आख़िरी वारिस की गवाही Wajid Husain द्वारा प्रेरक कथा में हिंदी पीडीएफ

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आख़िरी वारिस की गवाही

वाजिद हुसैन सिद्दीक़ी की कहानी।  

पश्चिमी उत्तर प्रदेश की बस्तियों में कब्रिस्तान अक्सर गांव से बाहर नहीं होते, बस्ती के आख़िरी छोर पर, जहां आबादी ख़त्म होती थी और ख़ामोशी शुरू। बियाबानी का कब्रिस्तान भी ऐसा ही था। वहां की कई कब्रों पर अब नाम नहीं बचे, बस मिट्टी के उभार हैं, जिन पर घास उग आई है। समय धीरे-धीरे उन्हें बराबर करता जा रहा है। मैं वहां एक मैयत के साथ गया था। दोपहर ढल रही थी। कुछ लोग क़ब्र खोद रहे थे, कुछ फातिहा पढ़ रहे थे। लोग दफनाने की तैयारी में लगे थे। मैं यूं ही क़ब्रों के बीच टहलने लगा। तभी मेरी नज़र एक अलग सी क़ब्र पर जाकर टिक गई, जो बाकी क़ब्रों के बीच वैसी लग रही थी जैसे फटे कपड़ों की भीड़ में कोई पुराना नवाबी अचकन। 

यह लंबी चौड़ी थी। पक्की बनी हुई, मगर जगह-जगह से  चूने की परत झड़ चुकी थी। सिरहाने की दीवार पर उर्दू में कुछ लिखा था, जिसे बारिश और वक्त मिलकर लगभग मिटा चुके थे। 

पास ही एक बूढ़ा आदमी तस्बीह फेर रहा था। मैंने उससे पूछा-"मियां, यह इतनी बड़ी क़ब्र किसकी है?"

बूढ़े ने पहले क़ब्र को देखा, फिर मुझे। उसकी आंखों में राख के नीचे दबी चिंगारी सी चमक उठी। 

"साहब, यह करामत खां की कब्र है।"

नाम सुनकर लगा जैसे कहीं सुना हो। मैंने पूछा-"कौन थे करामत खां?" 

 बूढ़े ने धीरे से तस्बीह समेटी और बोला- "एक ज़माना था जब इस इलाके में उन्ही का राज था। यहां से मेन रोड तक जितनी ज़मीन दिखती है-सब उनकी। जंगल भी, खेत भी, तालाब भी।"

उसकी आवाज़ में बीते समय की धुंध तैर रही थी। "अंग्रेज़ों के ज़माने में जंगल के भीतर उनकी बड़ी स्लीपर फैक्ट्री थी। लकड़ी ढोने के लिए अपनी मालगाड़ी चलती थी। पेड़ जंगल से कटकर आते, फैक्ट्री में स्लीपर बनते फिर रेलवे स्टेशन भेजे जाते।"

मैं चुपचाप सुनता रहा।

"खां साहब शिकार के बड़े शौकीन थे,"बूढ़ा बोला,"और दौलत दिखाने के भी। लेकिन दिल के बुरे आदमी नहीं थे।"

"फिर क्या हुआ?" मैंने पूछा। 

बूढ़ा थोड़ा पास खिसक आया। 

"फिर उनकी ज़िंदगी में आया संपत सहाय।"

"कौन?"

"उनका मुनीम।"

वह हल्का सा मुस्कुराया। 

"घिसी चप्पलें, आंखों पर सींग का चश्मा, और चेहरे पर ऐसी मासूमियत जैसे दुनिया का सबसे सीधा आदमी हो। मगर दिमाग... उस्तरे की धार।"

बूढ़े ने एक छोटा- सा किस्सा सुनाया- "खां साहब की छोटी बेटी थी। उसके पास एक गुड़िया थी- नाम था जमालो। वह उसे सोने के गहने पहनाती, मखमल के कपड़े पहनाती। एक दिन उसके चचेरे भाई राजा ने अपने गुड्डे से जमालो की शादी कर दी। खां साहब ने सचमुच की शादी की तरह दावत दी और दहेज़ दिया। बस निकाह पढ़ना रह गया था।"

