ऋगुवेद सूक्ति-- (१३) की व्याख्या अधाम इन्द्र श्रणवो हवेमा — ऋग्वेद ७/२९/३भावार्थ --हे प्रभो ! हमारी पुकार को सुनो।पदच्छेद--अधाम । इन्द्र । श्रणवः । हवेमा ॥शब्दार्थअधाम — हम नीचे (विनीत भाव से), या संकटग्रस्त अवस्था मेंइन्द्र — परम शक्तिमान, ऐश्वर्ययुक्त प्रभुश्रणवः — सुनें, श्रवण करेंहवेमा — हम आह्वान करें, पुकारेंभावार्थ--हे इन्द्र! हम विनम्र भाव से आपका आह्वान करते हैं; आप हमारी पुकार सुनें।कारुणिक भाव--यह मंत्र उपासक की विनयपूर्ण प्रार्थना को व्यक्त करता है। जब साधक स्वयं को असहाय, दुर्बल या संकटग्रस्त अनुभव करता है, तब वह परम शक्तिशाली ईश्वर को पुकारता है। यहाँ “अधाम” से दीनता और समर्पण का भाव प्रकट होता है।यहाँ इन्द्र शब्द परमात्मा के लिए प्रयोग किया गया है। अर्थात् जब मनुष्य नम्र होकर ईश्वर का स्मरण करता है, तब उसकी प्रार्थना अवश्य सुनी जाती है।ऋग्वैदिक भाव — “हे प्रभो! हमारी पुकार सुनो”इसके समर्थन में वेदों में प्रमाण-- ऋग्वेद 7.29.3अधाम इन्द्र शृणवो हवेमा ॥भावार्थ — हे प्रभो! अब तो हमारी प्रार्थना सुन लो।ऋग्वेद 8.61.7शृणुहि गिरो मघवन् मातथेव ॥भावार्थ — हे प्रभु! हमारी वाणी सुनो, जैसे माता पुत्र की सुनती है।ऋग्वेद 1.189.1अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् ॥भावार्थ — हे प्रभो! हमें उत्तम मार्ग से ले चलो।यजुर्वेद 36.24शं नो मित्रः शं वरुणः ॥भावार्थ — परम शक्तियाँ हमारा कल्याण करें।अथर्ववेद 19.9.14भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः ॥भावार्थ — हे देवो! हम अपने कानों से शुभ वचन सुनें।ऋग्वेद 10.17.6आ त्वा वयं सुम्नायवः ॥भावार्थ — हे प्रभो! हम आपकी कृपा पाने के लिए आपकी ओर आते हैं।सामवेद 372त्वं हि नः पिता वसो त्वं माता शतक्रतो ॥भावार्थ — हे प्रभो! आप ही हमारे पिता और माता हैं।उपनिषदों में प्रमाण --उपनिषदों में भी अनेक स्थानों पर ईश्वर की शरणागति और प्रार्थना का आश्वासन मिलता है। उदाहरणार्थ —१. कठोपनिषद (१/२/२३)नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो…यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः।भावार्थ: यह आत्मा केवल वाक्चातुर्य या बुद्धि से नहीं मिलता; जिस पर वह (परमात्मा) कृपा करता है, उसी को प्राप्त होता है।२. श्वेताश्वतरोपनिषद (६/१८)यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं…तं ह देवं आत्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये।भावार्थ: जो ब्रह्मा आदि का भी नियंता है, उस आत्मप्रकाशक देव की मैं शरण ग्रहण करता हूँ। यह स्पष्ट शरणागति है ।३. मुण्डकोपनिषद (३/२/३)भिद्यते हृदयग्रन्थिः…तस्मिन् दृष्टे परावरे।भावार्थ: जब परमात्मा का साक्षात्कार होता है, तब बंधन कट जाते हैं।अर्थात् ईश्वर की ओर किया गया आह्वान अंततः मुक्ति का कारण बनता है।४. तैत्तिरीयोपनिषद (शिक्षावल्ली १/११)सत्यं वद, धर्मं चर…आचार्याय प्रियं धनमाहृत्य प्रजातन्तुं मा व्यवच्छेत्सीः।यहाँ प्रत्यक्ष प्रार्थना न होकर भी उपदेश है कि धर्माचरण द्वारा ईश्वर की कृपा प्राप्त होती है।धर्ममय जीवन ही ईश्वर की सुनवाई का मार्ग है।सारांश--ऋग्वेद का “अधाम इन्द्र श्रणवो हवेमा” विनम्र पुकार है। भगवद्गीता से प्रमाण१. (९/२२)अनन्याश्चिन्तयन्तो मां… योगक्षेमं वहाम्यहम्।भावार्थ --जो अनन्य भाव से मुझे स्मरण करते हैं, उनके योग-क्षेम का वहन मैं स्वयं करता हूँ।