तुम्हें भी तो याद आती होगी - 1 Anil Kundal द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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तुम्हें भी तो याद आती होगी - 1

                            -१-

" माँ, आज मेरा लंच पैक नहीं करना। " मैंने शीशे के सामने खड़े होकर कंघी से अपने बाल संवारे और एकबारगी दर्पण में अपने चेहरे को निहारा। सब कुछ ठीक ठाक सा लगा। और दिनों की तरह शीशे में अपने चेहरे को देखकर मेरे चेहरे की रौनक में बढ़ोतरी नहीं हुई थी। बल्कि मुंह लटकाए ही मैंने फिर से अपने बाल संवारे। लेकिन उस बार कंघी से कतई नहीं। बल्कि अपने हाथों की उंगलियों से। 

" क्यों, किसी पार्टी में जाना है क्या? " माँ ने अनमने मन से पूछा। हालांकि वो सहज ही समझ बूझ गई थी कि सारा माजरा है क्या? पर कुछ बोली नहीं। माँ सब कुछ जानती हुई भी सब कुछ अपने हृदय में प्रच्छन्न ही रखती। मुझे उस सच्चाई की वास्तविकता बहुत वय के तदनंतर ही ज्ञात हुई थी। वैसे और भी बहुत से सत्य तथ्यों से मैं अवगत अभी तक भी नहीं हो पाया हूँ। 

" नहीं तो! " मैंने अपने स्कूल बैग को अपने कंधों पर पिठू की तरह उठाया और घर से बाहर सड़क पर निकल आया था। 

उस दिन माँ ने और कुछ कहा था कि नहीं कहा था? मुझे कुछ भी पता ही नहीं चला था। गली को लांघने के साथ ही जब मैं सड़क पर पहुँचा था, तो माँ घर से निकल कर काफी दूर निकल आई थी। संभवतः वो बहुत परेशान सी जान पड़ रही थी। मैं मुड़कर माँ की तरफ मुड़ना चाहता था। परंतु चाहकर भी ना जाने क्यों नहीं मुड़ा और सीधे चलता बना। उस दिवस ना जाने कैसे मेरे हृदय में इतनी कठेठता कहाँ से आ गई थी! हालांकि मुझे ये अहसास अच्छे से हो चुका था कि हरेक इंसान हमेशा अपने पर ही सितम ढाता है, परायों पर नहीं। 

मैं जब स्कूल पहुँचा, तब पढ़ाई का तीसरा घंटा बज चुका था। कक्षा में गणित का अध्यापक अभी अभी कक्षा में प्रविष्ट हुआ था। सभी विध्यार्थी अपनी अपनी पुस्तक निकाले हुए थे। लेकिन फिर भी यदा कदा कुछेक शरारती बच्चे अपनी शरारतों से बाज नहीं आए थे। कभी कभी तो कोई कोई बच्चा किसी शरीफ़ बच्चे के कान पर अपनी अंगुलियों से प्रहार करता, तो कभी कभार कोई शरारती बच्चा अपने किसी सहपाठी के सर के बालों को अच्छी तरह से झंझोर देता कि उस बेचारे बच्चे की मारे दर्द के चीखें निकल जातीं। 

मैं अपनी कक्षा में ना जाकर, फिर से स्कूल के खेल के मैदान पर चला गया। उस वक्त वहाँ पर कोई भी मौजूद नहीं था। संभवतः वहाँ की निस्तब्धता के सबब मैं उधर की तरफ चला गया था। लेकिन कुछ विलंब वहाँ पर बैठे बैठे हरी हरी दूर्वा के कोमल कोमल तिनके तोड़ तोड़ कर कुछ गहराई से सोचता रहा। मेरे कलेजे में कल नहीं पड़ रही थी। रह रह कर मन व्याकुल हो रहा था। 

और जब मन उस जगह पर भी ठिकाने पर नहीं टिका, तो स्कूल के बाहर निकल आया। 

                                -२-

बाहर सब कुछ सामान्य और ठीक ठाक सा था। पर मैं ही कतई नहीं। सड़क पर बहुत से लोग आ जा रहे थे, पैदल भी और गाड़ियों में भी। जाने पहचाने भी और अनजाने लोग भी। मैं उस सड़क के दसवें मोड़ पर निकल आया था। पर मुझे किसी ने बुलाया तक नहीं, और ना ही मैने। जैसे मैं सभी की नजरों से कतरा कर चला जा रहा था। वैसे ही लोग भी। 