मैं मुस्कुरा पड़ा। 

"मगर असली तमाशा विदाई के वक्त हुआ," बूढ़ा बोला। 

" जमालो को ससुराल भेजने पर लड़की रोने लगी और राजा अपना गुड्डा घर- जमाई न बनाने पर अड़ गया। दोनों ऐसे लड़ रहे थे जैसे सचमुच ख़ानदान की इज़्ज़त दांव पर लगी हो। बड़े- बूढ़े समझाते रहे, मगर कोई नहीं माना।"

"फिर क्या हुआ?"

तभी संपत कहीं से तीन पहियों वाली साइकिल उठा लाया। उसने राजा से कहा- "अगर तुम अपना गुड्डा जमालो के घर भेज दोगे तो यह साइकिल तुम्हारी।" राजा मान गया।

मैं हंस पड़ा। 

"बस साहब, शादी हंसी-खुशी पूरी हो गई।"

उस दिन खां साहब ने समझ लिया कि यह आदमी मुश्किल वक्त ख़रीदना जानता है। इतने ख़ुश हुए कि उन्होंने उसे मुनीम से सीधे मैनेजर बना दिया।

वहीं से कहानी का रुख बदल गया।

 मैनेजर बनने के बाद फैक्ट्री और जंगल का पूरा हिसाब-किताब संपत के हाथ में आ गया। उधर खां साहब का मन अब शिकार और महफिलों में ज़्यादा लगने लगा। 

कुछ ही दिनों में संपत ने अंग्रेज़ अफसर चीफ कंज़र्वेटर विल्सन से दोस्ती कर ली। हर छुट्टी के दिन जंगल के भीतर शिकार होता। रात को शराब, कवाब, और तवायफों की महफिल सजती। धीरे-धीरे विल्सन संपत का मुरीद हो गया। 

"जंगल कटते गए,"बूढ़े ने कहा,"और पैसे की बारिश होती रही।

मैंने पूछा-"खां साहब को पता नहीं चला?"

"आख़िरकार चल गया।"

उन्होंने संपत को बुलाकर डांटा- "यह सब बंद करो। जंगल बाप-दादा की अमानत है।"

संपत सिर झुकाकर खड़ा रहा। वह उन लोगों में था जो माफी भी इस अंदाज़ में मांगते हैं कि सामने वाला ख़ुद को गुनहगार समझने लगे।

 मगर खेल बंद नहीं हुआ। 

कुछ साल बाद लगातार ऐय्याशी से विल्सन को भयंकर बीमारी लग गई। इलाज के लिए उसे इंग्लैंड जाना था, मगर जेब खाली थी। 

उसने खां साहब से पांच हज़ार रुपए मांगे। उस ज़माने में पांच हजार रुपए छोटे जमींदार की पूरी उम्र होती थी।

 खां साहब ने सलाह के लिए संपत को बुलाया।

संपत बोला-"साहब, यह आदमी बचेगा नहीं। आपका रुपया मिट्टी में मिल जाएगा।"

खां साहब ने रुपए देने से मना कर दिया। 

उसी रात संपत विल्सन के बंगले पर पहुंचा। उसने एक पोटली उसके हाथ में रख दी। "हुज़ूर," उसने कहा, "घर बिक जाए तो दूसरा बन जाता है... मगर आदमी नहीं।" 

विल्सन की आंखें भर आईं। 

"यू आर अ ट्रू फ्रेंड," उसने कहा।

वह इलाज के लिए इंग्लैंड चला गया।

 कुछ महीनों बाद जब लौटा तो कहानी का रूख़ बदल चुका था। 

करामत खां उससे मिलने पहुंचे। मगर उन्हें देखते ही वह चीख़ा - "गेट आउट!"