भाव: भक्त की पुकार ईश्वर सुनते हैं और उसकी रक्षा करते हैं।भगवत् गीता_ २. (१८/६६)सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥भावार्थ -- मेरी शरण में आओ; मैं तुम्हें मुक्त कर दूँगा।भाव: शरणागत की प्रार्थना निष्फल नहीं जाती।भगवत् गीता-३. (७/१६)चतुर्विधा भजन्ते मां… आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च।भावार्थ _संकटग्रस्त (आर्त) भी मुझे पुकारता है।भाव: दुःख में की गई पुकार भी भगवान स्वीकार करते हैं। महाभारत से प्रमाण१. भीष्मपर्व (गीता का ही संदर्भ)अर्जुन के विषाद में श्रीकृष्ण का उपदेश —“क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ…” (२/३)भावार्थ -- जब शिष्य शरणागत होता है, तब ईश्वर मार्गदर्शन देते हैं।३. शान्तिपर्व“न हि कल्याणकृत्कश्चिद् दुर्गतिं तात गच्छति।”भावार्थ -- जो शुभ मार्ग पर चलता है, उसकी दुर्गति नहीं होती।भाव: धर्मनिष्ठ की रक्षा ईश्वर करते हैं। निष्कर्ष--ऋग्वेद का भाव — “हे प्रभो! हमारी पुकार सुनो” —गीता में शरणागति और योगक्षेम,महाभारत में संकट में स्मरण और दिव्य सहायता के रूप में प्रतिपादित है।ऋग्वैदिक भाव — “हे प्रभो! हमारी पुकार सुनो” — के समर्थन में पुराणों में ध्रुव और मार्कण्डेय आदि की हृदयविदारक पुकार अत्यन्त प्रसिद्ध है।ध्रुव की पुकार--(भागवत पुराण, चतुर्थ स्कन्ध)जब बालक ध्रुव वन में तप कर रहे थे, तब भगवान के प्रकट होने पर उन्होंने स्तुति की —योऽन्तः प्रविश्य मम वाचमिमां प्रसुप्तांसंजीवयत्यखिलशक्तिधरः स्वधाम्ना।अन्यांश्च हस्तचरणश्रवणत्वगादीन्प्राणान् नमो भगवते पुरुषाय तुभ्यम्॥(भागवत ४.९.६)भावार्थ:हे प्रभो! आप ही मेरे भीतर प्रवेश करके मेरी सुप्त वाणी और समस्त इन्द्रियों को चेतना देते हैं। मैं उस पुरुषोत्तम भगवान को नमस्कार करता हूँ। ध्रुव की तपःपूर्ण पुकार सुनकर भगवान प्रकट हुए — यह शरणागतवत्सलता का प्रमाण है। मार्कण्डेय की पुकार--(शिव पुराण तथा महाभारत में कथा)जब यमराज ने सोलह वर्ष की आयु पूर्ण होने पर मार्कण्डेय को बाँधना चाहा, तब बालक ने शिवलिङ्ग का आश्रय लेकर प्रार्थना की। परम्परा में प्रचलित उनका स्तोत्र —त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥ ऋग्वेद ७/५९/१२)भावार्थ:हम तीन नेत्रों वाले भगवान की उपासना करते हैं; वे हमें मृत्यु के बन्धन से मुक्त करें। उनकी पुकार से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए और उन्हें अमरत्व प्रदान किया।सारांश--ध्रुव — विष्णु की अनन्य भक्ति से भगवान साक्षात् प्रकट हुए।मार्कण्डेय — मृत्यु के भय में की गई शिव-शरणागति से अमरत्व प्राप्त हुआ।गजेन्द्र की पुकार--(भागवत पुराण, अष्टम स्कन्ध — गजेन्द्रमोक्ष)जब गजेन्द्र को ग्राह (मगर) ने पकड़ लिया और वह असहाय हो गया, तब उसने भगवान को पुकारा —नमः शान्ताय घोराय मूढाय गुणधर्मिणे।निर्विशेषाय साम्याय नमो ज्ञानघनाय च॥(भागवत ८.३)और अत्यन्त प्रसिद्ध शरणागति श्लोक —नारायणाखिलगुरो भगवन् नमस्ते॥भावार्थ:हे नारायण! आप समस्त जगत् के गुरु हैं; मैं आपको नमस्कार करता हूँ।गजेन्द्र की निष्कपट पुकार सुनकर भगवान विष्णु गरुड़ पर आरूढ़ होकर तुरंत आए और उसे मुक्त किया। प्रह्लाद की पुकार--(भागवत पुराण, सप्तम स्कन्ध)हिरण्यकशिपु के अत्याचारों के बीच भी प्रह्लाद निरन्तर भगवान का स्मरण करते रहे —नैवोद्विजे पर दुरत्यय-वैतरण्याःत्वद्वीर्य-गायन-महामृत-मग्न-चित्तः॥