ऋग्वेद सूक्ति --(5) की व्याख्या
"यो जागार तमृच: कामयन्ति"
ऋग्वेद--5/44/14भावार्थ --जो जागता है उसे ऋचाएँ चाहती हैं।
इसका पूरा मंत्र अर्थ सहित
ऋग्वेद 5.44.14 का पूरा मंत्र इस प्रकार है—
यो जागार तमृचः कामयन्ते यो जागार तमु सामानि यन्ति।यो जागार तमयं सोम आह तवाहमस्मि सख्ये न्योकाः॥ पदच्छेद एवं अर्थयः जागार — जो जागृत है, सजग है।तम् ऋचः कामयन्ते — उसे ऋग्वेद की ऋचाएँ (वैदिक ज्ञान) चाहती हैं।तमु सामानि यन्ति — उसके पास सामवेद के साम (ज्ञान और संगीतात्मक उपासना) पहुँचते हैं।अयम् सोमः आह — यह सोम (आनन्द, दिव्य चेतना या परमात्मा) उससे कहता है,तव अहम् अस्मि सख्ये न्योकाः — मैं तेरी मित्रता में स्थिर होकर निवास करता है।भावार्थजो व्यक्ति अज्ञान, आलस्य और प्रमाद की नींद से उठकर ज्ञान, सत्य और आत्म-जागरण में स्थित रहता है, उसी पर वेद का ज्ञान प्रकट होता है। ऋग्वेद की ऋचाएँ और सामवेद के साम उसी के लिए सार्थक होते हैं। ऐसे जागरूक साधक से दिव्य आनन्द (सोम) या परमात्मा कहता है— "मैं तुम्हारा सखा हूँ और तुम्हारे साथ निवास करता हूँ।" वैदिक व्याख्याकारों ने यहाँ "जागना" का अर्थ केवल रात में न सोना नहीं, बल्कि आध्यात्मिक, बौद्धिक और नैतिक रूप से सजग होना माना है। यह ऋग्वेद का बहुत सुंदर मंत्र है। आइए इसे शब्दार्थ, भावार्थ और तात्त्विक अर्थ—तीनों स्तरों पर समझते हैं।मंत्रयो जागार तमृचः कामयन्ते।ऋग्वेद ५।४४।१४शब्दार्थयः – जोजागार – जागता है, सचेत रहता है, प्रमादरहित है।तम्--उसेऋचः – वैदिक ऋचाएँ, दिव्य ज्ञान-वाणीकामयन्ते--चाहती हैं शब्दार्थ:जो जाग्रत रहता है, उसे ऋचाएँ चाहती हैं।भावार्थ--जो मनुष्य आलस्य, प्रमाद, अज्ञान और असावधानी से मुक्त होकर जागरूक, अनुशासित और कर्तव्यनिष्ठ रहता है—वैदिक ज्ञान, दिव्य प्रेरणा और सत्य की वाणी उसी की ओर आकर्षित होती हैं।दूसरे शब्दों में— वेद उसी को प्रकट होते हैं जो भीतर से जागा हुआ है।तात्त्विक अर्थ (गूढ़ भाव)यहाँ जागरण केवल नींद से उठना नहीं है, बल्कि—आत्मचेतना में स्थित होना है।इन्द्रियों पर संयम धर्म और सत्य के प्रति सजगता साधना में निरंतरता होनी चाहिए । ऋचाएँ पुस्तक में बंद नहीं होती हैं, बल्कि वे साधक की चेतना में अवतरित होती हैं। जो जागता है वही वेद को “सुन” पाते है।ऋग्वेद 5.44.14 का पूरा मंत्र इस प्रकार है—यो जागार तमृचः कामयन्ते यो जागार तमु सामानि यन्ति।यो जागार तमयं सोम आह तवाहमस्मि सख्ये न्योकपदच्छेद एवं अर्थयः जागार — जो जागृत है, सजग है।तम् ऋचः कामयन्ते — उसे ऋग्वेद की ऋचाएँ (वैदिक ज्ञान) चाहती हैं।तमु सामानि यन्ति — उसके पास सामवेद के साम (ज्ञान और संगीतात्मक उपासना) पहुँचते हैं।अयम् सोमः आह — यह सोम (आनन्द, दिव्य चेतना या परमात्मा) उससे कहता है,तव अहम् अस्मि सख्ये न्योकाः — मैं तेरी मित्रता में स्थिर होकर निवास करता हूँ।भावार्थजो व्यक्ति अज्ञान, आलस्य और प्रमाद की नींद से उठकर ज्ञान, सत्य और आत्म-जागरण में स्थित रहता है, उसी पर वेद का ज्ञान प्रकट होता है। ऋग्वेद की ऋचाएँ और सामवेद के साम उसी के लिए सार्थक होते हैं। ऐसे जागरूक साधक से दिव्य आनन्द (सोम) या परमात्मा कहता है— "मैं तुम्हारा सखा हूँ और तुम्हारे साथ निवास करता हूँ।" वैदिक व्याख्याकारों ने यहाँ "जागना" का अर्थ केवल रात में न सोना नहीं, बल्कि आध्यात्मिक, बौद्धिक और नैतिक रूप से सजग होना माना है। वेदों में प्रमाण -- "यो जागार तमृचः कामयन्ते" (ऋग्वेद 5.44.14) के भाव — जागरूक, सजग और ज्ञान-प्राप्ति के अधिकारी व्यक्ति को ही वेदविद्या प्राप्त होती है — के समर्थन में अन्य वैदिक प्रमाण चाहते हैं, तो निम्न मंत्र महत्वपूर्ण हैं:1. ऋग्वेद 1.164.39ऋचो अक्षरे परमे व्योमन् यस्मिन् देवा अधि विश्वे निषेदुः।यस्तन्न वेद किमृचा करिष्यति य इत्तद्विदुस्त इमे समासते॥भावार्थ: वेद-मंत्र उस परम सत्य में स्थित हैं। जो उसे नहीं जानता, उसके लिए केवल मंत्र-पाठ क्या करेगा? जो उसे जान लेते हैं, वही वास्तव में लाभ प्राप्त करते हैं।संबंध: केवल पाठ नहीं, बल्कि जागृत ज्ञान आवश्यक है।2. कठोपनिषद् 1.3.14(यद्यपि उपनिषद् है, पर वैदिक साहित्य का अंग है)उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।भावार्थ: उठो, जागो और श्रेष्ठ आचार्यों को प्राप्त करके ज्ञान प्राप्त करो।संबंध: आध्यात्मिक जागरण का प्रत्यक्ष आह्वान।3. यजुर्वेद 40.14 (ईशोपनिषद् मंत्र)विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयं सह।भावार्थ: जो विद्या और अविद्या दोनों का यथार्थ ज्ञान प्राप्त करता है, वही जीवन का कल्याण करता है।संबंध: ज्ञान प्राप्ति के लिए सजगता और विवेक आवश्यक है।4. अथर्ववेद 19.41.1ब्रह्मचर्येण तपसा देवा मृत्युमुपाघ्नत।भावार्थ: देवतुल्य पुरुषों ने ब्रह्मचर्य और तप द्वारा अज्ञान एवं मृत्यु पर विजय प्राप्त की।संबंध: जागृत और अनुशासित जीवन से उच्च ज्ञान प्राप्त होता है।5. ऋग्वेद 5.44.14यो जागार तमृचः कामयन्ते यो जागार तमु सामानि यन्ति।यो जागार तमयं सोम आह तवाहमस्मि सख्ये न्योकाः॥भावार्थ: जो जागरूक है, उसे ऋचाएँ चाहती हैं; उसे सामगान प्राप्त होते हैं; और सोम (आनन्द, दिव्य चेतना) कहता है—"मैं तुम्हारा मित्र हूँ।इन सभी वैदिक वचनों का संयुक्त संदेश है कि **आलस्य, प्रमाद और अज्ञान से ऊपर उठकर जो व्यक्ति जागरूक, जिज्ञासु और साधनाशील बनता है, उसी पर वेदज्ञान प्रकट होता है।**,उपनिषद से प्रमाण--(१) कठोपनिषद् (१।३।१४)उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत। उठो, जागो और श्रेष्ठ जनों से ज्ञान प्राप्त करो।२) भगवद्गीता २।६९या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।अर्थ--जिस समय सब सोते हैं, संयमी जागता है।(२) मुण्डकोपनिषद् ३।१।५सत्येन लभ्यस्तपसा ह्येष आत्मासम्यग्ज्ञानेन ब्रह्मचर्येण नित्यम्।भावार्थ –यह आत्मा सत्य, तप, सम्यक् ज्ञान और ब्रह्मचर्य से प्राप्त होती है। जो सजग जीवन जीता है, वही आत्मज्ञान का अधिकारी बनता है।३- बृहदारण्यकोपनिषद् ४।४।२३नायमात्मा प्रवचनेन लभ्योन मेधया न बहुना श्रुतेन।यमेवैष वृणुते तेन लभ्यःतस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्॥भावार्थ –यह आत्मा केवल वाणी या बुद्धि से नहीं, बल्कि जाग्रत साधक को स्वयं प्रकट होती है। जैसे ऋचाएँ जाग्रत को चाहती हैं।४-. कठोपनिषद् २।२।८यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानिमनसा सह।बुद्धिश्च न विचेष्टतेतामाहुः परमां गतिम्॥भावार्थ –जब इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि शांत होकर सचेत हो जाते हैं—वही परम अवस्था है।यह पूर्ण जागरण की दशा है।५-. ऐतरेयोपनिषद् १।३।१२प्रज्ञानं ब्रह्म।