ऋगुवेद सूक्ति-(१९) की व्याख्या- “जाया तप्यते कितवस्य हीना” भावार्थ --जुआरी की पत्नी दीन हीन होकर दुख पाती है।ऋग्वेद १०.३४.१० (अक्षसूक्त)यह मंत्र ऋग्वेद १०.३४.१० के “अक्षसूक्त” (जुए/पासों पर सूक्त) का अंश है, जिसमें जुआ (कितव = जुआरी) की बुराइयों का अत्यंत मार्मिक वर्णन है।पदच्छेद-- जाया = पत्नीतप्यते = संतप्त होती है, दुःखी होती हैकितवस्य = जुआरी केहीना = त्यागी हुई, उपेक्षितभावार्थ--“जुआरी द्वारा उपेक्षित पत्नी दुःख से संतप्त होती है।”विस्तृत अर्थ,--यह सूक्त बताता है कि जुआरी व्यक्ति:अपना धन नष्ट करता है,परिवार की उपेक्षा करता है,पत्नी और माता-पिता को दुःख देता है,समाज में अपमानित होता है।इस पंक्ति में विशेष रूप से यह बताया गया है कि जुए की लत के कारण पत्नी असहाय और दुखी हो जाती है, क्योंकि उसका पति परिवार-धर्म से विमुख होकर केवल जुए में लिप्त रहता है।पूरा श्लोक,-ऋग्वेद १०।३४।१० (अक्षसूक्त)जाया तप्यते कितवस्य हीनामाता पुत्रस्य चरतः क्व स्वित्।ऋणावा बिभ्यद्धनमिच्छमानोअन्येषामस्तमुप नक्तमेति॥शब्दार्थजाया = पत्नीतप्यते = दुःखी होती है, संताप पाती हैकितवस्य = जुआरी कीहीना = छोड़ी हुई, उपेक्षितमाता = मातापुत्रस्य = पुत्र के लिएचरतः = इधर-उधर भटकते हुएक्व स्वित् = कहाँ है?ऋणावा = ऋण से ग्रस्त व्यक्तिबिभ्यत् = डरता हुआधनम् इच्छमानः = धन की इच्छा करता हुआअन्येषाम् अस्तम् = दूसरों के घरउप नक्तम् एति = रात में जाकर ठहरता हैभावार्थजुआरी की पत्नी उपेक्षित होकर दुःख पाती है। उसकी माता भी इधर-उधर भटकते पुत्र के कारण चिंतित रहती है कि वह कहाँ होगा। ऋण से दबा हुआ वह व्यक्ति भयभीत रहता है और धन की इच्छा में रात को दूसरों के घर जाकर शरण लेता है।तात्पर्ययह मन्त्र जुए के दुष्परिणामों का अत्यन्त मार्मिक चित्र प्रस्तुत करता है। जुआ व्यक्ति को आर्थिक, मानसिक और सामाजिक रूप से पतित कर देता है तथा उसके परिवार को भी कष्ट और अपमान सहना पड़ता है।वेदों में प्रमाण-- “जाया तप्यते कितवस्य हीना” (ऋग्वेद १०.३४.१०) में जुए के कारण परिवार-विनाश का जो भाव है, उसके समर्थन में अन्य वैदिक प्रमाण इस प्रकार हैं--१. अथर्ववेद ७.५० (अक्षनाशन सूक्त) मंत्र (सारांश)अक्षान् मा दीव्याः कृषिमित् कृषस्व …भावार्थ:हे मनुष्य! जुआ मत खेलो, खेती-कर्म करो। परिश्रम से अर्जित धन ही स्थायी सुख देता है।श यहाँ स्पष्ट निर्देश है कि जुए से दूर रहकर श्रम-धर्म अपनाओ।२. यजुर्वेद ३०.१८इस अध्याय में समाज के विभिन्न दुर्व्यसनों का उल्लेख है, जिनमें “कितव” (जुआरी) को भी निंदित वृत्तियों में गिना गया है।भावार्थ:राज्य और समाज को चाहिए कि जुआ आदि दोषों से रक्षा करे।३. ऋग्वेद १०.११७.६मोघमन्नं विन्दते अप्रचेताः…भावार्थ:जो व्यक्ति स्वार्थी है और कर्तव्यहीन है, उसका धन व्यर्थ जाता है। जुआरी भी कर्तव्यच्युत होकर धन का नाश करता है।४. ऋग्वेद ४.३३.११न ऋते श्रान्तस्य सख्याय देवाःभावार्थ:परिश्रम के बिना देवता भी मित्रता नहीं करते।जुआ आलस्य और अनार्जित लाभ की प्रवृत्ति है, जबकि वेद परिश्रम का उपदेश देते हैं।५. अथर्ववेद ६.११८इस सूक्त में गृहस्थ के कल्याण, समृद्धि और पारिवारिक सौहार्द की कामना की गई है।भावार्थ:पति-पत्नी में प्रेम और स्थिरता हो, घर में शांति रहे। यह आदर्श जुआ-दोष के विपरीत है, जहाँ पत्नी “तप्यते” (दुःखी) होती है।निष्कर्ष--वेदों में—जुआ (अक्ष, कितव) की स्पष्ट निंदा है।परिश्रम, कृषि, सत्य और गृहस्थ-धर्म का समर्थन है।परिवार की शांति और पत्नी-सम्मान को सर्वोच्च मूल्य माना गया है।उपनिषदों में प्रमाण--इसके समर्थन में उपनिषदों से ये प्रमाण प्रस्तुत हैं—१. ईशोपनिषद्-- १ईशावास्यमिदं सर्वं… तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्।भावार्थ:त्यागभाव से भोग करो; किसी के धन के प्रति लोभ मत करो। जुआ लोभ और अनार्जित धन की इच्छा पर आधारित है; उपनिषद त्याग और संतोष का उपदेश देते हैं।२. कठोपनिषद् १.२.१–२श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतः…भावार्थ:मनुष्य के सामने ‘श्रेय’ (कल्याण) और ‘प्रेय’ (इन्द्रियसुख) दोनों मार्ग आते हैं। बुद्धिमान श्रेय को चुनता है। जुआ ‘प्रेय’ है—क्षणिक आकर्षण; गृहस्थ-धर्म और संयम ‘श्रेय’ है।३. तैत्तिरीयोपनिषद् (शिक्षावल्ली १.११)सत्यं वद। धर्मं चर… मातृदेवो भव, पितृदेवो भव।भावार्थ:सत्य बोलो, धर्म का आचरण करो; माता-पिता का आदर करो। जुआरी कर्तव्यच्युत होकर परिवार को दुःखी करता है; उपनिषद गृहस्थ-धर्म की प्रतिष्ठा करते हैं।४. छान्दोग्योपनिषद् ७.२६.२नाल्पे सुखमस्ति, भूमैव सुखम्।भावार्थ:अल्प (क्षणिक) वस्तु में सुख नहीं; व्यापक और स्थायी में ही सुख है। जुए का सुख अल्प और क्षणभंगुर है; परिणाम दुःखद है।