दो पतियों की लाडली पत्नी - 34 Sonam Brijwasi द्वारा नाटक में हिंदी पीडीएफ

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दो पतियों की लाडली पत्नी - 34

रात, 2:15 AM — कमरे में हल्का अँधेरा
खिड़की पर चाँद की हल्की रोशनी गिर रही है। Kabir अपनी तरफ करवट लेकर सोने का नाटक कर रहा है। पर उसकी साँसें गवाह हैं कि वो जाग रहा है।
Shreya उसकी बाँहों में है…
पर उसकी साँसें तेज़ हैं, शरीर तना हुआ, चेहरे पर दर्द साफ़।
Shreya अपनी आँखें बंद किए कोशिश कर रही है कि Kabir को जगाए बिना वह सो जाए।
उसके भीतर तीन तरह के दर्द आपस में लड़ रहे हैं—
Migraine का तेज़ दर्द
Periods की ऐंठन
सीने में भारीपन।
उसका पूरा जिस्म काँप रहा था…
जैसे किसी ने उसे डंडों से पीटा हो।
Shreya Kabir की छाती में और सिमटती है, जैसे उसकी गर्माहट उसे बचा लेगी।
पर दर्द बढ़ता जाता है…
अचानक Shreya की साँसें तेज़ हो जाती हैं। वह हल्के से कराहती है, होंठ काँपने लगते हैं।

Shreya (बहुत धीमे, टूटे हुए सुर में) बोला - 
आह…

Kabir की आँखें तुरंत खुल जाती हैं—
लेकिन वह कुछ नहीं बोलता, बस सुनता है।
Shreya और कुछ देर नहीं सह पाती—
उसकी आँखों से आँसू छलक पड़ते हैं।
वह Kabir से कसकर चिपक जाती है।

Shreya (रोते हुए, पर आवाज़ दबाकर) बोली - 
Kabir जी… मुझे… बहुत दर्द हो रहा है…

उसकी आवाज़ बेहद मासूम, बेहद टूटी हुई।
Kabir का चेहरा एक पल में बदल जाता है।
वह घबराता है—
क्योंकि ये वही रात है जो कभी Karan के लिए नर्क बनी थी… और अब वही Kabir के लिए शुरू हो चुकी है।

Kabir (घबराहट छुपाते हुए) बोला - 
कहाँ दर्द है Shreya? बोलो…

Shreya जवाब नहीं दे पाती—
बस उसकी शर्ट पकड़कर रोती है।
Kabir खुद समझने की कोशिश करता है।
वह उसके माथे को छूता है— गर्म।
कंधों को छूता है— सख़्त।
पेट को छूता है— ऐंठा हुआ।
सीना— भारी साँसें।

Kabir (धीरे, बहुत कोमल आवाज़ में) बोला - 
ठीक है… ठीक है… रोओ मत… मैं हूँ न…

Kabir Shreya को धीरे-धीरे ऊपर उठाकर अपनी गोद में ले लेता है, फिर उसकी पीठ सहलाता है।
Shreya का शरीर Kabir की बाँहों में काँप रहा था।
Kabir खुद डर रहा था…
लेकिन Shreya की हालत देखकर उसका डर पीछे रह गया।
Shreya का सिर Kabir के सीने पर था—
उसकी कराहें Kabir के दिल को चीर रही थीं।

Shreya (सिसकते हुए) बोली - 
Kabir जी… please… छोड़िए मत… दर्द हो रहा है…।

Kabir के अंदर सब टूट जाता है।

Kabir बोला - 
Shh… मैं हूं ना… कहीं नहीं जा रहा… बस… बस सांस लो…

वह Shreya के सिर को अपने हाथों से थामता है,
दूसरे हाथ से उसकी पीठ को हल्के-हल्के रगड़ता है।
Shreya अचानक Kabir की शर्ट को मुट्ठियों में कसकर पकड़ लेती है।

Shreya बोली - 
आह… Kabir जी… मुझसे… रुका नहीं जा रहा…।

Kabir का दिल काँप जाता है।
उसकी आँखों में पानी आ जाता है—
पर वह खुद को संभालता है।
वह Shreya को अपनी छाती से और कसकर लगा लेता है।

