दो पतियों की लाडली पत्नी - 35 Sonam Brijwasi द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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दो पतियों की लाडली पत्नी - 35

रात, Shreya का कमरा
Shreya बिस्तर पर पड़ी है, पूरी तरह कमजोर और थकी हुई। उसकी सांसें टूटने लगी हैं।
उसकी उंगलियाँ बेतहाशा कबीर के हाथों को पकड़ लेती हैं—जोर से, दर्द में। उसका शरीर ठंडा पड़ गया बर्फ सा। कबीर का सीना भी बताशा दर्द कर रहा था पर उससे ज्यादा श्रेया का दर्द उसे मार रहा था।

Shreya (धक-धक, हल्की आवाज़ में) बोली - 
न… ना… सांस… नहीं… आ रही…।

Kabir अचानक कमरे में दौड़ता है। उसकी आँखों में डर और बेचैनी।

वहीं करण के कमरे में अँधेरा है।
करन अपने सीने को पकड़े दीवार से टिककर बैठा है, भारी साँसों के साथ।
वही पुराना दर्द… वही तड़प… जो वो बरसों से अकेले झेलता आया है।

Kabir (तेज़, चीखते हुए) बोला - 
Karan… Karan भैया… जल्दी! Shreya… Shreya को सांस नहीं आ रही!

Kabir दरवाज़ा जोर से खटकाता है।
Karan, दर्द और थकान छुपाते हुए, उखड़े हुए कदमों से बाहर आता है।
Kabir रोते हुए karan के पैरों में गिरता है।
वह गिड़गिड़ाने लगता है, आँखों में आँसू।
Karan तुरंत समझता है कि स्थिति गंभीर है।
Shreya के साँस नहीं आने का दर्द सुनकर वह भी घबरा जाता है।

Karan (धीमी, ठंडी लेकिन गंभीर आवाज़ में) बोला - 
चुप… चुप कर… सब ठीक हो जाएगा…।

दोनों भाई अपने-अपने तरीके से Shreya को सहलाते हैं। Kabir उसकी बाँहों में हाथ रखकर धीरे-धीरे सहलाता है। Karan उसकी ओर झुकता है, उसके चेहरे को देखता है।
Karan तेजी से Shreya के चेहरे के पास झुकता है।
उसके होंठ Shreya के होंठों से लगते हैं, और धीरे-धीरे उसे साँसें देने लगता है।
Shreya के आंखें बंद हैं, पर उसका शरीर धीरे-धीरे राहत महसूस करता है।

Shreya (धीमे स्वर में, आराम पाते हुए) बोली - 
Hhh… hhh… th… thanks…

वह करन के सीने में गिर जाती है—कमज़ोर, पिघली हुई। कबीर सुबकता है। उसके सीने का दर्द तेज़ हो चुका है—पर वो अनदेखा करता है।
करन कुछ घंटों तक श्रेया को थामे रहता है…
फिर धीरे-से उसे कबीर की तरफ बढ़ा देता है।
Kabir और Karan दोनों साँसें संभालते हुए उसे देख रहे हैं। उनकी आँखों में दर्द है, लेकिन अब Shreya थोड़ी सुरक्षित महसूस कर रही है।
Shreya धीरे-धीरे Karan की बाँहों में सिमट जाती है।
पर Karan ने समझा कि कल अगर मैं नहीं रहूं तो कबीर कैसे संभालेगा? 
फिर वह धीरे-धीरे Shreya को Kabir के पास भेजता है।

Karan (धीमी, गंभीर आवाज़ में, जाते हुए) बोला - 
आदत डाल ले…कल को अगर मैं ना रहा तो कैसे संभालेगा तू...?

Shreya Kabir की बाँहों में सुरक्षित महसूस करती है, और थोड़ी देर बाद धीरे-धीरे शांत होकर सो जाती है।
तीनों का दर्द अलग था, पर उनका प्यार और जिम्मेदारी इतनी गहरी थी कि वह हर कठिनाई में एक-दूसरे की ताकत बने। उस रात, Shreya की साँसें और दोनों भाइयों की पीड़ा ने उनकी बॉन्डिंग को और भी मजबूत बना दिया।
कमरे में सन्नाटा छा जाता है।
कबीर रोते हुए श्रेया को अपने सीने से लगा लेता है।
करन उसकी तरफ एक बार भी मुड़कर नहीं देखता…
और दर्द छुपाते हुए कमरे से बाहर चला जाता है।

