रूहानी इश्क एक खौफनाक मोहब्बत - एपिसोड 6 kajal jha द्वारा डरावनी कहानी में हिंदी पीडीएफ

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रूहानी इश्क एक खौफनाक मोहब्बत - एपिसोड 6

अध्याय 6: नई आवाज़ की शुरुआत
सफेद धुंध में खड़ी आर्या को अब समय का भी अंदाज़ नहीं रहा था। उसे नहीं पता था कि वह कितनी देर से उसी जगह पर है—एक मिनट, एक घंटा या एक पूरा दिन। बस इतना महसूस हो रहा था कि अब कुछ भी पहले जैसा नहीं बचा है।
उसके हाथ में जो किताब थी, वह अब हल्की नहीं थी, बल्कि अजीब तरह से जीवित लग रही थी। जैसे उसके अंदर कुछ सांस ले रहा हो।
पन्ना धीरे-धीरे पलटा।
और इस बार शब्द खुद लिखे जाने लगे।
“आर्या…”
उसने घबराकर किताब बंद करने की कोशिश की, लेकिन इस बार उसके हाथ रुक गए।
किताब में आगे लिखा गया—
“तुमने मायरा की कहानी पूरी कर दी… लेकिन हर पूरी कहानी किसी नई शुरुआत को जन्म देती है।”
आर्या की सांसें तेज़ हो गईं।
“मैंने तो सिर्फ सच देखा था… मैंने कुछ नहीं बनाया,” उसने खुद से कहा।
लेकिन हवा में एक हल्की हँसी गूँजी।
“ह…ह…ह…”
आर्या ने चारों ओर देखा। धुंध अब हल्की होने लगी थी, और उसके बीच से एक नया आकार उभर रहा था।
यह हवेली नहीं थी… और न ही मायरा।
यह कुछ और था।
एक खाली कमरा।
पूरी तरह सफेद, बिना दरवाज़े, बिना खिड़की के।
और उसी कमरे के बीच में एक मेज़ थी—जिस पर वही किताब रखी थी।
लेकिन अब किताब का नाम बदल चुका था—
“अधूरी किताब: आर्या की दास्तान”
आर्या के पैरों तले जमीन जैसे खिसक गई।
“नहीं… मैं इसका हिस्सा नहीं हूँ,” उसने कांपते हुए कहा।
तभी पीछे से आवाज़ आई—
“तुम हमेशा से इसका हिस्सा थीं…”
आर्या ने तेजी से मुड़कर देखा।
कोई नहीं था।
लेकिन मेज़ पर एक नई चीज़ रखी हुई थी—एक पेन।
पुराना, स्याही से भरा हुआ, और हल्का सा काँपता हुआ।
किताब अपने आप खुल गई।
और पहले पन्ने पर लिखा था—
“अगर कहानी अधूरी लगे, तो उसे कोई पूरा करता है… या कोई नया शुरू करता है।”
आर्या का हाथ अपने आप पेन की तरफ बढ़ गया।
“नहीं… मैं यह नहीं लिखूंगी…” उसने खुद को रोका।
लेकिन उसका हाथ उसकी बात नहीं मान रहा था।
पेन ने खुद ब खुद कागज़ को छू लिया।
और शब्द बनने लगे—
“एक नई हवेली… एक नई रात…”
आर्या की आँखें फैल गईं।
“यह मैं नहीं कर रही…” उसने डरते हुए कहा।
लेकिन अंदर से एक आवाज़ आई—धीमी, शांत…
“अब तुम ही हो…”
कमरा धीरे-धीरे बदलने लगा।
सफेद दीवारों पर दरारें आने लगीं। और उन दरारों के पीछे से एक नया अंधेरा झाँकने लगा।
आर्या ने किताब को ज़ोर से बंद करने की कोशिश की।
लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी।
क्योंकि पहली कहानी खत्म नहीं हुई थी…
वह बस अगले लेखक की तलाश में थी।

 अगला दरवाज़ा
आर्या के हाथ काँप रहे थे, लेकिन पेन फिर भी उसके हाथ में मजबूती से टिका हुआ था। वह जितना उसे छोड़ना चाहती थी, उतना ही वह उसके नियंत्रण से बाहर होता जा रहा था।
सफेद कमरा अब बदलने लगा था। दीवारों पर हल्की-हल्की दरारें फैल रही थीं, और उन दरारों के बीच से वही पुरानी नीलगिरी हवेली झाँकने लगी थी।
“नहीं… यह फिर से शुरू नहीं हो सकता…” आर्या ने लगभग चीखते हुए कहा।
लेकिन उसकी आवाज़ जैसे कमरे ने निगल ली हो।
किताब खुली हुई थी, और उसके पन्नों पर अब लगातार शब्द लिखे जा रहे थे—
“हर अंत एक नया द्वार खोलता है…”
आर्या ने पेन को ज़ोर से फेंकने की कोशिश की, लेकिन वह उसके हाथ से छूट ही नहीं रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे पेन अब उसका हिस्सा बन चुका है।
अचानक हवा तेज़ हो गई।
और उसी हवा में मायरा की हल्की सी आवाज़ गूँजी—
“तुमने मुझे मुक्त किया था… अब किसी और को चाहिए जो मुझे समझे।”
आर्या ने घबराकर चारों ओर देखा।
“मैंने तुम्हें मुक्त नहीं किया… मैंने सिर्फ सच देखा था!” उसने जवाब दिया।
तभी किताब के पन्ने तेजी से पलटने लगे।
और एक नया नाम उभर आया—
“सिया”
आर्या ने यह नाम देखते ही सिर पकड़ लिया।
“अब कौन है यह?” उसने कांपते हुए पूछा।
मायरा की आवाज़ फिर आई—
“वह जो अगली कहानी सुनेगी…”
अचानक कमरे की दीवार गायब हो गई।
और वहाँ एक नया दृश्य उभर आया—एक छोटा सा गाँव, रात का समय, और एक लड़की खिड़की के पास बैठी किसी किताब को पढ़ रही थी।
आर्या को समझते देर नहीं लगी।
“नहीं… यह मत करो…” उसने चीखकर कहा।
लेकिन किताब ने उसकी एक भी बात नहीं सुनी।
कहानी आगे बढ़ रही थी।
और आर्या अब सिर्फ देखने वाली नहीं थी।
वह उस किताब के बीच फँसी एक आवाज़ बन चुकी थी।
तभी उसके सामने एक नया दरवाज़ा बन गया—अंधेरे से भरा हुआ, हल्की लाल रोशनी के साथ।
किताब के आखिरी खुले पन्ने पर लिखा था—
“अगर तुमने पढ़ा है… तो अब तुम्हें भीतर जाना होगा।”
आर्या ने दरवाज़े को देखा।
उसकी सांसें तेज़ थीं।
“अगर मैं अंदर गई… तो वापस नहीं आऊँगी,” उसने धीरे से कहा।
और उसी पल दरवाज़ा अपने आप खुल गया।
अंदर से सिर्फ एक आवाज़ आई—
“कहानी अभी बाकी है…”