Rebirth of a Bench - 2 Amardeep Kumar द्वारा हास्य कथाएं में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

Rebirth of a Bench - 2

टन-टन-टन-टन!

लंच ब्रेक की घंटी बजी और क्लास का माहौल ऐसे बदल गया जैसे किसी ने पिंजरे का दरवाज़ा खोल दिया हो। टीचर के बाहर कदम रखते ही क्लास में जो भूचाल आया, वो किसी भी आम भारतीय स्कूल या कॉलेज की सबसे 'रिलेटेबल' घटना है — और मैं गवाह हूँ इसका, क्योंकि मैं हिल नहीं सकता।

लड़कों का तो जैसे कोई उसूल ही नहीं होता। आधे से ज़्यादा लड़के तो टिफिन लाते ही नहीं हैं। वो बस बैग वहीं छोड़कर चीतों की तरह क्लास से बाहर भाग गए। कुछ ग्राउंड में घूमने निकल गए, कुछ 'वॉशरूम' के बहाने पूरे स्कूल का चक्कर लगाने, और कुछ दरवाज़े के पास झुंड बनाकर खड़े हो गए ताकि दूसरी क्लास की लड़कियों को देख सकें।

बाहर से गर्म हवा का एक तेज़ झोंका आया और खिड़की के पर्दे उड़ने लगे। उस हवा में रेत की महीन सी खुशबू थी — वो खुशबू और तपिश जो सिर्फ राजस्थान की दोपहर में होती है। खिड़की के बाहर दूर तक फैला मैदान, उस पर पड़ती तेज़ धूप, और गर्मी की लहरें जो हवा में नाचती दिख रही थीं...

एक मिनट... राजस्थान?

अरे, अब मैं समझा! ऊपर से किसी लड़के की copy पर लिखा था 'कोटा, राजस्थान' — बस, confirm हो गया। मैं यहाँ दो दिनों से हूँ और यह बात अब ध्यान में आई? लकड़ी का दिमाग हो जाए तो यही होता है।

राइटर साहब, आपने मुझे राजस्थान में क्यों भेजा? और कम से कम पहले chapter में ही बता देते — यहाँ की गर्मी का मुझे कोई एहसास नहीं होता, लेकिन audience को तो पता होना चाहिए था ना? खैर, देर आय दुरुस्त आय।

खैर, अब बात करते हैं मेरे ऊपर बैठी लड़कियों की।

इस वक़्त मेरे ऊपर तीन लड़कियाँ बैठी हैं। मेरे एकदम बायीं तरफ जो लड़की बैठी है, उसका नाम है — 'वीरेंद्र'।

हाँ, आपने सही सुना। एक लड़की, जिसका नाम वीरेंद्र है! शायद उसके घरवालों को लड़के की उम्मीद होगी और नाम पहले ही सोच लिया होगा, बाद में form भरते वक़्त नाम बदलने का आलस कर गए होंगे। वो थोड़ी tomboy टाइप की है — बाल छोटे कटे हुए, बैग पर cricket का sticker, और बात करने का अंदाज़ एकदम सीधा। जो मन में आया, बोल दिया।

और बाकी की दो लड़कियों का नाम... उम्म... मैं भूल गया। मुझे लगता है मेरे राइटर ने मुझे RAM और memory power बहुत कम दी है।

एक मिनट रुको... अगर मैं थोड़ा ज़ोर डालूँ अपने इस लकड़ी के दिमाग़ पर... हाँ, याद आया!

बीच में बैठी है गायत्री। चश्मा पहने, हमेशा किताब खुली रखने वाली, और जिसके चेहरे पर एक permanent 'मुझे distract मत करो' वाला expression है। उसने lunch box खोला, एक-एक bite ध्यान से खाई, और साथ में notes भी देखती रही। दोनों काम एक साथ। मुझे उस पर थोड़ा respect आया।

और सबसे दाईं तरफ बैठी है काव्या। नाम की तरह ही — थोड़ी poetic, थोड़ी dreamy। खिड़की के बाहर देखने की उसकी आदत है, जैसे बाहर कोई और दुनिया हो जो बाकियों को दिखती नहीं।

तीन बिल्कुल अलग किरदार। एक ही बेंच पर। कम से कम मेरी ज़िंदगी boring नहीं होगी।

लेकिन अगर आप मुझसे पूछें कि इस पूरी क्लास में सबसे ज़्यादा किसने मेरा ध्यान खींचा — तो वो मेरे ऊपर नहीं बैठी है। मेरी नज़रें तो सामने वाली बेंच पर टिक गई हैं।