(भागवत ७.९.४३)भावार्थ:हे प्रभो! आपकी महिमा का गान करते हुए मेरा चित्त अमृत में डूबा है; मुझे संसारसागर से भय नहीं।और उनकी स्तुति में —ब्रह्मादयः सुरगणा मुनयोऽथ सिद्धाःसत्त्वैकतानमतयो वचसां प्रवाहैः।नाराधितुं पुरुगुणैरधुनापि पिप्रुःकिं तोष्टुमर्हति स मे हरिरुग्रजातिः॥(७.९.८) प्रह्लाद की पुकार पर भगवान नृसिंह खम्भे से प्रकट हुए और भक्त की रक्षा की। निष्कर्ष--गजेन्द्र — संकट में आर्त पुकार।प्रह्लाद — अत्याचार के बीच अटल स्मरण।दोनों घटनाएँ सिद्ध करती हैं कि निष्कपट शरणागति और आर्त प्रार्थना अवश्य सुनी जाती है — यही “श्रणवो हवेमा” का साक्षात् पुराण-प्रमाण है। द्रौपदी की पुकार--(महाभारत, सभापर्व)जब दुर्योधन की सभा में द्रौपदी असहाय हुई, तब उसने पूर्ण शरणागति से पुकारा —“हे गोविन्द! हे केशव! हे द्वारकावासिन् कृष्ण!”पूरा श्लोक-- गोविन्द द्वारकावासिन् कृष्ण गोपीजनप्रिय।कौरवैः परिभूतां मां किं न जानासि केशव॥भावार्थ:हे गोविन्द! कौरवों द्वारा अपमानित मुझे क्या आप नहीं जानते? उसकी पुकार पर भगवान ने अनन्त चीर प्रदान कर उसकी रक्षा की।अजामिल की पुकार--(भागवत पुराण, षष्ठ स्कन्ध)मृत्युशय्या पर अजामिल ने अपने पुत्र का नाम लेकर पुकारा नारायण इति व्याजहार विवशो नामोच्चारणमात्रतः।(भाव — भागवत ६.२)और शास्त्र में कहा —एतावान् संख्ययोगाभ्यां स्वधर्मपरिनिष्ठया।जन्मलाभः परः पुंसामन्ते नारायणस्मृतिः॥(६.२.१२)भावार्थ:मनुष्य-जीवन की सर्वोच्च सिद्धि अन्त समय में “नारायण” का स्मरण है। नाम-स्मरण से ही विष्णुदूत आकर उसे यमदूतों से बचाते हैं। शबरी की पुकार--(रामायण, अरण्यकाण्ड)शबरी वर्षों तक प्रभु की प्रतीक्षा करती रहीं। उनका भाव —आगमिष्यति मे रामो दाशरथिः प्रियदर्शनः।जब भगवान श्रीराम उनके आश्रम आए, तब उन्होंने प्रेमपूर्वक कहा--भक्तिर्भवति नैष्ठिकी। निष्कपट भक्ति और प्रतीक्षा की पुकार पर स्वयं भगवान श्रीराम पधारे। निष्कर्ष--द्रौपदी — पूर्ण समर्पण की आर्त पुकार।अजामिल — अन्तकाल का नाम-स्मरण।शबरी — दीर्घ प्रतीक्षा और निष्कलुष भक्ति।तीनों उदाहरण सिद्ध करते हैं कि सच्चे हृदय से की गई पुकार अवश्य सुनी जाती है — यही “श्रणवो हवेमा” का शास्त्रीय प्रत्यक्ष प्रमाण है। हितोपदेश--आपदि स्मरणं विष्णोः सम्पदि स्मरणं हरिः।यत्र यत्र स्मरेन्नित्यं तत्र तत्र सहायता॥ (प्रचलित पाठ)भावार्थ:संकट में विष्णु का स्मरण और समृद्धि में भी हरि का स्मरण—जहाँ-जहाँ स्मरण होता है, वहाँ-वहाँ सहायता मिलती है। निष्कर्ष: आर्त पुकार व्यर्थ नहीं जाती।चाणक्य नीति--आपदर्थे धनं रक्षेद् दारान् रक्षेद् धनैरपि।आत्मानं सततं रक्षेद् दारैरपि धनैरपि॥भावार्थ:आपत्ति के लिए धन बचाओ; धन से परिवार की रक्षा करो; परन्तु आत्मा (धर्म) की रक्षा सर्वोपरी है। संकेत: अंतिम आश्रय धर्म और परमसत्ता ही है—वहीं सच्ची सुरक्षा है।एक अन्य नीति-वाक्य (प्रचलित) धर्मो रक्षति रक्षितः।जो धर्म की शरण लेता है, उसकी रक्षा होती है। भर्तृहरि नीतिशतक-दैवेनोद्धृतबुद्धयः परिभवन्त्येव साधवः।दैवाधीनं जगत्सर्वं तस्माद् दैवं परं बलम्॥ (भावानुसार उद्धरण)भावार्थ:यह संसार दैवाधीन है; इसलिए दैव (ईश्वर) ही परम बल है। संकट में परम बल की ओर ही मनुष्य की पुकार जाती है।और —सत्सङ्गत्वे निस्सङ्गत्वं…निस्सङ्गत्वे निर्मोहत्वं… सत्संग और ईश्वराभिमुखता से ही बन्धन कटते हैं।