अधूरी किताब: एक रूहानी दास्तान। - एपिसोड 15 kajal jha द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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अधूरी किताब: एक रूहानी दास्तान। - एपिसोड 15

अधूरी किताब: एक रूहानी दास्तान

एपिसोड 15: जब लेखक कहानी बन गया

स्टेशन के टूटे हुए शीशों में सिर्फ एक चेहरा दिखाई दे रहा था—

अनन्या का।

लेकिन वो अनन्या नहीं थी।

उसकी आँखें पूरी काली थीं।

होंठों पर धीमी मुस्कान।

और चेहरे पर वही ठंडी शांति… जो हर उस आत्मा में थी, जिसे अनन्या अब तक मुक्त करती आई थी।

पूरा प्लेटफॉर्म बर्फ जैसा ठंडा हो चुका था।

रागिनी पीछे हट गई।

उसकी आवाज़ काँप रही थी—

“नहीं…”

“इसका मतलब ये नहीं हो सकता…”

अनन्या शीशों को घूरती रह गई।

उसका दिल इतनी तेजी से धड़क रहा था, कि उसे खुद अपनी साँसें सुनाई दे रही थीं।

“ये… मैं नहीं हूँ…”

उसने खुद से कहा।

लेकिन तभी— टूटे हुए शीशों में मौजूद वो दूसरी अनन्या मुस्कुराई।

और उसके होंठ धीरे-धीरे हिले—

“हर कहानी की कीमत होती है…”

अनन्या का खून जम गया।

अचानक—

स्टेशन की सारी लाइट बुझ गईं।

पूरा प्लेटफॉर्म अंधेरे में डूब गया।

और उसी अंधेरे में— हजारों फुसफुसाहटें गूँजने लगीं।

“लेखक…”

“नई लेखक…”

“अब तुम्हारी बारी…”

अनन्या ने अपने कान बंद कर लिए।

“चुप हो जाओ!”

लेकिन आवाज़ें और तेज होती गईं।

उसकी कॉपी जमीन पर गिर गई।

और उसके सारे पन्ने अपने आप खुलने लगे।

उनमें लिखी हर कहानी चमक रही थी।

माया। इशान। वसुंधरा। रागिनी।

सभी नाम धीरे-धीरे काले पड़ने लगे।

और आखिरी पन्ने पर नया शब्द उभरा—

“अनन्या”

उसकी साँस रुक गई।

“नहीं…”

तभी—

कंडक्टर अचानक उसके सामने आ गया।

लेकिन अब उसका चेहरा पूरी तरह इंसानी हो चुका था।

थका हुआ।

दर्द से भरा।

उसने काँपती आवाज़ में कहा—

“भागो यहाँ से…”

अनन्या ने उसकी तरफ देखा।

“क्या हो रहा है?”

कंडक्टर की आँखों में डर उतर आया।

“ट्रेन नया संरक्षक चुन रही है।”

पूरा स्टेशन काँप उठा।

दूर खड़ी काली ट्रेन धीरे-धीरे फिर से धुआँ छोड़ने लगी।

उसकी खिड़कियाँ अपने आप खुल गईं।

और अंदर बैठे सारे यात्री एक साथ खड़े हो गए।

उनकी आँखें अब खाली नहीं थीं।

वे बस… अनन्या को देख रहे थे।

जैसे उसका इंतज़ार कर रहे हों।

रागिनी काँप उठी।

“अगर ट्रेन ने इसे चुन लिया… तो इसकी आत्मा हमेशा के लिए इसी यात्रा में फँस जाएगी।”

अनन्या का गला सूख गया।

“लेकिन क्यों मैं?”

कंडक्टर दर्द से मुस्कुराया।

“क्योंकि तुम सुनती हो।”

“और ये ट्रेन हमेशा ऐसे इंसान को चुनती है… जो दूसरों के दर्द को खुद से ज्यादा महसूस करे।”

अनन्या की आँखें भर आईं।

तभी—

उसके दिमाग में अचानक कई आवाज़ें गूँजने लगीं।

चीखें। रोना। फुसफुसाहटें।

हजारों अधूरी कहानियाँ।

इतना दर्द… कि उसका सिर फटने लगा।

वो घुटनों पर गिर पड़ी।

“आह्ह…”

कॉपी के पन्ने हवा में उड़ने लगे।

और हर पन्ने पर अलग कहानी उभर रही थी।

किसी माँ की। किसी बच्चे की। किसी प्रेमी की।

सब एक ही बात कह रहे थे—

“हमें मत छोड़ो…”

अनन्या रो पड़ी।

क्योंकि अब वो सिर्फ सुन नहीं रही थी।

वो सब महसूस कर रही थी।

उनकी मौत। उनका अकेलापन। उनका डर।

और तभी— उसके सामने माया दिखाई दी।

शांत।

हल्की मुस्कान के साथ।

“डरो मत…”

अनन्या की आँखें फैल गईं।

“माया…”

माया धीरे-धीरे उसके पास आई।

“याद है तुमने क्या कहा था?”

