रिश्तों का सच Vijay Erry द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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रिश्तों का सच

रिश्तों का  सच     लेखक: विजय शर्मा ऐरीगांव हरिपुर की सुबह हमेशा की तरह शांत थी। खेतों में ओस की बूंदें मोतियों की तरह चमक रही थीं और पक्षियों का मधुर कलरव वातावरण को संगीतमय बना रहा था। लेकिन आज शर्मा परिवार के आंगन में एक अजीब सी खामोशी थी।उस घर में रहते थे सत्तर वर्षीय रामनाथ शर्मा, उनकी पत्नी सरला देवी, बड़ा बेटा सुरेश, बहू कविता और छोटा बेटा महेश। कभी यह परिवार गांव में आदर्श परिवार माना जाता था। लोग कहते थे, "देखो शर्मा परिवार को, कितनी एकता है इनके बीच।"लेकिन समय के साथ रिश्तों में दरारें आने लगी थीं।रामनाथ जी ने अपनी पूरी जिंदगी मेहनत करके अपने दोनों बेटों को पढ़ाया-लिखाया था। खेत बेचे, गहने गिरवी रखे, लेकिन बच्चों की पढ़ाई में कोई कमी नहीं आने दी।आज वही बेटे अपने-अपने संसार में व्यस्त थे।एक दिन सुबह नाश्ते के समय रामनाथ जी ने धीरे से कहा, "सुरेश बेटा, मेरी दवाई खत्म होने वाली है।"सुरेश मोबाइल में व्यस्त था। उसने बिना ऊपर देखे कहा, "ठीक है पिताजी, शाम को ले आऊंगा।"शाम आई, फिर रात हो गई, लेकिन दवाई नहीं आई।सरला देवी ने दुखी होकर कहा, "बच्चे अब बड़े हो गए हैं, उन्हें हमारी जरूरत कहां रही?"रामनाथ जी मुस्कुरा दिए।"नहीं सरला, बच्चे बुरे नहीं हैं। बस जिम्मेदारियों में उलझ गए हैं।"लेकिन उनके दिल में दर्द जरूर था।कुछ दिनों बाद गांव में एक बड़ा समारोह आयोजित हुआ। वहां एक प्रसिद्ध संत आए हुए थे।संत जी ने प्रवचन में कहा—"रिश्ते आईने की तरह होते हैं। यदि आप उनमें प्रेम देखना चाहते हैं तो पहले स्वयं प्रेम देना सीखिए। यदि सम्मान चाहते हैं तो पहले सम्मान दीजिए।"यह बात रामनाथ जी के मन में बैठ गई।उसी रात उन्होंने अपने पुराने संदूक से एक छोटा सा आईना निकाला।यह आईना उन्हें उनके पिता ने दिया था।उन्होंने उसे साफ किया और अपने कमरे में रख दिया।अगली सुबह उनकी पोती पायल कमरे में आई।"दादाजी, यह पुराना आईना किसलिए रखा है?"रामनाथ जी मुस्कुराए।"बेटी, यह साधारण आईना नहीं है। यह रिश्तों का आईना है।"पायल आश्चर्य से बोली, "रिश्तों का आईना?""हाँ। इसमें चेहरा नहीं, इंसान का व्यवहार दिखाई देता है।"पायल हंस पड़ी।"दादाजी, आप भी ना!"लेकिन रामनाथ जी गंभीर थे।कुछ दिनों बाद सुरेश का अपने छोटे भाई महेश से खेत की जमीन को लेकर झगड़ा हो गया।दोनों जोर-जोर से बहस कर रहे थे।"मैंने ज्यादा मेहनत की है!" सुरेश चिल्लाया।"और मैंने क्या किया है?" महेश भी गुस्से में था।रामनाथ जी चुपचाप सब सुन रहे थे।फिर उन्होंने दोनों को कमरे में बुलाया।"एक काम करो, इस आईने में देखो।"दोनों भाइयों ने हंसते हुए आईने में देखा।उन्हें अपना ही चेहरा दिखाई दिया।"क्या दिखा?" रामनाथ जी ने पूछा।"हमारा चेहरा।""नहीं बेटा। थोड़ा गहराई से देखो।"दोनों चुप हो गए।रामनाथ जी बोले—"जब तुम छोटे थे, एक रोटी को आधा-आधा बांटकर खाते थे। एक दूसरे के लिए लड़ते नहीं, दुनिया से लड़ जाते थे। आज जमीन के कुछ टुकड़ों ने तुम्हारे दिलों को अलग कर दिया।"दोनों भाइयों की आंखें झुक गईं।उस रात महेश सो नहीं पाया।उसे बचपन की बातें याद आने लगीं।कैसे सुरेश उसे स्कूल छोड़ने जाता था।कैसे बारिश में दोनों एक ही छतरी के नीचे चलते थे।कैसे पिता ने दोनों के लिए नई साइकिल खरीदने के लिए अपनी जरूरतें छोड़ दी थीं।उसकी आंखों में आंसू आ गए।दूसरी ओर सुरेश भी बेचैन था।उसे याद आया कि जब वह बीमार पड़ा था तो महेश ने तीन रातें जागकर उसकी सेवा की थी।उसे महसूस हुआ कि वह जमीन के लिए अपने भाई से दूर हो रहा है।