Kabir (लगभग फुसफुसाते हुए, टूटे हुए स्वर में)बोला- 
बस… बस Shreya…मुझे पकड़ कर रखो…
सब ठीक हो जाएगा…मैं हूं ना…।

Shreya उसका कंधा पकड़कर रोती है… उसकी आँसुओं की गर्मी Kabir की गर्दन पर गिरती है।
Kabir अपनी पूरी गर्माहट, पूरी ताकत से उसे शांत करने की कोशिश करता है।
दो घंटे तक Kabir उसे बस थामे रहता है—
बिना सोए, बिना हिले, बिना एक पल भी शिकायत किए।
आख़िर Shreya का शरीर थोड़ा ढीला पड़ता है…
उसकी साँसें शांत होने लगती हैं।
वह Kabir की गर्दन में चेहरा छुपाकर सो जाती है—
पूरी तरह उसपर भरोसा करके।
Kabir उसकी साँसों को सुनता है—
अपना सीना भींगता हुआ महसूस करता है…
पर इस बार आँसू Shreya के नहीं—
Kabir के थे। कबीर को लगा वो ठीक हो गई है।

Kabir (बहुत धीमे) बोला - 
Thank you Shreya…
तुमने ये रात मुझे झेलने दी…
मैं कल रात वाले Kabir से थोड़ा बेहतर हो गया…।

वह झुककर Shreya के सिर पर एक हल्का, बहुत स्नेहभरा चुंबन देता है।
कमरा फिर शांत हो जाता है…
पर Kabir के दिल में कुछ बड़ा बदल चुका था।

रात, 2:45 AM — Kabir का कमरा
कमरा पूरी तरह अँधेरा, सिर्फ़ खिड़की से हल्की चाँदनी। Shreya अभी भी Kabir की बाँहों में थी, पर उसकी साँसें अचानक तेज़ हो जाती हैं।
Shreya की पूरी बॉडी अचानक बर्फ़ जैसी ठंडी हो जाती है।
उसके हाथ-पाँव कठोर, होंठ नीले पड़ने लगे।
वह काँपती है— पूरी तरह कमजोर।
Shreya दर्द से कराहती है। उसके हाथ Kabir की छाती में गड़े हुए हैं।

Shreya (रोते हुए, कराहते हुए) बोली - 
Aahhh… Kabir जी… दर्द… दर्द…।

उसकी आवाज़ में भयानक पीड़ा थी।
उसके नाखून Kabir की छाती में गड़े हैं—
Kabir को दर्द होता है, पर वह खुद को रोक नहीं पाता।

Kabir (धीमे, खुद से लड़ते हुए) बोली - 
Shh… Shreya… बस… बस… सब ठीक हो जाएगा…।

पर उसकी आवाज़ दूसरों को सुनाई नहीं दे रही, क्योंकि Shreya का दर्द इतना तेज़ था।
Kabir अपने आप को पूरा कमजोर महसूस करता है।
वह Karan की तरह majboot नहीं था।
Shreya काँप रही थी।
उसका सारा शरीर ठंडा।
साँसें तेज़ और अनियमित।
Kabir उसे कसकर अपनी बाँहों में थामता है।
पर Shreya का दर्द उसके दिल को भी चीर रहा था।

Kabir (भारी सांस लेते हुए) बोला - 
बस… बस… मैं हूं ना…
तुम्हे कुछ नहीं होगा…।

पर Kabir खुद भी हिल रहा था, आँखों में आँसू, शरीर में कमजोरी।
Shreya अब पूरी तरह बेबस थी—
वह कराहते हुए रो रही थी, काँप रही थी।
पेट में ऐंठन,
सिर में तेज़ दर्द,
पूरे शरीर में थकान और ठंडक।
वह सांस लेने में भी मुश्किल महसूस कर रही थी।
Kabir उसका सिर सहलाता है, पीठ पर हाथ फेरता है
पर दर्द कम नहीं हो रहा।

Shreya (धीमी, टूटती आवाज़ में) बोली - 
K…Kabir ji… help… please…"