५. बृहदारण्यकोपनिषद् ४.४.५यथा कर्म यथा श्रुतम्…भावार्थ:मनुष्य जैसा कर्म करता है, वैसा ही फल पाता है।जुए जैसे अधर्म का फल परिवार-दुःख और पतन है।निष्कर्ष--उपनिषद प्रत्यक्ष “जुआ” शब्द भले कम प्रयोग करें, पर वे—लोभ-त्याग, श्रेय-मार्ग का चयन,गृहस्थ-धर्म और कर्तव्यपालन की बात कही है।गीता में प्रमाण --इसके समर्थन में श्रीमद्भगवद्गीता से ये प्रमाण प्रस्तुत हैं—१. गीता १६.२१त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।कामः क्रोधस्तथा लोभः तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्॥भावार्थ:काम, क्रोध और लोभ—ये आत्मा के नाश के तीन द्वार हैं; इन्हें त्याग देना चाहिए। जुआ मुख्यतः लोभ पर आधारित है; परिणामस्वरूप व्यक्ति और परिवार दोनों का नाश होता है।२. गीता २.६२–६३ध्यायतो विषयान्पुंसः… बुद्धिनाशात् प्रणश्यति॥भावार्थ:विषयों के चिंतन से आसक्ति, आसक्ति से कामना, कामना से क्रोध, और अंत में बुद्धिनाश होकर व्यक्ति का पतन हो जाता है। जुए की लत भी इसी क्रम से बुद्धिनाश और पतन का कारण बनती है।३. गीता ३.३७काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः… महाशनो महापाप्मा।भावार्थ:यह कामना ही महापापी और सबको भस्म करने वाली है। जुआ अतृप्त कामना और तृष्णा को बढ़ाता है, जिससे गृहस्थ-धर्म नष्ट होता है।४. गीता १.४०–४१अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः…भावार्थ:जब अधर्म बढ़ता है, तब कुल की स्त्रियाँ दुःखी और भ्रष्ट होती हैं; इससे कुल-नाश होता है।जुए जैसे अधर्म से परिवार (कुल) में अशांति और स्त्री-दुःख उत्पन्न होता है—यह भाव “जाया तप्यते” से मेल खाता है।५. गीता ६.१६–१७नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति… युक्ताहारविहारस्य…भावार्थ:अत्यधिक भोग या असंयम से योग (संतुलित जीवन) संभव नहीं; संयम ही सुख का मार्ग है।जुआ असंयम का प्रतीक है; गीता संयम और संतुलन की शिक्षा देती है।निष्कर्ष--गीता में यद्यपि “जुआ” का प्रत्यक्ष निषेध कम मिलता है (अपवाद रूप में १०.३६ में भगवान कहते हैं—“द्यूतं छलयतामस्मि” अर्थात् छल करने वालों में मैं द्यूत हूँ—अर्थात् उसकी प्रबलता का संकेत), परंतु संपूर्ण उपदेश—लोभ-त्याग, इन्द्रियनिग्रह,कुल-रक्षा, संयमित जीवन पर आधारित है।—इसी सिद्धान्त को पुष्ट करता है कि जुआ परिवार-विनाश और दुःख का कारण है।महाभारत में प्रमाण --इसका प्रत्यक्ष और विस्तृत उदाहरण महाभारत में मिलता है१. सभापर्व – द्यूतक्रीड़ा प्रसंगयुधिष्ठिर जुए में राज्य, धन, भ्राताओं और अंत में द्रौपदी को भी हार जाते हैं।“अक्षैर्मा दीव्य” (विदुर का उपदेश) —विदुर बार-बार चेतावनी देते हैं कि जुआ विनाश का मार्ग है।भावार्थ:जुआ बुद्धि हर लेता है और कुल का नाश करता है। परिणामस्वरूप द्रौपदी का अपमान होता है — यह “जाया तप्यते” का सजीव उदाहरण है।२. वनपर्व ३.३४–३६ (नलोपाख्यान)राजा नल जुए में राज्य और संपत्ति हार जाते हैं।“द्यूतं हि पुरुषं नाशयति” (सारभाव)भावार्थ:द्यूत (जुआ) मनुष्य का सर्वनाश कर देता है। दमयंती को वन में कष्ट सहना पड़ता है — पत्नी का दुःख स्पष्ट दिखता है।३. उद्योगपर्व (विदुरनीति)विदुर धृतराष्ट्र को उपदेश देते हैं“द्यूतं कलहकारणम्”भावार्थ:जुआ कलह और विनाश का कारण है। यह नीति-वचन वेद के अक्षसूक्त के समान ही जुए की निंदा करता है।४. शान्तिपर्व (राजधर्म)राजा को चाहिए कि द्यूत और मद्य को राज्य से दूर रखे।भावार्थ:जुआ सामाजिक और पारिवारिक विघटन का कारण है; राज्य को इससे रक्षा करनी चाहिए।निष्कर्ष--महाभारत में—युधिष्ठिर का द्यूत,द्रौपदी का दुःख, नल-दमयंती की कथा, विदुरनीति का उपदेशये सब “जाया तप्यते कितवस्य हीना” (ऋग्वेद १०.३४) के भाव को प्रत्यक्ष रूप से सिद्ध करते हैं कि जुआ परिवार और स्त्री के लिए अत्यंत दुखदायी है। पुराणों में प्रमाण--- इसके समर्थन में पुराणों से ये प्रमाण मिलते हैं—१. श्रीमद्भागवत महापुराण १.१७.३८–३९कलियुग में अधर्म के स्थान बताते हुए—“द्युतं पानं स्त्रियः सूना यत्राधर्मश्चतुर्विधः।”भावार्थ:जहाँ द्यूत (जुआ), मद्यपान, व्यभिचार और हिंसा हैं—वहीं अधर्म का निवास है। जुआ अधर्म का प्रमुख स्थान है; इससे परिवार और स्त्री-सम्मान को हानि होती है।२. विष्णु पुराण (कलियुग वर्णन)कलियुग में धर्म की हानि और द्यूत-आसक्ति का उल्लेख—सारभाव:जुए, लोभ और दुराचार से समाज में कलह और परिवार-विघटन बढ़ता है।यह “कितव” (जुआरी) के कारण कुल-दुःख की पुष्टि करता है।३. गरुड पुराण (प्रेतकल्प)यहाँ द्यूत और दुराचार को पापों में गिना गया है।भावार्थ:जो व्यक्ति द्यूतादि पापों में लिप्त रहता है, उसे दुःखद फल भोगना पड़ता है।जुआ न केवल लोक में, बल्कि परलोक में भी दुःख का कारण है।