कोलकाता: गुनाह का काला जश्न
कोलकाता की वह रात आम रातों जैसी नहीं थी। 'द वेलवेट अंडरग्राउंड' नाइट क्लब के बाहर महंगी गाड़ियों का काफिला लगा था,
और अंदर—शहर की चकाचौंध अपनी पूरी शिद्दत पर थी। बेस (Bass) की गूँज से दीवारें कांप रही थीं और नियॉन लाइट्स की नीली-लाल रोशनी भीड़ के चेहरों पर किसी मुखौटे की तरह छप रही थी।
शहर के बड़े अमीरज़ादे, जिनके लिए पैसा सिर्फ एक कागज़ का टुकड़ा था, वहाँ अपनी दुनिया से बेखबर जश्न में डूबे थे।
लेकिन उस भीड़ के बीच, मौत दबे पाँव चल रही थी।
तभी, वीआईपी लाउंज के उस मखमली अंधेरे में एक सन्नाटा फैल गया।
भवनीश चट्टोपाध्याय—वह नाम जो कोलकाता की हसीन रातों का शहजादा था और शहर के सबसे ताकतवर शख्स, अग्निश चट्टोपाध्याय का इकलौता चिराग—अब एक बेजान जिस्म बन चुका था।
उसका शरीर एक आरामदायक सोफे पर लुढ़का हुआ था, आँखें छत की तरफ थमी थीं, मानो मौत के उस आखिरी पल में उसने शून्य को देख लिया हो। न कोई खून, न कोई दुश्मनी का निशान, बस एक गहरी और रहस्यमयी खामोशी।
जब म्यूजिक बंद हुआ और भीड़ का शोर थमा, तब लोगों को एहसास हुआ कि कोलकाता का सबसे बड़ा चिराग गुल हो चुका है।
यह सिर्फ एक मौत नहीं थी, बल्कि चट्टोपाध्याय खानदान के उस किले में पहली दरार थी, जिसे अब तक कोई हिला नहीं सका था।
द वेलवेट अंडरग्राउंड: कोहराम और खौफ
जैसे ही वीआईपी सेक्शन से यह खबर फैली, क्लब का वह कान फाड़ देने वाला संगीत एक झटके में थम गया।
मदहोश कर देने वाली रोशनी अब डरावनी लगने लगी थी। जैसे ही लोगों की नजर भवनीश की बेजान लाश पर पड़ी, पूरा क्लब मानों पत्थर का हो गया।
फिर अचानक, उस सन्नाटे को चीरती हुई चीख-पुकार मच गई। जो अमीरज़ादे अभी तक झूम रहे थे, वे अब अपनी जान बचाकर भागने की कोशिश करने लगे।
उसी भीड़ में खड़ी थी नजीमा—शहर की एक मशहूर रईसज़ादी और भवनीश की करीबी दोस्त। नजीमा ने जैसे ही सोफे पर लुढ़के हुए भवनीश को देखा,
उसकी रूह कांप गई। कुछ मिनट पहले तक जिस पर महँगी शराब और संगीत का सुरूर चढ़ा था, वह एक पल में उतर गया। उसकी आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा।
उसने चीखना चाहा, पर गला जैसे रुँध गया हो। वह बेसुध होकर वहीं फर्श पर गिर पड़ी, उसे यकीन ही नहीं हो रहा था कि उसका सबसे अच्छा दोस्त अब इस दुनिया में नहीं रहा।
तभी, बाहर सायरन की आवाज़ गूँजी। लाल और नीली बत्तियों की चमक ने क्लब के गेट पर दस्तक दी।
कोलकाता पुलिस की टीम अंदर दाखिल हुई। जूते की धमक और वायरलेस की आवाज़ों ने माहौल को और भी भारी बना दिया।
भीड़ को चीरते हुए इंस्पेक्टर ने लाश की तरफ कदम बढ़ाए। उन्हें पता था कि यह कोई आम मर्डर नहीं है—यह अग्निश चट्टोपाध्याय के घर में लगी वह आग है, जो पूरे शहर को अपनी चपेट में लेने वाली थी।
