शैतानी घाटी का सफर - 4 RAAHULL SHARMA द्वारा आध्यात्मिक कथा में हिंदी पीडीएफ

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शैतानी घाटी का सफर - 4

ड्राइवर की सीट पर कालू बैठा था, लेकिन उसका चेहरा बिल्कुल सपाट था, जैसे वो किसी बेहोशी में हो।


उसने गाड़ी का गियर डाला और बस तेज़ी से एक दूसरी भयानक और गहरी खाई की तरफ भगाने लगा।


राम: "कालू! पागल हो गया है क्या? रुक जाओ!"
सातों दोस्त उस बस के पीछे पागलों की तरह भागे, पर कालू पर किसी का असर नहीं हुआ।


बस हवा में उछली और एक भयानक चीख के साथ हज़ारों फिट गहरी खाई में गिर गयी। नीचे एक बहुत बड़ा धमाका हुआ। कालू और उनकी बस, दोनों राख हो चुके थे।


विनोद की आख़िरी पुकार?


कालू और बस की तबाही के बाद, सभी दोस्तों के होश उड़ चुके थे। डर के मारे सब ने अंधाधुंध भागना शुरू कर दिया। भागते-भागते राम ने रुक कर सबको गिना और उसका दिल बैठ गया।



राम: "रुको! सब रुको! गिनती करो... हम सिर्फ छै हैं! विनोद कहाँ है? विनोद!"


सबने घबरा कर पीछे देखा। तभी सौरभ ने ऊपर की तरफ इशारा किया। उनके बिल्कुल सामने एक बहुत ही ऊँची और नुकीली चट्टान  थी। उस चट्टान की चोटी पर कोई बैठा था।वो विनोद था।



राम: "विनोद! पागल हो गया है क्या? नीचे आ..."
राम: "जल्दी! वहाँ मौत है, शैतान तुझे मार डालेगा!"


लेकिन विनोद पर किसी की आवाज़ का कोई असर नहीं हो रहा था। वो वहाँ से नीचे देख रहा था और एक अजीब सी, भयानक हंसी हंस रहा था। 


वो हंसी विनोद की नहीं लग रही थी, ऐसा लग रहा था जैसे उसके गले से कोई और बोल रहा हो।


मेहुल: "विनोद, देख भाई, मज़ाक मत कर! हम सब साथ निकलेंगे यहाँ से, नीचे आ जा!"


विनोद ने एक बार गर्दन घुमा कर दोस्तों की तरफ देखा। उसके चेहरे पर एक शैतानी सुकून था। उसने धीरे-धीरे उठना शुरू किया और चट्टान के बिल्कुल किनारे पर खड़ा हो गया।


उसने अपने दोनों हाथ और पैर हवा में फैलाए, जैसे वो उड़ने की तैयारी कर रहा हो।


अनामिका (चीखते हुए) "नहीं विनोद! रुक जाओ!"


लेकिन विनोद ने एक आखिरी बार ज़ोर से ठहाका लगाया और बिना किसी डर के, उसी गहरी खाई में छलांग लगा दी। 


दोस्तों की चीख निकल गयी। उन्होंने भाग कर चट्टान के नीचे देखा, पर वहाँ सिर्फ गहरा अँधेरा और मौत का सन्नाटा था। विनोद का भी अंत हो चुका था।


मोनिका का विलाप


मोनिका का हाल बुरा था। विनोद की मौत ने उसे पूरी तरह तोड़ दिया था। वो ज़मीन पर गिर पड़ी और पागलों की तरह रोने लगी।


मोनिका: (चिल्लाते हुए) "नहीं! विनोद मुझे छोड़ कर नहीं जा सकता! तुम सब खड़े देखते रहे... तुमने उसे बचाया क्यों नहीं?"


वो गुस्से और दुःख में मेहुल और सौरभ को पीटने लगी, उनके सीने पर हाथ मारने लगी। 

"तुम लोग कह रहे थे ना कि ये एडवेंचर है? देखो तुम्हारा एडवेंचर! मेरे विनोद को खा गया ये पहाड़!"


सौरभ ने मोनिका को संभालने की कोशिश की, पर वो किसी की सुनने को तैयार नहीं थी। उसका रोना पूरी घाटी में गूंज रहा था।


सौरभ: "मोनिका, होश में आओ! हमें यहाँ से निकलना होगा, वरना हम सब मारे जाएंगे। विनोद अब नहीं रहा, पर हमें बचना है!"


