुस्कुराकर) सबका अपना-अपना गुण होता है... देख न तू कितना अच्छा खाना बनाती है ..दुनिया के बेस्ट सेफ भी फेल हैं तेरे आगे।। और मुझे तो चाय तक ठीक से बनाना नही आता ।

प्रीति: हम्म्म...!!!सबका अपना - अपना गुण होता है पर तू तो गुणों की खान है, रंगोली , पेंटिंग, डांस, पढ़ाई कुछ छोड़ा भी  है या नही ।

श्रद्धा:(हल्का हस्ते हुए) अरे बस कर...इतना भी, मत बढ़ा।

प्रीति कुछ पल उसे देखती रही... श्रद्धा के चेहरे पर हमेशा की तरह ही  शांतिदायक मुस्कान थी।

प्रीति:  तू क्या है ....??यार ..कोई  तारीफ करे या बुराई ...तेरे चेहरे पर हमेशा शांति का भाव रहता है।

हम्म्म भगवान ने बड़ा टाइम लिया होगा तुझे बनाने में.. ..!!

श्रद्धा:(मजाक में) अच्छा...पर तुझे बनाने में उनका पेशंस खत्म हो गया।

(प्रीति उसे कुछ देर घूरती है....फिर दोनो खिलखिलाकर हस पड़ती है।)

फिर प्रीति पास रखी टोकरी से फूलों की पंखुड़ियां अलग करने लगती है और श्रद्धा वापस अपनी रंगोली  में व्यस्त हो गई।

तभी वहां  से सोसायटी की दो महिलाएं गुजरी -- कमला आंटी और सुशीला आंटी।

दोनो की नजरे श्रद्धा और प्रीति पर पड़ती है।

कमला: अरे , सुशीला देखो तो जरा..!!कितनी देर से ये लड़कियां एक ही काम में लगी हुई हैं।

सुशीला: बात करने से फुरसत मिले तब न पूरा हो काम।(रंगोली को देखते हुए) हम्म..वैसे सब काहे की तारीफ करते रहते हैं... रंगोली मुझे तो कुछ खास नहीं लग रही .।।।

कमला: हां ....(हल्का हस कर) हमारी रीमा इससे कहीं अच्छी बना लेती है।

प्रीति ने धीरे से अपनी गर्दन उठाई।

प्रीति:(उनकी तरफ देखते हुए) अच्छा???....तो फिर रीमा को भी बुला ही लीजिए...आंटी जी। मंदिर और सुंदर सज जायेगा!!....

(दोनो महिलाएं थोड़ा सकपका जाती हैं।)

सुशीला: हम तो बस राय दे रहे थे..!!

प्रीति: और हम तो बस सुन रहे थे ...वैसे राय और बुराई में बहुत पतली लाइन होती है , ध्यान रखिएगा ।

कमला: बड़ी तेज जुबान हो गई है तुम्हारी..!!

(श्रद्धा बस  उन लोगो को बात करते सुन रही थी)

प्रीति: क्या करू आंटी..संगत का असर है..!!

सुशीला:मतलब??

प्रीति: (मासूम चेहरा बनाकर) अरे , रोज आपको लोगो की चर्चा करते सुनते है ...कुछ तो सीखेंगे ही।

( यह बात सुनकर आसपास खड़े दो तीन बच्चे अपनी हंसी रोकने की कोशिश करने लगे।)

(सुशीला और कमला दोनो ने उन्हें घूर देखा)

कमला:बहुत बोलने लगी हो ...तुम।

प्रीति: एक बात बताये आंटी जी....उम्र हो रही है आपकी । अपना समय लोगो की बुराई करने के बजाय भगवान में लगाइए...शायद ऊपर नरक में टॉर्चर थोड़ा कम हो। क्योंकि जैसी आपकी हरकते हैं .....स्वर्ग में जगह मिलने से रही ।

(पास बैठी श्रद्धा ने तुरंत अपना माथा पकड़ लिया।)

सुशीला: हे भगवान।

कमला: नरक मिले मेरे दुश्मन को।

(दोनो महिलाओं के चेहरे देखने लायक थे)

सुशीला: हम्म...चलो बहन  यहां से।

(दोनो मुंह बनाते हुए वहा से निकल जाती है।)

प्रीति:(उन्हे जाते देख हसने लगती है।)(थोड़ी तेज आवाज में) मेरी बात पर गौर करिएगा ..आंटी जी।

श्रद्धा:(उसके सिर पीट हल्की चपत लगाते हुए) प्रीति, क्या करती रहती है तू??

प्रीति: क्या?? मैं तो बस समाज सुधार का छोटा सा प्रयास कर रही थी।

श्रद्धा: इसे समाज सुधार नहीं , लोगो को चिढाना कहते हैं।

प्रीति:और जो वो लोग कर रही थी?वो

श्रद्धा: उन्हे भगवान संभाल लेंगे।

प्रीति: हां भगवान तो अपना कम करेंगे ही। लेकिन मैं भी तो उनकी पार्ट टाइम कर्मचारी हूं।

श्रद्धा अपना सर हिलाते हुए मुस्कुरा देती है।

दोनो फिर से अपने काम में लग जाती हैं।........

दृश्य: सनाया का घर।

मुख्य दरवाजा खुलने की आवाज के साथ आशुतोष खन्ना(सनाया के डैड) अंदर दाखिल होते हैं।

नैना:(आशुतोष से) आइए, आपकी लाडली घर आई है।

आशुतोष(खुश होते हुए) क्या ..!!सनाया आ गई। नैना ....तुमने मुझे बताया क्यों नही।

(सनाया को बुलाते हुए) Sanaya where are you, princes??

नैना: अपने रूम में है । बहुत गुस्से में थी...अब आप ही संभालिए उसे...अब तक तो कमरे का हुलिया पूरी तरह  बिगाड़ चुकी होगी

आशुतोष: (नैना की बात सुनकर कमरे की ओर बढ़ जाता है)...सनाया बच्चा।

नैना भी पीछे पीछे चली जाती है।

आज के लिए बस इतना ही ।

आगे जानने ले लिए पढ़ते रहिए .....!!

[आशिकी.....अब तुम ही हो।]

राधे राधे🙏😊

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