दो पतियों की लाडली पत्नी - 33 Sonam Brijwasi द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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दो पतियों की लाडली पत्नी - 33

करन का कमरा
कमरे में अँधेरा है, बस एक स्टडी लैम्प की हल्की-सी रोशनी। टेबल पर बिखरी हुई किताबें—
B.Tech की नोटबुक्स, ऑफिस की फाइलें, लैपटॉप खुला हुआ… पर फिर भी कमरे में बस एक ही चीज़ सबसे ज़्यादा साफ़ दिखती है—
Shreya की एक फोटो, जिसे करन अपनी हथेलियों में घुमाकर देख रहा है।
उसकी आँखें लाल हैं।
नींद से नहीं… रो-रोकर थक जाने से।

करन( बहुत धीमी टूटी हुई आवाज़ में) बोला - 
बस.... इसके बाद एक महीना और.... फिर तुम कबीर के साथ हमेशा रहेगी....
और मैं.....

उसकी आवाज़ वहीं टूट जाती है।
वह फोटो को सीने से लगा लेता है, जैसे वही उसकी आखिरी साँस हो।
करन जितना खुद को संभालने की कोशिश करता,
उतना ही वह बिखर जाता।
पूरा दिन वह ऑफिस के काम,
और रात को B.Tech के असाइनमेंट में खुद को डुबाने की कोशिश करता था।
सोचता था—
“मन बंट जाएगा… दर्द कम होगा…”

पर दर्द बंटता नहीं था।
कुचलता था।
करन शेल्फ खोलता है।
वह एक कोने से श्रेया की साड़ियाँ निकालता है,
जो पिछले महीने उसने उसके लिए चुनी थीं,
जब वही उसका सबकुछ लगती थी।
वह साड़ियाँ अपनी गोद में फैलाकर बैठ जाता है।
उन पर चेहरा रख देता है—
और बिना आवाज़ किए, बस सिसकियाँ बहने लगती हैं। उसकी सिसकियाँ इतनी हल्की थीं
कि कोई सुन भी ले तो सिर्फ हवा समझे…
क्योंकि करन हमेशा अपने दर्द को छुपाता था।

करन (काँपती आवाज़ में) बोला - 
Shreya…तुम्हे पास भी नहीं....
तुम्हारी एक - एक चीज मेरे लिए क्या थी....।

उसकी उंगलियाँ किसी दीवाने की तरह साड़ी के कपड़े को पकड़ लेती हैं। जैसे यही कपड़ा उसे जीने की वजह दे रहा हो। और वही कपड़ा उसे मार भी रहा हो।

टेबल पर रखी नीली बोतल, जिस पर लिखा है—
“Anti-Depressant – High Strength”

करन बोतल उठाता है, ढक्कन खोलता है, और एक गोली मुँह में डाल लेता है।
फिर…एक और।
वह शीशी को देखता है, जैसे उससे बात कर रहा हो।

करन बोला - 
Dose बढ़ाने से शायद....दर्द कम हो जाए।

पर दवा दर्द नहीं मिटाती। दर्द को बस सुन्न कर देती है।
और करन सुन्न होना नहीं चाहता था—
वह तो सिर्फ इतना चाहता था कि
Shreya उसके पास रहे… बस थोड़ी देर और।

(फ़्लैशबैक हल्का-सा दिखाई देता है)
जब श्रेया उसके कमरे में रहती थी,
जब वह रातों में उसकी साँसों का खयाल रखता था,
जब वह दर्द में झटपटाती थी और करन उसे सीने से लगाकर उसे राहत देता था…
यह सब उसकी स्मृति में बिजली की तरह कौंध रहा था।

(वापस वर्तमान में)
करन अचानक अपने बालों को पकड़ लेता है।
उसकी आँखें जोर से भीग जाती हैं।

करन (टूटा हुआ) बोला - 
मैं क्यों हूँ ऐसा...?
क्यों नहीं रोक पाया तुम्हें...?