निष्कर्ष--हितोपदेश — संकट में ईश्वर-स्मरण को सहायक बताता है।चाणक्य — धर्म को परम आश्रय मानते हैं।भर्तृहरि — दैव को परम बल स्वीकार करते हैं।इस प्रकार आर्ष नीतिग्रन्थ भी यही प्रतिपादित करते हैं कि जब मनुष्य विनयपूर्वक उच्च शक्ति/धर्म की ओर उन्मुख होकर पुकारता है, तब वही उसका वास्तविक संरक्षण करती है — यही “श्रणवो हवेमा” का नीतिशास्त्रीय समर्थन है। मनुस्मृति--(८/१५)धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत्॥भावार्थ:धर्म का नाश करने वाला स्वयं नष्ट होता है; धर्म की रक्षा करने पर वही हमारी रक्षा करता है। संकेत: जो धर्म (ईश्वर-मार्ग) की शरण लेता है, उसकी रक्षा अवश्य होती है।(४/१३८ – भावानुसार)सततं धर्ममाश्रित्य शुचिः स्यात् प्रयतः नरः। भावार्थ --मनुष्य को निरन्तर धर्म का आश्रय लेना चाहिए — यही स्थायी सुरक्षा है। योगवासिष्ठ-(उपशमप्रकरण)ईश्वरप्रणिधानाद्वा चित्तस्यैकाग्रता भवेत्।भावार्थ:ईश्वर-प्रणिधान (समर्पण) से चित्त की एकाग्रता और शान्ति प्राप्त होती है। संकट में ईश्वर-स्मरण ही स्थिरता देता है।एक प्रसिद्ध उक्ति (भावानुसार)यदा यदा मनो दुःखैः पीड्यते मानवस्य हि।तदा तदा हरिं स्मृत्वा शान्तिमाप्नोति मानवः॥ जब-जब मनुष्य दुःखी होता है, तब-तब ईश्वर-स्मरण से शान्ति पाता है। निष्कर्ष--मनुस्मृति — धर्म-आश्रय को सुरक्षा का आधार बताती है।योगवासिष्ठ — ईश्वर-प्रणिधान को चित्त-शान्ति और मुक्ति का मार्ग बताता है।अर्थात् आर्ष परम्परा का समग्र मत यही है किविनयपूर्वक की गई पुकार, धर्माश्रय और ईश्वर-समर्पण व्यर्थ नहीं जाते।वाल्मीकि रामायण से प्रमाणवाल्मीकि रामायण, युद्धकाण्ड 28.8शरणागतं परित्यज्य यो हि दीनमनाथवत् ।न रक्षति स धर्मात्मा स्वर्गाच्च परिहीयते ॥भावार्थ — जो दीन होकर शरण में आए उसकी पुकार न सुनना धर्म के विरुद्ध है।वाल्मीकि रामायण, युद्धकाण्ड 18.33सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते ।अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम ॥भावार्थ — जो एक बार भी मेरी शरण आकर प्रार्थना करता है, उसे मैं अभय देता हूँ।वाल्मीकि रामायण, अरण्यकाण्ड 10.19रक्ष मां राक्षसाद्राम ॥भावार्थ — हे राम! मुझे राक्षस से बचाइए।वाल्मीकि रामायण, सुंदरकाण्ड 21.15हा राम हा लक्ष्मण ॥भावार्थ — सीता की करुण पुकार — हे राम! हे लक्ष्मण!वाल्मीकि रामायण, युद्धकाण्ड 117.24भक्त्या त्वां प्रार्थये राम ॥भावार्थ — हे राम! मैं भक्तिभाव से आपसे प्रार्थना करता हूँ।वाल्मीकि रामायण, अयोध्याकाण्ड 31.25त्वमेव प्रतिपाल्यश्च ॥भावार्थ — हे प्रभु! आप ही हमारी रक्षा करने वाले हैं।वाल्मीकि रामायण, बालकाण्ड 1.18स हि देवैरुदीर्णस्य रावणस्य वधार्थिभिः ।अर्थितो मानुषे लोके जज्ञे विष्णुः सनातनः ॥भावार्थ — देवताओं की प्रार्थना सुनकर भगवान विष्णु राम रूप में प्रकट हुए।अध्यात्म रामायण से प्रमाणअध्यात्म रामायण, अरण्यकाण्ड 3.14त्राहि मां रघुनाथेति ॥भावार्थ — हे रघुनाथ! मेरी रक्षा कीजिए।अध्यात्म रामायण, युद्धकाण्ड 6.35भक्तानामार्तिनाशाय ॥भावार्थ — भगवान भक्तों की पीड़ा दूर करने के लिए प्रकट होते हैं।अध्यात्म रामायण, उत्तरकाण्ड 5.12राम रामेति रामेति ॥भावार्थ — रामनाम का स्मरण ही परम प्रार्थना है।अध्यात्म रामायण, अयोध्याकाण्ड 2.20त्वमेव शरणं राम ॥भावार्थ — हे राम! आप ही मेरी शरण हैं।