चट्टोपाध्याय का प्रतिशोध
बाहर मीडिया के कैमरों की फ्लैश लाइट्स और ओबी वैन की कतारें लग चुकी थीं। देखते ही देखते यह खबर पूरे कोलकाता और फिर देश भर की सुर्ख़ियों में छा गई।
न्यूज़ चैनलों पर ब्रेकिंग न्यूज़ चल रही थी—
"चट्टोपाध्याय साम्राज्य के वारिस की रहस्यमयी मौत!"।
तभी, क्लब के गेट पर एक काले रंग की बेहद आलीशान और रफ़्तार से आती हुई गाड़ी रुकी। पीछे की सीट से अग्निश चट्टोपाध्याय उतरे।
उनकी आँखों में दुःख से ज्यादा एक खौफनाक गुस्सा था। पुलिस वालों का घेरा उन्हें रास्ता देने के लिए तुरंत पीछे हट गया। जैसे ही उन्होंने अंदर कदम रखा,
उनकी नज़र अपने इकलौते बेटे भवनीश के ठंडे पड़ चुके शरीर पर पड़ी। अग्निश वहीं घुटनों के बल बैठ गए, उनका पत्थर जैसा दिल मानो मोम बन गया, लेकिन अगले ही पल वो दहाड़े— "किसने किया यह?
किसकी इतनी हिम्मत हुई कि मेरे खून पर हाथ डाला?"
पास खड़े इंस्पेक्टर ने हिचकिचाते हुए कहा, "सर, शुरुआती जांच और पोस्टमार्टम की सरसरी रिपोर्ट तो यही कह रही है कि भारी मात्रा में नशा (Overdose) करने के कारण हार्ट फेल हुआ है। शायद यह एक हादसा है।"
अग्निश चट्टोपाध्याय ने तिरस्कार से इंस्पेक्टर की ओर देखा और उठ खड़े हुए। उनकी आवाज़ में बर्फ जैसी ठंडी नफरत थी, "हादसा? मेरा बेटा नशा करता था,
लेकिन वह इतना बेवकूफ नहीं था कि अपनी जान दे दे। यह नशा नहीं, साजिश है। किसी ने बड़ी सफाई से उसे रास्ते से हटाया है।"
उन्होंने पुलिस की रिपोर्ट को सिरे से खारिज कर दिया। उन्हें यकीन था कि गुनहगार इसी भीड़ में कहीं छिपा है और पुलिस की आंखों में धूल झोंक रहा है।
अग्निश ने नजीमा की तरफ देखा, जो अभी भी बदहवास पड़ी थी। उनकी निगाहें अब हर उस शख्स पर शक की सुई चुभा रही थीं जो उस रात वहाँ मौजूद था।
सत्ता का चक्रव्यूह
अग्निश चट्टोपाध्याय की आँखों में दहकती आग उस वक्त ठंडी पड़ने लगी जब उन्होंने क्लब के चारों ओर नज़र दौड़ाई।
वहाँ मौजूद हर दूसरा चेहरा किसी न किसी बड़े मंत्री, उद्योगपति या इंटरनेशनल सिंडिकेट से ताल्लुक रखता था। वे जानते थे कि अगर उन्होंने बिना सबूत के हाथ डाला, तो यह पूरा शहर जल उठेगा।
पुलिस कमिश्नर ने उनके करीब आकर दबी आवाज़ में कहा, "अग्निश जी, ज़रा संभल कर।
यहाँ मौजूद हर शख्स के पीछे एक बड़ी ताकत खड़ी है। अगर हम बिना पुख्ता गवाह के किसी पर हाथ डालते हैं, तो ऊपर से दबाव इतना बढ़ जाएगा कि हम चाहकर भी जांच नहीं कर पाएंगे।"
अग्निश का हाथ अपनी पिस्तौल पर जाकर रुक गया। उन्हें पहली बार अपनी ताकत छोटी लगने लगी।
वे जानते थे कि पुलिस की 'ओवरडोज' वाली थ्योरी महज एक कवर-अप है ताकि उन रईसज़ादों को बचाया जा सके जिनके माता-पिता सत्ता की कुर्सियों पर बैठे हैं।
