अधूरी किताब – सीजन 2
एपिसोड 3 : बचपन का रहस्य
रात के तीन बज चुके थे।
अनन्या के हाथ अब भी काँप रहे थे।
उसकी आँखें सामने रखी उस तस्वीर पर जमी थीं जिसमें एक छोटा बच्चा दिखाई दे रहा था।
लेकिन वह कोई साधारण तस्वीर नहीं थी।
वह उसकी अपनी तस्वीर थी।
उसका बचपन।
उसकी यादें।
उसका अतीत।
"यह... यह यहाँ कैसे हो सकती है?"
अनन्या की आवाज काँप रही थी।
उसने तस्वीर को बार-बार देखा।
कोई शक नहीं था।
वह वही थी।
उसी उम्र की।
उसी कपड़ों में।
लेकिन सबसे अजीब बात यह थी कि तस्वीर के पीछे एक तारीख लिखी थी।
12 जून 2005
अनन्या का दिल तेजी से धड़कने लगा।
उस तारीख से जुड़ी एक बात उसे अच्छी तरह याद थी।
वही दिन था...
जब उसके माता-पिता एक भयानक सड़क दुर्घटना में मारे गए थे।
उस समय वह सिर्फ पाँच साल की थी।
और उसके बाद से उसकी परवरिश उसके मामा-मामी ने की थी।
लेकिन उस दुर्घटना की सच्चाई उसे कभी नहीं बताई गई।
हर बार जब उसने पूछा...
लोगों ने यही कहा—
"तुम बहुत छोटी थीं।"
"तुम्हें कुछ याद नहीं होगा।"
लेकिन आज...
उसे लग रहा था कि शायद उससे कुछ छिपाया गया था।
बहुत बड़ा सच।
सुबह होते ही अनन्या ने अपने मामा को फोन किया।
"मामा... मुझे आपसे कुछ पूछना है।"
दूसरी तरफ कुछ क्षणों की चुप्पी रही।
"क्या बात है बेटा?"
"मम्मी-पापा की मौत कैसे हुई थी?"
यह सुनते ही फोन पर अचानक सन्नाटा छा गया।
कुछ सेकंड तक कोई आवाज नहीं आई।
फिर मामा धीरे से बोले—
"इतने साल बाद अचानक यह सवाल क्यों?"
"बस बताइए।"
मामा की आवाज बदल चुकी थी।
जैसे वे किसी बात से डर गए हों।
"जो तुम्हें बताया गया था वही सच है।"
"नहीं।"
अनन्या ने तुरंत कहा।
"मुझे लगता है कुछ और भी था।"
दूसरी तरफ फिर चुप्पी।
और फिर...
फोन कट गया।
अनन्या सन्न रह गई।
उसने दोबारा कॉल किया।
लेकिन फोन बंद था।
उसका शक अब और गहरा हो चुका था।
उसी समय मेज पर रखी अधूरी किताब अपने आप खुल गई।
पन्ने धीरे-धीरे पलटने लगे।
और फिर एक पन्ने पर आकर रुक गए।
लाल अक्षरों में लिखा था—
"सच की शुरुआत घर से होती है।"
इसके नीचे एक और पंक्ति उभरी—
"पुराना बंगला। शिवपुर।"
अनन्या का दिल बैठ गया।
शिवपुर।
यही वह जगह थी जहाँ उसका बचपन बीता था।
जहाँ उसके माता-पिता रहते थे।
और जहाँ दुर्घटना के बाद कोई कभी वापस नहीं गया।
उसी शाम।
अनन्या शिवपुर के लिए निकल गई।
लगभग दो घंटे बाद वह वहाँ पहुँची।
सड़क के किनारे पुराना बंगला अब भी खड़ा था।
लेकिन अब वह खंडहर बन चुका था।
दीवारों पर काई जमी थी।
खिड़कियाँ टूटी हुई थीं।
और चारों तरफ जंगली घास उगी हुई थी।
जैसे वर्षों से वहाँ कोई आया ही न हो।
अनन्या का दिल घबराने लगा।
लेकिन वह अंदर चली गई।
मुख्य दरवाजा आधा टूटा हुआ था।
हल्का धक्का देते ही खुल गया।
अंदर धूल ही धूल थी।
सन्नाटा इतना गहरा था कि उसकी साँसों की आवाज तक सुनाई दे रही थी।
तभी...
उसे ऊपर से किसी चीज गिरने की आवाज सुनाई दी।
धड़ाम!
वह चौंक गई।
"कौन है वहाँ?"
कोई जवाब नहीं आया।
लेकिन अब उसे साफ महसूस हो रहा था कि वह अकेली नहीं थी।
वह धीरे-धीरे सीढ़ियाँ चढ़ने लगी।
ऊपर पहुँचते ही उसकी नजर एक कमरे पर पड़ी।
दरवाजे पर उसका नाम लिखा था।
"अनन्या"
यह उसका बचपन का कमरा था।
उसने काँपते हाथों से दरवाजा खोला।
कमरा लगभग वैसा ही था।
कोने में टूटा हुआ खिलौना पड़ा था।
दीवार पर फीकी पड़ चुकी पेंटिंग थी।
और खिड़की के पास...