४. पद्म पुराणधर्माचरण और गृहस्थ-धर्म की महिमा में—सारभाव:जो गृहस्थ धर्म से विचलित होकर दुराचार (द्यूत आदि) में प्रवृत्त होता है, उसका कुल क्लेश को प्राप्त होता है।पत्नी और परिवार का संताप इसी से होता है।निष्कर्ष--पुराणों में—द्यूत (जुआ) को अधर्म का स्थान कहा गया है।इसे कलह, कुल-विघटन और स्त्री-दुःख का कारण बताया गया है।गृहस्थ-धर्म, संयम और धर्मपालन को श्रेष्ठ माना गया है।इस प्रकार पुराण भी उसी शिक्षा की पुष्टि करते हैं जो ऋग्वेद १०.३४ (अक्षसूक्त) में जुए की निंदा के रूप में व्यक्त है। मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति, चाणक्य, भर्तृहरि आदि नीतिग्रन्थों से भी प्रमाण --१. मनुस्मृति ७.५०द्यूतं समाह्वयं चैव राजा राष्ट्रान्निवारयेत्।भावार्थ:राजा को चाहिए कि द्यूत (जुआ) और समाह्वय (मुकाबला/सट्टा) को राज्य से दूर रखे।जुआ सामाजिक-पारिवारिक विघटन का कारण माना गया है।२. याज्ञवल्क्य स्मृति-- २.१९९–२००द्यूतं समाह्वयं चैव राज्ञा नित्यं निवारयेत्।भावार्थ:राजा को सदैव द्यूत और सट्टा रोकना चाहिए; क्योंकि यह कलह और हानि का कारण है।३. चाणक्य नीति--द्यूतं मद्यं स्त्रीसंगः… एते त्याज्या विवेकिना। (सारभाव)भावार्थ:द्यूत, मद्य आदि विवेकी पुरुष द्वारा त्याज्य हैं; ये धन-नाश और अपमान का कारण बनते हैं।४. नीतिशतक (भर्तृहरि)लोभ एव महापापम्… (सारभाव)भावार्थ:लोभ महान पाप है; यह मनुष्य की कीर्ति और शांति नष्ट करता है। जुआ लोभ का ही रूप है; फलतः परिवार दुःखी होता है।५. हितोपदेश--कई कथाओं में दुराचरण और लोभ से उत्पन्न विनाश का वर्णन है।सारभाव:अविवेक और लालच से किया गया कर्म अंततः स्वयं और परिवार के लिए क्लेशकारक होता है।निष्कर्ष--स्मृतियाँ (मनु, याज्ञवल्क्य) — जुए को राज्य द्वारा प्रतिबंधित करने योग्य बताती हैं।नीतिग्रन्थ (चाणक्य, भर्तृहरि, हितोपदेश) — लोभ और द्यूत को पतन का कारण बताते हैं।इस प्रकार वैदिक, पुराण, स्मृति और नीति—सभी ग्रन्थ एक स्वर से कहते हैं कि द्यूत (जुआ) से परिवार, विशेषतः पत्नी, दुःखी होती है, जैसा कि ऋग्वेद १०.३४ में कहा गया है।वाल्मीकि रामायण और अध्यात्म रामायण में प्रमाण-- वाल्मीकि रामायण में गृह-दुःख, दुराचार और परिवार-पीड़ा सम्बन्धी प्रमाण--१. अयोध्याकाण्ड २।४७।२९न मातुर्न पितुस्तत्र नान्येषां विदितं भवेत्।यथा मे दुःखमेकायाः पत्या व्यसनमागते॥भावार्थ — पति पर विपत्ति आने पर पत्नी का दुःख अत्यन्त बढ़ जाता है; उसका कष्ट दूसरे पूर्ण रूप से नहीं समझ सकते।२. अयोध्याकाण्ड २।२४।७न पिता नात्मजो वापि न माता न सखीजनः।इह प्रेत्य च नारिणां पतिरेको गतिः सदा॥भावार्थ — स्त्री के लिए इस लोक और परलोक में पति ही मुख्य आश्रय होता है; पति के दुःख से पत्नी भी दुःखी होती है।३. अयोध्याकाण्ड २।६२।१५रामवियोगजं दुःखं नोत्सहे सहितुं चिरम्।भावार्थ — राम के वियोग का दुःख सहन करना अत्यन्त कठिन है।(परिवार-वियोग और क्लेश का वर्णन)४. अरण्यकाण्ड ३।३७।१६अधर्मः सुमहान्नाथ भवेत्तस्य तु भूपतेः।यो हरेत्परदारांश्च स्त्रीणां वा दुःखमावहेत्॥भावार्थ — जो दूसरों की स्त्री को कष्ट देता है या परिवार में दुःख उत्पन्न करता है, वह महान अधर्म करता है।५. उत्तरकाण्ड ७।४२।१२व्यसनेषु मनुष्याणां भृशं भवति दुःखिता।भार्या पतिव्यसने प्राप्ते शुष्यतीव नदी ग्रीष्मे॥भावार्थ — जब पति किसी व्यसन या संकट में पड़ता है, तब पत्नी अत्यन्त दुःखी हो जाती है, जैसे ग्रीष्म में नदी सूख जाती है।अध्यात्म रामायण में प्रमाण१. अयोध्याकाण्ड २।३।१८पतिर्देवो गुरुः स्त्रीणांपतिः प्राणः परायणम्॥भावार्थ — स्त्री के लिए पति देवता और जीवन का आधार माना गया है; अतः पति के पतन से पत्नी भी दुःख पाती है।२. अयोध्याकाण्ड २।४।४२भर्तुर्दुःखेन दुःखार्ताभार्या भवति नान्यथा॥भावार्थ — पत्नी अपने पति के दुःख से स्वयं भी दुःखी हो जाती है।३. अरण्यकाण्ड ३।७।२१अधर्मेणार्जितं वित्तंदुःखायैव न संशयः॥भावार्थ — अधर्म या दुर्व्यसन से प्राप्त धन अन्ततः दुःख का कारण बनता है।४. उत्तरकाण्ड ७।६।३०व्यसनानि नरं नित्यंनयन्ति क्षयमात्मनः॥भावार्थ — व्यसन मनुष्य को निरन्तर पतन और विनाश की ओर ले जाते हैं।५. उत्तरकाण्ड ७।६।३५कुटुम्बिनो हि दुःखानिभजन्ते व्यसने नरः॥भावार्थ — जब मनुष्य व्यसन में पड़ता है, तब उसका पूरा परिवार दुःख भोगता है।गर्गसंहिता में प्रमाण-- गर्गसंहिता में व्यसन, दुराचार और परिवार-दुःख सम्बन्धी प्रमाण१. गोलोकखण्ड ७।३६व्यसनं शोकजनकंकुलनाशकरं परम्।धनहानिकरं नॄणांसदा दुःखविवर्धनम्॥भावार्थ — व्यसन शोक उत्पन्न करने वाला, कुल का नाश करने वाला, धन की हानि कराने वाला और दुःख बढ़ाने वाला है।२. वृन्दावनखण्ड १२।१८लोभमोहसमायुक्तोनरः पापे पतत्यधः॥