“कहानियों का अंत बदला जा सकता है।”

अनन्या की आँखों से आँसू बह निकले।

“लेकिन मैं ये सब रोक नहीं पा रही…”

माया ने उसके सिर पर हाथ रखा।

और उसी पल— सारी आवाज़ें कुछ सेकंड के लिए शांत हो गईं।

“तुम उन्हें खत्म करने नहीं आई हो…”

उसने धीरे से कहा।

“तुम उन्हें रास्ता दिखाने आई हो।”

तभी इशान भी दिखाई दिया।

उसकी आँखों में वही सुकून था।

“हर आत्मा को बस एक चीज़ चाहिए होती है…”

“कोई जो उसे समझ सके।”

अनन्या काँपती आवाज़ में बोली—

“लेकिन मैं हमेशा ये नहीं कर सकती…”

इशान हल्का मुस्कुराया।

“कोई भी अकेले नहीं कर सकता।”

अचानक— उनके पीछे हजारों आत्माएँ दिखाई देने लगीं।

वसुंधरा। रिया। ट्रेन के यात्री।

सभी शांत खड़े थे।

और पहली बार— उनकी आँखों में डर नहीं था।

बस उम्मीद।

अनन्या धीरे-धीरे समझने लगी।

ये ट्रेन श्राप नहीं थी।

ये उन कहानियों का घर थी, जो भुला दी गई थीं।

और जब तक कोई उन्हें सुनता रहेगा— वे अंधेरा नहीं बनेंगी।

तभी काली ट्रेन ने लंबी सीटी दी।

फूँऊऊऊ…

पूरा स्टेशन काँप उठा।

कंडक्टर अचानक दर्द से चिल्लाया।

उसका शरीर धुएँ में बदलने लगा।

“जल्दी करो!”

“ट्रेन नया संरक्षक चुन रही है!”

अनन्या घबरा गई।

“मैं क्या करूँ?!”

कंडक्टर ने काँपते हाथ से उसकी कॉपी की ओर इशारा किया।

“नई कहानी लिखो…”

“ऐसी कहानी… जिसमें अंत डर नहीं, उम्मीद हो।”

अनन्या का दिल तेजी से धड़कने लगा।

उसने धीरे-धीरे कॉपी उठाई।

उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं।

लेकिन जैसे ही उसने कलम पकड़ी—

पूरा स्टेशन शांत हो गया।

सभी आत्माएँ उसकी तरफ देखने लगीं।

और अनन्या ने लिखना शुरू किया—

“जो लोग खो गए थे… वे खत्म नहीं हुए।”

“वे सिर्फ इंतज़ार कर रहे थे— किसी ऐसे इंसान का, जो उन्हें डर की तरह नहीं… याद की तरह देखे।”

जैसे-जैसे वो लिखती गई—

ट्रेन की काली दीवारें सफेद होने लगीं।

खिड़कियों का अंधेरा मिटने लगा।

आत्माओं के चेहरे शांत हो गए।

रागिनी रो पड़ी।

“ये… उन्हें मुक्त कर रही है…”

अनन्या लिखती रही।

“और उस रात— मृत यात्रियों ने जाना, कि हर अधूरी कहानी का अंत मौत नहीं होता…”

“कभी-कभी… कोई बस उन्हें सुन ले, तो वो पूरी हो जाती है।”

अचानक—

पूरी ट्रेन तेज रोशनी में डूब गई।

इतनी तेज, कि पूरा स्टेशन चमक उठा।

आत्माएँ धीरे-धीरे हवा में घुलने लगीं।

मुस्कुराते हुए।

शांत।

मुक्त।

कंडक्टर ने आखिरी बार अनन्या की तरफ देखा।

और उसकी आँखों में पहली बार सुकून था।

“धन्यवाद…”

अगले ही पल— उसका शरीर रोशनी में बिखर गया।

और फिर…

सब खत्म हो गया।

ना ट्रेन। ना अंधेरा।

सिर्फ खाली प्लेटफॉर्म।

और सुबह की हल्की धूप।

अनन्या धीरे-धीरे खड़ी हुई।

उसकी कॉपी अब पूरी सफेद थी।

सिर्फ आखिरी लाइन बची थी—

“कुछ कहानियाँ खत्म नहीं होतीं…

वे बस किसी और दिल में जगह बना लेती हैं।”

बाहर पहली ट्रेन की सीटी सुनाई दी।

जिंदगी फिर चल पड़ी थी।

लेकिन इस बार…

अनन्या मुस्कुरा रही थी।