शैतानी घाटी का सफर - 3 RAAHULL SHARMA द्वारा आध्यात्मिक कथा में हिंदी पीडीएफ

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शैतानी घाटी का सफर - 3

मैदान का छलावा


बस से उतरने और उस खौफनाक ढलान के बाद, जब सब दोस्त थोड़ा आगे बढ़ते हैं, तो उन्हें एक ऐसी जगह दिखती है जिसने उनकी सारी फ़िक्र मिटा दी। 

सामने एक बहुत बड़ा, साफ़-सुथरा खुला मैदान था। वहाँ ना तो कोई झाड़ी थी, ना ही कोई डरावने घने पेड़। चारों तरफ पहाड़ों की चोटियां थीं और बीच में ये मैदान किसी सुकून भरी जगह जैसा लग रहा था।


मेहुल: (खुश होकर) "अरे दोस्तों, देखो! हम तो खामखा डर रहे थे। ये जगह देखो कितनी सही है। यहाँ ना कोई झाड़ी है, ना कोई छिपने की जगह। बिल्कुल साफ़ मैदान है!"


सौरभ: "हाँ यार, मेहुल सही कह रहा है। वो बुड्ढा और वो लड़का शायद हमें डरा कर भगाना चाहते होंगे ताकि कोई इस सुंदर घाटी में ना आए। क्यों ना हम यहाँ अपना टेंट (कैंप) लगाएं?"



विनोद: "परफेक्ट! रात का खाने का इंतज़ाम करते हैं। मेरे पास थोड़ा पैक खाना है और हम यहाँ आग जला सकते हैं। आज की रात यही एडवेंचर करते हैं!"


राम: "सही है भाई। शाम हो चुकी है, सूरज ढल रहा है। अँधेरा होने से पहले टेंट लगा लेते हैं।"


सातों दोस्त—राम, विनोद, सृष्टि, अंशिका, सौरभ, मेहुल और मोनिका—मिलकर काम में लग गए। लड़कियों ने खाना निकालना शुरू किया, और लड़कों ने मिलकर टेंट गाड़ दिए। सब लोग हंसी-मज़ाक करने लगे, मानो पुरानी सारी डरावनी बातें एक बुरा सपना थीं।



सूरज ढल गया और आसमान में तारे निकल आए। मैदान के बीच में उन्होंने एक बड़ी सी आग (बोनफायर) जलायी। सब उसके चारों तरफ बैठ गए।


ठंडी हवा चल रही थी, और आग की रोशनी में सबके चेहरे चमक रहे थे।
अंशिका: "चलो, अब सब डर निकल गया। ये जगह तो बहुत पीसफुल है।"


तूफ़ान और पहली चीख


शाम ढल चुकी थी और घना अँधेरा शैतानी घाटी को अपनी लपेट में ले चुका था। मैदान के बीच में जलती हुई आग की लपटें दोस्तों के चेहरों पर नाच रही थीं। मेहुल ने कहा, "भाई, ये पनीर तो कमाल बना है! क्यों विनोद, डर के मारे भूख बढ़ गयी क्या?"



जैसे ही सब खाना खाने बैठते हैं, रात के उस सन्नाटे को चीरते हुए अचानक हवा का एक ऐसा भभका उठा जिसने सब कुछ तहस-नहस कर दिया। 


वो मैदान, जो अभी तक शांत लग रहा था, एक भयानक तूफ़ान की लपेट में आ गया। हवा इतनी तेज़ थी कि आँखें खोलना मुश्किल था।


"अपना हाथ पकड़ो! सब एक दूसरे का हाथ पकड़ो!" राम ज़ोर से चिल्लाया।


पर तूफ़ान के थप्पड़ों ने सबको तितर-बितर कर दिया। उनके टेंट्स, उनका सारा खाना और सामान कागज़ की तरह हवा में उड़ गया।

कुछ दिखाई नहीं दे रहा था, बस मिट्टी और सूखे पत्तों का एक बवंडर था जो उन्हें अंधा कर रहा था।


जैसे ही तूफ़ान थोड़ा थमा और धूल नीचे बैठी, सब लोग हांफते हुए एक दूसरे को ढूंढने लगे। 


सौरभ ने सबसे पहले गिनती की... और उसके पैरों तले ज़मीन निकल गयी।


सौरभ: (पागलों की तरह चिल्लाते हुए) "सृष्टि? सृष्टि कहाँ है? सृष्टि!"


सौरभ की प्रेमिका सृष्टि वहाँ नहीं थी। सबने टॉर्च जलायी, पर दूर-दूर तक सिर्फ खाली मैदान था।

सौरभ का गुस्सा और डर दोनों फट पड़े। उसने मेहुल का कॉलर पकड़ लिया, "मेहुल! तेरी वजह से हम यहाँ आए! तेरी घाटी, तेरा एडवेंचर... देख मेरी सृष्टि कहाँ गयी!"