श्रेया बेहोशी जैसी नींद में है।
कमरे में हल्की-सी नाइट लाइट जल रही है।
श्रेya कबीर की बाहों में ढकी हुई है—थकी, टूटी हुई, लेकिन अब साँस ले पा रही है।
कबीर उसके माथे पर हाथ फेर रहा है…
पर उसका अपना चेहरा—दर्द और सदमे से भरा।
उसके कानों में बार-बार एक ही आवाज़ गूंजती है—

आदत डाल ले कबीर…
कल को मैं न रहा… तो तू कैसे संभालेगा इसे।

ये लाइन जैसे उसके दिल में काँटे की तरह चुभी हुई है।
करन की वह सख्त, भारी, दर्द भरी आवाज़।
उसका जाते हुए दरवाज़ा बंद करना।
उसकी आँखों में छुपी हुई पीड़ा।
 कबीर की आँखों में आँसू भर आते हैं
वह श्रेया को और कसकर पकड़ लेता है—जैसे डर रहा हो कि कहीं ये भी उससे छिन न जाए।

कबीर (बहुत धीमी आवाज़ में, टूटते हुए) बोला - 
भैया… ये कैसी बात बोल गए आप… क्यों?

श्रेया हिलती भी नहीं।
वह दर्द से बेहाल होकर दवाइयों के असर में बेहोशी जैसी हालत में सो रही है।
कबीर अपने सीने को पकड़ता है।
दर्द वहीं है—जैसे भीतर कुछ खुरच रहा हो।
कबीर धीरे से श्रेया के बाल सहलाता है।

कबीर (टूटी आवाज़, बिल्कुल धीमे) बोला - 
श्रेया… तुम तो सो गईं… लेकिन मैं कैसे सोऊँ…।

उसकी आवाज़ रुँध जाती है।

वो बोला - 
अगर भैया को कुछ हुआ?
अगर वो सच में…

वह वाक्य पूरा नहीं कर पाता—गले में कुछ अटक जाता है। उसकी आँखें भर आती हैं।

FLASHBACK – कबीर और करन का बचपन

छोटा कबीर रो रहा है।
कोई उसे बुली करता है।
करन उसके सामने खड़ा है, 

किसी को धक्का देकर कहता है —
मेरे रहते इसे कोई छू भी नहीं सकता।

फिर छोटा कबीर—
छोटा करन के पीछे छिप जाता है।

FLASHBACK टूट जाता है।

कबीर की आँखों में आँसू लुढ़क जाते हैं।

कबीर (फुसफुसाकर) बोला - 
आप मेरे लिए सिर्फ भैया नहीं… पूरी दुनिया हो… कैसे बोल दिया आपने कि कल को न रहा…।

वह धीरे से श्रेया को बिस्तर पर ठीक से लिटाता है।
श्रेया की साँसें अब सामान्य हैं, पर वह पूरी तरह थक चुकी है।
कबीर उठता है – उसके कदम भारी हैं
वह कमरे के कोने में जाकर दीवार पकड़ लेता है।
उसके अंदर उथल-पुथल है—गुस्सा नहीं… बस डर।
वह दीवार से माथा टिकाता है।

कबीर (आँखें बंद कर, टूटी हुई आवाज़ में) बोली - 
भगवान… मेरे भैया को कुछ मत होने देना…
श्रेया की पीड़ा तो मैं बाँट लूँगा…पर अगर भैया…

उसकी आवाज़ कांप जाती है।
उसके पैर हिलते हैं—भावनाओं का बोझ बहुत भारी है।

श्रेया आधी नींद में, दर्द के असर में फुसफुसाती है —
कबीर जी… छोड़कर मत जाना…।

कबीर का दिल एक पल के लिए रुक जाता है।
वह झटके से मुड़ता है और उसकी ओर भागता है।
उसका हाथ थाम लेता है।

कबीर (फौरन, भावुक होकर) बोला - 
कहीं नहीं जाऊँगा…तुम भी नहीं जाओगी… और भैया भी नहीं…।

वह उसकी उंगलियाँ चूम लेता है।
कबीर श्रेया को बाँहों में भरकर, आँखों में आँसू लिए छत को देखे जा रहा है।
लेकिन उसकी आँखों में एक ही डर—
अपने भाई को खोने का।

पृष्ठभूमि में गूंजती रहती है करन की वही लाइन—
“कल को मैं न रहा…तो तू कैसे संभालेगा इसे...?

और कबीर हर बार उस याद पर काँप उठता है।