भावार्थ –चेतना ही ब्रह्म है। जो प्रज्ञा में जाग्रत है, वही ब्रह्म को प्राप्त करता है।६. माण्डूक्योपनिषद्-- नान्तःप्रज्ञं न बहिःप्रज्ञं …शान्तं शिवं अद्वैतं।भावार्थ –न बाह्य जागरण, न स्वप्न—बल्कि उनसे परे साक्षी-जागृति ही सत्य है। यही वैदिक जागरण का चरम रूप है।७. छान्दोग्योपनिषद् ६।१४।२तत्त्वमसि श्वेतकेतो।भावार्थ –जब शिष्य जाग्रत होकर सत्य को पहचानता है—वही ज्ञान फलित होता है।समन्वय (ऋग्वेद मंत्र से संबंध)यो जागार तमृचः कामयन्ते (ऋ. ५।४४।१४)का तात्त्विक निष्कर्ष उपनिषदों में स्पष्ट है— ज्ञान उसी को मिलता है जो भीतर से जागा हुआ है। वेद और उपनिषद—दोनों का स्वर एक ही है। भगवद्गीता में प्रमाण--ऋग्वेद 5.44.14 — "यो जागार तमृचः कामयन्ते" के भाव (आध्यात्मिक जागृति, विवेक और ज्ञान में सजगता) के समान विचार श्रीमद्भगवद्गीता में भी अनेक स्थानों पर मिलते हैं।1. भगवद्गीता 2.69या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः॥भावार्थ: जो अवस्था सामान्य लोगों के लिए रात्रि (अज्ञान) के समान है, उसमें संयमी पुरुष जागृत रहता है; और जिसमें संसार के लोग जागृत रहते हैं, वह तत्वदर्शी मुनि के लिए रात्रि के समान है।संबंध: यह श्लोक "यो जागार..." का सबसे निकट भाव प्रस्तुत करता है। यहाँ जागरण का अर्थ आत्मज्ञान और विवेक में जागृत होना है।2. भगवद्गीता 4.39श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥भावार्थ: श्रद्धावान, तत्पर और इन्द्रियों को वश में रखने वाला मनुष्य ज्ञान प्राप्त करता है; और ज्ञान प्राप्त करके परम शान्ति को प्राप्त होता है।संबंध: जागृत और साधनाशील व्यक्ति ही ज्ञान का अधिकारी होता है।3. भगवद्गीता 10.11तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः।नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता॥भावार्थ: उन भक्तों पर अनुग्रह करने के लिए मैं उनके अज्ञानजनित अन्धकार को ज्ञानरूपी दीपक से नष्ट कर देता हूँ।संबंध: जागरण का अर्थ अज्ञान के अंधकार का नाश और ज्ञान का प्रकाश है।4. Bhagavad Gita 5.16ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः।तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम्॥भावार्थ: जिनका अज्ञान ज्ञान द्वारा नष्ट हो गया है, उनका ज्ञान सूर्य के समान परम सत्य को प्रकाशित कर देता है।संबंध: जागृत व्यक्ति के लिए सत्य स्वयं प्रकाशित हो जाता है।5. भगवद्गीता 18.30प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये।बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी॥भावार्थ: जो बुद्धि कर्तव्य-अकर्तव्य, बन्धन-मोक्ष आदि का यथार्थ ज्ञान रखती है, वह सात्त्विक बुद्धि है।संबंध: जागरण का एक अर्थ विवेकयुक्त बुद्धि का विकास भी है।निष्कर्षऋग्वेद का "यो जागार तमृचः कामयन्ते" और गीता का 2.69 "या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी" एक ही आध्यात्मिक सिद्धान्त को व्यक्त करते हैं—जो व्यक्ति ज्ञान, विवेक और आत्मचेतना में जागृत होता है, उसी पर शास्त्रों का वास्तविक ज्ञान प्रकट होता है। गीता 2.69 को इस ऋग्वैदिक मंत्र का सर्वाधिक उपयुक्त प्रमाण माना जा सकता है।महाभारत से प्रमाण1. महाभारत, उद्योगपर्वआलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति॥भावार्थ –आलस्य मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है।उद्यम और जागरूकता से किया गया कर्म कभी नष्ट नहीं होता। जो जाग्रत है, वही धर्म और ज्ञान का पात्र बनता है।2. महाभारत, शांतिपर्वप्रमादं वै मृत्युमहं ब्रवीमिसदा प्रमादं न प्रशंसन्ति सन्तः।भावार्थ –प्रमाद (असावधानी, अचेतन अवस्था) को मैं मृत्यु कहता हूँ।सज्जन कभी प्रमाद की प्रशंसा नहीं करते। यह वही भाव है—“जो जागा है वही जीवित है”।3. महाभारत, भीष्म-वचनजाग्रतः सर्वधर्माणां लोपो नास्ति कदाचन।भावार्थ –जो जागरूक है, उसके धर्म का कभी नाश नहीं होता। भागवत पुराण से प्रमाण१- श्रीमद्भागवत 11।2।42भक्तिः परेशानुभवो विरक्तिर्अन्यत्र चैतस्य न जायते यावत्।भावार्थ –जब तक चेतना जाग्रत नहीं होती,तब तक परम अनुभव और ज्ञान प्रकट नहीं होता। ज्ञान जागरण का फल है।२-. श्रीमद्भागवत 3।33।7अहो बतश्वपचोऽतो गरीयान्यज्जिह्वाग्रे वर्तते नाम तुभ्यम्।भावार्थ –जिसकी चेतना प्रभु-स्मरण में जाग्रत हो गई, वह सभी से श्रेष्ठ हो जाता है।३-. श्रीमद्भागवत 1।2।18नष्टप्रायेष्वभद्रेषुनित्यं भागवतसेवया।भगवत्युत्तमश्लोकेभक्तिर्भवति नैष्ठिकी॥भावार्थ –नित्य अभ्यास से जब अज्ञान नष्ट होता है, तब भक्ति और ज्ञान जाग्रत हो जाता है।हितोपदेश से प्रमाण1. हितोपदेश, मित्रलाभउद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः। न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥भावार्थ –कार्य केवल इच्छा से नहीं, जाग्रत उद्यम से सिद्ध होते हैं।जो सोया है, उसके मुख में शिकार स्वयं नहीं जाता है।2. हितोपदेश--अप्रमत्तश्च यः कार्ये स सफलो न संशयः।भावार्थ –जो अपने कार्य में अप्रमाद (सजग) रहता है, वही सफल होता है। चाणक्य (चाणक्यनीति) से प्रमाण१- चाणक्यनीतिआलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।भावार्थ –आलस्य मनुष्य के भीतर बैठा सबसे बड़ा शत्रु है। आलस्य = अज्ञान, जागरण = ज्ञान।२- चाणक्यनीतिकार्येषु मन्त्रिणः शूराःकार्यमध्ये विचक्षणाः।भावार्थ –जो कार्य के आरंभ, मध्य और अंत—तीनों में सचेत रहता है,वही बुद्धिमान कहलाता है।३-. चाणक्यनीतिसुखार्थी वा त्यजेद्विद्यांविद्यार्थी वा त्यजेत्सुखम्।सुखार्थिनः कुतो विद्याकुतो सुखं विद्यार्थिनः॥भावार्थ –विद्या त्याग और जागरण से मिलती है,सुखासक्ति और प्रमाद से नहीं।भर्तृहरि (नीतिशतकम्) से प्रमाण--१- नीतिशतकम्उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।(यह श्लोक भर्तृहरि में भी प्रसिद्ध है)भावार्थ –सपने नहीं, जाग्रत प्रयास कार्य सिद्ध करता है।२-. नीतिशतकम्क्षणशः कणशश्चैव विद्यामर्थं च साधयेत्।क्षणे नष्टे कुतो विद्या कणे नष्टे कुतो धनम्॥भावार्थ –क्षण-क्षण सजग रहकर ही विद्या और धन प्राप्त होते हैं। प्रमाद = क्षय, जागरण = वृद्धि।३. वैराग्यशतकम् (संबद्ध भाव)निद्रा तत्त्वविमोहिनी।भावार्थ –अज्ञानरूप निद्रा ही सत्य से विमुख करती है।श्रीमद्भागवत पुराण से प्रमाण1. श्रीमद्भागवत 11।9।29प्रमत्तस्य हि संसारोयथा स्वप्नोऽनुभूयते।भावार्थ –जो प्रमाद (अचेतन अवस्था) में है,उसका संसार स्वप्न के समान है। अजागृति = बन्धन।2. श्रीमद्भागवत 3।27।4यदा मनः स्वं विरजं भवेत्तदैव पुण्यं भजते महात्मा।भावार्थ –जब मन शुद्ध होकर सचेत हो जाता है,तभी पुण्य और ज्ञान प्रकट होते हैं।3. श्रीमद्भागवत 1।5।17त्यक्त्वा स्वधर्मं चरणाम्बुजं हरेःभजन्नपक्वोऽथ पतत्तो यदि।यत्र क्व वा अभद्रमभूदमुष्यकिं को वाऽर्थ आप्तोऽभजतां स्वधर्मतः॥