अध्यात्म रामायण, सुंदरकाण्ड 5.31नाथ मां परिपाहि ॥भावार्थ — हे प्रभु! मेरी रक्षा कीजिए।अध्यात्म रामायण, युद्धकाण्ड 7.42भक्तवत्सल राम ॥भावार्थ — भगवान राम भक्तों की पुकार सुनने वाले हैं।अध्यात्म रामायण, बालकाण्ड 1.7यदा यदा हि धर्मस्य ॥भावार्थ — जब-जब धर्म की हानि होती है, तब प्रभु भक्तों की पुकार सुनकर अवतरित होते हैं।इस्लाम धर्म में प्रमाण ---सूरह अल-बक़रह 2:186وَإِذَا سَأَلَكَ عِبَادِي عَنِّي فَإِنِ قَرِيبٌ ۖ أُجِيبُ دَعْوَةَ الدَّاعِ إِذَا دَعَانِभावार्थ — जब मेरे बन्दे मेरे विषय में पूछें, तो मैं निकट हूँ; जो मुझे पुकारता है उसकी दुआ स्वीकार करता हूँ।सूरह ग़ाफ़िर 40:60ادْعُونِي أَسْتَجِبْ لَكُمْभावार्थ — मुझे पुकारो, मैं तुम्हारी प्रार्थना स्वीकार करूँगा।सूरह अल-अआराफ़ 7:55ادْعُوا رَبَّكُمْ تَضَرُّعًا وَخُفْيَةًभावार्थ — अपने पालनहार को विनम्रता और गुप्त भाव से पुकारो।सूरह अल-अंबिया 21:89رَبِّ لَا تَذَرْنِي فَرْدًا وَأَنتَ خَيْرُ الْوَارِثِينَभावार्थ — हे मेरे पालनहार! मुझे अकेला न छोड़; तू सबसे उत्तम वारिस है।सूरह आल-इमरान 3:8رَبَّنَا لَا تُزِغْ قُلُوبَنَا بَعْدَ إِذْ هَدَيْتَنَاभावार्थ — हे हमारे पालनहार! हमें मार्ग दिखाने के बाद हमारे हृदय टेढ़े न होने दे।सूरह ताहा 20:25-26رَبِّ اشْرَحْ لِي صَدْرِي وَيَسِّرْ لِي أَمْرِيभावार्थ — हे प्रभु! मेरा हृदय खोल दे और मेरा कार्य सरल कर दे।सूरह अल-फ़ातिहा 1:5-6إِيَّاكَ نَعْبُدُ وَإِيَّاكَ نَسْتَعِينُ اهْدِنَا الصِّرَاطَ الْمُسْتَقِيمَभावार्थ — हम केवल तेरी उपासना करते हैं और तुझी से सहायता माँगते हैं; हमें सीधा मार्ग दिखा।सूफ़ी सन्तों में प्रमाण --हज़रत रूमीبشنو از نی چون حکایت میکنداز جداییها شکایت میکندभावार्थ — सुनो, यह बांसुरी कैसी कथा कहती है; वह अपने प्रभु से वियोग की पुकार कर रही है।हज़रत राबिआ बसरीإلهي ما عبدتك خوفًا من نارك ولا طمعًا في جنتك ولكن حبًّا لكभावार्थ — हे प्रभु! मैंने तेरी उपासना न नरक के भय से की और न स्वर्ग की इच्छा से, बल्कि केवल तेरे प्रेम में।हज़रत निज़ामुद्दीन औलियाهر قوم راست راهے و دینے و قبلہ گاہےما قبلہ راست کردیم بر سمت کج کلاہےभावार्थ — हर समुदाय का अपना मार्ग और किबला है; हमने अपना मुख प्रियतम की ओर कर लिया।हज़रत अमीर ख़ुसरोمن تو شدم تو من شدیمن تن شدم تو جان شدیभावार्थ — मैं तुझमें खो गया और तू मुझमें समा गया; मैं शरीर बना और तू प्राण।हज़रत बुल्ले शाहرنجھا رنجھا کردی نی میں آپے رنجھا ہوئیभावार्थ — मैं प्रिय का नाम लेते-लेते स्वयं उसी में लीन हो गई।हज़रत सुल्तान बाहूاللہ ہو، اللہ ہوभावार्थ — प्रभु ही सत्य है; उसी का स्मरण करो।हज़रत शम्स तबरेज़ای خدا دل را چنان کن از صفاتا شود آینۂ نور خداभावार्थ — हे प्रभु! हृदय को इतना निर्मल कर दे कि वह तेरे प्रकाश का दर्पण बन जाए।हज़रत हाफ़िज़ शीराज़ीدر ازل پرتو حسنت ز تجلی دم زدعشق پیدا شد و آتش به همه عالم زدभावार्थ — आदि में तेरे सौन्दर्य की ज्योति प्रकट हुई; प्रेम उत्पन्न हुआ और सारे जगत में अग्नि-सा फैल गया।हज़रत बायज़ीद बस्तामीسبحانی ما أعظم شأنيभावार्थ — प्रभु की महिमा महान है; उसी की ज्योति से आत्मा प्रकाशित होती है।हज़रत अब्दुल क़ादिर जीलानीيا رب ارحم ضعفي وقلة حيلتيभावार्थ — हे प्रभु! मेरी दुर्बलता और असहायता पर दया कर।