एक पुराना लकड़ी का संदूक रखा था।
अनन्या धीरे-धीरे उसके पास गई।
संदूक खोलते ही उसकी आँखें फैल गईं।
अंदर दर्जनों तस्वीरें थीं।
पुराने दस्तावेज थे।
और एक डायरी।
उसके पिता की डायरी।
उसने जल्दी से पहला पन्ना खोला।
लिखा था—
"अगर यह डायरी अनन्या तक पहुँचे, तो समझना कि मैं अपनी बेटी को बचाने में असफल रहा।"
अनन्या की आँखों में आँसू आ गए।
वह पढ़ती गई।
"उस किताब ने हमें ढूँढ लिया है।"
"मैंने उसे नष्ट करने की कोशिश की थी।"
"लेकिन वह लौट आई।"
"अब वह मेरी बेटी को चाहती है।"
अनन्या का पूरा शरीर काँप उठा।
किताब...
फिर वही किताब।
उसके पिता भी उसे जानते थे।
अचानक कमरे का तापमान गिरने लगा।
ठंडी हवा पूरे कमरे में फैल गई।
खिड़कियाँ अपने आप खुल गईं।
धड़ाम!
धड़ाम!
धड़ाम!
अनन्या घबरा गई।
तभी कमरे के कोने में कोई दिखाई दिया।
एक छोटी लड़की।
लगभग पाँच साल की।
सफेद फ्रॉक पहने।
वह धीरे-धीरे उसकी तरफ देख रही थी।
अनन्या का दिल रुकने लगा।
क्योंकि वह लड़की...
बिल्कुल उसी जैसी थी।
उसका बचपन।
उसका चेहरा।
उसकी आँखें।
सब कुछ।
"तुम कौन हो?"
अनन्या फुसफुसाई।
लड़की मुस्कुराई।
लेकिन वह मुस्कान सामान्य नहीं थी।
बहुत डरावनी।
बहुत अजीब।
और फिर उसने धीरे से कहा—
"तुम मुझे भूल गई।"
अनन्या के पैरों तले जमीन खिसक गई।
"क्या?"
"तुम मुझे वहीं छोड़कर चली गई थी।"
"मैं... मैं समझी नहीं।"
लड़की की आँखें अचानक लाल हो गईं।
"झूठ।"
कमरे की सारी चीजें काँपने लगीं।
दीवारों पर दरारें उभर आईं।
और तभी लड़की गायब हो गई।
अनन्या डरकर पीछे हटने लगी।
लेकिन तभी उसे नीचे से किसी आदमी की आवाज सुनाई दी।
"अनन्या!"
वह चौंक गई।
आवाज जानी-पहचानी थी।
वह भागकर नीचे पहुँची।
और सामने जो व्यक्ति खड़ा था उसे देखकर राहत की साँस ली।
वह उसका मामा था।
"मामा!"
वह दौड़कर उनके पास पहुँची।
लेकिन मामा का चेहरा डरा हुआ था।
बहुत ज्यादा डरा हुआ।
"तुम यहाँ क्यों आई?"
उन्होंने घबराकर पूछा।
"मुझे सच जानना है।"
मामा कुछ क्षण चुप रहे।
फिर बोले—
"तुम्हारे माता-पिता दुर्घटना में नहीं मरे थे।"
अनन्या के पैरों तले जमीन खिसक गई।
"क्या?"
"उनकी हत्या हुई थी।"
यह सुनते ही उसका दिल जैसे रुक गया।
"किसने?"
मामा ने जवाब नहीं दिया।
उनकी नजर अचानक उसके हाथ में पकड़ी अधूरी किताब पर चली गई।
और अगले ही पल उनके चेहरे का रंग उड़ गया।
"हे भगवान..."
उन्होंने काँपते हुए कहा।
"यह फिर लौट आई।"
"आप इसे जानते हैं?"
"हाँ।"
मामा की आँखों में डर साफ दिखाई दे रहा था।
"यही वह किताब है जिसने तुम्हारे परिवार को खत्म कर दिया।"
अनन्या स्तब्ध रह गई।
"लेकिन कैसे?"
मामा कुछ बोल पाते उससे पहले...
पूरे बंगले में भयानक चीख गूँज उठी।
आआआआआआआह्ह्ह्ह!
दीवारें काँपने लगीं।
छत से धूल गिरने लगी।
और अधूरी किताब अपने आप खुल गई।
इस बार पन्नों पर सिर्फ एक वाक्य लिखा था—
"वह जाग चुकी है..."
और उसके नीचे—
"आर्या वापस आ गई है।"
उसी क्षण बंगले के बाहर खड़ी सूखी पेड़ों की शाखाएँ जोर-जोर से हिलने लगीं।
मानो कोई अदृश्य शक्ति पूरे इलाके को अपने कब्जे में ले रही हो।
अनन्या और उसके मामा भय से एक-दूसरे को देखने लगे।
उन्हें समझ आ चुका था—
असल खतरा अभी शुरू हुआ था।
और आर्या...
जिसे वे अब तक एक भटकती आत्मा समझ रहे थे...
शायद उससे कहीं ज्यादा खतरनाक थी।
क्रमशः...
अगले एपिसोड 4 में आर्या की असली कहानी, अधूरी किताब का जन्म और अनन्या के माता-पिता की मौत का रहस्य सामने आना शुरू होगा।