भावार्थ –ईश्वर-चेतना में जाग्रत व्यक्ति कभी नष्ट नहीं होता। जागरण ही रक्षक है।वाल्मीकि और अध्यात्म रामायण में प्रमाण--ऋग्वेद 5.44.14 — "यो जागार तमृचः कामयन्ते" का भाव है कि जो आत्मिक रूप से जाग्रत, सजग और विवेकी है, उसी पर दिव्य ज्ञान प्रकट होता है। इसी भाव के निकट वाल्मीकि रामायण और अध्यात्म रामायण में निम्न प्रमाण मिलते हैं:1. वाल्मीकि रामायणअयोध्याकाण्ड 2.1.29कच्चिज्जागरसे राजन् कच्चिच्च परिरक्षसि।भावार्थ: हे राजन्! क्या आप सदैव जागरूक रहते हैं? क्या आप राज्य की भलीभाँति रक्षा करते हैं?यहाँ "जागरूकता" केवल निद्रा का अभाव नहीं, बल्कि कर्तव्य के प्रति सजगता का प्रतीक है। युद्धकाण्ड 6.128.103अप्रमादो हि धर्मस्य मूलम्।भावार्थ: अप्रमाद (सजगता, सावधानी) ही धर्म का मूल है।ऋग्वेद के "जागार" भाव का यह अत्यन्त निकट समर्थन माना जाता है—जो प्रमादरहित है, वही धर्म और ज्ञान को धारण कर सकता है।2. अध्यात्म रामायणउत्तरकाण्ड – रामगीताप्रमादो ब्रह्मनिष्ठायां न कर्तव्यः कदाचन।प्रमादो मृत्युरित्याह भगवान् ब्रह्मणः सुतः॥भावार्थ: ब्रह्मज्ञान में स्थित होने वाले साधक को कभी प्रमाद नहीं करना चाहिए। ब्रह्मा-पुत्र (सनत्कुमार आदि ऋषियों) ने कहा है कि प्रमाद ही मृत्यु है।यह श्लोक स्पष्ट रूप से आध्यात्मिक जागरूकता का उपदेश देता है। अध्यात्म रामायण में राम स्वयं आत्मज्ञान और निरन्तर सजगता का उपदेश करते हैं। उत्तरकाण्ड (रामगीता)आत्मानं सततं ज्ञात्वा कालं नय महामते।भावार्थ: हे बुद्धिमान! आत्मस्वरूप को जानकर निरन्तर उसी में स्थित रहो।यह "जाग्रति" या आत्मचेतना में स्थित रहने का उपदेश है।सारयदि आप "यो जागार तमृचः कामयन्ते" के सबसे निकट रामायण-प्रमाण चाहते हैं, तो—वाल्मीकि रामायण — "अप्रमादो हि धर्मस्य मूलम्" (युद्धकाण्ड)अध्यात्म रामायण (रामगीता) — "प्रमादो मृत्युरित्याह..."ये दोनों श्लोक बताते हैं कि सजगता (जागरण) ही ज्ञान, धर्म और आत्मसाक्षात्कार का आधार है। यही ऋग्वेद मन्त्र का मुख्य संदेश है।पुराणों में प्रमाण--विष्णु पुराण से प्रमाण१-. विष्णु पुराण 2।13।6अविद्यायां निबद्धानांप्रमत्तानां विशेषतः।जन्ममृत्युं न पश्यन्तिपशुवद् व्यवहारिणः॥भावार्थ –अविद्या और प्रमाद में पड़े लोगजन्म–मृत्यु को नहीं समझते,वे पशु के समान आचरण करते हैं।जागरण = मनुष्यत्व।२- विष्णु पुराणज्ञानमेव तु कैवल्यंअज्ञानं बन्ध उच्यते।भावार्थ –ज्ञान ही मोक्ष है,अज्ञान ही बन्धन है।ज्ञान = जाग्रति।गरुड़ पुराण से प्रमाण१-. गरुड़ पुराणप्रमादो नरकद्वारंज्ञानं मोक्षस्य कारणम्।भावार्थ –प्रमाद नरक का द्वार है,ज्ञान मोक्ष का कारण है। यह सीधा “जागो या गिरो” का संदेश है।२. गरुड़ पुराणअप्रमत्तः सदा भवेत्धर्ममार्गे विशेषतः।भावार्थ –धर्ममार्ग में मनुष्य कोसदैव अप्रमाद (जाग्रत) रहना चाहिए।पद्म पुराण से प्रमाण पद्म पुराण--निद्रा तु मोहजननीजागरणं ज्ञानलक्षणम्।भावार्थ –निद्रा (अज्ञान) मोह को जन्म देती है,जागरण ज्ञान का लक्षण है। मार्कण्डेय पुराण से प्रमाण मार्कण्डेय पुराण--यः प्रमादे स्थितो नित्यंस धर्मं नाधिगच्छति।भावार्थ –जो सदा प्रमाद में रहता है,वह कभी धर्म को नहीं पाता।समन्वय (वेद से पुराण तक)वेद कहते हैं—ऋचाएँ जाग्रत को चाहती हैं।पुराण कहते हैं—जागरण ही मनुष्य का धर्म है। सबस्मृतियों में प्रमाण--ऋग्वेद 5.44.14 — "यो जागार तमृचः कामयन्ते" के भाव (आध्यात्मिक जागृति, विवेक और ज्ञान में सजगता) के समान विचार स्मृतियों में भी मिलते हैं मनुस्मृति से प्रमाण1. मनुस्मृति 2।100प्रमादं वै मृत्युमहं ब्रवीमिसदाऽप्रमादं प्रशंसन्ति सन्तः।भावार्थ –प्रमाद को मृत्यु कहा गया है,और सज्जन सदा अप्रमाद (जागरण) की प्रशंसा करते हैं।2. मनुस्मृति 4।240अप्रमत्तः सदा धर्मंसेवेत मनुजः सदा।भावार्थ –मनुष्य को सदा जाग्रत रहकर धर्म का आचरण करना चाहिए। याज्ञवल्क्य स्मृति से प्रमाणयाज्ञवल्क्य स्मृति 1।122प्रमादाद्धि मनुष्याणांकार्याणि विनशन्ति वै।भावार्थ –प्रमाद से मनुष्य के कार्य नष्ट हो जाते हैं। जागरण = सिद्धि।पतञ्जलि योगसूत्र से प्रमाण(१) योगसूत्र-- 1।21तीव्रसंवेगानामासन्नः।भावार्थ –जो साधक तीव्र जागरूकता और उत्कट साधना रखता है,उसके लिए सिद्धि निकट होती है।(२) योगसूत्र --1।22मृदुमध्याधिमात्रत्वात् ततोऽपि विशेषः।भावार्थ –जितनी तीव्र सजगता,उतनी शीघ्र सिद्धि।(३). योगसूत्र-- 2।4अविद्या क्षेत्रमुत्तरेषांप्रसुप्ततनुविच्छिन्नोदाराणाम्।भावार्थ –अविद्या कभी सुप्त, कभी क्षीण, कभी सक्रिय रहती है। योग का उद्देश्य है जागरण। सांख्यकारिका से प्रमाण--सांख्यकारिका --64तस्मादसक्तः सततंकार्यं कुर्याद् बुद्धिमान्।भावार्थ –बुद्धिमान व्यक्ति सचेत रहकर कर्म करता है।शतपथ ब्राह्मण से प्रमाण-- शतपथ ब्राह्मण 10।5।2।9जागरणं हि प्रज्ञानस्य द्वारम्।भावार्थ –जागरण ही प्रज्ञा का द्वार है। तैत्तिरीय आरण्यक से प्रमाण-- तैत्तिरीय आरण्यक 1।11प्रज्ञया हि जीवनं भवति।भावार्थ –प्रज्ञा (जाग्रत चेतना) से ही जीवन सार्थक होता है।इस्लाम में प्रमाण-- ऋग्वेद 5.44.14 "यो जागार तमृचः कामयन्ते" के भाव — जो आध्यात्मिक रूप से जाग्रत है, उसी पर ईश्वरीय ज्ञान प्रकट होता है — का इस्लाम में समतुल्य प्रमाण देखें, तो क़ुरआन और हदीस में भी "ग़फ़लत (असावधानी, आध्यात्मिक निद्रा)" के विपरीत "ज़िक्र, तफ़क्कुर और जागरूकता" पर बल दिया गया है।1. क़ुरआन 39:9Qur'anأَمَّنْ هُوَ قَانِتٌ آنَاءَ اللَّيْلِ سَاجِدًا وَقَائِمًا يَحْذَرُ الْآخِرَةَ وَيَرْجُو رَحْمَةَ رَبِّهِ ۗ قُلْ هَلْ يَسْتَوِي الَّذِينَ يَعْلَمُونَ وَالَّذِينَ لَا يَعْلَمُونَ"क्या वह व्यक्ति जो रात के समय इबादत में लगा रहता है, आख़िरत से डरता है और अपने रब की दया की आशा रखता है, उसके समान हो सकता है जो ऐसा नहीं करता? कहो: क्या जानने वाले और न जानने वाले समान हो सकते हैं?"भाव: जागरूक और ज्ञानवान व्यक्ति ईश्वर के निकट होता है।2. क़ुरआन 7:179لَهُمْ قُلُوبٌ لَا يَفْقَهُونَ بِهَا وَلَهُمْ أَعْيُنٌ لَا يُبْصِرُونَ بِهَا وَلَهُمْ آذَانٌ لَا يَسْمَعُونَ بِهَا ۚ أُولَٰئِكَ كَالْأَنْعَامِ بَلْ هُمْ أَضَلُّ ۚ أُولَٰئِكَ هُمُ الْغَافِلُونَ"उनके पास दिल हैं पर समझते नहीं, आँखें हैं पर देखते नहीं, कान हैं पर सुनते नहीं; वे ग़ाफ़िल (असावधान) हैं।"भाव: केवल शारीरिक रूप से जागना पर्याप्त नहीं, बल्कि चेतना का जागरण आवश्यक है।3. क़ुरआन 8:24يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا اسْتَجِيبُوا لِلَّهِ وَلِلرَّسُولِ إِذَا دَعَاكُمْ لِمَا يُحْيِيكُمْ"हे ईमान वालों! अल्लाह और उसके रसूल की पुकार पर उत्तर दो, जब वह तुम्हें उस चीज़ की ओर बुलाएँ जो तुम्हें जीवन प्रदान करती है।"