Kabir का हृदय टूट जाता है—
वह शांति से उसे सहलाने की कोशिश कर रहा था, पर अंदर से वह भी टूट रहा था।
Kabir अब Karan की याद करता है—
उसने देखा था कि Karan भी इस दर्द को सहता था।
पर अब Kabir खुद को कमजोर पाता है—
शायद Karan की तरह मजबूत नहीं था।
फिर भी Kabir ने Shreya को कसकर अपनी बाँहों में थाम लिया।
उसकी गर्माहट, साँसों की लय, और लगातार सहलाना
बस यह सब ही अब Shreya की राहत का माध्यम था।

Kabir (धीरे से फुसफुसाते हुए) बोला - 
बस… अब तुम safe हो… मैं यहीं हूं बस…
तुम कैसे भी सो जाओ…मैं तुम्हारे साथ हूं…।

वहीं Karan अकेला बिस्तर पर पड़ा है। उसकी सांसें तेज़ हैं। पूरे शरीर में दर्द है। सीने में भारीपन।

Karan (धीमी आवाज़ में, खुद से) बोला - 
Ahh… ये दर्द… ये दर्द… क्यों कम नहीं होता…?

वह अपने सिर पर हाथ फेरता है, शरीर में कंपकंपी महसूस करता है।
साँसें तेज़, हृदय धड़क रहा है।
Karan की आँखें बंद हैं, पर अंदर से वह पूरी तरह तड़प रहा है।

Kabir अभी भी Shreya को बाँहों में लिए बिस्तर पर बैठा है। उसका चेहरा तनाव और दर्द से भरा हुआ है।

Kabir (धीमे स्वर में, Shreya की ओर देखते हुए) बोला - 
बस… सब ठीक हो जाएगा… मैं यहीं हूं…।

लेकिन उसकी अपनी साँसें तेज़ हैं।
कबीर के सीने में तेज़ दर्द है—शायद Shreya की हालत देखकर उसका हृदय भी थक गया है।
Kabir हल्के से काँप रहा है। उसकी आँखें नम हैं।
Shreya पूरी तरह बेबस और थकी हुई है।
पेट में cramps
सिर में तेज़ दर्द
पूरे शरीर में थकान और कमजोरी
वह Kabir की बाँहों में सिमट कर सोने की कोशिश कर रही है, पर दर्द से कराह रही है।

Shreya (धीमे स्वर में, आधी नींद में) बोली - 
K…Kabir Ji… please… बस… पास रहिए…।

Kabir उसे कसकर थामे हुए है।
वह महसूस कर रहा है कि Shreya की स्थिति उससे भी ज्यादा खराब है, और उसके अपने दर्द को भूलकर बस उसे सहलाता है।
Karan कमरे में अकेला पड़ा हुआ है।
वह देखता है कि Kabir Shreya को थामे हुए है।
Karan को एहसास होता है कि Shreya की स्थिति इतनी गंभीर थी कि Kabir ने अपनी ताकत लगाकर उसे सहलाया, पर Karan खुद अकेला, दर्द और थकान में तड़प रहा है।

Karan (कंपकंपाते हुए, खुद से):
"Main akela… par Kabir… woh Shreya ko… bas… samajh raha hai… main kaise…"

Karan का दिल भारी है—शायद अपने दर्द और अकेलेपन से।


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Scene 5 – तीनों की साझा पीड़ा

Shreya की हालत सबसे गंभीर, लेकिन वह चुप है।

Kabir दर्द में है, पर Shreya को सहलाकर खुद को संभाल रहा है।

Karan अकेला है, अपने दर्द में।


(कमरा शांत, केवल तीनों की साँसों की आवाज़ सुनाई दे रही है। रात की चाँदनी हल्की-हल्की कमरे में गिर रही है।)

Narration (धीमा स्वर, अंदर से):
"तीनों का दर्द अलग-अलग था, लेकिन अंततः एक ही सच था—शक्ति, प्यार और सहनशीलता के बीच उनकी थकान और पीड़ा ने उन्हें अंदर से तोड़ दिया था।"