वहाँ एक लड़की बैठी है। बहुत प्यारी — एकदम शांत, जैसे क्लास का शोर उस तक पहुँचता ही नहीं। उसने अपने बाल हल्के से बाँधे हुए हैं और खिड़की से बाहर देख रही है। आज उसने lunch नहीं लाया है। वो बस चुपचाप बैठी है। और ये बात मुझे बहुत गुस्सा दिला रही है कि क्लास के कुछ आवारा लड़के दूर से खड़े होकर उसे ही घूर रहे हैं।

अबे ओ छपरियों! घूरना बंद करो उसे! तुम्हें क्या लगता है किसी लड़की को ऐसे लगातार देखने पर उसे कितना अजीब और uncomfortable महसूस होता होगा? काश मेरे पास हाथ होते तो मैं अपना डस्टर उठाकर उनके सिर पर दे मारता। लेकिन मैं क्या कर सकता हूँ? मैं तो बस एक लाचार बेंच हूँ।

मैं क्लासरूम में हो रही इन सारी घटनाओं को देख रहा था। मेरे अंदर इंसानी भावनाएँ तो हैं, पर इंसान वाले neurons नहीं हैं जो मुझे कुछ physical 'action' करने पर मजबूर करें। मैं बस अपने ख्यालों में जी रहा हूँ।

मुझे अचानक अपनी 'इसेकाई' किस्मत पर रोना आ रहा था। अरे भाई, मैंने एक जापानी anime देखा था — 'Reborn as a Vending Machine'। उसमें एक लड़का वेंडिंग मशीन बन जाता है, फिर भी उसके पास जादुई ताकतें होती हैं और एक बहुत ही खूबसूरत लड़की उससे प्यार भी करने लगती है! एक लोहे के डिब्बे की किस्मत इतनी तेज़ हो सकती है, तो मैं तो फिर भी प्राकृतिक लकड़ी हूँ! 'Mushoku Tensei' वाले hero को देख लो — क्या मज़े हैं उसके!

और एक मैं हूँ...

नहीं, नहीं! सतोशी, अपने राइटर की बुराई मत कर। अगर वो नाराज़ हो गए तो मुझे किसी दीमक लगे store room में फेंक देंगे। राइटर साहब, आप बहुत अच्छा लिख रहे हो! मुझे कोई शिकायत नहीं है!

मैंने एक गहरी साँस ली और वापस उस प्यारी सी लड़की की तरफ देखा। तभी एक और लड़का, जो थोड़ा सीधा-साधा लग रहा था, झिझकता हुआ उस लड़की के पास गया और अपना टिफिन उसकी तरफ बढ़ा दिया।

लड़की ने पहले मना किया, फिर एक बार उस लड़के को देखा — उसकी आँखों में कोई चालाकी नहीं थी, बस एक सीधी सी चिंता। लड़की ने हल्की सी smile के साथ एक रोटी ले ली।

"थोड़ा और लो," लड़के ने धीरे से कहा।

"नहीं, बस यही काफी है। शुक्रिया," लड़की ने जवाब दिया।

*ओहो!* मेरे अंदर की लकड़ी रोमांचित हो उठी।



मैं समझ गया। मुझे यहाँ कोई जादुई दुनिया नहीं बचानी है। मैं तो यहाँ एक दर्शक बनने आया हूँ — इस क्लासरूम की हर छोटी-बड़ी कहानी का इकलौता खामोश गवाह। ये हाई स्कूल है मेरे दोस्त! यहाँ अगले दो सालों तक जो रोमांस, जो breakup, जो छुप-छुप कर बातें होंगी... मैं उन सबका इकलौता गवाह बनूँगा।

बाहर राजस्थान की दोपहर अपनी पूरी आग उगल रही थी, लेकिन इस तपती दोपहर के बीच इस क्लासरूम में जो छोटी-छोटी कहानियाँ चल रही थीं — वो किसी AC से ज़्यादा ताज़ी थीं।

"चलो, कम से कम कोई नई love story तो देखने को मिलेगी," मैंने मन ही मन मुस्कुराते हुए कहा।

ये नई क्लास, ये नए चेहरे... वीरेंद्र, गायत्री, काव्या, वो प्यारी लड़की, वो सीधा-साधा लड़का — और न जाने कितने और किरदार इस stage पर आने वाले हैं।

अगले दो साल बहुत ही मज़ेदार होने वाले हैं। मैं कोई आम बेंच नहीं हूँ — मैं इस क्लासरूम की हर love story का दर्शक, हर झगड़े का गवाह, और हर उस पल का कमेंटेटर हूँ जो किसी और को याद नहीं रहेगा।

"तैयार हो जाओ दुनिया वालों," मैंने खुद से कहा, "क्योंकि 'rebirth of a Bench ' अभी बस शुरू हुई है!"


                                 — ✦ —