मैंने पनवाड़ीे की दुकान से एक सिगरेटों का पैकेट लिया और दियासलाई पहले से ही मेरी पतलून की जेब में मौजूद थी। 

थोड़ा दूर और आगे बढ़ जाते ही मैंने पहली सिगरेट जला ली। और कोयले वाली रेलगाड़ी के इंजन के जैसे मुंह से धुआँ निकालने लगा। बड़े बड़े लंबे लंबे कश दर कश खींचने पर कुछ ही देरी में वह सिगरेट खत्म हो गई। 

तो दूसरी सुलगा ली। मैं एक विक्षिप्त व्यक्ति के जैसे अपनी ही धुन मे आगे बढ़ा जा रहा था। मैं इतना दूर निकल आया था कि उसके पूर्व मैं कभी भी आधे रास्ते तक भी नहीं पहुंचा था। 

जब मैं थक कर चूर चूर हो गया, तो सड़क के एक ओर एक बड़े से पत्थर पर बैठ गया और फिर से अपनी सोच में डूब गया। 

आज दस दिनों से ऊपर का समय हो चुका था और अभी तक एक बार भी अनन्या स्कूल नहीं आई थी। वो मेरे बचपन का प्यार था। जिसे अगर मैं दिन में एक बार देख ना लेता था,  मेरा जीना मुहाल हो जाता था। मैं इसी रोज़ की ही तरह विक्षिप्त सा गलियों सड़कों पर निकल जाता था। ठीक जैसे कि शिकारी और भिखारी का क्या पता होता है कि वो कहाँ निकल जाएं। 

                               -३-

मुझे एकाएक यूँ लगा जैसे कि पीछे से कोई आवाजें लगा कर पुकारता हो। फिर भी मैंने अपने पीछे मुड़कर नहीं देखा और उस बड़े से पत्थर पर से उठकर फिर से आगे बढ़ गया। 

सड़क के ग्यारहवें मोड़ पर मैं यूँ ही मुड़ा ही था कि किसी ने पीछे से मुझे ग्रीवा से पकड़ लिया और क्रोधाग्नि में तमतमाये हुए बोला, " अनिल माथुर, यार कब से तुझे मैं आवाजें लगा रहा था, तुझे सुनाई क्यों नहीं दिया? क्या बहरा हो गया है तू? "

" अबे, सुधाकर पांडेय, तू! हाँ, बोल? आज लड़कियों के पीछे दुम हिला कर पीछा करने वाला, ठरकी मुन्ना! आज मेरा पीछा क्योंकर करने लगा? " मैंने उसकी चिकोटी काटने के साथ ही कहा। 

" यार, कुछ परेशानी वाली बात है। "

" हाँ, तो बोल? मुझसे बेहिचक बोल, मेरे यार? "

" समझ नहीं आ रहा कैसे बोलूँ? और कहाँ से शुरू करूँ और कहाँ पर खत्म! "

" हूँ! बात इतनी गंभीर है! "

" यार, बि सीरियस! बहुत टैंशन हो रही है मुझे तो! "

" अच्छा, तू मुझे बता! मैं परेशानी का हल ढूंढ लूंगा। जिगरी यार के लिए इतना भी नहीं किया, तो क्या खाक किया! "

" यार, अनन्या! "

" क्या हुआ मेरी अनन्या को? " मैं मारे डर के यूँ चीख पड़ा जैसे कि मेरी जान ही निकल गई हो। 

" यार, आज रात नौ बजकर पंद्रह मिनट पर नई दिल्ली से बाम्बे के लिए चलने वाली पश्चिम एक्स्प्रेस ट्रेन पर अनन्या और उसका सारा परिवार हमेशा हमेशा के लिए बाम्बे जा रहे हैं। अभी मेरी घड़ी पर साढ़े छह बजकर बीस मिनट हो रहें हैं। तेरे पास अब थोड़ा सा ही वक्त बचा है। ये रख पांच सौ रूपये। अगर उसके साथ बाम्बे भी जाना पड़े, तो निकल जाना, मेरे भाई। गुड लक! "

" थैंक्स, सुधाकर पांडेय, मेरी जान! निकलता हूँ। मेरी माँ का ख्याल रखना। "

" जरूर भाई! वो तेरी नहीं, बल्कि मेरी माँ है। "

यही सब कुछ कह सुनने के साथ ही मैं वहाँ से नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के लिए ऑटो पर सवार हो गया और ऑटो में ही मैंने अपनी अगली सिगरेट सुलगा ली और कश दर कश खींचने लगा।