अनामिका और वह खौफनाक पेड़


तभी सृष्टि की नज़र पड़ती है और वह देखती है कि अनामिका चली जा रही है एक विशालकाय पेड़ के पास और धीरे-धीरे उस पेड़ पर चढ़ रही है। यह देखकर सृष्टि एकदम शॉक हो जाती है और सबको कहती है। 

सृष्टि की चीख ने सबका ध्यान भटका दिया।


अनामिका, जो अभी तक डर के मारे सहमी हुई थी, वो किसी बेहोशी की हालत में  एक विशालकाय पुराने पेड़ की तरफ बढ़ रही थी। 


वो पेड़ वही था जिस पर काले धागे और मिट्टी की मूर्तियां लटकी हुई थीं।


सृष्टि: (चिल्लाते हुए) "देखो! अनामिका कहाँ जा रही है?

वो... वो पेड़ पर चढ़ रही है!"

सबने देखा कि अनामिका के हाथ और पैर अजीब तरह से मुड़ रहे थे, जैसे कोई अदृश्य डोर  उसे ऊपर खींच रही हो।

वो उस विशालकाय पेड़ के तने पर बिल्कुल एक मकड़ी  की तरह उल्टे पैरों से चढ़ने लगी। उसका चेहरा बिल्कुल सफेद था और आँखें ऊपर की तरफ चढ़ गयी थीं।



राम: "अनामिका! नीचे आओ! ये क्या कर रही हो?"


अनामिका का ये रूप देखकर सबकी रूह कांप गयी। वो पेड़ की एक बहुत ऊँची टहनी पर खड़ी थी, वहाँ जहाँ इंसान का पहुँचना नामुमकिन था। 


उसके चेहरे पर एक ऐसी हंसी थी जो इस दुनिया की नहीं लग रही थी।


सौरभ और राम: "अनामिका! रुक जाओ! नीचे उतरो, हम घर चलेंगे!"


पर अनामिका ने उनकी तरफ देखा तक नहीं। उसने अपने गले से अपना दुपट्टा निकाला और उसे बड़े ही अजीब तरह से ऊपर वाली टहनी पर बांध दिया।


उसने दुपट्टे का एक फंदा बनाया और उसे अपने गले में डाल लिया।


राम: "नहीं अनामिका! ऐसा मत करो!"


लेकिन अनामिका के दिमाग पर शायद घाटी के शैतान ने कब्ज़ा कर लिया था। वो हंसते-हंसते उस टहनी से कूद गयी।


अगले ही पल, उसका शरीर हवा में झटके खाने लगा और वो उस विशालकाय पेड़ पर एक भयानक झूले की तरह लटक गयी।


उसके हाथ-पैर थोड़ी देर तड़पे और फिर बिल्कुल शांत हो गए। अंशिका की मौत हो चुकी थी।


जलता हुआ बदला और सौरभ का अंत


मोनिका: (रोते हुए) "पहले विनोद... अब अनामिका...

अगला नंबर किसका है?"

मेहुल के लिए ये नज़ारा किसी जहन्नुम से कम नहीं था। मेहुल और अनामिका एक-दूसरे को पसंद करते थे।


अनामिका उनके ग्रुप की सबसे खूबसूरत लड़की थी। मेहुल घुटनों के बल गिर पड़ा।


मेहुल: "नहीं... अनामिका! तुम मुझे ऐसे छोड़ कर नहीं जा सकती! मैंने तुमसे वादा किया था कि हम साथ वापस जाएंगे!"



राम: "मेहुल! होश में आ भाई! हमें मोनिका और सृष्टि को यहाँ से निकालना है। देख, वो शैतानी परछाइयां पास आ रही हैं!"



सौरभ ने मेहुल को ज़बरदस्ती उठाया। अभी वो लोग वहाँ से भागने की कोशिश कर ही रहे थे कि पूरी घाटी एक भयानक रफ़्तार वाली इंजन की आवाज़ से कांप उठी।


दूर अँधेरे से दो चमकती हुई हेडलाइट्स दिखायी दीं। वो और कोई नहीं, वही मिनी बस थी जो खाई में गिर कर राख हो चुकी थी!


बस पूरी तरह आग की लपटों में घिरी हुई थी, धुआं निकल रहा था, 

जब वह आग की लपटों से घिरी मिनी बस उनकी तरफ बढ़ती है, तो ड्राइवर की सीट पर कौन बैठा है? क्या कालू का जला हुआ कंकाल गाड़ी चला रहा है, या फिर वह बस अपने आप (अदृश्य शक्ति द्वारा) उनकी तरफ आ रही है?