Rebirth of a Bench - 4 Amardeep Kumar द्वारा हास्य कथाएं में हिंदी पीडीएफ

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Rebirth of a Bench - 4



वो रात।

कदमों की आहट। दरवाज़े की आवाज़। और फिर...

कुछ नहीं।

बस इतना ही? इतने dramatic cliffhanger के बाद सिर्फ... कुछ नहीं? मैंने सोचा। राइटर साहब, आपने मुझे रात भर डरा कर रखा और अंदर आया कोई नहीं? यह तो धोखा है!

हाँ। जो भी था — इंसान, जानवर, या कोई और — वो आया और चला गया। बिना कुछ किए। बिना कुछ बोले।

या शायद वो रुका था। चुपचाप। अंधेरे में। मुझे देखता रहा।

मैंने वो सोच तुरंत दिमाग से निकाल दी। नहीं, नहीं। Science। Thermal Expansion। Logic। सब ठीक है।

सूरज धीरे-धीरे ढल रहा था।

अँधेरा गहरा होने के साथ-साथ परिंदों के चहचहाने की आवाज़ें भी शांत होने लगी थीं। मैं अपनी लकड़ी के शरीर से उन आवाज़ों की तरंगों को महसूस कर पा रहा था। ये आवाज़ें मुझे अपने बचपन की याद दिला रही थीं — जब मैं शाम को पेड़ों पर चिड़ियों का शोर सुना करता था।

लेकिन एक मिनट... राजस्थान में इतनी हरियाली और चिड़ियाँ कहाँ से आ गईं? मुझे अचानक confusion हुआ। यहाँ तो सिर्फ रेत, ऊँट और coaching institutes होने चाहिए थे। यह स्कूल Kota में है या किसी जंगल में?

अरे सतोशी! तू कितना बेवकूफ़ है! मैंने खुद को धिक्कारा। Kota में पेड़ भी होते हैं। और चिड़ियाँ भी। बस students नहीं होते — वो सब library में बंद होते हैं।

खैर, जैसे-जैसे रात गहरी हो रही थी, मेरा डर भी बढ़ रहा था। मैंने खुद को शांत करने के लिए वैज्ञानिक तर्कों का सहारा लिया।

सतोशी, डर मत। तू पढ़ा-लिखा है। Science पर भरोसा कर। भूत होते ही नहीं हैं। और अगर होते भी हैं तो वो मुझे क्या करेंगे? मैं पहले से ही मर चुका हूँ और एक बेंच हूँ। मेरी situation भूत से भी ज़्यादा दयनीय है।

तभी छत से आवाज़ आई — धम... धम... धम...

मेरी लकड़ी काँप उठी।

कुछ नहीं है! ये 'Thermal Expansion' है! दिन भर की गर्मी से concrete और pipe फैलते हैं, रात में ठंडे होकर सिकुड़ते हैं — इसीलिए ऐसी आवाज़ें आती हैं। Science!

लेकिन फिर बाहर से एक अजीब सी सरसराहट की आवाज़ आई। एकदम धीमी। जैसे कोई घिसटते हुए चल रहा हो।

यह... यह Thermal Expansion नहीं है। मेरा scientific logic वहीं ध्वस्त हो गया।

ठीक है, plan B — आँखें बंद करो और सो जाओ। जो नहीं दिखता वो डराता नहीं। यही philosophy है। यही survival है।

मेरी आँखें — या जो भी देखने का sensor मेरे पास था — भारी होने लगीं और मैं एक बार फिर नींद की वादियों में फिसल गया।

                             [सपने का दृश्य]

मैं वापस उसी क्लासरूम में था। लेकिन इस बार मैं कोई बेंच नहीं — एक इंसान था। मैं अपनी बेंच पर बैठा था। सब कुछ normal था, लेकिन मैं बार-बार अपने बगल वाली खाली सीट को देख रहा था।

मुझे इतना बुरा क्यों लग रहा है? ये जगह कौन सी है? मैं कौन हूँ? और मैं किसका इंतज़ार कर रहा हूँ?

तभी मैंने देखा कि आगे बैठा लड़का — गजेंद्र — भी उसी खाली सीट को देख रहा था। मेरे मन में एक अजीब सी बेचैनी हुई।

फिर अचानक सीन बदल गया।

Lunch time। मैं washroom के पास खड़ा था। मेरे सामने कुछ लड़के थे। और एक लड़के की डरी हुई आवाज़ गूँज रही थी —

"क्या कहा तुमने? तुम सर को सच-सच बता दोगे? मैं तुम्हें छोड़ूँगा नहीं...!"

इसके बाद मैं वहाँ से भागने लगा। मेरी साँसें फूल रही थीं, दिल ज़ोरों से धड़क रहा था, और तभी —

[सपना टूटा]

मैं हाँफते हुए — मानसिक रूप से — उठा। सुबह हो चुकी थी।

यार, ये अजीब सपने क्या हैं? क्या ये मेरे पिछले जन्म की यादें हैं? मैं कौन था? और वो खाली सीट किसकी थी? मैं एक बेंच होकर भी इन उलझनों में परेशान हो रहा था।

और वो धमकी वाली आवाज़... वो कौन था? और मैं क्यों भाग रहा था?

तभी सफाई वाले भैया अंदर आए। उन्होंने झाड़ू लगाना शुरू किया। बच्चों ने कागज़ फाड़कर क्लास गंदी कर रखी थी।

टीचर्स को इन बच्चों को manners सिखाने चाहिए! इतने सारे pages बर्बाद कर दिए! पेड़ काटकर बनाई गई थी वो copy — मेरे रिश्तेदार थे वो पेड़! थोड़ी तो respect करो!

