दयाल फिर अपनी बात को जारी रखते हूए कहता है:
" मालिक ! ये वक्त सौच मे का नही है । हमे जल्दी से अघोरी बाबा के पास जाना चाहिए । और उनसे इन देत्यो से हमेशा की छुटकारा पाने का कोई उपाय पूछनी चाहिए । "
दक्षराज दयाल की बात सुनकर एक गहरी सांस लेता है और कहता है:
" तुम ठिक बोल रहे हो दयाल ! हमे जल्दी से कुछ करना होगा। "
इतना बोलकर दक्षराज उठता है और दयाल से कहता है।
" दयाल गाड़ी निकालो और निलु तुम यही रहना । जब
तक मैं ना आउं तुम बाहर नही निकलना । "
एपिसोड 62. दक्षराज को देत्य का डर ।
दक्षराज निलु को एक कमरे के अंदर जाने को कहता है। निलु दक्षराज की बात मानकर हवेली के निचे वाले कमरे के अंदर चला जाता है। दक्षराज और दयाल गाड़ी जंगल की और जाने लगता है अघोरी बाबा के पास ।
उधर चेतन एकांश और वर्शाली की खोज मे हॉस्पिटल पहूँच जाता है। जहां पर चेतन दैखता है के हॉस्पिटल मे सभी लोगों को छुट्टी दिया जा रहा है। चेतन उनमे से एक को रोककर पूछता है:
" अ..अरे भाया जरा ठहरो तो !"
वो आदमी रुक जाता है और। चेतन को दैखकर पहचान जाता है वो आदमी चेतन से पूछता है :
" अरे भाया तुम ? तुम तो इसी हॉस्पिटल मे भर्ती थे ना फिर यहां से बिना बताए कहां भाग गए थे । पागल वागल हो क्या जो ऐसे बिना बताए भाग गये सभी तुम्हारे लिए कितना परेसान थे और तुम हो के...."
वो आदमी इतना बोलकर रुक जाता है और नाराज होकर कहता है।
"आज फिर क्या हुआ क्या बात है। "
चेतन बड़े चालाकी के साथ उस आदमी से पूछता है:
" ह...हां भाया वो मुझे किसी से झुठी खबर मिली थी के मेरे भाई को एक्सीडेंट हो गया है। इसिलिए मैं घबाराया हुआ था और बिना बताए ही यहां से चला गया।"
वो आदमी कहता है:
" अच्छा तो ये बात थी। आजकल पता नही क्या हो गया है सबको परिवार वालो की भी झूठी खबर फैला रहा है।"
चेतन कहता है:
" हां भाया बताइए अब ऐसी खबर को कौन झुठ मान सकता है। इसिलिए मैं दौड़ा चला गया। अच्छा ये बताओ के डॉक्टर एकांश कहां है अभी ? मुझे उन्ही से कुछ काम था। "
वो आदमी कहता है:
" वो अभी यहां नही है । सुबह से ही उन्हे इस हॉस्पिटल मे नही दैखा और आज तो फिर सबको छुट्टी भी दी जा रहा है। तुम अंदर जाकर पता कर लो मैं चलता हूँ भाया मुझे बहोत काम है। "
इतना बोलकर वो आदमी आगे निकल जाता है। चेतन अपने आप से कहता है:
" एकांश यहां नही हो़ै तो फिर कहां गया होगा। वो जरुर वर्शाली के साथ होगा मुझे जाकर उन दोनो को
ढुडंना होगा।"
इतना बोलकर चेतन वहां से चला जाता है। मांतक और त्रिजला पक्षी का रुप लेकर हॉस्पिटल मे आकर बैठ जाता है। त्रिजला कहती है:
" स्वामी यहां पर तो बहोत सारे मानवो का भीड़ है ऐसे मैं हम उस मानल को कैसै ढुंडे । एक बात और स्वामी । आपने एकांश के विषय मे अपने मित्र से क्यो नही कहा।"
मांतक कहता है:
" हां त्रिजला मैं बताना तो चाहता था परतुं पता नही कैसे मैं उन्हे बात बताना भूल गया। जब मैं वहां से निकला तब मुझे स्मरण हूआ के मैं अपने मित्र कुंभ्मन को एकांश के विषय मे बताना भूल गया । परतुं मैं अपनी भुल को सुधार लुगां । "
त्रिजला कहता है :
" वो कैसे स्वामी ? "
मांतक कहता है :
"एकांश को यहां से बंदी बनाकर अपने मित्र कुंम्भन के समक्ष लेकर जाऐगें। क्योकी मित्र कुंम्भन ने कहां था के कुंम्भनी ने उसे एकांश का ही नाम बताया था। अब यही एकांश हमे उस मणी तक पहूँचा सकता है।"
इतना बोलकर दौनो वहां ये हॉस्पिटल के अंदर उड़कर चला जाता है और एकांश को ढुंडने लगता है। हर जगह ढुंड ने के बाद भी जब मांतक और त्रिजला को एकांश नही मिलता है तो त्रिजला मांतक से कहती है:
" स्वामी ! यहां पर तो एकांश नही है। लगता है वो कही और होगें । हमे और ज्यादा विलम्ब नही करनी चाहिए और सिघ्र हि उसे खोज निकालना है। "
मातंक त्रिजला की बात से सहमत होते हूए कहता है:
" हां त्रिजला तुम उचित कह रही हो । हमे अब यहां से चलना चाहिए।"
इतना बोलकर वो दोनो वहां सो चला जाता है। उधर दक्षराज और दयाल अघोरी के पास पहूँच जाता है। दयाल हर बार की तरह गुफा के बाहर ही रुक जाता है और दक्षराज गुफा के अंदर चला जाता है। जहां पर अघोरी दक्षराज का ही इंतजार कर रहा था।
दक्षराज अघोरी बाबा को प्रणाम करते हूए कहता है:
" प्रणाम बाबा ! "
अघोरी दक्षराज की और देखती है और कहता है :
" आ गए दक्षराज । बड़ी दैर लगा दी तुमने आने मे।
लगता है अब तुम्हें मेरा आवश्यकता नही रहेगी । "
अघोरी के मुह से इस तरह का बात को सुनकर दक्षराज हैरान हो जाता है। दक्षराज हाथ जौड़कर अघोरी से कहता है:
" नही बाबा ऐसी बात नही है । "
दक्षराज अघोरी को निलु के बारे मे सारी बात बोलकर सुना देता है। और कहता है:
" मैं आपके बिना कुछ नही कर सकता । और ऐसा तो मैं अपने स्वप्न मे भी नही सौच सकता । बाबा क्या मुझसे कोई भूल हूई है ?"