हज़रत मोइनुद्दीन चिश्तीعشقِ الٰہی جانِ من، نورِ ایمانِ منभावार्थ — ईश्वर का प्रेम ही मेरा जीवन और मेरे विश्वास का प्रकाश है।सिक्ख धर्म में प्रमाण --गुरु ग्रन्थ साहिब — अंग 10ਸੁਣਿ ਬੇਨੰਤੀ ਠਾਕੁਰ ਮੇਰੇਜੀਅ ਜੰਤ ਤੇਰੇ ਧਾਰੇ ॥भावार्थ — हे मेरे प्रभु! मेरी विनती सुनिए; समस्त जीव आपकी शरण में हैं।गुरु ग्रन्थ साहिब — अंग 268ਤੂ ਠਾਕੁਰ ਤੁਮ ਪਹਿ ਅਰਦਾਸਿਜੀਉ ਪਿੰਡੁ ਸਭੁ ਤੇਰੀ ਰਾਸਿ ॥भावार्थ — हे प्रभु! आपके समक्ष ही हमारी प्रार्थना है; यह जीवन और शरीर सब आपका है।गुरु ग्रन्थ साहिब — अंग 383ਹਮਰੀ ਕਰੋ ਹਾਥ ਦੈ ਰਛਾਪੂਰਨ ਹੋਇ ਚਿਤ ਕੀ ਇਛਾ ॥भावार्थ — हे प्रभो! अपने हाथ से हमारी रक्षा करो और हृदय की शुभ इच्छा पूर्ण करो।गुरु ग्रन्थ साहिब — अंग 724ਬਿਨਵੰਤ ਨਾਨਕ ਕਰੇ ਅਰਦਾਸਿਮੇਰਾ ਪ੍ਰਭੁ ਸੁਣੈ ਅਭਿਲਾਖ ॥भावार्थ — नानक विनती करता है; मेरा प्रभु मेरी अभिलाषा सुनता है।गुरु ग्रन्थ sahib — अंग 748ਮੇਰੇ ਸਾਹਿਬਾ ਕਉਣੁ ਜਾਣੈ ਗੁਣ ਤੇਰੇਕਹੇ ਨ ਜਾਨੀ ਅਉਗਣ ਮੇਰੇ ॥भावार्थ — हे प्रभु! कौन आपके गुणों को जान सकता है? मेरे दोषों को क्षमा करें।गुरु ग्रन्थ साहिब — अंग 1252ਸੁਣਿ ਅਰਦਾਸਿ ਸੁਆਮੀ ਮੇਰੇਸਰਣਿ ਪਰੇ ਕੀ ਰਾਖੁ ॥भावार्थ — हे स्वामी! मेरी प्रार्थना सुनिए और शरणागत की रक्षा कीजिए।जाप साहिब — दसम ग्रन्थਦੇਹ ਸ਼ਿਵਾ ਬਰੁ ਮੋਹਿ ਇਹੈਸ਼ੁਭ ਕਰਮਨ ਤੇ ਕਬਹੂੰ ਨ ਟਰੋਂ ॥भावार्थ — हे प्रभु! मुझे यह वरदान दें कि मैं शुभ कर्मों से कभी विचलित न हों।ईसाई धर्म में प्रमाण --Bible — Matthew 7:7“Ask, and it shall be given you; seek, and ye shall find; knock, and it shall be opened unto you.”भावार्थ — माँगो तो तुम्हें दिया जाएगा; खोजो तो पाओगे; खटखटाओ तो तुम्हारे लिए द्वार खोला जाएगा।Bible — Jeremiah 33:3“Call unto me, and I will answer thee.”भावार्थ — मुझे पुकारो, मैं तुम्हारी प्रार्थना सुनूँगा।Bible — Psalm 145:18“The Lord is near unto all them that call upon him.”भावार्थ — प्रभु उन सबके निकट है जो उसे पुकारते हैं।Bible — John 14:13“And whatsoever ye shall ask in my name, that will I do.”भावार्थ — जो कुछ तुम मेरे नाम से माँगोगे, मैं वह करूँगा।Bible — Psalm 34:17“The righteous cry, and the Lord heareth.”भावार्थ — धर्मी पुकारते हैं और प्रभु उनकी सुनता है।Bible — Philippians 4:6“In every thing by prayer and supplication let your requests be made known unto God.”भावार्थ — हर बात में प्रार्थना और विनती द्वारा अपनी याचनाएँ परमेश्वर के सामने रखो।Bible — 1 John 5:14“If we ask any thing according to his will, he heareth us.”भावार्थ — यदि हम उसकी इच्छा के अनुसार कुछ माँगते हैं, तो वह हमारी सुनता है।जैन धर्म में प्रमाण --णमोकार मन्त्रणमो अरिहंताणं ।णमो सिद्धाणं ।णमो आयरियाणं ।णमो उवज्झायाणं ।णमो लोए सव्वसाहूणं ॥भावार्थ — अरिहन्तों, सिद्धों, आचार्यों, उपाध्यायों और समस्त साधुओं को नमस्कार; वे हमारी प्रार्थना के आदर्श हैं।क्षमापना प्रार्थनाखामेमि सव्व जीवाणंसव्वे जीवा खमंतु मे ।मित्ति मे सव्व भूएसुवेरं मज्झं ण केणइ ॥भावार्थ — मैं सब जीवों से क्षमा चाहता हूँ; सब मुझे क्षमा करें। सबके प्रति मेरी मैत्री हो, किसी से वैर न हो।उत्तराध्ययन सूत्रधम्मो मंगलमुक्किट्ठंअहिंसा संजमो तवो ॥भावार्थ — धर्म ही सर्वोच्च मंगल है; अहिंसा, संयम और तप उसका स्वरूप हैं।तत्त्वार्थसूत्रसम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः ॥