मेरा पूरा शरीर डर के मारे कांपने लगा था। मेरे माथे से पसीने की बूंदें टपक रही थीं। मैंने बहुत डरते-डरते अपने हाथ में पकड़ी टॉर्च की कमजोर पड़ रही रोशनी को ऊपर छत की तरफ घुमाया। जो कुछ उस रोशनी के घेरे में दिखा, उसे देखकर मेरी चीख मेरे गले में ही घुट कर रह गई। मेरे मुंह से आवाज़ तक नहीं निकली। छत पर लगे एक लोहे के हुक से रोहित का शव लटका हुआ था। उसकी गर्दन पूरी तरह से मुड़ी हुई थी, उसकी आँखें बाहर को निकली हुई थीं और उसकी छाती पर गहरे नाखूनों के निशान थे जहाँ से खून नीचे टपक रहा था। मेरा दिमाग पूरी तरह सुन्न हो गया। अगर रोहित की लाश ऊपर लटकी थी, तो जो रोहित हमारे साथ भागकर इस कमरे में आया था और जिसने अलमारी हटाने में मेरी मदद की थी... वो कौन था?मैंने झटके से अपनी ठीक बगल में बैठे रोहित की तरफ टॉर्च घुमाई। वह हमारी तरफ ही देख रहा था, लेकिन उसके चेहरे पर कोई डर या घबराहट नहीं थी। वह बहुत ही डरावने और अजीब तरीके से मुस्कुरा रहा था। उसकी मुस्कान इतनी चौड़ी थी कि उसके होंठ फटने लगे थे। धीरे-धीरे उसकी त्वचा काली पड़ने लगी, उसके चेहरे का मांस पिघलकर नीचे गिरने लगा और उसकी आँखें उसी शापित कुएं की चुड़ैल की तरह लाल अंगारे में बदल गईं। वह रोहित नहीं था, बल्कि उसी शापित कुएं की चुड़ैल का रूप था जो हमारे साथ ही रोहित का भेष बदलकर कमरे के अंदर आ चुकी थी। उसने हमें अपने जाल में फंसा लिया था।"तुम सब मेरे कुएं की प्यास बुझाओगे... यहाँ से कोई ज़िंदा नहीं बचेगा..." उसने एक ऐसी भारी और गूँजती हुई आवाज़ में कहा जो एक साथ कई औरतों और मर्दों की मिली-जुली आवाज़ जैसी लग रही थी। कमरे की दीवारें उसकी आवाज़ से कांपने लगी थीं। इससे पहले कि मैं या लड़कियां कुछ समझ पातीं या भागने की कोशिश करतीं, उसने अपने लंबे, सड़े हुए हाथ बढ़ाए और एक ही झटके में अंजलि और स्नेहा के सिरों को आपस में इतनी ज़ोर से टकराया कि उनकी खोपड़ी टूटने की आवाज़ आई। दोनों लड़कियां बिना एक भी चीख निकाले, बिना तड़पे वहीं जमीन पर बेजान होकर ढेर हो गईं। उनके सिर से खून का फव्वारा फूट पड़ा।अब उस बंद, अंधेरे कमरे में सिर्फ मैं अकेला जिंदा बचा था। मौत मेरे बिल्कुल सामने खड़ी थी और अपनी जीत पर भयानक तरीके से हंस रही थी। उसने एक हाथ से मेरी गर्दन पकड़ी और मुझे हवा में उठा दिया। मेरा दम घुट रहा था, फेफड़ों में हवा खत्म हो रही थी और आँखों के सामने धीरे-धीरे अंधेरा छा रहा था। उसने अपने सड़े हुए खूनी चेहरे को मेरे चेहरे के बिल्कुल करीब लाया। उसकी सांसों से हफ्तों पुराने मरे हुए जानवरों जैसी भयंकर बदबू आ रही थी, जिससे मुझे उल्टी आने लगी। उसने अपनी लंबी, काली जीभ मेरे गाल पर फेरी और गंदी हंसी हंसते हुए कहा, "जा... तुझे मैं जिंदा छोड़ती हूँ। शहर जा और दुनिया को बता कि 'काला खोह' के कुएं में जो आता है, उसका क्या हश्र होता है। लेकिन याद रखना, मेरा यह साया अब हमेशा तेरे साथ रहेगा। तू कभी अकेला नहीं होगा।"उसने मुझे पूरी ताकत से जमीन पर पटका और मेरा सिर कमरे की पक्की दीवार से जा टकराया। असहनीय दर्द के साथ ही मेरी आँखों के सामने पूरी तरह अंधेरा छा गया और मैं बेहोश हो गया। जब अगली सुबह मेरी आंख खुली, तो कमरे की टूटी हुई खिड़की से तेज धूप अंदर आ रही थी। चिड़ियों के चहकने की आवाज़ आ रही थी, लेकिन मेरे आस-पास का नज़ारा किसी नरक जैसा था। मैं उस वीरान स्कूल के कमरे में अपने दोस्तों की लाशों के बीच अकेला पड़ा था। पुलिस ने बाद में नितिन, स्नेहा, अंजलि और रोहित की लाशें उस शापित कुएं से निकालीं। मैं कानूनी तौर पर और शारीरिक रूप से तो बच गया, लेकिन मानसिक रूप से कभी नहीं बच पाया। आज भी जब रात के ठीक बारह बजते हैं, तो मुझे अपने कमरे के अंधेरे कोने में दो लाल आंखें चमकती हुई दिखाई देती हैं और कानों में वही मां जैसी आवाज गूंजती है... "बेटा... नीचे आओ..."