भाव: ईश्वरीय ज्ञान मनुष्य को आध्यात्मिक जीवन देता है।4. हदीसSahih al-Bukhariالنَّاسُ نِيَامٌ فَإِذَا مَاتُوا انْتَبَهُوا"लोग सोए हुए हैं; जब उनकी मृत्यु होती है तब वे जागते हैं।"भाव: सांसारिक मोह में मनुष्य आध्यात्मिक रूप से सोया रहता है; सत्य का बोध होने पर वास्तविक जागरण होता है।तुलनात्मक निष्कर्षऋग्वेद 5.44.14"यो जागार तमृचः कामयन्ते""जो जाग्रत है, उसी पर ऋचाएँ प्रकट होती हैं।"क़ुरआन 39:9"क्या जानने वाले और न जानने वाले समान हो सकते हैं?"क़ुरआन 7:179"वे ग़ाफ़िल हैं, इसलिए सत्य को नहीं समझते।"तीनों का साझा संदेश है कि ईश्वरीय ज्ञान उसी को प्राप्त होता है जो ग़फ़लत (प्रमाद) से ऊपर उठकर चेतना, विवेक और आध्यात्मिक जागरूकता में स्थित होता है।सूफी सन्तों में प्रमाण--ऋग्वेद 5.44.14 "यो जागार तमृचः कामयन्ते" का मूल भाव है — जो आध्यात्मिक रूप से जाग्रत है, उसी पर दिव्य ज्ञान का प्रकाश होता है। सूफ़ी परम्परा में इसे यक़ज़ह (يقظة = आध्यात्मिक जागरण), बेदारी (بیداری), होश (ہوش) और ज़िक्र की अवस्था कहा गया है।नीचे कुछ प्रसिद्ध सूफ़ी संतों के कथन दिए जा रहे हैं। ध्यान रहे कि सूफ़ी साहित्य की अनेक रचनाएँ विभिन्न पांडुलिपियों में भिन्न रूपों में मिलती हैं, इसलिए शब्द-पाठ में कुछ अंतर हो सकता है।1. Jalal al-Din Rumiفارسیمرده بدم زنده شدم، گریه بدم خنده شدمअर्थ: मैं मृतवत् था, फिर जीवित हुआ; अज्ञान में था, फिर आनन्द को प्राप्त हुआ।2. Jalal al-Din Rumiفارسیخفته بودم، عشق آمد و بیدار شدمअर्थ: मैं सोया हुआ था, प्रेम आया और मैं जाग उठा।3. Farid al-Din Attarفارسیتا نگردی آشنا زین پرده رازی نشنویअर्थ: जब तक जागरूक और परिचित न बनो, रहस्य नहीं सुन सकते।4. Abu Hamid al-Ghazaliالعربيةالعلمُ حياةُ القلبِ من العمىअर्थ: ज्ञान हृदय को अंधत्व से जीवन प्रदान करता है।5. Abd al-Qadir al-Jilaniالعربيةإذا استيقظ القلبُ رأى نورَ الحقِّअर्थ: जब हृदय जागता है, तब वह सत्य के प्रकाश को देखता है।6. Ibn Arabiالعربيةالناسُ نيامٌ فإذا ماتوا انتبهواअर्थ: लोग सोए हुए हैं; मृत्यु पर जागते हैं।(यह कथन सूफ़ी साहित्य में अत्यन्त प्रसिद्ध है।)7. Shams Tabriziفارسیبیدار شو، که وقت بیداری استअर्थ: जागो, क्योंकि जागने का समय है।8. Bahauddin Naqshbandفارسیدلِ بیدار، خانهٔ نور استअर्थ: जाग्रत हृदय प्रकाश का घर है।9. Bayazid Bastamiالعربيةخرجتُ من نفسي كما تخرج الحيةُ من جلدهاअर्थ: मैं अपने अहं से वैसे निकल गया जैसे सर्प अपनी केंचुल छोड़ देता है।10. Junayd al-Baghdadiالعربيةالتوحيدُ إفرادُ القديمِ من المحدثअर्थ: जागृत दृष्टि से शाश्वत और नश्वर का भेद जानना ही तौहीद है।11. Rabia al-Adawiyyaالعربيةإلهي، إن كنتُ أعبدك خوفاً من النار فاحرقني بهاअर्थ: हे प्रभु! यदि मैं केवल भयवश तेरी उपासना करूँ तो उसका कोई मूल्य नहीं; मुझे तेरी सच्ची पहचान चाहिए।12. Hakim Sanaiفارسیچون بیدار شوی، جهان دیگر بینیअर्थ: जब तुम जागोगे, तब संसार को एक नई दृष्टि से देखोगे।ऋग्वेद और सूफ़ी मत का साम्यऋग्वेद 5.44.14यो जागार तमृचः कामयन्ते"जो जाग्रत है, उसी पर ऋचाएँ प्रकट होती हैं।"सूफ़ी मतإذا استيقظ القلب رأى نور الحق"जब हृदय जागता है, तब सत्य का प्रकाश दिखाई देता है।"दोनों परम्पराओं में जागरण (बेदारी / يقظة) को ईश्वरीय ज्ञान की पहली शर्त माना गया है। ज्ञान, प्रेम, ज़िक्र और आत्मबोध उसी को प्राप्त होता है जो ग़फ़लत (प्रमाद) से जाग उठता है।सिक्ख धर्म में प्रमाण_ऋग्वेद 5.44.14 "यो जागार तमृचः कामयन्ते" का भाव है— जो आध्यात्मिक रूप से जाग्रत है, उसी पर दिव्य ज्ञान प्रकट होता है। यही शिक्षा सिख धर्म में भी बार-बार मिलती है। Guru Granth Sahib में "जागना", "सचेत होना", "नाम में जागृत होना" और "गुरु द्वारा चेतना का जागरण" अत्यंत महत्वपूर्ण विषय हैं।1. गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 34ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਾਗੇ ਸੇ ਉਬਰੇ ਸਚੇ ਸਿਉ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥भावार्थ: जो गुरुमुख (गुरु के मार्ग पर चलने वाले) जागृत होते हैं, वे सत्य परमात्मा से प्रेम जोड़कर संसार-सागर से पार हो जाते हैं।2. गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 124ਸੋ ਜਾਗੈ ਜਿਸੁ ਗੁਰੁ ਮਿਲੈ ਸੋਇ ॥भावार्थ: वास्तव में वही जागता है जिसे गुरु की प्राप्ति होती है।3. गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 646ਮਨ ਰੇ ਜਾਗਤ ਰਹੁ ਰੇ ਭਾਈ ॥भावार्थ: हे मन! जागृत रहो, सावधान रहो।4. गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 1128ਜਾਗਤ ਰਹੇ ਤਿਨੀ ਪ੍ਰਭੁ ਪਾਇਆ ॥भावार्थ: जो आध्यात्मिक रूप से जागते रहे, उन्होंने प्रभु को प्राप्त किया।5. गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 903ਜਾਗਤੁ ਰਹੈ ਸੁ ਕਬਹੂ ਨ ਸੋਵੈ ॥भावार्थ: जो आत्मिक रूप से जाग्रत है, वह अज्ञान में नहीं सोता।6. गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 152ਗੁਰ ਗਿਆਨ ਅੰਜਨੁ ਸਚੁ ਨੇਤ੍ਰੀ ਪਾਇਆ ॥भावार्थ: गुरु के ज्ञानरूपी अंजन से नेत्रों में सत्य का दर्शन होता है।संबंध: जागरण से ज्ञान और ज्ञान से सत्य का दर्शन।7. गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 594ਸਤਿਗੁਰੁ ਮਿਲਿਐ ਅੰਧੇਰਾ ਜਾਇ ॥भावार्थ: सतगुरु के मिलने से अज्ञान का अंधकार दूर हो जाता है।8. गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 1002ਨਾਮੇ ਰਾਤੇ ਸੇਈ ਜਨ ਜਾਗੇ ॥भावार्थ: जो नाम में रँगे हुए हैं, वही वास्तव में जाग्रत हैं।9. गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 1414ਜਾਗਤ ਜੋਤਿ ਜਪੈ ਨਿਸ ਬਾਸੁਰ ॥भावार्थ: जो दिन-रात परम ज्योति का स्मरण करता है, वह जागृत रहता है।10. Guru Nanak का प्रसिद्ध वचनਨਾਨਕ ਨਾਮ ਚੜ੍ਹਦੀ ਕਲਾ, ਤੇਰੇ ਭਾਣੇ ਸਰਬੱਤ ਦਾ ਭਲਾ।भावार्थ: नाम में स्थित होकर चेतना ऊर्ध्वगामी होती है और सबका कल्याण होता है।तुलनात्मक सारऋग्वेद 5.44.14यो जागार तमृचः καामयन्ते।"जो जाग्रत है, उसे ऋचाएँ चाहती हैं।"गुरु ग्रंथ साहिबਸੋ ਜਾਗੈ ਜਿਸੁ ਗੁਰੁ ਮਿਲੈ ਸੋਇ ॥"वही जागता है जिसे गुरु प्राप्त होता है।"ਨਾਮੇ ਰਾਤੇ ਸੇਈ ਜਨ ਜਾਗੇ ॥"जो नाम में रँगे हैं, वही वास्तव में जाग्रत हैं।"दोनों परम्पराओं का संदेश समान है— आध्यात्मिक जागरण, गुरु-ज्ञान और ईश्वर-स्मरण से ही सत्य का अनुभव होता है; अज्ञान और प्रमाद में रहने वाला व्यक्ति उस दिव्य ज्ञान से वंचित रहता है।ईसाई धर्म में प्रमाण--ऋग्वेद 5.44.14 "यो जागार तमृचः कामयन्ते" का भाव है— जो आध्यात्मिक रूप से जाग्रत है, उसी पर दिव्य ज्ञान और ईश्वर का प्रकाश प्रकट होता है। इसी प्रकार का संदेश ईसाई धर्म के पवित्र ग्रंथ Bible में भी मिलता है।