बरसों पहले बंगाल और बिहार की सीमा के पास एक छोटा सा गांव था जिसका नाम लोग धीरे धीरे भूल चुके थे। पुराने नक्शों में उसे केवल बड़का पुरवा कहा जाता था। गांव के चारों तरफ घना जंगल था और गांव के पीछे एक बहुत बड़ा मरघट फैला हुआ था। उस मरघट में दिन में भी अजीब सन्नाटा रहता था। लोग कहते थे कि वहां जलने वाली चिताओं का धुआं कभी पूरी तरह खत्म नहीं होता। रात के समय वहां से राख की गंध हवा में घुलकर पूरे गांव में फैल जाती थी।
उसी गांव में एक पुराना मकान था। मिट्टी और लकड़ी से बना हुआ वह घर मरघट के बिल्कुल किनारे खड़ा था। गांव वाले उसे मरघट का आखिरी घर कहते थे। शाम ढलते ही उस रास्ते पर कोई नहीं जाता था। लोगों का कहना था कि उस घर में रहने वाले कभी चैन से नहीं जी पाए। जिसने भी वहां रात बिताई, उसकी जिंदगी बदल गई।
सन 1923 की बात है। कलकत्ता में रहने वाला अमित नाम का युवक अपने पुराने दोस्त संजय का खत मिलने के बाद दो साल बाद उसके गांव जाने के लिए तैयार हुआ। खत में केवल इतना लिखा था कि अगर सच में भूत प्रेत जैसी चीजों पर यकीन नहीं है तो एक बार गांव आकर देख ले। संजय ने लिखा था कि मरघट के पास वाले घर में एक रात गुजारकर दिखा दे तो वह मान जाएगा कि अमित सबसे बहादुर आदमी है।
अमित पढ़ा लिखा युवक था। वह इन बातों पर विश्वास नहीं करता था। उसे लगा संजय मजाक कर रहा है। उसने तुरंत गांव जाने का फैसला किया।
तीन दिन की यात्रा के बाद अमित बैलगाड़ी से गांव पहुंचा। शाम उतर चुकी थी। आसमान में धुंधली लाल रोशनी बची हुई थी। गांव के बाहर पहुंचते ही उसे अजीब बेचैनी महसूस हुई। पूरा गांव बहुत शांत था। बच्चे नहीं खेल रहे थे। औरतें जल्दी जल्दी दरवाजे बंद कर रही थीं। कुछ बूढ़े उसे देखकर ऐसे घूर रहे थे जैसे वह कोई मुसीबत साथ लेकर आया हो।
संजय गांव के बाहर ही उसका इंतजार कर रहा था। उसे देखकर अमित खुश हुआ लेकिन अगले ही पल उसे अजीब लगा। संजय का चेहरा पहले से बहुत कमजोर हो चुका था। उसकी आंखों के नीचे गहरे काले निशान थे और उसकी आवाज पहले जैसी नहीं रही थी।
संजय मुस्कुराया लेकिन उसकी मुस्कान में गर्मजोशी नहीं थी। उसने धीरे से कहा, “चल, तुझे अपने घर ले चलता हूं।”
दोनों गांव के बीच से होते हुए पीछे की तरफ बढ़े। रास्ता खत्म होते ही मरघट दिखाई देने लगा। दूर कहीं अधजली लकड़ी से धुआं उठ रहा था। हवा में राख और जले हुए शरीर की गंध थी। अमित का मन घबराने लगा।
मरघट के बिल्कुल किनारे वह मकान खड़ा था। टूटी दीवारें। लकड़ी की पुरानी खिड़कियां। ऊपर टेढ़ी छत। ऐसा लग रहा था जैसे घर सांस ले रहा हो।
अंदर एक बूढ़ा रसोइया था जिसे सब महाराज कहते थे। एक दुबला पतला माली भी था जिसका नाम लखन था। दोनों ने अमित को ऐसे देखा जैसे वह कोई पुरानी याद हो।
रात को खाना खाते समय संजय ने पूछा, “अब भी नहीं मानता कि इस दुनिया में कुछ और भी है?”
अमित हंस पड़ा। “भूत वूत कुछ नहीं होता।”
संजय ने धीमी आवाज में कहा, “आज रात जागना मत भूलना।”
उस रात तेज हवा चल रही थी। बाहर पेड़ों की टहनियां खिड़कियों से टकरा रही थीं। अमित सोने की कोशिश कर रहा था लेकिन उसे बार बार ऐसा लग रहा था जैसे घर के भीतर कोई चल रहा हो।
आधी रात के करीब उसे पायल की हल्की आवाज सुनाई दी।
वह उठकर बाहर आया। लंबा अंधेरा गलियारा उसके सामने था। दीवारों पर लगी पुरानी तस्वीरें हवा में हिल रही थीं। अचानक उसे लगा कि किसी तस्वीर की आंखें उसकी तरफ घूम गई हैं।
वह डरकर पीछे हटा लेकिन तभी ऊपर से किसी औरत के रोने की आवाज आई।
अमित ने लालटेन उठाई और सीढ़ियों की तरफ बढ़ा। ऊपर पहुंचते ही उसे एक कमरा खुला मिला। कमरे के बीचों बीच एक टूटी चारपाई थी और उसके ऊपर सफेद कपड़े में कोई बैठा था।
अमित का गला सूख गया।
उसने हिम्मत करके पूछा, “कौन है?”