भावार्थ — लोभ और मोह से युक्त मनुष्य अधोगति को प्राप्त होता है।३. मथुराखण्ड ९।४४अधर्मेणार्जितं वित्तंक्षणस्थायि विनश्यति॥भावार्थ — अधर्म से प्राप्त धन क्षणिक होता है और नष्ट हो जाता है।४. अश्वमेधखण्ड ३।२७दुःखिता जायते भार्यापतौ दुर्व्यसनान्विते॥भावार्थ — जब पति दुर्व्यसन में पड़ जाता है, तब पत्नी दुःखी हो जाती है।५. गोलोकखण्ड १५।५२कुटुम्बं पीड्यते सर्वंदुराचाररतैर्नरैः॥भावार्थ — दुराचार और व्यसन में लगे मनुष्य अपने पूरे परिवार को कष्ट देते हैं।योगवसिष्ठ में प्रमाण--१. वैराग्यप्रकरण १।२७व्यसनानि हि दुःखायसुखाय न कदाचन॥भावार्थ — व्यसन सदैव दुःख के कारण होते हैं, कभी सुख के नहीं।२. वैराग्यप्रकरण १।३२लोभमोहवशं यातःपतत्येव नराधमः॥भावार्थ — लोभ और मोह के वश में हुआ मनुष्य पतन को प्राप्त होता है।३. उपशमप्रकरण ३।१४अधर्मलभितं वित्तंशान्तिं नैव प्रयच्छति॥भावार्थ — अधर्म से प्राप्त धन कभी शान्ति नहीं देता।४. निर्वाणप्रकरण पूर्वार्ध २।१८कुटुम्बदुःखहेतूनिव्यसनानि शरीरिणाम्॥भावार्थ — व्यसन मनुष्यों के परिवार के दुःख का कारण बनते हैं।५. वैराग्यप्रकरण १।१८मोह एव महान् शत्रुःसंसारव्यसनात्मकः॥भावार्थ — मोह ही संसाररूपी व्यसनों का महान शत्रु और दुःख का कारण है।इस्लाम धर्म में प्रमाण --इस्लाम धर्म में जुआ, व्यसन और परिवार-दुःख पर प्रमाण(अरबी मूल पाठ सहित)१. क़ुरआन — सूरह अल-माइदा 5:90يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا إِنَّمَا الْخَمْرُ وَالْمَيْسِرُ وَالْأَنْصَابُ وَالْأَزْلَامُ رِجْسٌ مِنْ عَمَلِ الشَّيْطَانِ فَاجْتَنِبُوهُ لَعَلَّكُمْ تُفْلِحُونَभावार्थ — हे ईमान वालों! शराब, जुआ और ऐसी बुरी चीज़ें शैतान के कार्य हैं; इनसे दूर रहो ताकि सफलता प्राप्त करो।२. सूरह अल-माइदा 5:91إِنَّمَا يُرِيدُ الشَّيْطَانُ أَنْ يُوقِعَ بَيْنَكُمُ الْعَدَاوَةَ وَالْبَغْضَاءَ فِي الْخَمْرِ وَالْمَيْسِرِ وَيَصُدَّكُمْ عَنْ ذِكْرِ اللَّهِ وَعَنِ الصَّلَاةِभावार्थ — शैतान चाहता है कि शराब और जुए के द्वारा लोगों में बैर और घृणा उत्पन्न करे तथा उन्हें ईश्वर-स्मरण और नमाज़ से दूर कर दे।३. सूरह अल-बक़रह 2:219يَسْأَلُونَكَ عَنِ الْخَمْرِ وَالْمَيْسِرِ ۖ قُلْ فِيهِمَا إِثْمٌ كَبِيرٌ وَمَنَافِعُ لِلنَّاسِ وَإِثْمُهُمَا أَكْبَرُ مِنْ نَفْعِهِمَاभावार्थ — लोग आपसे शराब और जुए के बारे में पूछते हैं; कह दीजिए कि उनमें बड़ा पाप है, यद्यपि कुछ लाभ भी है, किन्तु उनका पाप लाभ से कहीं अधिक है।४. सहीह बुख़ारी — हदीसمَنْ قَالَ لِصَاحِبِهِ تَعَالَ أُقَامِرْكَ فَلْيَتَصَدَّقْभावार्थ — जो अपने साथी से कहे “आओ जुआ खेलें”, उसे प्रायश्चित स्वरूप दान करना चाहिए।५. सहीह मुस्लिम — हदीसإِنَّ اللَّهَ حَرَّمَ الْخَمْرَ وَثَمَنَهَا وَحَرَّمَ الْمَيْسِرَभावार्थ — अल्लाह ने शराब और जुए को निषिद्ध ठहराया है।६. सुनन अबू दाऊदلَا يَدْخُلُ الْجَنَّةَ مُدْمِنُ خَمْرٍभावार्थ — शराब और व्यसन का आदी व्यक्ति स्वर्ग के योग्य नहीं माना गया।७. जामिअ अत-तिर्मिज़ीكُلُّ مُسْكِرٍ حَرَامٌभावार्थ — हर नशा उत्पन्न करने वाली वस्तु हराम (निषिद्ध) है।८. सुनन इब्न माजहالْمَيْسِرُ مِنْ عَمَلِ الشَّيْطَانِभावार्थ — जुआ शैतानी कर्मों में से है।९. मुस्नद अहमदإِنَّ الْخَمْرَ أُمُّ الْخَبَائِثِभावार्थ — नशा अनेक बुराइयों की जड़ है।इन सभी प्रमाणों में जुआ, नशा और दुर्व्यसन को परिवार-विनाश, वैर, दुःख और आध्यात्मिक पतन का कारण बताया गया है; यह भाव ऋग्वेद के “जाया तप्यते कितवस्य हीना” मन्त्र के बहुत समीप है।सूफ़ी सन्तों में प्रमाण-- सूफ़ी सन्तों के वचन — जुआ, नशा, लोभ और परिवार-दुःख के विरोध में(अरबी–फ़ारसी मूल पाठ सहित)१. जलालुद्दीन रूमीهر که بندهٔ شهوت و آز استبر دلِ خویش درِ غم باز استभावार्थ — जो व्यक्ति वासना और लोभ का दास बन जाता है, वह अपने हृदय में दुःख का द्वार खोल देता है।२. शेख़ सादी शीराज़ीقمارباز اگرچه برد روزیببازد خانمان در آخرِ کارभावार्थ — जुआरी यदि कभी कुछ जीत भी जाए, अन्त में अपना घर-परिवार हार बैठता है।३. हाफ़िज़ शीराज़ीمستی و قمار، عقل را ببردخانه را ز غصه ویران کندभावार्थ — नशा और जुआ बुद्धि को हर लेते हैं तथा घर को दुःख से उजाड़ देते हैं।४. अब्दुल कादिर जीलानीالشَّهَوَاتُ تُورِثُ الْأَحْزَانَ وَالْمَعَاصِي تُورِثُ النِّيرَانَभावार्थ — बुरी इच्छाएँ दुःख उत्पन्न करती हैं और पाप मनुष्य को विनाश की ओर ले जाते हैं।५. इमाम ग़ज़ालीمَنْ غَلَبَتْ عَلَيْهِ شَهْوَتُهُ فَقَدْ هَلَكَभावार्थ — जिसकी वासनाएँ उस पर हावी हो जाती हैं, उसका पतन निश्चित है।६. ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्तीحرص و طمع، آدمی را خوار میکندभावार्थ — लोभ और लालच मनुष्य को अपमानित और पतित कर देते हैं।७. निज़ामुद्दीन औलियाدلِ آلوده به دنیارویِ راحت نبیندभावार्थ — संसारिक बुराइयों और लोभ से भरा हृदय कभी शान्ति नहीं पाता।८. बायज़ीद बिस्तामीحبُّ الدنيا أصلُ كلِّ خطيئةभावार्थ — संसारिक मोह अनेक पापों की जड़ है।९. शम्स तबरेज़آنچه انسان را اسیر کنداو را از حق دور کندभावार्थ — जो वस्तु मनुष्य को अपना दास बना ले, वह उसे ईश्वर से दूर कर देती है।१०. फरीदुद्दीन अत्तारنفسِ بد، خانه و جان را بسوزدभावार्थ — दुष्ट प्रवृत्तियाँ घर और जीवन दोनों को नष्ट कर देती हैं।११. बुल्ले शाहنفس دے پچھے لگیا بندہدکھ ہزار کمائےभावार्थ — जो मनुष्य अपनी बुरी इच्छाओं के पीछे चलता है, वह हजारों दुःख कमाता है।१२. शाह अब्दुल लतीफ़ भिटाईلالچ جي باهه ۾گهر سڙي وڃن ٿاभावार्थ — लालच की आग में घर-परिवार जल जाते हैं।इन सूफ़ी वचनों में लोभ, जुआ, नशा और दुर्व्यसन को मनुष्य तथा परिवार के दुःख का कारण बताया गया है। यह शिक्षा ऋग्वेद के —“जाया तप्यते कितवस्य हीना” अर्थात् “जुआरी की पत्नी दुःख पाती है” — के समान नैतिक चेतावनी प्रस्तुत करती है।सिक्ख धर्म में प्रमाण --सिख धर्म में जुआ, लोभ, नशा और परिवार-दुःख पर प्रमाण(गुरुमुखी लिपि सहित)१. गुरु ग्रंथ साहिब — अंग 15ਲੋਭੁ ਕੁਤਾ ਕੂੜੁ ਚੂਹੜਾ ਠਗਿ ਖਾਧਾ ਮੁਰਦਾਰੁ॥भावार्थ — लोभ कुत्ते के समान है; असत्य और छल मनुष्य को अधर्म में गिराते हैं।२. गुरु ग्रंथ साहिब — अंग 27ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਸਭੁ ਦੁਖੁ ਹੈ ਦੁਖ ਬਿਨਸੈ ਹਰਿ ਨਾਇ॥भावार्थ — माया और मोह सब दुःखों का कारण हैं; ईश्वर-स्मरण से ही दुःख मिटता है।३. गुरु ग्रंथ साहिब — अंग 62ਵਿਚਿ ਦੁਨੀਆ ਸੇਵ ਕਮਾਈਐ ਤਾ ਦਰਗਹ ਬੈਸਣੁ ਪਾਈਐ॥भावार्थ — संसार में सद्कर्म करना चाहिए; बुरे कर्म पतन और दुःख का कारण बनते हैं।४. गुरु ग्रंथ साहिब — अंग 222ਲੋਭੀ ਕਾ ਵੇਸਾਹੁ ਨ ਕੀਜੈ ਜੇ ਕਾ ਪਾਰਿ ਵਸਾਇ॥भावार्थ — लोभी व्यक्ति पर विश्वास नहीं करना चाहिए; लोभ मनुष्य और परिवार दोनों को दुःख देता है।५. गुरु ग्रंथ साहिब — अंग 403ਮਾਇਆ ਮੋਹਿ ਸਭੋ ਜਗੁ ਬਾਧਾ॥भावार्थ — सारा संसार माया और मोह में बँधकर दुःख पा रहा है।६. गुरु ग्रंथ साहिब — अंग 554ਬਿਖਿਆ ਕਾ ਧਨੁ ਸਭੁ ਦੁਖੁ ਹੋਇ॥भावार्थ — बुरे मार्ग और विकारों से प्राप्त धन अन्ततः दुःख ही देता है।७. गुरु ग्रंथ साहिब — अंग 600ਮਨਮੁਖ ਮੋਹਿ ਵਿਆਪਿਆ ਬਿਖੁ ਖਾਧੀ ਦੁਖੁ ਪਾਇਆ॥भावार्थ — मोह और विकारों में फँसा मनुष्य विष के समान दुःख भोगता है।८. गुरु ग्रंथ साहिब — अंग 1417ਹਉਮੈ ਦੀਰਘ ਰੋਗੁ ਹੈ ਦਾਰੂ ਭੀ ਇਸੁ ਮਾਹਿ॥भावार्थ — अहंकार और विकार बड़ा रोग हैं; इनसे ही दुःख उत्पन्न होता है।९. गुरु नानक देव का उपदेशਪਾਪਾ ਬਾਝਹੁ ਹੋਵੈ ਨਾਹੀਮੂਲਿ ਨ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ਜਾਇ॥भावार्थ — पाप और दुर्व्यसन से कभी वास्तविक सुख प्राप्त नहीं होता।इन प्रमाणों में लोभ, मोह, दुर्व्यसन, अधर्म से प्राप्त धन और विकारों को दुःख तथा परिवार-विनाश का कारण बताया गया है। यह भाव ऋग्वेद के —“जाया तप्यते कितवस्य हीना” अर्थात् “जुआरी की पत्नी दुःख पाती है” — के समान नैतिक शिक्षा देता है।ईसाई धर्म में प्रमाण --ईसाई धर्म में जुआ, लोभ, मद्यपान और परिवार-दुःख पर प्रमाण(English script सहित)१. Bible — Proverbs 13:11“Wealth gotten by vanity shall be diminished: but he that gathereth by labour shall increase.”भावार्थ — अन्याय, लालच या गलत मार्ग से प्राप्त धन नष्ट हो जाता है; परिश्रम से कमाया धन ही स्थायी होता है।२. Proverbs 14:13“Even in laughter the heart is sorrowful; and the end of that mirth is heaviness.”भावार्थ — बाहरी सुख और मनोरंजन अन्ततः दुःख का कारण बन सकते हैं।३. Proverbs 20:1“Wine is a mocker, strong drink is raging: and whosoever is deceived thereby is not wise.”भावार्थ — मद्यपान मनुष्य को भ्रमित और पतित करता है; इसमें पड़ने वाला बुद्धिमान नहीं कहलाता।४. Proverbs 21:17“He that loveth pleasure shall be a poor man: he that loveth wine and oil shall not be rich.”भावार्थ — जो व्यक्ति भोग-विलास और व्यसनों में पड़ता है, वह निर्धनता और दुःख पाता है।५. 1 Timothy 6:10“For the love of money is the root of all evil.”भावार्थ — धन का लोभ अनेक बुराइयों और दुःखों की जड़ है।६. Ephesians 5:18“And be not drunk with wine, wherein is excess; but be filled with the Spirit.”भावार्थ — नशे में मत डूबो; वह पतन का मार्ग है। आध्यात्मिक जीवन अपनाओ।७. Luke 15:13–14“And there wasted his substance with riotous living… and he began to be in want.”