हम चारों हांफते हुए झटके से कार के अंदर घुसे और सारे दरवाजे अंदर से लॉक कर दिए। रोहित के हाथ इस कदर कांप रहे थे कि वह कार की चाबी को की-होल में नहीं डाल पा रहा था। चाबी बार-बार उसके हाथ से छूटकर नीचे गिर रही थी। "स्टार्ट कर रोहित! जल्दी कर, वो आ रही है!" मैंने पीछे की खिड़की से देखते हुए चिल्लाया। खिड़की के बाहर, दूर अंधेरे में, वह सात फीट लंबा साया बहुत तेजी से हवा में तैरता हुआ हमारी कार की तरफ ही बढ़ रहा था। उसकी लाल आंखें अंधेरे में दो जलते हुए अंगारों की तरह चमक रही थीं। उसकी रफ्तार इतनी तेज़ थी कि ऐसा लग रहा था मानो वह हवा को चीरते हुए आ रही हो।रोहित ने आखिरकार कांपते हाथों से चाबी घुमाई, लेकिन इंजन ने बस एक अजीब सी गड़गड़ाहट की और बंद हो गया। गाड़ी स्टार्ट ही नहीं हो रही थी। रोहित ने पागलों की तरह एक्सीलेटर पर पैर मारना शुरू किया, लेकिन कार का इंजन पूरी तरह से बेजान हो चुका था। उसी समय, कार की हेडलाइट्स और अंदर की केबिन लाइट अपने आप जलने और बुझने लगीं। कार का रेडियो, जो बंद था, अचानक पूरी आवाज़ में चालू हो गया और उसमें से किसी बूढ़ी औरत के रोने और हंसने की मिली-जुली भयानक आवाज़ आने लगी। अंजलि ने डर के मारे अपनी आँखें बंद कर लीं और रोहित का हाथ कसकर पकड़ लिया।अचानक कार की छत पर एक बहुत जोर का धमाका हुआ—धड़ाम! ऐसा लगा जैसे ऊपर कोई भारी वजनी चीज या कोई बड़ा पत्थर कूदा हो। कार की लोहे की छत अंदर की तरफ धंस गई और ठीक स्नेहा के सिर के ऊपर आकर टिक गई। स्नेहा और अंजलि डर के मारे सीट के नीचे छिप गईं और ज़ोर-ज़ोर से रोने लगीं। डर का माहौल इतना गहरा था कि हमें अपनी ही सांसों की आवाज़ें चीखों जैसी लग रही थीं। तभी कार के सामने वाले बड़े शीशे (विंडस्क्रीन) पर ऊपर से एक चेहरा नीचे की तरफ लटका। वह चेहरा भयानक रूप से सड़ा हुआ था, उसकी चमड़ी गल चुकी थी, उसकी जीभ बाहर निकली हुई थी और वह हमें देखकर अपने नुकीले, पीले दांत निकाल कर हिंसक तरीके से हंस रही थी।उसने अपने लंबे और कड़े नाखूनों से कार के शीशे पर प्रहार करना शुरू किया। जब भी उसके नाखून शीशे पर लगते, एक रूह कंपा देने वाली आवाज़ पैदा होती। शीशे पर मकड़ी के जाले की तरह दरारें पड़ने लगीं। "बाहर निकलो! यह कार अब हमारे लिए कब्र बन जाएगी!" मैंने चिल्लाया। हमने बिना सोचे-समझे झटके से कार के दरवाजे खोले और बाहर की तरफ भागे। कार से निकलते ही हमें महसूस हुआ कि हवा पूरी तरह से ठंडी हो चुकी थी, जैसे हम किसी बर्फ के कमरे में आ गए हों।कार के ठीक सामने ही गांव का एक पुराना, जर्जर सरकारी स्कूल का कमरा था। हमारी हिम्मत खुले में भागने की बिल्कुल नहीं थी, क्योंकि वह साया हवा में कहीं भी आ-जा सकता था। इसलिए हम सब उस कमरे के अंदर घुस गए। रोहित और मैंने मिलकर उस भारी लकड़ी के दरवाजे को बंद किया और कमरे में पड़ी एक पुरानी, भारी लोहे की अलमारी को घसीटकर दरवाजे के पीछे अड़ा दिया ताकि कोई उसे बाहर से धक्का देकर न खोल सके। कमरे के अंदर घोर, दम घोंटू अंधेरा था। धूल और जालों की वजह से सांस लेना मुश्किल हो रहा था। हम चारों एक कोने में एक-दूसरे से सटकर दुबक कर बैठ गए और अपनी सांसें पूरी तरह रोक लीं। बाहर से हमारी कार के शीशे पूरी तरह टूटने की भयानक आवाज़ आई, और फिर अचानक सब कुछ बिल्कुल शांत हो गया। वह सन्नाटा पहले के शोर से भी ज्यादा डरावना था क्योंकि हमें नहीं पता था कि वह चुड़ैल बाहर है या हमारे आस-पास ही कहीं छिपी है। तभी कमरे की छत से मेरे हाथ पर कुछ टपका। मैंने सोचा बारिश का पानी होगा, लेकिन जब मैंने अपनी उँगलियों से उसे छुआ, तो वह गाढ़ा, गर्म और चिपचिपा था। उसमें से ताज़े लोहे जैसी गंध आ रही थी... वह पानी नहीं, बल्कि किसी का ताज़ा खून था जो ऊपर से गिर रहा था।