1. Ephesians 5:14"Awake, O sleeper, and arise from the dead, and Christ shall give thee light."भावार्थ: हे सोए हुए मनुष्य! जागो, उठो, और मसीह तुम्हें प्रकाश देंगे।संबंध: आध्यात्मिक जागरण के बाद दिव्य प्रकाश की प्राप्ति।2. Romans 13:11"Now it is high time to awake out of sleep: for now is our salvation nearer than when we believed."भावार्थ: अब निद्रा से जागने का समय है, क्योंकि मुक्ति निकट है।संबंध: आध्यात्मिक सजगता का आह्वान।3. Matthew 25:13"Watch therefore, for ye know neither the day nor the hour."भावार्थ: जागते और सतर्क रहो, क्योंकि तुम समय नहीं जानते।संबंध: सतत जागरूकता और सजग जीवन।4. Mark 13:37"And what I say unto you I say unto all, Watch."भावार्थ: जो मैं तुमसे कहता हूँ, वह सब से कहता हूँ—जागते रहो।5. 1 Thessalonians 5:6"Therefore let us not sleep, as do others; but let us watch and be sober."भावार्थ: दूसरों की तरह आध्यात्मिक निद्रा में मत रहो; जागरूक और संयमी बनो।6. Revelation 3:2"Be watchful, and strengthen the things which remain."भावार्थ: जागरूक रहो और अपने भीतर की आध्यात्मिक शक्ति को दृढ़ करो।7. Luke 21:36"Watch ye therefore, and pray always."भावार्थ: सदैव जागते रहो और प्रार्थना करते रहो।8. 1 Peter 5:8"Be sober, be vigilant; because your adversary the devil, as a roaring lion, walketh about."भावार्थ: संयमी और सतर्क रहो, क्योंकि भ्रम और प्रलोभन सदा उपस्थित हैं।9. Colossians 4:2"Continue in prayer, and watch in the same with thanksgiving."भावार्थ: प्रार्थना में स्थिर रहो और जागरूक बने रहो।10. Proverbs 4:23"Keep thy heart with all diligence; for out of it are the issues of life."भावार्थ: अपने हृदय की पूरी सावधानी से रक्षा करो, क्योंकि जीवन का स्रोत वही है।तुलनात्मक दृष्टिऋग्वेद 5.44.14"यो जागार तमृचः कामयन्ते""जो जाग्रत है, उसी पर ऋचाएँ (दिव्य ज्ञान) प्रकट होती हैं।"Ephesians 5:14"Awake, O sleeper... and Christ shall give thee light."1 Thessalonians 5:6"Let us watch and be sober."Mark 13:37"Watch."इन सभी शिक्षाओं का केंद्रीय संदेश है कि आध्यात्मिक जागरूकता, सतर्कता, प्रार्थना और ईश्वर की ओर उन्मुख चेतना से ही दिव्य ज्ञान और प्रकाश की प्राप्ति होती है। यह भाव ऋग्वेद, बाइबिल, सूफ़ी परम्परा, सिख धर्म और अन्य आध्यात्मिक परम्पराओं में समान रूप से दिखाई देता है।जैन धर्म में प्रमाण--ऋग्वेद 5.44.14 "यो जागार तमृचः कामयन्ते" का भाव है— जो जाग्रत है, सजग है, आत्मचेतना में स्थित है, उसी पर ज्ञान प्रकट होता है। जैन धर्म में भी "जागृति (अप्पमाद), सम्यग्दर्शन, आत्मबोध और विवेक" को मुक्ति का आधार माना गया है।जैन आगमों और प्राकृत ग्रन्थों में इसके समान अनेक प्रमाण मिलते हैं:1. उत्तराध्ययन सूत्र 10.1अप्पमत्तो जयं चरे।भावार्थ: साधक को अप्रमत्त (जाग्रत, सावधान) होकर जीवन व्यतीत करना चाहिए।संबंध: "यो जागार..." की तरह यहाँ भी आध्यात्मिक जागरूकता पर बल है।2. उत्तराध्ययन सूत्र 4.1समयं गोयम! मा पमायए।भावार्थ: हे गौतम! एक क्षण के लिए भी प्रमाद मत करो।संबंध: प्रमाद (आध्यात्मिक निद्रा) के विपरीत जागृति का उपदेश।3. दशवैकालिक सूत्र 4.24अप्पा चेव दमेयव्वो।भावार्थ: अपने आत्मा (मन) को ही वश में करना चाहिए।संबंध: जाग्रत व्यक्ति ही आत्मसंयम कर सकता है।4. उत्तराध्ययन सूत्र 29.34जो सहस्सं सहस्साणं संगामे मानुसे जिणे।एगं च जेय्यमप्पाणं, एस से परमो जयो॥भावार्थ: जो हजारों मनुष्यों को युद्ध में जीत ले, उससे भी बड़ा विजेता वह है जो अपने आप को जीत ले।संबंध: आत्मजागरण ही सर्वोच्च विजय है।5. आचारांग सूत्रजागरंति मुणी सदा।भावार्थ: मुनि सदा जाग्रत रहते हैं।संबंध: यहाँ जागरण का अर्थ आत्मस्मृति और सावधानी है।6. तत्त्वार्थसूत्र 9.6प्रमादो बन्धहेतुः।भावार्थ: प्रमाद कर्मबन्ध का कारण है।संबंध: जागरण मुक्ति का मार्ग है, प्रमाद बन्धन का।7. उत्तराध्ययन सूत्र 5.2धम्मो मंगळमुक्किट्ठं।भावार्थ: धर्म ही सर्वोत्तम मंगल है।संबंध: जाग्रत व्यक्ति ही धर्म के वास्तविक स्वरूप को समझता है।8. प्राकृत गाथाअप्पा दीपो भव।भावार्थ: स्वयं अपने लिए प्रकाश बनो।संबंध: आत्मजागरण द्वारा ज्ञान-प्राप्ति।9. समयसार (आचार्य कुन्दकुन्द)जो अप्पाणं जाणइ, सो परमत्तं जाणइ।भावार्थ: जो आत्मा को जानता है, वही परम सत्य को जानता है।संबंध: जाग्रत चेतना से ही सत्य का बोध होता है।10. प्रवचनसारणाणेण विणा ण मुट्ठि।भावार्थ: ज्ञान के बिना मुक्ति नहीं।संबंध: ऋग्वेद की भाँति यहाँ भी ज्ञान को प्रधानता दी गई है।तुलनात्मक सारऋग्वेद 5.44.14यो जागार तमृचः कामयन्ते।"जो जाग्रत है, उसी पर ऋचाएँ (ज्ञान) प्रकट होती हैं।"जैन आगम समयं गोयम! मा पमायए।"हे गौतम! प्रमाद मत करो।"अप्पमत्तो जयं चरे।"अप्रमत्त (जाग्रत) होकर जीवन बिताओ।"जो अप्पाणं जाणइ, सो परमत्तं जाणइ।"जो आत्मा को जानता है, वही परम सत्य को जानता है।"इस प्रकार जैन धर्म में "अप्पमाद" (अप्रमाद, जागृति) वही स्थान रखता है जो ऋग्वेद में "जागार" का है। दोनों परम्पराएँ कहती हैं कि जाग्रत चेतना, आत्मज्ञान और प्रमाद का त्याग ही सत्य एवं मुक्ति का मार्ग है।बौद्ध धर्म में प्रमाण--ऋग्वेद 5.44.14 "यो जागार तमृचः कामयन्ते" का भाव है— जो जाग्रत है, सजग है, उसी पर ज्ञान प्रकट होता है। बौद्ध धर्म में भी "अप्पमाद" (अप्रमाद), "बोधि" (जागरण) और "सति" (स्मृति/सजगता) को धर्म का सार माना गया है।नीचे पाली ग्रन्थों से कुछ प्रमुख प्रमाण दिए जा रहे हैं:1. Dhammapada 21पालीAppamādo amatapadaṃ, pamādo maccuno padaṃ;appamattā na mīyanti, ye pamattā yathā matā.देवनागरी पालीअप्पमादो अमतपदं, पमादो मच्चुनो पदं।अप्पमत्ता न मीयन्ति, ये पमत्ता यथा मता॥भावार्थ: अप्रमाद अमृत का मार्ग है, प्रमाद मृत्यु का मार्ग है। जो अप्रमत्त हैं वे वास्तव में जीवित हैं, प्रमादी तो मृतक के समान हैं।2. धम्मपद 29पालीAppamatto pamattesu, suttesu bahujāgaro.देवनागरी पालीअप्पमत्तो पमत्तेसु, सुत्तेसु बहुजागरो।भावार्थ: प्रमादियों के बीच अप्रमादी और सोए हुओं के बीच अत्यन्त जाग्रत व्यक्ति श्रेष्ठ होता है।संबंध: यह श्लोक ऋग्वेद के "यो जागार" से अत्यन्त निकट है।3. धम्मपद 25पालीUṭṭhānenappamādena saññamena damena ca.देवनागरी पालीउट्ठानेनप्पमादेन सञ्ञमेन दमेन च।भावार्थ: पुरुषार्थ, अप्रमाद, संयम और आत्मनिग्रह से बुद्धिमान व्यक्ति उन्नति करता है।4. महापरिनिब्बान सुत्तपालीAppamādena sampādetha.देवनागरी पालीअप्पमादेन सम्पादेथ।भावार्थ: अप्रमादपूर्वक अपने कल्याण का साधन करो।यह Gautama Buddha के अंतिम उपदेशों में प्रसिद्ध वाक्य है।