अमित के हाथ में पकड़ा मोबाइल फोन कांप रहा था। फ्लैशलाइट की रोशनी उस कोरे कागज पर टिक गई थी, जहां नीली स्याही से लिखा था— "हाँ अमित, मैं पैंतीस साल से तुम्हारी ही राह देख रहा हूँ।"
कमरे का तापमान अचानक गिर चुका था। अमित को अपनी ही सांसों की आवाज साफ सुनाई दे रही थी। उसने पीछे हटकर स्टोर रूम से भागने की सोची, लेकिन पैर जैसे जमीन से चिपक गए थे। एक लेखक का दिमाग डर से ज्यादा इस बात पर हैरान था कि यह सब उसकी आंखों के सामने लाइव हो रहा था।
"यह... यह कोई मजाक है? क्या कोई प्रैंक (prank) कर रहा है?" अमित ने खुद से बड़बड़ाया।
उसने कांपते हाथों से फिर से फाउंटेन पेन उठाया। उसने उसी कागज पर, उस अदृश्य लिखावट के ठीक नीचे लिखा— "तुम कौन हो? और मेरा नाम तुम्हें कैसे पता?"
जैसे ही अमित ने पेन हटाया, मेज पर रखी स्याही की बोतल में से थोड़ी सी स्याही अपने आप पेन की निब की तरफ खिंची। और फिर, बिना किसी सहारे के पेन हवा में थोड़ा सा उठा और कागज पर चलने लगा। अमित अपनी जगह पर जम गया।
कागज पर लिखा जा रहा था:
"मेरा नाम राघव है। पैंतीस साल पहले मैं इसी कमरे में रहता था। तुम्हारी ही तरह, मैं भी शब्दों का शौकीन था... एक लेखक था। तुम्हारा नाम मुझे कैसे पता? क्योंकि पिछले छह महीने से जब तुम कोरे पन्नों को देखकर परेशान होते थे, तब मैं यहीं अंधेरे में बैठकर तुम्हें देखता था। मुझे पता है कि तुम्हारी कलम रुक चुकी है, और मेरी कहानी अधूरी है।"
अमित का डर अब धीरे-धीरे उत्सुकता में बदल रहा था। उसने गहरी सांस ली और कुर्सी खींचकर वहीं बैठ गया। उसने लिखा— "कैसी अधूरी कहानी? और तुम मुझसे क्या चाहते हो?"
पेन फिर से चला:
"मैं अपनी जिंदगी की आखिरी और सबसे कीमती कहानी पूरी करना चाहता हूँ। यह केंट रोड का कमरा नंबर 3 सिर्फ एक कमरा नहीं है अमित, यह गवाह है एक ऐसे वादे का जो कभी पूरा नहीं हो सका। अगर तुम मेरी कहानी लिखोगे, तो तुम्हें तुम्हारी अगली बेस्ट-सेलर किताब मिलेगी, और मुझे इस अधूरी दास्तान से मुक्ति।"
अमित ने कुछ पल सोचा। एक तरफ उसका डर था, और दूसरी तरफ एक लेखक की वो भूख जो एक बेहतरीन कहानी के लिए कुछ भी कर सकती थी। उसने पेन उठाया और लिखा— "ठीक है राघव। मैं तुम्हारी कहानी लिखूंगा। बताओ, क्या हुआ था पैंतीस साल पहले?"
जैसे ही अमित ने यह लिखा, कमरे की बत्ती वापस आ गई। अचानक स्टोर रूम का माहौल सामान्य हो गया। लेकिन मेज पर रखे उस कागज पर अब एक नया वाक्य लिखा हुआ था, जिससे कहानी का पहला रहस्य खुलने वाला था:
"तो सुनो अमित, बात साल 1991 की है। इसी कमरे में, इसी मेज पर बैठकर मैंने सुचित्रा के लिए अपना आखिरी खत लिखा था... वह खत जो उस तक कभी पहुँच ही नहीं पाया, क्योंकि उस रात मेरी हत्या कर दी गई थी।"
'हत्या' शब्द पढ़ते ही अमित की आंखें फटी की फटी रह गईं। केंट रोड के इस कमरे में पैंतीस साल पहले कोई कत्ल हुआ था, और वह कातिल शायद आज भी आजाद था।
[अध्याय 2 समाप्त]
Cliffhanger: क्या अमित राघव के कातिल का पता लगा पाएगा? और सुचित्रा कौन है?