अगले दिन दोनों भाइयों ने एक-दूसरे को देखा।कुछ क्षणों तक चुप्पी रही।फिर महेश आगे बढ़ा।"भैया, माफ कर दीजिए।"सुरेश की आंखें भर आईं।"नहीं महेश, गलती मेरी भी थी।"दोनों गले लग गए।सरला देवी की आंखों से खुशी के आंसू बह निकले।लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।घर में एक और रिश्ता टूटने की कगार पर था।बहू कविता और सास सरला देवी के बीच अक्सर अनबन रहती थी।कविता को लगता था कि सास हर बात में टोकती हैं।सरला देवी को लगता था कि बहू उनका सम्मान नहीं करती।एक दिन दोनों के बीच जोरदार बहस हो गई।कविता गुस्से में बोली—"मैं अब इस घर में नहीं रह सकती!"यह सुनकर पूरा घर सन्न रह गया।रामनाथ जी ने उसी शाम कविता को बुलाया।"बेटी, एक बार इस आईने में देखो।"कविता ने देखा।"क्या दिख रहा है?""मेरा चेहरा।"रामनाथ जी मुस्कुराए।"जब तुम्हारी शादी हुई थी, तब तुमने सरला को क्या कहा था?"कविता कुछ सोचने लगी।फिर बोली—"मैंने कहा था कि मुझे मां की कमी महसूस नहीं होने दूंगी।""और सरला ने क्या कहा था?""उन्होंने कहा था कि मैं बेटी बनकर रहूंगी।"रामनाथ जी बोले—"फिर रास्ते में ऐसा क्या हुआ कि मां-बेटी फिर से सास-बहू बन गईं?"कविता के पास कोई जवाब नहीं था।उसकी आंखें नम हो गईं।उस रात कविता ने पहली बार सरला देवी के कमरे में जाकर उनके पैर दबाए।सरला देवी चौंक गईं।"क्या हुआ बहू?"कविता रो पड़ी।"मां, मुझे माफ कर दीजिए।"सरला देवी ने उसे गले लगा लिया।"बेटी, मां-बेटी के बीच माफी नहीं होती।"दोनों रोती रहीं।उन आंसुओं ने वर्षों की शिकायतें बहा दीं।समय बीतता गया।घर में फिर से खुशियां लौटने लगीं।लेकिन एक दिन अचानक रामनाथ जी की तबीयत बिगड़ गई।उन्हें अस्पताल ले जाया गया।डॉक्टर ने कहा—"उम्र ज्यादा है। हमें पूरी कोशिश करनी होगी।"पूरा परिवार चिंतित था।सुरेश, महेश, कविता, पायल—सब अस्पताल में थे।रामनाथ जी ने धीरे से आंखें खोलीं।उन्होंने अपने बेटों को पास बुलाया।"बेटा, एक बात याद रखना।""जी पिताजी।""रिश्तों का आईना हमेशा साफ रखना।""हम समझे नहीं।"रामनाथ जी मुस्कुराए।"जब भी किसी रिश्ते में धूल जमने लगे, अहंकार आने लगे, शिकायतें बढ़ने लगें, तब अपने दिल के आईने को साफ कर लेना।""कैसे?""सिर्फ यह याद करके कि सामने वाला भी कभी तुम्हारी खुशी के लिए रोया था, तुम्हारे लिए जागा था, तुम्हारे लिए त्याग किया था।"सबकी आंखें भर आईं।कुछ दिनों बाद रामनाथ जी स्वस्थ होकर घर लौट आए।पूरे गांव ने उनका स्वागत किया।अब शर्मा परिवार फिर से पहले जैसा हो चुका था।एक शाम सभी आंगन में बैठे थे।पायल ने पूछा—"दादाजी, क्या सचमुच वह आईना जादुई है?"रामनाथ जी हंस पड़े।"नहीं बेटी।""फिर सबके रिश्ते कैसे सुधर गए?"रामनाथ जी ने उसकी ओर प्यार से देखा।"जादू आईने में नहीं था, जादू उन लोगों में था जिन्होंने अपने दिल के अंदर झांकने की हिम्मत की।"सालों बाद जब रामनाथ जी इस दुनिया से विदा हो गए, तब वह पुराना आईना पायल को सौंप दिया गया।पायल ने उसे अपने कमरे में सजा लिया।जब भी परिवार में कोई नाराजगी होती, वह सभी को उस आईने के सामने ले जाती और कहती—"पहले अपना चेहरा मत देखो, अपना व्यवहार देखो।"धीरे-धीरे यह बात पूरे परिवार की परंपरा बन गई।संदेशरिश्ते कांच की तरह नाजुक होते हैं। उन्हें तोड़ना आसान है, लेकिन जोड़ना कठिन। जीवन में धन, संपत्ति, पद और प्रतिष्ठा सब मिल सकते हैं, लेकिन सच्चे रिश्ते बार-बार नहीं मिलते।जब भी किसी अपने से नाराज हों, तो एक बार दिल के आईने में जरूर झांकिए। हो सकता है वहां आपको उसकी गलतियां नहीं, उसके त्याग दिखाई दें।क्योंकि रिश्तों का असली आईना चेहरा नहीं, बल्कि दिल होता है।– विजय शर्मा ऐरी