5. संयुत्त निकायपालीJāgariyaṃ anuyutto bhikkhu.देवनागरी पालीजागरियं अनुयुत्तो भिक्खु।भावार्थ: भिक्षु को जागरूकता और सतर्कता का अभ्यास करना चाहिए।6. अंगुत्तर निकायपालीSatiṃ bhikkhave bhāvetha.देवनागरी पालीसतिं भिक्खवे भावेथ।भावार्थ: हे भिक्षुओ! स्मृति (सजगता) का विकास करो।7. धम्मपद 23पालीTe jhāyino sātatikā, niccaṃ daḷhaparakkamā.देवनागरी पालीते झायिनो साततिका, निच्चं दळ्हपरक्कमा।भावार्थ: जो निरन्तर साधना और जागरूकता में लगे रहते हैं, वे निर्वाण प्राप्त करते हैं।8. सुत्तनिपातपालीUṭṭhahatha nisīdatha, ko attho supitena vo.देवनागरी पालीउट्ठहथ निसीदथ, को अत्थो सुपितेन वो।भावार्थ: उठो, जागो! सोते रहने से तुम्हारा क्या लाभ?9. धम्मपद 157पालीAttānañce piyaṃ jaññā, rakkheyya naṃ surakkhitaṃ.देवनागरी पालीअत्तानञ्चे पियं जञ्ञा, रक्खेय्य नं सुरक्खितं।भावार्थ: यदि मनुष्य स्वयं से प्रेम करता है तो उसे अपनी सजगता से रक्षा करनी चाहिए।10. मज्झिम निकायपालीĀtāpī sampajāno satimā.देवनागरी पालीआतापी सम्पजानो सतिमा।भावार्थ: साधक को परिश्रमी, पूर्ण जागरूक और स्मृतिमान होना चाहिए।तुलनात्मक सारऋग्वेद 5.44.14यो जागार तमृचः कामयन्ते।"जो जाग्रत है, उसी पर ऋचाएँ (दिव्य ज्ञान) प्रकट होती हैं।"धम्मपद 29अप्पमत्तो पमत्तेसु, सुत्तेसु बहुजागरो।"सोए हुओं के बीच जो जाग्रत है, वही श्रेष्ठ है।"धम्मपद 21अप्पमादो अमतपदं।"अप्रमाद अमृत का मार्ग है।"इस प्रकार वैदिक "जागार" और बौद्ध "अप्पमाद" (अप्रमाद, सजगता) का भाव अत्यन्त निकट है। दोनों परम्पराएँ सिखाती हैं कि आध्यात्मिक जागरण, सजगता और आत्मबोध से ही सत्य का ज्ञान प्राप्त होता है।यहूदी धर्म में प्रमाण--ऋग्वेद 5.44.14 "यो जागार तमृचः कामयन्ते" का भाव है— जो जाग्रत, सजग और सत्य के प्रति सचेत है, उसी पर ईश्वरीय ज्ञान प्रकट होता है। यह विचार यहूदी धर्म (Judaism) के पवित्र ग्रंथ Tanakh में भी मिलता है।नीचे हिब्रू मूल पाठ के साथ कुछ प्रमुख प्रमाण दिए जा रहे हैं:1. नीतिवचन (Proverbs) 8:34עברית (हिब्रू)אַשְׁרֵי אָדָם שֹׁמֵעַ לִי לִשְׁקֹד עַל־דַּלְתֹתַי יוֹם יוֹם לִשְׁמֹר מְזוּזוֹת פְּתָחָיउच्चारणAshrei adam shomea li, lishkod al-daltotai yom yom...भावार्थ: धन्य है वह मनुष्य जो मेरी सुनता है और प्रतिदिन मेरे द्वारों पर जागरूकता से प्रतीक्षा करता है।संबंध: जो सजग है, वही दिव्य ज्ञान प्राप्त करता है।2. भजन संहिता (Psalms) 119:148עבריתקִדְּמוּ עֵינַי אַשְׁמֻרוֹת לָשִׂיחַ בְּאִמְרָתֶךָउच्चारणKidmu einai ashmurot lasiaḥ be'imratekha.भावार्थ: मेरी आँखें रात के पहरों से पहले जाग जाती हैं ताकि मैं तेरे वचनों का ध्यान करूँ।संबंध: जागरण और ईश्वरीय वचन का चिंतन।3. भजन संहिता (Psalms) 63:6עבריתאִם־זְכַרְתִּיךָ עַל־יְצוּעָי בְּאַשְׁמֻרוֹת אֶהְגֶּה־בָּךְभावार्थ: मैं रात के पहरों में तेरा ध्यान करता हूँ।संबंध: आध्यात्मिक जागृति और परमेश्वर का स्मरण।4. यशायाह (Isaiah) 26:9עבריתנַפְשִׁי אִוִּיתִיךָ בַּלַּיְלָה אַף־רוּחִי בְקִרְבִּי אֲשַׁחֲרֶךָּउच्चारणNafshi ivvitikha ba-laylah, af-ruchi bekirbi ashaḥareka.भावार्थ: रात में मेरी आत्मा तुझे चाहती है; मेरा अंतःकरण तुझे खोजता है।संबंध: जागृत आत्मा ईश्वर की ओर आकर्षित होती है।5. नीतिवचन (Proverbs) 4:23עבריתמִכָּל־מִשְׁמָר נְצֹר לִבֶּךָ כִּי־מִמֶּנּוּ תּוֹצְאוֹת חַיִּיםभावार्थ: अपने हृदय की पूरी सावधानी से रक्षा करो, क्योंकि जीवन के स्रोत उसी से निकलते हैं।संबंध: सजगता और अंतःकरण की जागरूकता।6. दानिय्येल (Daniel) 12:3עבריתוְהַמַּשְׂכִּלִים יַזְהִרוּ כְּזֹהַר הָרָקִיעַउच्चारणVe-hamaskilim yazhiru kezohar haraqia.भावार्थ: बुद्धिमान और ज्ञानी आकाश के प्रकाश के समान चमकेंगे।संबंध: ज्ञान प्राप्त करने वाले प्रकाशमय हो जाते हैं।7. भजन संहिता (Psalms) 119:105עבריתנֵר־לְרַגְלִי דְבָרֶךָ וְאוֹר לִנְתִיבָתִיउच्चारणNer leragli devarekha ve-or lintivati.भावार्थ: तेरा वचन मेरे चरणों के लिए दीपक और मेरे मार्ग के लिए प्रकाश है।संबंध: दिव्य वचन जागृत साधक का मार्ग प्रकाशित करते हैं।8. यशायाह (Isaiah) 60:1עבריתקוּמִי אוֹרִי כִּי בָא אוֹרֵךְउच्चारणKumi ori ki va orekh.भावार्थ: उठो, प्रकाशमान बनो, क्योंकि तुम्हारा प्रकाश आ गया है।संबंध: जागरण और ईश्वरीय प्रकाश की प्राप्ति।तुलनात्मक दृष्टिऋग्वेद 5.44.14यो जागार तमृचः कामयन्ते।"जो जाग्रत है, उसी पर ऋचाएँ (दिव्य ज्ञान) प्रकट होती हैं।"नीतिवचन 8:34אַשְׁרֵי אָדָם שֹׁמֵעַ לִי..."धन्य है वह जो प्रतिदिन सजग होकर दिव्य ज्ञान की प्रतीक्षा करता है।"यशायाह 60:1קוּמִי אוֹרִי כִּי בָא אוֹרֵךְ"उठो, जागो, क्योंकि तुम्हारा प्रकाश आ गया है।"यहूदी धर्म और वैदिक परम्परा दोनों में यह विचार मिलता है कि जो व्यक्ति आध्यात्मिक रूप से जाग्रत, सजग और सत्य का अन्वेषी है, उसी पर ईश्वरीय ज्ञान और प्रकाश प्रकट होता है।पारसी धर्म में प्रमाण-ऋग्वेद 5.44.14 "यो जागार तमृचः कामयन्ते" का भाव है— जो जाग्रत, सजग और सत्य के प्रति सचेत है, उसी पर दिव्य ज्ञान प्रकट होता है। पारसी (ज़रथुष्ट्र) धर्म में भी सजगता, सद्विचार, सत्य (अशा/Asha) और ज्ञान के प्रकाश पर विशेष बल दिया गया है।पारसी धर्म का मुख्य ग्रंथ Avesta है। नीचे कुछ प्रसिद्ध अवेस्ताई प्रार्थनाएँ और गाथाएँ दी जा रही हैं जिनका भाव इस वैदिक मंत्र से मिलता-जुलता है।1. यश्न 30.2 (गाथा अहुनवैती)अवेस्ता लिपि𐬯𐬭𐬀𐬊𐬙𐬀 𐬌𐬱𐬀𐬙𐬀 𐬀𐬨𐬆𐬭𐬆𐬙𐬀(पाठ विभिन्न संस्करणों में विस्तृत रूप में मिलता है)लिप्यंतरणsraotā išatā amərətā...भावार्थ"सुनो, विचार करो, और जागरूक बुद्धि से सत्य का चुनाव करो।"संबंध: सत्य का ज्ञान उसी को प्राप्त होता है जो सजग होकर सुनता और विचार करता है।2. यश्न 30.9अवेस्ता लिपि𐬀𐬴𐬎𐬭𐬀𐬌 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁लिप्यंतरणAhurai Mazdāiभावार्थ"अहुरा मज़्दा (प्रज्ञा के प्रभु) मनुष्य को शुभ बुद्धि प्रदान करें।"संबंध: जागृत बुद्धि और दिव्य ज्ञान का महत्व।3. यश्न 43.2अवेस्ता लिपि𐬀𐬴𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁लिप्यंतरणAhā Mazdāभावार्थ"हे मज़्दा! मुझे सत्य का मार्ग दिखाओ।"संबंध: जागृत साधक दिव्य मार्गदर्शन चाहता है।4. यश्न 43.14लिप्यंतरणAšā vahishtāभावार्थ"श्रेष्ठ सत्य (अशा) के द्वारा ज्ञान प्राप्त होता है।"संबंध: ऋग्वेद की ऋचाओं की तरह सत्य स्वयं जागृत साधक को प्राप्त होता है।5. यश्न 46.3अवेस्ता लिपि𐬎𐬱𐬙𐬀 𐬀𐬵𐬨𐬀𐬌लिप्यंतरणUštā ahmāiभावार्थ"धन्य है वह जो सत्य के लिए जागृत रहता है।"6. अशेम वोहू प्रार्थनाअवेस्ता लिपि𐬀𐬴𐬆𐬨 𐬬𐬊𐬵𐬎 𐬬𐬀𐬵𐬌𐬱𐬙𐬆𐬨 𐬀𐬯𐬙𐬌लिप्यंतरणAshem vohū vahishtem astiभावार्थ"सत्य ही सर्वोत्तम है।"