वह आकृति धीरे धीरे उसकी तरफ मुड़ी। उसका चेहरा राख से भरा था। आंखें पूरी काली। होंठ जले हुए।
अमित चीख पड़ा।
अचानक लालटेन बुझ गई।
कमरे में केवल उस औरत की भारी सांसों की आवाज बची थी।
अमित भागता हुआ नीचे आया। नीचे पहुंचकर उसने देखा कि महाराज चूल्हे के पास बैठे मुस्कुरा रहे हैं।
अमित कांपते हुए बोला, “ऊपर कौन है?”
महाराज ने बिना उसकी तरफ देखे कहा, “जो ऊपर जाता है, वही जानता है।”
सुबह होने पर अमित ने रात की बात संजय को बताई लेकिन वह हंसने लगा।
“तुझे सपना आया होगा।”
अमित चुप हो गया लेकिन अब उसके मन में डर बैठ चुका था।
दोपहर में वह गांव घूमने निकला। गांव वाले उससे बात करने से बच रहे थे। आखिर एक बूढ़ा आदमी उसके पास आया और धीरे से बोला, “यहां ज्यादा दिन मत रुकना।”
अमित ने पूछा, “क्यों?”
बूढ़े ने डरते हुए मरघट वाले घर की तरफ देखा। “वह घर जिंदा लोगों के लिए नहीं है।”
इतना कहकर वह चला गया।
शाम को अचानक संजय को मरघट की तरफ जाना पड़ा। उसने कहा कि गांव में किसी की मौत हो गई है। वह जल्दी लौट आएगा।
अब अमित घर में अकेला था।
रात गहराने लगी।
अचानक उसे रसोई से बर्तन गिरने की आवाज सुनाई दी। वह अंदर गया लेकिन वहां कोई नहीं था। तभी उसकी नजर दीवार पर गई।
दीवार पर ताजा खून से लिखा था।
“भाग जा।”
अमित के हाथ कांपने लगे।
तभी पीछे से आवाज आई।
“अब भागकर कहां जाएगा?”
वह मुड़ा तो सामने लखन खड़ा था। लेकिन उसका चेहरा सड़ा हुआ था। आंखों में कीड़े रेंग रहे थे।
अमित डरकर पीछे हटा और गिर पड़ा।
अगले ही पल लखन गायब था।
अमित भागते हुए बाहर निकला लेकिन बाहर मरघट में उसे दर्जनों लोग खड़े दिखाई दिए। सफेद कपड़ों में। जले हुए चेहरे। सब उसकी तरफ देख रहे थे।
हवा में अचानक एक साथ कई आवाजें गूंजने लगीं।
“तू देर से आया अमित... बहुत देर से...”
अमित पागलों की तरह वापस घर के अंदर भागा। उसने दरवाजा बंद किया और कांपते हुए जमीन पर बैठ गया।
तभी उसे पीछे किसी के चलने की आवाज सुनाई दी।
संजय अंधेरे में खड़ा था।
उसका चेहरा बिल्कुल सफेद था।
अमित रोते हुए बोला, “यह सब क्या है?”
संजय कुछ देर चुप रहा। फिर बोला, “सच जानना चाहता है?”
उसने धीरे धीरे बताया कि दो हफ्ते पहले मरघट के पास एक शेर गांव में घुस आया था। कई लोग मारे गए थे। उन्हीं में संजय भी था।
अमित की सांस रुक गई।
“लेकिन... तू तो मेरे सामने खड़ा है...”
संजय मुस्कुराया। उसकी मुस्कान अब इंसानों जैसी नहीं थी।
“मैंने तुझे बुलाया क्योंकि यह घर किसी को अकेला नहीं छोड़ता।”
अचानक पूरे घर में जोर की आवाज गूंजी। दीवारों से राख गिरने लगी। ऊपर से किसी के भागने की आवाज आने लगी।
संजय ने कांपती आवाज में कहा, “जिस रात मैं मरा, उस रात मैंने भी यही आवाजें सुनी थीं।”
तभी पीछे से एक और आवाज आई।
“अब तेरी बारी है।”
अमित धीरे धीरे मुड़ा।
वहीं सफेद कपड़ों वाली औरत खड़ी थी। इस बार उसका चेहरा साफ दिखाई दे रहा था।
वह कोई और नहीं बल्कि अमित की मां थी जो कई साल पहले मर चुकी थी।
अमित की आंखें फट गईं।
उसकी मां मुस्कुराई लेकिन वह मुस्कान इंसानी नहीं थी।
“तू यहां क्यों आया बेटा?”
अमित चीखते हुए पीछे हटा लेकिन तभी उसे एहसास हुआ कि उसके पैर जमीन से ऊपर उठ रहे हैं। जैसे कोई अदृश्य हाथ उसे खींच रहा हो।
संजय गायब हो चुका था।
पूरा घर अंधेरे में डूब गया।
अगली सुबह गांव वालों ने मरघट के पास केवल अमित का बैग पाया। आदमी का कोई निशान नहीं मिला।
उस दिन के बाद गांव में यह बात फैल गई कि मरघट का आखिरी घर अब और ज्यादा ताकतवर हो चुका है। रात के समय वहां कभी कभी एक नई आवाज सुनाई देती है।
एक युवक की आवाज।
जो धीरे से कहती है।
“यहां मत आना... यहां कोई जिंदा नहीं है...”
लेकिन कई लोगों ने दावा किया कि जब भी कोई उस रास्ते से गुजरता है तो घर की टूटी खिड़की में एक आदमी खड़ा दिखाई देता है। उसकी आंखें मदद मांगती हैं। और जैसे ही कोई पास जाने की कोशिश करता है, वह आदमी मुस्कुराने लगता है।
बिल्कुल अमित की तरह।