सफाई वाले ने कचरा साफ़ किया और फिर मेरी तरफ देखा। और अचानक... उसने मुझे गले लगा लिया!

अरे भाई! तुझे मुझसे क्या obsession है? Chapter 1 में भी तू मेरे ऊपर लेटा था और अब गले लगा रहा है? यह कोई furniture store नहीं है जहाँ तू trial करता रहे!

फिर वह मेरे ऊपर बैठ गया। उसने अपना सिर अपनी हथेलियों में गिरा लिया। उसकी आँखें भर आई थीं। वह खुद से बातें कर रहा था।

"काश मेरे पास भी इतने पैसे होते... तो मेरे बच्चे का एडमिशन भी इसी क्लास में हो जाता।" उसकी आवाज़ में एक गहरा दर्द था। "मैं हर Sunday उसे उसके दोस्तों का इंतज़ार करते देखता हूँ। जब वो उन्हें स्कूल जाते देखता है, तो उसका चेहरा उतर जाता है।"

मैं चुपचाप सुन रहा था। मैं बोल नहीं सकता था, पर महसूस कर पा रहा था।

"मुझे सबसे ज़्यादा दुख तब हुआ," उसने आगे कहा, "जब एक दिन वो दोस्तों के साथ खेल रहा था। एक बच्चे ने उससे पूछा — 'तू स्कूल क्यों नहीं जाता?' तो मेरे बेटे ने कहा, 'मैं स्कूल नहीं जाता।' उस बच्चे ने कहा, 'वाह! कितनी अच्छी बात है! तुम्हें school नहीं जाना पड़ता, कोई homework नहीं।' लेकिन मेरे बेटे ने जवाब दिया..." उसकी आवाज़ काँप गई। "'पर मुझे भी तुम्हारी तरह बैग पहनकर स्कूल जाने का मन करता है।'"

यह सुनकर मेरी लकड़ी का दिल भी पिघल गया।

एक बच्चे के लिए school सिर्फ पढ़ाई की जगह नहीं होती — वो उसकी दुनिया होती है। और जब वो दुनिया नहीं मिलती, तो उसका दिल उतना ही टूटता है जितना किसी बड़े का।

सफाई वाले ने अपने आँसू पोंछे, उठा और झाड़ू लेकर दरवाज़े की तरफ बढ़ा। तभी दरवाज़ा खुला। सामने एक टीचर खड़े थे — गंभीर चेहरा, आँखों में एक सोचती हुई नज़र।

"नमस्कार सर!" सफाई वाले ने हड़बड़ाकर कहा।

"नमस्कार। सुनो, ये जो कूड़ेदान है ना, इसे उठाकर मेरे office में रख दो," टीचर ने कहा।

सफाई वाला कूड़ेदान लेकर चला गया।

टीचर क्लास में आए और सीधे मेरे ऊपर आकर बैठ गए। उन्होंने अपनी जेब से phone निकाला और मिलाया।

अरे! मेरे ऊपर बैठने से पहले पूछते भी नहीं? कम से कम 'excuse me' तो बोलो! मैं एक sentient बेंच हूँ!

"हेलो, Principal सर? Good morning। सर, मुझे अभी पता चला है कि हमारे यहाँ जो सफाई कर्मचारी है, उसका बेटा पैसों की कमी की वजह से school नहीं जा पा रहा है। हमें कुछ करना चाहिए सर। हम उसे अपने school के 'Free Education Quota' (RTE) के तहत admission दे सकते हैं ना?"

टीचर ने बहुत ही विस्तार से Principal को उस बच्चे की अहमियत समझाई।

यह सब सुनकर मेरे अंदर एक अजीब सी शांति छा गई। वाह! क्या बात है! लेकिन रुक जाओ। इतनी अच्छी और happy ending? कुछ गड़बड़ तो नहीं है? मेरी कहानी इतनी positive कैसे जा रही है? राइटर साहब, आप ठीक तो हैं ना?

लेकिन सच कहूँ? यह emotional scene पढ़कर मुझे लग रहा है कि मेरे राइटर कहीं रो तो नहीं रहे अभी। राइटर साहब, please खुद को संभालिए। कहानी अभी बाकी है।

लेकिन सच कहूँ? मुझे जापानी और Korean writers ही ज़्यादा पसंद हैं। उनका taste ही अलग है। जैसे रसगुल्ले और गुलाब जामुन — दोनों मीठे हैं, दोनों amazing हैं, पर बात कुछ और होती है।

अरे यार! रसगुल्ले की बात कहाँ से आ गई? मुझे भी खाने का मन कर रहा है। पर मैं बेंच होकर रसगुल्ला कैसे खा सकता हूँ? अगर खाऊँ भी तो रखूँगा कहाँ? मेरे पास मुँह नहीं है, पेट नहीं है... लेकिन इच्छा है। यही तो सबसे बड़ा अत्याचार है।

टन-टन-टन-टन!

तभी school की पहली घंटी बजी। मेरे रसगुल्ले वाले ख्यालों पर पानी फिर गया।

"चलो सतोशी," मैंने खुद से कहा, "romance और mystery का दूसरा दिन शुरू होने वाला है। आज देखते हैं वो गजेंद्र प्रताप सिंह शेखावत और क्या बेवकूफी करता है। उम्मीद है आज Doraemon की जगह कोई और anime का नाम लेगा।"


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