भावार्थ — सम्यक दर्शन, ज्ञान और चरित्र ही मोक्ष का मार्ग हैं।प्राकृत वचनअप्पा चेव दमेयव्वोअप्पा हु खलु दुद्दमो ॥भावार्थ — मनुष्य को अपने आप को वश में करना चाहिए, क्योंकि आत्मसंयम कठिन है।जैन प्रार्थनाअरिहंत सिद्ध साहूणंमंगलं परमं हवइ ॥भावार्थ — अरिहन्त, सिद्ध और साधुओं का स्मरण परम मंगलकारी है।प्राकृत सूत्रजयं चरंति साहूसंयमेण तवेण य ॥भावार्थ — साधु संयम और तप द्वारा आत्मविजय प्राप्त करते ।बौद्ध धर्म में प्रमाण --बुद्धं शरणं गच्छामिबुद्धं शरणं गच्छामि ।धम्मं शरणं गच्छामि ।संघं शरणं गच्छामि ॥भावार्थ — मैं बुद्ध, धर्म और संघ की शरण में जाता हूँ।धम्मपदमनोपुब्बङ्गमा धम्मामनोसेट्ठा मनोमया ॥भावार्थ — मन ही सब धर्मों का अग्रदूत है; सब कुछ मन से उत्पन्न होता है।करणीया मेत्ता सुत्तसब्बे सत्ता भवंतु सुखितत्ता ॥भावार्थ — सभी प्राणी सुखी हों।धम्मपदअत्ताहि अत्तनो नाथोको हि नाथो परोसिया ॥भावार्थ — मनुष्य स्वयं अपना स्वामी है; दूसरा कौन उसका रक्षक हो सकता है?मंगल सुत्तएतं मंगलमुत्तमं ॥भावार्थ — यही सर्वोत्तम मंगल है।धम्मपदनहि वेरेन वेरानिसम्मन्तीध कुदाचनं ।अवेरेन च सम्मन्ति ॥भावार्थ — वैर से वैर कभी शांत नहीं होता; प्रेम से ही शांत होता है।महापरिनिब्बान सुत्तवयधम्मा सङ्खाराअप्पमादेन सम्पादेथ ॥भावार्थ — सभी संस्कार नश्वर हैं; इसलिए सावधानी और परिश्रम से साधना करो।बुद्धं शरणं गच्छामिबुद्धं शरणं गच्छामि ।धम्मं शरणं गच्छामि ।संघं शरणं गच्छामि ॥भावार्थ — मैं बुद्ध, धर्म और संघ की शरण में जाता हूँ।धम्मपदमनोपुब्बङ्गमा धम्मामनोसेट्ठा मनोमया ॥भावार्थ — मन ही सब धर्मों का अग्रदूत है; सब कुछ मन से उत्पन्न होता है।करणीया मेत्ता सुत्तसब्बे सत्ता भवंतु सुखितत्ता ॥भावार्थ — सभी प्राणी सुखी हों।धम्मपदअत्ताहि अत्तनो नाथोको हि नाथो परोसिया ॥भावार्थ — मनुष्य स्वयं अपना स्वामी है; दूसरा कौन उसका रक्षक हो सकता है?मंगल सुत्तएतं मंगलमुत्तमं ॥भावार्थ — यही सर्वोत्तम मंगल है।धम्मपदनहि वेरेन वेरानिसम्मन्तीध कुदाचनं ।अवेरेन च सम्मन्ति ॥भावार्थ — वैर से वैर कभी शांत नहीं होता; प्रेम से ही शांत होता है।महापरिनिब्बान सुत्तवयधम्मा सङ्खाराअप्पमादेन सम्पादेथ ॥भावार्थ — सभी संस्कार नश्वर हैं; इसलिए सावधानी और परिश्रम से साधना करो।यहूदी धर्म में प्रमाण --अहुनवैर्य प्रार्थना𐬫𐬀𐬚𐬀 𐬀𐬵𐬎 𐬬𐬀𐬌𐬭𐬌𐬌𐬊𐬀𐬚𐬀 𐬭𐬀𐬙𐬎𐬱 𐬀𐬱𐬀𐬙𐬗𐬌𐬙 𐬵𐬀𐬗𐬀भावार्थ — जैसे प्रभु की इच्छा है वैसे ही धर्म और सत्य की स्थापना हो।अशेम वोहू𐬀𐬴𐬆𐬨 𐬬𐬊𐬵𐬎 𐬬𐬀𐬵𐬌𐬱𐬙𐬆𐬨 𐬀𐬯𐬙𐬌भावार्थ — सत्य ही सर्वोत्तम कल्याण है।यस्ना प्रार्थना𐬌𐬙 𐬀𐬵𐬨𐬀𐬌 𐬭𐬀𐬙𐬎𐬨𐬠𐬀𐬭𐬆𐬘𐬀𐬌भावार्थ — हे प्रभु! हमें धर्ममार्ग पर चलाइए।गाथा𐬀𐬵𐬎𐬭𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁𐬨𐬀𐬌𐬥𐬌𐬌𐬎भावार्थ — अहुरा मज़्दा महान और पवित्र हैं।अवेस्ता वचन𐬵𐬎𐬨𐬀𐬙𐬀𐬵𐬎𐬑𐬙𐬀𐬵𐬎𐬬𐬀𐬭𐬱𐬙𐬀भावार्थ — शुभ विचार, शुभ वचन, शुभ कर्म।ज़रथुष्ट्र प्रार्थना𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 𐬀𐬵𐬎𐬭𐬀𐬯𐬭𐬀𐬊𐬱𐬀भावार्थ — हे अहुरा मज़्दा! हमारी प्रार्थना सुनिए।अवेस्ता गाथा𐬀𐬴𐬀𐬌 𐬫𐬀𐬥𐬀𐬨𐬀𐬱𐬀𐬊𐬥𐬀𐬨भावार्थ — सत्य और धर्म के मार्ग पर चलने वालों को कल्याण प्राप्त होता है।ताओ धर्म में प्रमाण,-+道德經 第四章道沖,而用之或不盈。भावार्थ — ताओ अनन्त और असीम है; वह सबकी पुकार को धारण करता है।道德經 第八章上善若水。水善利萬物而不爭。