दक्षराज के इतना कहने पर अघोरी नाराज होकर कहता है:
" भूल ..! भूल नही तुमने पाप किया है दक्षराज। मुझसे सत्य को छुपाने का पाप।"
दक्षराज हैरान होकर कहता है:
" सत्य छुपाने का पाप ..! पर बाबा मैंने आपसे कोई बात नही छुपाई है। मेरा विश्वास करिए बाबा। ऐसा पाप तो मैं कभी नही कर सकता ।"
अघोरी दक्षराज से गुस्सा होकर कहता है:
" फिरसे झुठ दक्ष । अगर तुम्हे मेरा ही ख्याल ना रहा
तो मैं भी अब तुम्हारे लिए कुछ नही कर सकता । दक्ष चले जाओ यहां से ।"
दक्षराज अपने घुटने को टेककर हाथ जौड़कर अघोरी बाबा से कहता है:
" बाबा मुझे क्षमा करे । अगर मुझसे अनजाने मे कभी
भूल हो गई हो तो बाबा मुझे क्षमा कर दे । परतुं बाबा मैने आपसे कोई बात नही छिपाई है। बाबा मुझे ये बताने की कृपा करे की मुझसे क्या भूल हूई है?"
दक्षराज पर चिल्लाते हूए अघोरी कहता है:
" अब मुझे ये भी बताना पड़ेगा के तुम्हारी भूल गया है। ठिक है तो सुनो । तुमने मुझसे ये सत्य छुपाया है के तुम्हारे पास सिर्फ सांतक मणी है अगर ये ही सत्य है तो फिर मुझे ये बताओ दक्ष के कुंम्भन की पुत्री का मेघ मणी किसके पास है?"
" मेघ मणी ?"
दक्षराज हैरानी से कहता है।
अघोरी कहता है:
" हां दक्ष मेघ मणी कुंम्भन की पुत्री कुंम्भनी का मणी जिसे कुंम्भन 10 सालो से ढुंड रहा है। दक्ष पहले मुझे लगा था के कुंम्भन अपनी पुत्री को जिवित करने के लिए मेघ मणी को ढुंड रहा है । परतुं मुझे अब ज्ञात हुआ के वो मणी भी तुमने ही उसी रात्री को कुंम्भनी से छीन लिया था। और ये बात तुमने मुझसे छिपाये रखा ।"
दक्षराज कहता है:
" नही बाबा नही मेरा विश्वास किजिए मैं उस मेघ मणी
के बारे नही जानता हूँ । बाबा मैने आपसे पहले भी कहा था के कुंम्भन के इस आंतक का कारण मैं नही हूँ। "
अघोरी कहता है:
" क्या तुम सत्य कह रहे हो दक्ष। हां बाबा मैं आपसे झुठ बोलकर कहां जाऊगां।"
इतना बोलकर दक्षराज अघोरी के पैर पकड़ लेता है और कहता है:
" बाबा अगर मेरे पास ये दोनो मणीयां होता तो मैं अब तक इस श्राप से मुक्त नही हो जाता बाबा।"
अघोरी दक्षराज को उठाते हूए कहता है:
" दक्ष मुझे तुम्हारे बात पऱ भरोसा है। परतुुं दक्ष अगर वो मणी तुम्हारे पास नही है तो फिर वो किसके पास
है। क्योकी वो मणी उसी रात्री को कुम्भनी से छिना गया था। पहले तो मुझे लगा था के वो किसी और का कार्य है परतुं जब मुझे ये ज्ञात हुआ के वो मणी भी उसी रात्री को गायब हूआ है तो मुझे लगा के ये तुम्हारा ही कार्य होगा । इसिलिए मैने तुम्हे यहां बुलाया है। "
दक्षराज कहता है:
" पर बाबा इन दौनो मणीओ का ज्ञान तो केवल आपके पास है ये बात तो आपने ही हमे बताई थी और आपने वो ज्ञान मुझे और चेतन को ही दिया है।"
दक्षराज की बात को सुनकर अघोरी कुछ दैर सौच कर कहता है:
" हां ये सत्य है के इस संसार मे मेरे अलावा ये ज्ञान और किसी के पास नही है। परतुं चेतन ...! नही नही चेतन मुझे बिना बताए ये कार्य नही कर सकता। वो तो मेरा सबसे प्रिय शिष्य है। दक्ष तुम सत्य बोल रहे हो ना के वो मेघ मणी के बारे मे तुम्हे कुछ भी नही पता?"
" दक्षराज फिर अपना हाथ जौड़कर कहता है:
" बाबा मेरा विश्वास किजिए। "
अघोरी कहता है"
" हम्म्..! ठीक है । दक्ष ये बात मेरे और तुम्हारे बिच ही रहनी चाहिए इस बारे मे चेतन को पता नही चलनी चाहिए ।"
To be continue...1280