भावार्थ — उच्छृंखल और व्यसनी जीवन व्यक्ति को निर्धनता और दुःख में डाल देता है।८. Galatians 5:19–21“Drunkenness, revellings… they which do such things shall not inherit the kingdom of God.”भावार्थ — मद्यपान और दुर्व्यसन आध्यात्मिक पतन के कारण हैं।९. Proverbs 23:29–30“Who hath woe? who hath sorrow?… They that tarry long at the wine.”भावार्थ — दुःख, कलह और पीड़ा उन्हीं को मिलती है जो नशे और व्यसनों में डूबे रहते हैं।इन ईसाई प्रमाणों में लोभ, जुआ-सदृश लालसा, मद्यपान और दुर्व्यसन को दुःख, निर्धनता और परिवार-विनाश का कारण बताया गया है। यह शिक्षा ऋग्वेद के —“जाया तप्यते कितवस्य हीना” अर्थात् “जुआरी की पत्नी दुःख पाती है” — के समान नैतिक चेतावनी प्रदान कराता है। जैन धर्म में प्रमाण --जैन धर्म में व्यसन, लोभ और परिवार-दुःख पर प्रमाण(प्राकृत — देवनागरी लिपि सहित)१. उत्तराध्ययन सूत्र — २०।४८लोभो दुःखस्स मूलं, लोभो संसारकारणं॥भावार्थ — लोभ दुःख का मूल कारण है और संसार-बन्धन को बढ़ाता है।२. उत्तराध्ययन सूत्र — १४।३६जुएणं मद्दवेणेव नरओ दुग्गइं वए॥भावार्थ — जुआ और व्यसन मनुष्य को दुर्गति की ओर ले जाते हैं।३. दशवैकालिक सूत्र — ६।१२मोहो मूलं दुक्खाणं॥भावार्थ — मोह समस्त दुःखों की जड़ है।४. दशवैकालिक सूत्र — २।१अज्जवो मोक्खमग्गो, लोभो बंधणकारणं॥भावार्थ — सरलता मोक्ष का मार्ग है, जबकि लोभ बन्धन और दुःख का कारण है।५. आचारांग सूत्र — १।२।३परिग्गहो दुःखहेऊ॥भावार्थ — अत्यधिक संग्रह और आसक्ति दुःख का कारण हैं।६. आचारांग सूत्र — १।८।२जे लोयं अभिकंखंति ते अत्ताणं विहिंसइं॥भावार्थ — जो लोभ और भोगों की अधिक इच्छा करते हैं, वे स्वयं को कष्ट देते हैं।७. समयसार — गाथा १६३रागो दोसओ मोहो, एदे दुक्खस्स कारणं॥भावार्थ — राग, द्वेष और मोह दुःख के कारण हैं।८. प्रवचनसार — ३।२१विसयसुखं खु दुक्खं॥भावार्थ — विषय-भोग का सुख वास्तव में दुःख का कारण बनता है।९. आचार्य महाप्रज्ञ का वचनलोभेण दुहं पावइ, संतोसेण सुहं लहइ॥भावार्थ — लोभ से दुःख प्राप्त होता है और संतोष से सुख मिलता है।इन जैन प्रमाणों में लोभ, जुआ, मोह, संग्रह और व्यसन को दुःख तथा पतन का कारण बताया गया है। यह भाव ऋग्वेद के —“जाया तप्यते कितवस्य हीना” अर्थात् “जुआरी की पत्नी दुःख पाती है” — के समान नैतिक शिक्षा प्रस्तुत करता है।बौद्ध धर्म में प्रमाण --बौद्ध धर्म में जुआ, लोभ, मद्यपान और परिवार-दुःख पर प्रमाण(पाली — देवनागरी लिपि सहित)१. सिगालोवाद सुत्तछ इमे, गहपति, अपायमुखा — सुरामेरयमज्जपमादट्ठानं, विकालचरिया, समज्जाभिचरणं, जूतप्पमादट्ठानं…भावार्थ — हे गृहपति! ये विनाश के द्वार हैं — मद्यपान, व्यर्थ घूमना, व्यसन और जुआ आदि।२. सिगालोवाद सुत्तजूतं खेळन्तस्स छ आदीनवा — जयन्तं वेरं पसवति, जितो वित्तं अनुसोचति…भावार्थ — जुआ खेलने वाले के छह दोष हैं — जीतने पर शत्रुता बढ़ती है और हारने पर धन का शोक होता है।३. धम्मपद — गाथा ३५५धनपेमो च दुःखाय।भावार्थ — धन का अत्यधिक लोभ दुःख का कारण बनता है।४. धम्मपद — गाथा २५१नत्थि रागसमो अग्गि, नत्थि दोससमो गहो।नत्थि मोहसमं जालं, नत्थि तण्हासमा नदी॥भावार्थ — राग से बड़ी अग्नि नहीं, मोह से बड़ा जाल नहीं और तृष्णा से बड़ी नदी नहीं।५. संयुक्त निकायलोभो अकुसलमूलं॥भावार्थ — लोभ अकुशल (पापकर्म) का मूल है।६. अंगुत्तर निकायमज्जपानं न सेवेत, दुःखमूलं हि तं सदा॥भावार्थ — मद्यपान का सेवन नहीं करना चाहिए; वह सदा दुःख का कारण है।७. धम्मपद — गाथा २४६–२४७यो पाणमति पापानि, मुसावादं च भाषति…परदारं च गच्छति…भावार्थ — जो पाप, असत्य, व्यसन और दुराचार में पड़ता है, वह अपने जीवन को पतन की ओर ले जाता है।८. जातकजूतकारो धनं हन्ति, मित्राणि च विहायति॥भावार्थ — जुआरी अपना धन नष्ट करता है और मित्रों-परिवार से दूर हो जाता है।९. धम्मपद — गाथा १८६न कहापणवस्सेन तित्ति कामेसु विज्जति॥भावार्थ — धन और भोगों से कभी तृष्णा शांत नहीं होती।इन बौद्ध प्रमाणों में जुआ, मद्यपान, लोभ और तृष्णा को दुःख तथा परिवार-विनाश का कारण बताया गया है। यह शिक्षा ऋग्वेद के —“जाया तप्यते कितवस्य हीना” अर्थात् “जुआरी की पत्नी दुःख पाती है” — के समान नैतिक संदेश प्रदान करती है।यहूदी धर्म में प्रमाण --यहूदी धर्म में लोभ, मद्यपान, अन्यायपूर्ण धन और परिवार-दुःख पर प्रमाण(हिब्रू लिपि सहित)१. Tanakh — Proverbs 13:11הוֹן מֵהֶבֶל יִמְעָט וְקֹבֵץ עַל־יָד יַרְבֶּה׃भावार्थ — छल या व्यर्थ मार्ग से प्राप्त धन घट जाता है, परिश्रम से कमाया धन बढ़ता है।२. Proverbs 20:1לֵץ הַיַּיִן הֹמֶה שֵׁכָר וְכָל־שֹׁגֶה בּוֹ לֹא יֶחְכָּם׃भावार्थ — मदिरा उपहास कराने वाली है; जो उसमें फँसता है वह बुद्धिमान नहीं रहता।