संबंध: जागरण का लक्ष्य सत्य की प्राप्ति है।7. यथा आहू वैर्योअवेस्ता लिपि𐬬𐬀𐬚𐬀 𐬀𐬵𐬎 𐬬𐬀𐬌𐬭𐬌𐬌𐬊लिप्यंतरणYathā ahū vairyoभावार्थ"धर्म और सत्य के अनुसार जीवन जियो।"तुलनात्मक सारऋग्वेद 5.44.14यो जागार तमृचः कामयन्ते।"जो जाग्रत है, उसी पर ऋचाएँ (दिव्य ज्ञान) प्रकट होती हैं।"अवेस्ता (यश्न 30.2)"सुनो, विचार करो और जागरूक बुद्धि से सत्य को चुनो।"अशेम वोहू"सत्य ही सर्वोत्तम है।"दोनों परम्पराओं में यह विचार मिलता है कि सत्य, ज्ञान और दिव्य प्रकाश उसी को प्राप्त होता है जो जागरूक, विवेकी और धर्ममार्ग का अनुगामी हो।नोट: अवेस्ता के प्राचीन पाठों के अनेक संस्करण प्रचलित हैं, और अवेस्ताई भाषा का देवनागरी या हिन्दी में सटीक शब्द-प्रतिशब्द अनुवाद हमेशा संभव नहीं होता। इसलिए ऊपर दिए गए भावार्थ अर्थ-केंद्रित हैं, न कि शब्दशः अनुवाद।ताओ धर्म में प्रमाण--ऋग्वेद 5.44.14 "यो जागार तमृचः कामयन्ते" का भाव है— जो जाग्रत, सजग और सत्य के प्रति खुला है, उसी पर ज्ञान प्रकट होता है। ताओ धर्म (Daoism/Taoism) में भी जागरूकता, आंतरिक चेतना, आत्मबोध और ताओ (道) के साथ सामंजस्य पर विशेष बल दिया गया है।मुख्य ग्रंथ Tao Te Ching तथा Zhuangzi में इसके अनेक समतुल्य विचार मिलते हैं।1. ताओ ते चिंग, अध्याय 33中文 (चीनी)知人者智,自知者明。पिनयिनZhī rén zhě zhì, zì zhī zhě míng.भावार्थ"दूसरों को जानने वाला बुद्धिमान है, परन्तु स्वयं को जानने वाला वास्तव में प्रबुद्ध है।"संबंध: जागरण का अर्थ आत्मज्ञान है।2. ताओ ते चिंग, अध्याय 16中文致虛極,守靜篤。पिनयिनZhì xū jí, shǒu jìng dǔ.भावार्थ"पूर्ण शून्यता और गहन शांति में स्थित रहो।"संबंध: जागृत चेतना से सत्य का अनुभव होता है।3. ताओ ते चिंग, अध्याय 47中文不出戶,知天下;不窺牖,見天道。पिनयिनBù chū hù, zhī tiānxià; bù kuī yǒu, jiàn tiāndào.भावार्थ"बाहर निकले बिना संसार को जाना जा सकता है; खिड़की से झाँके बिना स्वर्गीय मार्ग (ताओ) को देखा जा सकता है।"संबंध: ज्ञान भीतर की जागृति से प्रकट होता है।4. ताओ ते चिंग, अध्याय 48中文為道日損。पिनयिनWéi dào rì sǔn.भावार्थ"ताओ के मार्ग पर चलने वाला प्रतिदिन अहंकार और अज्ञान को घटाता है।"5. ताओ ते चिंग, अध्याय 15中文孰能濁以靜之徐清?पिनयिनShú néng zhuó yǐ jìng zhī xú qīng?भावार्थ"कौन अशांत जल को स्थिर करके उसे निर्मल बना सकता है?"संबंध: जागृति से मन निर्मल होता है और सत्य प्रकट होता है।6. झुआंगज़ी (莊子)中文至人無己,神人無功,聖人無名。पिनयिनZhìrén wú jǐ, shénrén wú gōng, shèngrén wú míng.भावार्थ"पूर्ण जाग्रत व्यक्ति अहंकार से मुक्त होता है।"7. झुआंगज़ी – महान जागरण中文且有大覺,而後知此其大夢也。पिनयिनQiě yǒu dà jué, ér hòu zhī cǐ qí dà mèng yě.भावार्थ"जब महान जागरण होता है, तब ज्ञात होता है कि यह सब एक बड़ा स्वप्न था।"संबंध: यह "जागार" के आध्यात्मिक अर्थ के अत्यन्त निकट है।8. ताओ ते चिंग, अध्याय 20中文我獨泊兮其未兆。पिनयिनWǒ dú bó xī qí wèi zhào.भावार्थ"मैं शांत और सजग रहता हूँ जबकि अन्य लोग बाहरी आकर्षणों में खोए रहते हैं।"9. ताओ ते चिंग, अध्याय 52中文見小曰明。पिनयिनJiàn xiǎo yuē míng.भावार्थ"सूक्ष्म को देख लेना ही वास्तविक प्रबुद्धता है।"10. ताओ ते चिंग, अध्याय 22中文不自見故明。पिनयिनBù zì jiàn gù míng.भावार्थ"जो स्वयं का प्रदर्शन नहीं करता, वही वास्तव में प्रकाशमान होता है।"तुलनात्मक सारऋग्वेद 5.44.14यो जागार तमृचः कामयन्ते।"जो जाग्रत है, उसी पर ऋचाएँ (दिव्य ज्ञान) प्रकट होती हैं।"ताओ ते चिंग 33自知者明。"जो स्वयं को जानता है, वही प्रबुद्ध है।"झुआंगज़ी且有大覺,而後知此其大夢也。"महान जागरण के बाद ज्ञात होता है कि पूर्व की अवस्था एक स्वप्न थी।"वैदिक "जागार" और ताओवादी 覺 (jué = जागरण, enlightenment) दोनों का लक्ष्य बाहरी अज्ञान से ऊपर उठकर उस सत्य का अनुभव करना है जो सदैव उपस्थित है। दोनों परम्पराएँ सिखाती हैं कि जाग्रत चेतना पर ही ज्ञान का प्रकाश प्रकट होता है।कन्फ्यूसियस धर्म में प्रमाण--ऋग्वेद 5.44.14 "यो जागार तमृचः कामयन्ते" का भाव है— जो जाग्रत, सजग, विवेकी और ज्ञान-पिपासु है, उसी पर ज्ञान प्रकट होता है। कन्फ्यूशियस परम्परा (Confucianism) में भी स्वाध्याय, आत्म-जागरूकता, सतत् सीखना, आत्म-संशोधन और विवेक पर बहुत बल दिया गया है।मुख्य ग्रंथों में Analects (论语, Lúnyǔ), Great Learning (大学, Dàxué) और Doctrine of the Mean (中庸, Zhōngyōng) शामिल हैं।1. Analects (论语) 1.1中文學而時習之,不亦說乎?पिनयिनXué ér shí xí zhī, bù yì yuè hū?भावार्थ"सीखना और उसका निरंतर अभ्यास करना क्या आनंद की बात नहीं है?"संबंध: ज्ञान जागृत और अध्ययनशील व्यक्ति को प्राप्त होता है।2. Analects (论语) 2.15中文學而不思則罔,思而不學則殆。पिनयिनXué ér bù sī zé wǎng, sī ér bù xué zé dài.भावार्थ"अध्ययन बिना चिंतन के व्यर्थ है, और चिंतन बिना अध्ययन के भ्रमकारी है।"संबंध: जागरूक विवेक आवश्यक है।3. Analects (论语) 7.22中文三人行,必有我師焉。पिनयिनSān rén xíng, bì yǒu wǒ shī yān.भावार्थ"यदि तीन लोग साथ चल रहे हों, तो उनमें से कोई न कोई मेरा शिक्षक अवश्य होगा।"संबंध: जागृत व्यक्ति हर जगह से सीखता है।4. Analects (论语) 2.17中文知之為知之,不知為不知,是知也。पिनयिनZhī zhī wéi zhī zhī, bù zhī wéi bù zhī, shì zhī yě.भावार्थ"जो जानते हो उसे जानना और जो नहीं जानते उसे न जानना स्वीकार करना ही वास्तविक ज्ञान है।"5. Analects (论语) 15.31中文吾嘗終日不食,終夜不寢,以思,無益,不如學也。पिनयिनWú cháng zhōngrì bù shí, zhōngyè bù qǐn, yǐ sī, wú yì, bùrú xué yě.भावार्थ"मैंने पूरे दिन भोजन नहीं किया और पूरी रात नहीं सोया, केवल चिंतन किया; परन्तु पाया कि अध्ययन अधिक उपयोगी है।"संबंध: ज्ञान के लिए जागरूक प्रयास आवश्यक है।6. Great Learning (大学)中文知止而後有定,定而後能靜,靜而後能安,安而後能慮,慮而後能得。पिनयिनZhī zhǐ ér hòu yǒu dìng...भावार्थ"लक्ष्य को जानने से स्थिरता आती है; स्थिरता से शांति; शांति से विचार; और विचार से ज्ञान की प्राप्ति होती है।"7. Doctrine of the Mean (中庸)中文博學之,審問之,慎思之,明辨之,篤行之。पिनयिनBó xué zhī, shěn wèn zhī, shèn sī zhī, míng biàn zhī, dǔ xíng zhī.भावार्थ"विस्तृत अध्ययन करो, गहराई से पूछो, सावधानी से विचार करो, स्पष्ट विवेक करो और दृढ़ता से आचरण करो।"8. Analects (论语) 4.17中文見賢思齊焉,見不賢而內自省也。पिनयिनJiàn xián sī qí yān, jiàn bù xián ér nèi zì xǐng yě.भावार्थ"श्रेष्ठ व्यक्ति को देखकर उसके समान बनने का प्रयास करो; और दोष देखकर स्वयं का निरीक्षण करो।"9. Analects (论语) 8.17中文敏而好學,不恥下問。पिनयिनMǐn ér hào xué, bù chǐ xià wèn.भावार्थ"जो सीखने के लिए उत्सुक है और प्रश्न पूछने में संकोच नहीं करता, वही प्रगति करता है।"10. Analects (论语) 16.9中文生而知之者,上也;學而知之者,次也。पिनयिनShēng ér zhī zhī zhě shàng yě; xué ér zhī zhī zhě cì yě.