उन्होंने अपनी नज़रें घुमाकर नजीमा को देखा, जो अब भी कांप रही थी। नजीमा खुद एक बहुत बड़े घरानें की बेटी थी। अग्निश समझ गए कि अगर उन्हें सच जानना है, तो उन्हें कानून और सिस्टम के बाहर जाकर अपना रास्ता खुद बनाना होगा।
उन्होंने ठंडे स्वर में कहा, "ठीक है इंस्पेक्टर, अगर सिस्टम अंधा हो गया है, तो मैं खुद अपनी आँखें खोलूँगा। पर याद रखना, जिस दिन मुझे वह नाम पता चला, उस दिन न कोई पद काम आएगा और न ही किसी का पैसा।"
अंतिम विदाई और सत्ता का दिखावा
कोलकाता का सबसे बड़ा श्मशान घाट आज छावनी में तब्दील हो चुका था। भवनीश की देह जब पंचतत्व में विलीन होने के लिए ले जाई गई,
तो वहाँ का नज़ारा किसी शोक सभा से ज्यादा सत्ता का शक्ति प्रदर्शन लग रहा था। शहर की तमाम वीआईपी गाड़ियाँ कतार में खड़ी थीं।
बड़े-बड़े मीडिया हाउस के मालिक, जिनके चैनल रात भर इस मौत को बेच रहे थे, आज सफेद लिबास पहनकर अफसोस जताने आए थे।
तभी राज्य के एक बेहद कद्दावर और प्रभावशाली मंत्री, दिग्विजय सिंह, अग्निश के पास पहुंचे।
उन्होंने अग्निश के कंधे पर हाथ रखा, मानो वह उनके सबसे बड़े हमदर्द हों।
मंत्री जी ने भारी आवाज़ में कहा, "अग्निश जी, आपके बेटे का जाना सिर्फ आपकी नहीं, पूरे शहर की क्षति है। पुलिस की रिपोर्ट भले ही नशे की बात कर रही हो, लेकिन आपकी तसल्ली के लिए मैं खुद इस केस की निगरानी करूँगा।
मैं वादा करता हूँ कि इसकी निष्पक्ष जांच होगी।"
अग्निश ने उनकी आँखों में देखा। उन आँखों में सहानुभूति कम और राजनीति ज्यादा थी।
मंत्री जी के अगले शब्दों ने सब साफ कर दिया— "पर आप भी जानते हैं अग्निश, भवनीश फिल्म इंडस्ट्री और हाई-सोसायटी के जिस सर्कल में उठ-बैठ रहा था,
वहाँ बदनामी बहुत जल्दी फैलती है। जांच तो हम करेंगे, पर हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि किसी बड़े घराने की इज्जत उछलकर सड़क पर न आ जाए।"
अग्निश समझ गए कि यह सांत्वना नहीं, बल्कि एक चेतावनी थी। मंत्री जी असल में यह कह रहे थे कि जांच उतनी ही होगी जितनी 'सिस्टम' इजाजत देगा।
चिता की आग जैसे-जैसे बढ़ रही थी, अग्निश के मन में प्रतिशोध की आग और भी तेज़ हो रही थी। उन्हें समझ आ गया था कि इन मंत्रियों और रईसों के बीच ही वह कातिल खड़ा है, जो आज सफेद कपड़ों में शोक मना रहा है।
टकराव: शक्ति बनाम प्रतिशोध
जैसे ही मंत्री दिग्विजय सिंह मुड़कर अपनी सफ़ेद गाड़ी की ओर बढ़ने लगे, अग्निश की भारी और कड़कती आवाज़ ने पूरे श्मशान घाट के सन्नाटे को चीर दिया।
"दिग्विजय सिंह, रुको!"
क्या वह सिर्फ एक गवाह है, या उसने डर के मारे कोई ऐसी चीज़ देखी है जिसे वह अग्निश को भी बताने से कतरा रही है? क्या उसे भी अपनी जान का खतरा है?