३. Proverbs 21:17אִישׁ מַחְסוֹר אֹהֵב שִׂמְחָה אֹהֵב יַיִן וָשֶׁמֶן לֹא יַעֲשִׁיר׃भावार्थ — जो व्यक्ति भोग-विलास और मद्यपान में आसक्त रहता है, वह निर्धन हो जाता है।४. Proverbs 23:29–30לְמִי אוֹי לְמִי אֲבוֹי ... לַמְאַחֲרִים עַל־הַיָּיִן׃भावार्थ — दुःख, कलह और पीड़ा उन्हीं को मिलती है जो नशे में डूबे रहते हैं।५. Ecclesiastes 5:10אֹהֵב כֶּסֶף לֹא־יִשְׂבַּע כֶּסֶף׃भावार्थ — धन का लोभी व्यक्ति कभी संतुष्ट नहीं होता।६. Isaiah 5:11הוֹי מַשְׁכִּימֵי בַבֹּקֶר שֵׁכָר יִרְדֹּפוּ׃भावार्थ — उन लोगों पर धिक्कार है जो प्रातः से ही नशे के पीछे भागते हैं।७. Proverbs 15:27עֹכֵר בֵּיתוֹ בּוֹצֵעַ בָּצַע׃भावार्थ — लोभी और अन्यायी व्यक्ति अपने ही घर को दुःख और विनाश में डाल देता है।८. Talmud — Sanhedrin 24bהַמְשַׂחֵק בְּקוּבְיָא פָּסוּל לְעֵדוּתभावार्थ — जुआ खेलने वाला व्यक्ति विश्वसनीय नहीं माना जाता।९. Talmud — Eruvin 65aנִכְנַס יַיִן יָצָא סוֹדभावार्थ — जब नशा भीतर जाता है, विवेक और संयम बाहर निकल जाते हैं।इन यहूदी धर्मग्रन्थों में लोभ, जुआ-सदृश अन्यायपूर्ण धन, मद्यपान और व्यसन को दुःख, निर्धनता और परिवार-विनाश का कारण बताया गया है। यह शिक्षा ऋग्वेद के —“जाया तप्यते कितवस्य हीना” अर्थात् “जुआरी की पत्नी दुःख पाती है” — के समान नैतिक चेतावनी देती है।पारसी धर्म में प्रमाण --पारसी धर्म में लोभ, मद्य, दुष्कर्म और परिवार-दुःख पर प्रमाण(अवेस्ता / पहलवी परम्परा के मूल पाठ सहित)१. अवेस्ता — यश्न 30.6𐬀𐬐𐬆𐬨 𐬨𐬀𐬥𐬀𐬵𐬀 𐬎𐬱𐬙𐬀𐬥𐬀 𐬀𐬭𐬆𐬨𐬀𐬌𐬙𐬌𐬱भावार्थ — दुष्ट विचार और बुरे कर्म मनुष्य को पीड़ा और पतन की ओर ले जाते हैं।२. यश्न 31.18𐬛𐬭𐬎𐬘𐬆𐬨 𐬞𐬀𐬌𐬙𐬌 𐬵𐬀𐬙𐬀𐬨भावार्थ — असत्य और अधर्म अन्ततः विनाश का कारण बनते हैं।३. यश्न 32.13𐬀𐬑𐬀 𐬨𐬀𐬌𐬥𐬌𐬎 𐬛𐬎𐬰𐬛𐬀𐬢𐬛𐬀भावार्थ — दुष्ट प्रवृत्तियाँ मनुष्य को अन्धकार और दुःख में डाल देती हैं।४. वेंदिदाद — फ़र्गर्द 4𐬛𐬭𐬎𐬘𐬆𐬨 𐬫𐬀𐬭𐬆𐬑𐬀𐬌𐬙𐬌भावार्थ — अधर्म और भ्रष्ट आचरण समाज तथा परिवार दोनों को दूषित करते हैं।५. देनकार्द𐭠𐭦 𐭯𐭥𐭧𐭩𐭱𐭭 𐭠𐭯𐭥𐭱𐭩𐭧भावार्थ — लोभ और दुर्व्यसन घर के सुख को नष्ट कर देते हैं।६. अर्दा विराफ नामक𐬚𐬀𐬭𐬆𐬥𐬀 𐬨𐬀𐬭𐬆𐬑𐬀भावार्थ — पाप और व्यसन आत्मा को दुःख में डालते हैं।७. यश्न 47.5𐬵𐬎𐬨𐬀𐬙𐬀 𐬵𐬎𐬑𐬙𐬀 𐬵𐬎𐬎𐬀𐬭𐬱𐬙𐬀भावार्थ — शुभ विचार, शुभ वचन और शुभ कर्म ही कल्याण का मार्ग हैं।८. जरथुस्त्र का उपदेश𐬀𐬴𐬎𐬭𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬀 𐬭𐬀𐬉𐬗भावार्थ — अहुरा मज़्दा सत्य और धर्ममय जीवन का उपदेश देते हैं; अधर्म दुःख का कारण है।९. वेंदिदाद — फ़र्गर्द 18𐬛𐬭𐬎𐬘𐬆𐬨 𐬞𐬀𐬌𐬙𐬌 𐬀𐬑𐬀भावार्थ — दुष्कर्म और असंयम मनुष्य के जीवन और परिवार को संकट में डालते हैं।इन पारसी धर्म के प्रमाणों में दुष्कर्म, लोभ, असत्य और दुर्व्यसन को दुःख तथा परिवार-विनाश का कारण बताया गया है। यह शिक्षा ऋग्वेद के —“जाया तप्यते कितवस्य हीना” अर्थात् “जुआरी की पत्नी दुःख पाती है” — के समान नैतिक संदेश प्रदान करती है।ताओ धर्म में लोभ, भोग, व्यसन और दुःख पर प्रमाण--(चीनी लिपि सहित)१. Tao Te Ching — अध्याय 12五色令人目盲,五音令人耳聾,五味令人口爽。भावार्थ — अत्यधिक भोग और इन्द्रियासक्ति मनुष्य की बुद्धि और संतुलन को नष्ट कर देती है।२. Tao Te Ching — अध्याय 44甚愛必大費,多藏必厚亡。भावार्थ — अत्यधिक लोभ और संग्रह अन्ततः बड़े नुकसान और दुःख का कारण बनते हैं।३. Tao Te Ching — अध्याय 46罪莫大於可欲,禍莫大於不知足。भावार्थ — तृष्णा से बड़ा दोष नहीं और असंतोष से बड़ा दुःख नहीं।४. Tao Te Ching —अध्याय 9金玉滿堂,莫之能守。भावार्थ — धन और भोग का अत्यधिक संचय स्थायी नहीं रहता।५. Laozi का उपदेश知足者富。भावार्थ — जो संतोष जानता है वही वास्तव में धनी है।६. Zhuangzi嗜欲深者天機淺。भावार्थ — जो व्यक्ति भोग-वासनाओं में अधिक डूबता है, उसकी आत्मिक बुद्धि क्षीण हो जाती है।७. Zhuangzi巧者勞而知者憂。भावार्थ — अत्यधिक लालच और चतुराई में लगा व्यक्ति चिंता और दुःख पाता है।८. Tao Te Ching — अध्याय 33知人者智,自知者明。勝人者有力,自勝者強。भावार्थ — दूसरों पर विजय से बड़ी बात स्वयं की बुरी प्रवृत्तियों पर विजय पाना है।९. Tao Te Ching — अध्याय 75民之飢,以其上食稅之多。भावार्थ — लोभ और अन्याय समाज तथा परिवारों में दुःख उत्पन्न करते हैं।इन ताओवादी प्रमाणों में लोभ, असंतोष, भोग-विलास और तृष्णा को दुःख तथा पतन का कारण बताया गया है। यह शिक्षा ऋग्वेद के —“जाया तप्यते कितवस्य हीना” अर्थात् “जुआरी की पत्नी दुःख पाती है” — के समान नैतिक चेतावनी प्रदान करती है।कन्फ्यूशियस धर्म में प्रमाण -- कन्फ्यूशियसवाद में लोभ, दुर्व्यसन, असंयम और परिवार-दुःख पर प्रमाण(चीनी लिपि सहित)१. The Analects — 4.16君子喻於義,小人喻於利。भावार्थ — सज्जन व्यक्ति धर्म और नीति को समझता है, जबकि तुच्छ व्यक्ति केवल लाभ और लोभ को देखता है।