भावार्थ — परम गुण जल के समान है, जो सबका कल्याण करता है और बिना विरोध सबकी सहायता करता है।道德經 第二十三章希言自然。भावार्थ — मौन और सरल प्रार्थना प्रकृति के ताओ के निकट ले जाती है।道德經 第三十五章執大象,天下往。往而不害,安平太。भावार्थ — जो महान ताओ को धारण करता है, उसके पास लोग शान्ति पाने आते हैं।道德經 第四十九章聖人無常心,以百姓心為心。善者吾善之,不善者吾亦善之。भावार्थ — संत सबकी भावना को अपनी भावना मानता है और सबके प्रति करुणा रखता है।莊子虛室生白,吉祥止止。भावार्थ — निर्मल और शांत हृदय में दिव्य प्रकाश प्रकट होता है।道德經 第六十七章我有三寶,持而保之:一曰慈,二曰儉,三曰不敢為天下先。भावार्थ — मेरे तीन रत्न हैं: करुणा, सादगी और विनम्रता; यही ईश्वरीय मार्ग है।論語·八佾篇祭如在,祭神如神在。भावार्थ — उपासना और प्रार्थना ऐसे करो मानो परम सत्ता वास्तव में सामने उपस्थित हो और सुन रही हो।論語·顏淵篇己所不欲,勿施於人。भावार्थ — जो अपने लिए प्रिय नहीं, वह दूसरों पर मत थोपो; करुणा ही स्वर्गीय मार्ग है।中庸誠者,天之道也;誠之者,人之道也。भावार्थ — सच्चाई और निष्कपट हृदय स्वर्ग का मार्ग है; सच्ची पुकार अवश्य सुनी जाती है।論語·述而篇天生德於予。भावार्थ — स्वर्ग ने मनुष्य को दिव्य गुण प्रदान किए हैं; इसलिए वह उसकी पुकार को जानता है।論語·泰伯篇任重而道遠。भावार्थ — जीवन का मार्ग कठिन है; इसलिए मनुष्य को उच्च शक्ति का स्मरण करते हुए आगे बढ़ना चाहिए।書經惟天聰明,惟聖時憲。भावार्थ — स्वर्ग सब सुनता और सब जानता है।詩經上帝臨女,無貳爾心。भावार्थ — परम सत्ता तुम्हारे ऊपर दृष्टि रखती है; अपने हृदय को सत्य और प्रार्थना में स्थिर रखो।शिन्तो धर्म में प्रमाण 神道祝詞祓へ給ひ清め給へ守り給ひ幸へ給へभावार्थ — हे दिव्य शक्तियो! हमारी प्रार्थना सुनो, हमें शुद्ध करो, रक्षा करो और कल्याण प्रदान करो।延喜式祝詞掛けまくも畏き伊邪那岐大神भावार्थ — हे महान दिव्य प्रभु! हमारी विनती स्वीकार करें।神社祝詞惟神霊幸倍坐世भावार्थ — दिव्य आत्माएँ कृपा करें और हमारी पुकार सुनें।古事記惟神之道भावार्थ — दिव्य मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति कामी की कृपा प्राप्त करता है।日本書紀敬神愛人भावार्थ — देवताओं का आदर और प्राणियों से प्रेम ही सच्ची प्रार्थना है।神道教義清き明き心भावार्थ — निर्मल हृदय से की गई प्रार्थना दिव्य शक्ति तक पहुँचती है।神前祈願大神よ、願いを聞き給えभावार्थ — हे महान देव! हमारी प्रार्थना सुनिए।यूनानी दर्शन में प्रमाण-- सुकरात (Socrates)“Know thyself.”भावार्थ — अपने भीतर के सत्य को पहचानो; वहीं दिव्य पुकार का उत्तर मिलता है।प्लेटो (Plato)“The soul of man is immortal.”भावार्थ — मनुष्य की आत्मा अमर है और वह उच्च सत्य की ओर पुकार करती है।प्लेटो — Republic“Good is the highest object of knowledge.”भावार्थ — परम शुभ ही सर्वोच्च सत्य है; उसी की ओर प्रार्थना उठती है।अरस्तू (Aristotle)“Nature does nothing in vain.”भावार्थ — प्रकृति का प्रत्येक कार्य उद्देश्यपूर्ण है; मानव की प्रार्थना भी अर्थपूर्ण है।एपिक्टेटस (Epictetus)“Seek not for events to happen as you wish, but wish them to happen as they do happen.”भावार्थ — ईश्वरीय व्यवस्था को स्वीकार करना ही शान्ति का मार्ग है।प्लोटिनस (Plotinus)“The soul’s journey is towards the One.”भावार्थ — आत्मा की यात्रा परम एकत्व की ओर है; वहीं उसकी पुकार सुनी जाती है।पाइथागोरस (Pythagoras)“Number rules the universe.”भावार्थ — समस्त जगत दिव्य व्यवस्था से संचालित है; मनुष्य उसी महान सत्ता से संवाद करता है।------+-------+--------+--------+----