मेहुल चुप था, उसकी आँखों में भी खौफ था। तभी, उस सन्नाटे को चीरते हुए एक दर्द-नाक चीख गूंजी: "सौरभ! बचाओ मुझे! ये... ये मुझे नीचे खींच कर ले जा रहा है! सौरभऽऽऽ!"


खाई का रहस्य और दोहरी सृष्टि


सौरभ बिल्कुल पागल हो चुका था। सृष्टि की आवाज़ उसने इतनी साफ़ सुनी थी कि उसे लग रहा था वो बस थोड़ी ही दूर है। वो मैदान से निकल कर उस गहरी खाई की तरफ भागा जहाँ अँधेरा इतना घना था कि नीचे का कुछ दिखाई नहीं दे रहा था।



सौरभ: "सृष्टि! मैं आ रहा हूँ! हिम्मत मत हारना!"
राम और मेहुल: "सौरभ रुक जा! पागल मत बन, नीचे मौत है!"


लेकिन सौरभ ने किसी की नहीं सुनी। वो पत्थरों को पकड़ते हुए नीचे जाने लगा। जैसे-जैसे सौरभ गहराई में जा रहा था, सृष्टि के रोने की आवाज़ और साफ़ होने लगी।


सृष्टि की आवाज़: "सौरभ... जल्दी आओ... यहाँ बहुत ठण्ड है... वो लोग मुझे मार डालेंगे... जल्दी नीचे आओ..."


तभी खाई के ऊपर खड़े विनोद ने अपनी टॉर्च की रोशनी एक तरफ घुमायी और उसकी चीख निकल गयी।


विनोद: "सौरभ! ऊपर आ! जल्दी ऊपर आ! वो सृष्टि की आवाज़ नहीं है!"


सौरभ: "क्या बकवास कर रहे हो? वो सृष्टि ही है!"
विनोद: "नहीं सौरभ! देखो वो क्या है!"


राम चिल्लाया: "सौरभ! उसका हाथ छोड़ो! वो सृष्टि नहीं है!"


अब सबकी आँखों के सामने एक खौफनाक नज़ारा था। मैदान में दो सृष्टि खड़ी थीं। एक राम के पास रो रही थी, और एक खाई के किनारे खड़ी सौरभ को नीचे गिरा रही थी!


माता रानी की चुनरी और बचाव


सौरभ मौत और ज़िंदगी के बीच लटका हुआ था। तभी उसे याद आया कि सफ़र शुरू करने से पहले सृष्टि की माँ ने उसके गले में माता रानी का एक छोटा सा लॉकेट पहनाया था। 


सौरभ ने अपनी टॉर्च की थोड़ी सी रोशनी ऊपर खड़ी सृष्टि पर मारी। उसने देखा कि जो सृष्टि राम के पास खड़ी रो रही थी, उसके गले में वो लॉकेट चमक रहा था!


वही असली सृष्टि थी! और जो खाई के किनारे खड़ी उसे धक्का दे रही थी, वो सिर्फ एक शैतानी परछाई थी।


लेकिन तभी, नीचे से उन काले हाथों ने इतनी ज़ोर से झटका दिया कि सौरभ की पकड़ छूटने लगी।
सौरभ: "राम! बचाओ! मैं गिर रहा हूँ!"



राम ने तुरंत बैग से माता रानी की लाल चुनरी निकाली और "जय माता दी!" चिल्लाते हुए उसे खाई में सौरभ की तरफ फेंक दिया। जैसे ही वो पवित्र चुनरी हवा में लहरायी, खाई के अँधेरे से एक भयानक चीख आयी। वो काले हाथ जो सौरभ के पैर जकड़े हुए थे, वो जलने लगे।


सौरभ ने हवा में ही उस चुनरी को पकड़ लिया और दोस्तों ने मिलकर उसे ऊपर खींच लिया। असली सृष्टि भागते हुए आयी और उससे लिपट कर रोने लगी। लेकिन खुशी ज़्यादा देर तक नहीं रही।


कालू और बस का अंत


अभी दोस्तों ने चैन की सांस ली ही थी कि अचानक पुरानी मिनी बस का इंजन गूंज उठा। बस की हेडलाइट्स किसी शैतान की आँखों की तरह जलीं। 

क्या दोस्तों को उस बस की तरफ भागकर उसमें बैठने की कोशिश करनी चाहिए, या फिर बस से दूर भागकर जंगलों और पहाड़ों के बीच छिपना ज़्यादा सुरक्षित होगा?