सिपाहियों ने उन्हें धक्के देकर बाहर निकाल दिया। 

सारे जंगलों के ठेके उसने संपत सहाय के नाम कर दिए। उस रात पहली बार करामत खां को समझ आया कि आदमी जब गिरता है तो पहले उसकी ज़मीन जाती है, फिर इज़्ज़त। उसी रात उन्हें दिल का दौरा पड़ा। और अगले दिन इसी कब्रिस्तान में दफना दिए गए।

बूढ़ा चुप हो गया।

हवा में सूखी घास कांप रही थी।

 कुछ देर हम दोनों उस बड़ी कब्र को देखते रहे। मैंने पूछा- "संपत सहाय का क्या हुआ?"

उसने दूर सड़क के पार खड़ी एक भव्य कोठी की ओर इशारा किया। 

"वह देख रहे हैं साहब... मिल वालों की कोठी?"

"हां।"

"वही उसके नाती-पोतों की है।"

मैंने फिर पूछा- "और करामत खां का कोई वारिस?"

बूढ़े की आंखें भर आईं।

"हां साहब... एक आख़िरी वारिस है।"

"कहां है?"

बूढ़े ने कांपते हाथों से अपनी छाती पर हाथ रखा। 

"आपके सामने खड़ा है..."

उसकी आवाज़ टूट रही थी। 

"मैं... करामत खान का पड़पौता हूं..."

इतना कहकर वह अचानक ज़मीन पर गिर पड़ा। लोग दौड़ कर आ गए। किसी ने पानी छिड़का, किसी ने नब्ज़ टटोली। लेकिन सब बेकार था। 

किसी ने मुझसे पूछा- "यह कौन था?"

मैंने पक्की कब्र की तरफ इशारा किया-"इनका आख़िरी वारिस।"

शाम तक हमने मिलकर उसे उसी कब्र के पास दफना दिया। 

मिट्टी बराबर करते समय कब्र खोदने वाले का फावड़ा किसी पत्थर से टकराया। 

मिट्टी हटाई गई तो एक टूटी हुई संगमरमर की पट्टिका निकली। उस पर धुंधले अक्षरों में लिखा था-"यह ज़मीन करामत खां के ख़ानदान के नाम वक्फ है।"

भीड़ में खड़े एक अधेड़ आदमी ने पट्टिका हाथ में लेकर गौर से पढ़ी। वह अब तक चुप था। फिर धीमे से बोला-"अरे... यह तो वक्फ की जमीन है।"

लोग उसकी तरफ देखने लगे।

मैं देर तक उस पत्थर को देखता रहा।

उसने बताया कि वह ज़िला वक्फ बोर्ड में वकील है। उसकी नज़र दूर खड़ी हुई कोठी पर टिक गई।

"अगर यह पट्टिका असली है, "उसने कहा, "तो यह कोठी गैर क़ानूनी क़ब्ज़े में है।"

कुछ पल के लिए वहां अजीब सी खामोशी छा गई। 

मैंने पीछे मुड़कर उस नई क़ब्र को देखा। मिट्टी अभी गीली थी। 

मुझे लगा-शायद करामत खां का आख़िरी वारिस अपनी विरासत वापस लेने नहीं, सिर्फ उसकी गवाही देने आया था। 

क़रीब तीन साल बाद में फिर उस सड़क से गुज़रा। दूर से वही पुरानी कोठी दिखाई दी, मगर अब उसके बाहर एक नया बोर्ड लगा था-"करामत खां चैरिटेबल हॉस्पिटल"

बरामदे में ग़रीब मरीज़ बैठे थे। भीतर से फिनाइल और दवाइयों की मिली-जुली गंध आ रही थी। 

मैं सड़क किनारे खड़ा बहुत देर तक उस इमारत को देखता रहा।

अचानक मेरी नज़र अस्पताल के पीछे पड़े पुराने कब्रिस्तान पर गई। 

"अगला मरीज़ अंदर भेजिए।"

और उसी क्षण मुझे लगा-शायद इतिहास इंसाफ नहीं करता। वह सिर्फ इंतज़ार करता है। 

इतना लंबा इंतज़ार कि एक दिन लूटी हुई ज़मीन पर महल नहीं, अस्पताल खड़े होने लगते हैं। और तब कब्रों में सोए लोग पहली बार सचमुच चैन से सोते होंगे।

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