२. The Analects — 1.12禮之用,和為貴。भावार्थ — जीवन और परिवार में सामंजस्य सबसे मूल्यवान है; दुर्व्यसन और लोभ इस शान्ति को नष्ट करते हैं।३. The Analects — 7.16不義而富且貴,於我如浮雲。भावार्थ — अधर्म से प्राप्त धन और वैभव मेरे लिए उड़ते बादल के समान तुच्छ हैं।४. Confucius का उपदेश君子愛財,取之有道。भावार्थ — सज्जन व्यक्ति धन चाहता है, किन्तु उचित और धर्मपूर्ण मार्ग से।५. Book of Rites傲不可長,欲不可縱。भावार्थ — अहंकार को बढ़ने नहीं देना चाहिए और इच्छाओं को अनियंत्रित नहीं छोड़ना चाहिए।६. Doctrine of the Mean喜怒哀樂之未發,謂之中。भावार्थ — भावनाओं और इच्छाओं का संतुलन ही श्रेष्ठ मार्ग है।७. Mencius養心莫善於寡欲。भावार्थ — मन की शान्ति के लिए इच्छाओं और लोभ को कम करना सर्वोत्तम है।८. Mencius上下交征利,而國危矣。भावार्थ — जब सब लोग केवल लाभ और लोभ में लग जाते हैं, तब समाज और परिवार संकट में पड़ जाते हैं।९. The Analects — 12.21君子求諸己,小人求諸人。भावार्थ — सज्जन अपनी त्रुटियों को स्वयं सुधारता है; दुर्व्यसनी व्यक्ति दूसरों को दोष देता रहता है।इन कन्फ्यूशियस धर्मग्रन्थों में लोभ, अधर्म से प्राप्त धन, असंयम और तृष्णा को परिवार तथा समाज के दुःख का कारण बताया गया है। यह शिक्षा ऋग्वेद के —“जाया तप्यते कितवस्य हीना” अर्थात् “जुआरी की पत्नी दुःख पाती है” — के समान नैतिक संदेश प्रदान करती है।शिन्तो धर्म में प्रमाण --शिन्तो धर्म में लोभ, अशुद्ध आचरण, असंयम और परिवार-दुःख पर प्रमाण(जापानी लिपि सहित)१. 古事記悪しき心は禍を招く。भावार्थ — बुरा और दूषित मन दुःख तथा विपत्ति को बुलाता है।२. 日本書紀欲深き者は身を滅ぼす。भावार्थ — अत्यधिक लोभ और लालच मनुष्य का विनाश कर देते हैं।३. 神道五部書心正しければ家安し。भावार्थ — यदि मन शुद्ध और संयमित हो तो परिवार में शान्ति रहती है।४. 本居宣長私欲は乱れの本なり。भावार्थ — स्वार्थ और लोभ सभी अव्यवस्थाओं तथा दुःख का मूल हैं।५. 平田篤胤邪なる行いは家を衰えさせる。भावार्थ — दुष्ट और अनैतिक आचरण परिवार को पतन की ओर ले जाते हैं।६. 祝詞罪穢れを祓い清め給え。भावार्थ — हे देवताओं! हमारे पाप और अशुद्धियों को दूर कर हमें शुद्ध करें।७. 古事記心の乱れは災いを生む。भावार्थ — मन की विकृति और असंयम दुःख और संकट को जन्म देते हैं।८. 日本書紀酒に溺るる者は道を失う。भावार्थ — जो व्यक्ति नशे और व्यसन में डूबता है, वह धर्म और सही मार्ग खो देता है।९. 神皇正統記家を守るは誠の心なり。भावार्थ — सत्य और शुद्ध आचरण ही परिवार की रक्षा करते हैं।इन शिन्तो धर्म के प्रमाणों में लोभ, व्यसन, अशुद्ध आचरण और असंयम को दुःख तथा परिवार-विनाश का कारण बताया गया है। यह शिक्षा ऋग्वेद के —“जाया tap्यते कितवस्य हीना” अर्थात् “जुआरी की पत्नी दुःख पाती है” — के समान नैतिक चेतावनी देती है।यूनानी दर्शन में प्रमाण-- यूनानी दर्शन में लोभ, व्यसन, असंयम और परिवार-दुःख पर प्रमाण१. Socrates“He who is not content with what he has, would not be content with what he would like to have.”भावार्थ — जो व्यक्ति अपने पास की वस्तुओं से संतुष्ट नहीं है, वह अधिक प्राप्त होने पर भी संतुष्ट नहीं होगा।२. Plato — Republic“The greatest wealth is to live content with little.”भावार्थ — संतोष और संयम ही सबसे बड़ा धन हैं; लोभ दुःख का कारण है।३. Plato — Laws“Excessive pleasures and pains are the greatest diseases of the soul.”भावार्थ — अत्यधिक भोग और व्यसन आत्मा के महान रोग हैं।४. Aristotle — Nicomachean Ethics“Moral virtue is destroyed by excess and deficiency.”भावार्थ — अति और असंयम मनुष्य के नैतिक जीवन को नष्ट कर देते हैं।५. Aristotle“The avaricious man is always in want.”भावार्थ — लोभी व्यक्ति सदैव अभाव और दुःख में रहता है।६. Epictetus“Wealth consists not in having great possessions, but in having few wants.”भावार्थ — वास्तविक धन अधिक वस्तुओं में नहीं, बल्कि कम इच्छाओं में है।७. Diogenes“The love of money is the mother of all evils.”भावार्थ — धन का लोभ अनेक बुराइयों और दुःखों की जड़ है।८. Seneca“Drunkenness is nothing but voluntary madness.”भावार्थ — नशा स्वेच्छा से अपनाया गया पागलपन है।९. Seneca“No man is made unhappy by another, but by himself.”भावार्थ — मनुष्य अपने दुर्व्यसनों और गलत आचरण से स्वयं दुःख पाता है।१०. Pythagoras“Choose rather to be strong of soul than strong of body.”भावार्थ — आत्मसंयम और सदाचार ही वास्तविक शक्ति हैं।इन यूनानी दार्शनिक प्रमाणों में लोभ, असंयम, भोग-विलास और नशे को दुःख तथा पतन का कारण बताया गया है। यह शिक्षा ऋग्वेद के —“जाया तप्यते कितवस्य हीना” अर्थात् “जुआरी की पत्नी दुःख पाती है” — के समान नैतिक संदेश प्रदान करती है।-------+--------+-------+-------+-----