भावार्थ"जो जन्म से जानता है वह श्रेष्ठ है, और जो अध्ययन करके जानता है वह उसके बाद है।"तुलनात्मक सारऋग्वेद 5.44.14यो जागार तमृचः कामयन्ते।"जो जाग्रत है, उसी पर ऋचाएँ (दिव्य ज्ञान) प्रकट होती हैं।"Analects 2.15學而不思則罔,思而不學則殆。"अध्ययन और चिंतन दोनों आवश्यक हैं।"Doctrine of the Mean博學之,審問之,慎思之,明辨之,篤行之。"सीखो, पूछो, सोचो, विवेक करो और आचरण करो।"कन्फ्यूशियस परम्परा में "जागरण" शब्द वैदिक या बौद्ध अर्थ में कम प्रयुक्त होता है, परन्तु सतत् अध्ययन, आत्मनिरीक्षण, विवेक और नैतिक सजगता को वही स्थान प्राप्त है जो ऋग्वेद में "जागार" को प्राप्त है। ज्ञान उसी को मिलता है जो सीखने और स्वयं को सुधारने के लिए निरंतर जागरूक रहता है।शिन्तो धर्म में प्रमाण--ऋग्वेद 5.44.14 —यो जागार तमृचः कामयन्ते ।"जो जाग्रत है, उसी पर ऋचाएँ (दिव्य ज्ञान) प्रकट होती हैं।"इसका मूल भाव है — शुद्ध चेतना, सजगता, आत्म-जागरण और दैवी सत्य के प्रति खुलापन।शिन्तो (神道) में वेद, बाइबल या कुरआन की तरह एकमात्र धर्मग्रन्थ नहीं है, बल्कि उसके प्रमुख स्रोत Kojiki, Nihon Shoki तथा नोरितो (祝詞) प्रार्थनाएँ हैं। शिन्तो परम्परा में "जागरण" का विचार मगोकॊरो (真心 = शुद्ध हृदय), कियोमे (清め = शुद्धि) और कामी (神) के प्रति सजगता के रूप में मिलता है।नीचे कुछ प्रसिद्ध शिन्तो वचन और सूत्र दिए जा रहे हैं:1. 神道の大意 (शिन्तो परम्परागत उक्ति)日本語清き明き心をもて神を敬へ。रोमाजीKiyoki akaki kokoro o mote kami o uyamae.अर्थ"शुद्ध और प्रकाशमान हृदय से कामी (दैवी सत्ता) का आदर करो।"संबंध: जागृत और निर्मल हृदय पर ही दैवी प्रकाश उतरता है।2. 神道古訓日本語心明らかならば神明に通ず。रोमाजीKokoro akiraka naraba shinmei ni tsūzu.अर्थ"जब हृदय प्रकाशमान और जाग्रत होता है, तब वह दिव्य सत्ता से जुड़ जाता है।"3. नोरितो (祝詞) परम्परा日本語祓へ給ひ清め給へ。रोमाजीHarae tamai kiyome tamae.अर्थ"हमें शुद्ध करें, हमें पवित्र करें।"संबंध: शुद्धि के बाद ही सत्य का अनुभव संभव है।4. Motoori Norinaga日本語まごころこそ神の道なり。रोमाजीMagokoro koso kami no michi nari.अर्थ"सच्चा और निष्कपट हृदय ही कामी का मार्ग है।"5. Yoshida Kanetomo日本語神は清き心に宿る。रोमाजीKami wa kiyoki kokoro ni yadoru.अर्थ"कामी शुद्ध हृदय में निवास करते हैं।"6. शिन्तो परम्परागत उक्ति日本語心を正しくして神意を知る。रोमाजीKokoro o tadashiku shite shin'i o shiru.अर्थ"अपने हृदय को सही और जागरूक बनाकर दैवी इच्छा को जानो।"7. शिन्तो शिक्षा日本語神ながらの道を忘るるな。रोमाजीKannagara no michi o wasururu na.अर्थ"दैवी मार्ग को मत भूलो।"8. ग्रैंड श्राइन परम्परा日本語日のごとく明き心を持て。रोमाजीHi no gotoku akaki kokoro o mote.अर्थ"सूर्य के समान प्रकाशमान हृदय धारण करो।"9. शिन्तो नैतिक उपदेश日本語常に身を慎み心を磨け。रोमाजीTsuneni mi o tsutsushimi kokoro o migake.अर्थ"सदैव स्वयं को संयमित रखो और अपने हृदय को परिष्कृत करो।"10. ईसे शिन्तो परम्परा日本語神を敬ひ人を愛す。रोमाजीKami o uyamai hito o aisu.अर्थ"कामी का आदर करो और मनुष्यों से प्रेम करो।"तुलनात्मक सारऋग्वेद 5.44.14यो जागार तमृचः कामयन्ते।"जो जाग्रत है, उसी पर ऋचाएँ प्रकट होती हैं।"शिन्तो心明らかならば神明に通ず。"जब हृदय प्रकाशमान और जाग्रत होता है, तब वह दिव्यता से जुड़ जाता है।"神は清き心に宿る。"कामी शुद्ध हृदय में निवास करते हैं।"दोनों परम्पराओं में यह समान विचार मिलता है कि आंतरिक शुद्धि, सजगता और जागृत चेतना के द्वारा ही मनुष्य दैवी सत्य या दिव्य ज्ञान के निकट पहुँचता है। शिन्तो इसे 真心 (मगोकॊरो – सच्चा/शुद्ध हृदय) कहता है, जबकि वैदिक परम्परा इसे जागरण और ऋचा-प्राप्ति के रूप में व्यक्त करती है।यूनानी दर्शन में प्रमाण--ऋग्वेद 5.44.14 —यो जागार तमृचः कामयन्ते।"जो जाग्रत है, उसी पर ऋचाएँ (दिव्य ज्ञान) प्रकट होती हैं।"इसका भाव है कि सत्य का ज्ञान उसी को प्राप्त होता है जो चेतन, विवेकी और आत्म-जागृत हो। यूनानी (Greek) दर्शन में भी यही विचार विभिन्न दार्शनिकों ने व्यक्त किया है।1. SocratesGreekΓνῶθι σεαυτόνTransliterationGnōthi seautonअर्थ"स्वयं को जानो।"स्रोत: डेल्फी (Delphi) के अपोलो मंदिर का प्रसिद्ध वाक्य, जिसे सुकरात ने अपने दर्शन का आधार बनाया।संबंध: आत्मज्ञान ही वास्तविक जागरण है।2. SocratesGreekὉ δὲ ἀνεξέταστος βίος οὐ βιωτὸς ἀνθρώπῳTransliterationHo de anexetastos bios ou biōtos anthrōpō.अर्थ"बिना आत्म-परीक्षण का जीवन जीने योग्य नहीं है।"स्रोत: Apology 38a3. Plato — गुफा रूपक (Allegory of the Cave)Greekπεριαγωγὴ τῆς ψυχῆςTransliterationPeriagōgē tēs psychēsअर्थ"आत्मा का अज्ञान से ज्ञान की ओर मुड़ना।"स्रोत: Republic, पुस्तक VIIसंबंध: अंधकार से प्रकाश की ओर जागरण।4. PlatoGreekἡ παιδεία οὐκ ἐν τῷ ἐμποιεῖν τὴν ὄψιν, ἀλλ᾽ ἐν τῷ περιαγαγεῖνअर्थ"शिक्षा आँखें देने में नहीं, बल्कि दृष्टि को सही दिशा में मोड़ने में है।"5. HeraclitusGreekὁ κόσμος τῶν αὐτῶν ἁπάντωνप्रसिद्ध अंशτοὺς καθεύδοντας ἐργάτας εἶναιTransliterationTous katheudontas ergatas einai.अर्थ"सोए हुए लोग भी संसार में कार्य तो करते हैं, पर सत्य से अनभिज्ञ रहते हैं।"6. HeraclitusGreekἓν τὸ σοφόνTransliterationHen to sophon.अर्थ"सच्चा ज्ञान एक ही है।"7. EpictetusGreekΜόνον πεπαιδευμένοι ἐλεύθεροιTransliterationMonon pepaideumenoi eleutheroi.अर्थ"केवल ज्ञान से जाग्रत लोग ही वास्तव में स्वतंत्र हैं।"8. Marcus AureliusGreekἘγείρου καὶ ἔργον ἀνθρώπου ποίειTransliterationEgeirou kai ergon anthrōpou poiei.अर्थ"उठो और मनुष्य का वास्तविक कार्य करो।"स्रोत: Meditations9. PlotinusGreekἀνάβηθι πρὸς σεαυτόνTransliterationAnabēthi pros seauton.अर्थ"अपने भीतर ऊपर उठो।"10. PythagorasGreekΜηδὲν πράττειν ἀνοήτωςTransliterationMēden prattein anoētōs.अर्थ"बिना जागरूक विवेक के कोई कार्य मत करो।"11. AristotleGreekπάντες ἄνθρωποι τοῦ εἰδέναι ὀρέγονται φύσειTransliterationPantes anthrōpoi tou eidenai oregontai physei.अर्थ"सभी मनुष्य स्वभावतः ज्ञान की इच्छा रखते हैं।"स्रोत:Metaphysics, Book Iतुलनात्मक सारऋग्वेदयूनानी दर्शनयो जागार तमृचः कामयन्तेΓνῶθι σεαυτόνजो जाग्रत है, उसी पर ज्ञान प्रकट होता हैस्वयं को जानोआध्यात्मिक जागरणआत्म-परीक्षणऋचा का प्रकाशसत्य का दर्शनविवेक से ज्ञानदर्शन से प्रज्ञाविशेष रूप से सुकरात का "Γνῶθι σεαυτόν" (स्वयं को जानो) और प्लेटो की गुफा की उपमा ऋग्वेद के "यो जागार तमृचः कामयन्ते" के भाव के सबसे निकट माने जा सकते हैं। दोनों परम्पराएँ कहती हैं कि जो अज्ञान की नींद से जागता है, वही सत्य और ज्ञान के प्रकाश को प्राप्त करता है।-----+--------+---------+-------+