वह मेज़ पर सिर रख देता है।
गोद में साड़ियाँ…हाथ में श्रेया की फोटो…और दिल में हजार टुकड़ों में टूटा हुआ प्यार।

(यह वही रात थी जब)
श्रेया कबीर की बाँहों में जागी थी—
बिल्कुल वैसे जैसे होना चाहिए था।
पर करन…वह तो उस रात अपने कमरे में
अपने अकेलेपन की मौत मर रहा था।

 सुबह का कमरा, हल्की धूप पर्दों से छन रही है।)
श्रेया धीरे-धीरे आँखें खोलती है। उसके पास कबीर बैठा है…पर पहले जैसा नहीं।
वो वही कबीर था जो हर सुबह छेड़ता था, उलझाता था,उसकी उँगलियों को पकड़कर मस्ती करता था…

बोलता था - 
Shreya ji… good morning, मेरी जान…।

कहकर मुस्कुराता था।
पर आज सामने जो बैठा था—
वह खोया हुआ, टूटा हुआ,
और अजीब-सा खामोश कबीर था।

कबीर (बहुत ठंडी, रूखी आवाज़ में) बोला - 
तबियत ठीक है?

उसकी आवाज़ में न नरमी थी,न प्यार…सिर्फ दूरी।
श्रेया ने धीरे से सिर हिलाया।
वह कुछ कहना चाहती थी—
पर डर सा लगा।

श्रेया (हिचकते हुए) बोली - 
वो.... आप रात को ठीक से सोए थे ना...?
लग रहा था....तबियत—

कबीर अचानक भड़क उठा।

कबीर (गुस्से में, बिना वजह) बोला - 
Shreya मुझे मेरी तबियत का पता नहीं होगा?
तुम मुझे सिखाओगी अब ?

श्रेया एकदम सिमट गई। उसके होंठ काँप गए। वह डरकर चुप हो गई।
कबीर गुस्से में पलटकर खड़ा हुआ… पर पाँच कदम चलते ही उसकी साँस रुक-सी गई।उसे महसूस हुआ—
उसने उसे डरा दिया। और उसे खुद से ज़्यादा
श्रेया का डर चुभने लगा। वह मुड़कर उसे देखता है—
डरती, सहमी, आँखे झुकाए बैठी हुई।
कबीर का दिल वहीं टूट जाता है।

कबीर (धीमे, पछतावे में) बोला - 
Shreya… वो… मैं…
मेरा मतलब ये नहीं था…।

पर वह आधे रास्ते में रुक गया। उसे लगा अगर वो पास गया तो शायद खुद को रोक नहीं पाएगा।
शायद फिर से प्यार कर बैठेगा…
और वह अब अपने दिल को और नहीं तोड़ सकता था।
वह खुद से झुँझलाता हुआ दूर, खिड़की के पास जा खड़ा होता है।

 दोपहर का घर
श्रेया चुपचाप रसोई में पानी पी रही है।
कबीर दूर से उसे देख रहा है।
वह पास जाना चाहता था… 

पूछना चाहता था—
दर्द हो रहा है क्या?
Medicine ली तुमने?
तुम ठीक तो हो?

पर उसने खुद को पकड़ लिया। हथेलियाँ कसकर बंद कर लीं।

वो ( मन में ) बोला - 
नहीं Kabir… दूर रह...।
प्यार करेगा तो फिर टूट जाएगा।

लेकिन दिल तो दिल है, रुकता कहाँ है?

कबीर ( मन ही मन ) बोला - 
बस जाके हाथ पकड़ ले उसका…
एक बार देख के उसकी आंखों में…
शायद वो भी रोती रही होगी तेरे बिना…।

वह आधा कदम बढ़ाता है…पर रुक जाता है।

रात का कमरा
श्रेया चुपचाप लाइट ऑफ करके लेटी थी।
कबीर अपनी तरफ करवट बदल-बदल कर
नींद खोज रहा था…मगर मिल नहीं रही थी।
उसे महसूस हुआ—
श्रेया थोड़ा काँप रही थी।
पहले वह फट से उसे पकड़ लेता था…।

कबीर बोलता - 
इधर आओ… मैं हूं ना..।

पर अब?
अब वह कंबल पकड़कर जकड़ लेता है।
ताकि खुद को रोके रख सके।
फिर भी…कुछ सेकंड में वह हार गया।
वह धीरे-धीरे उसकी तरफ मुड़ा।
बहुत धीरे…जैसे खुद को चोर महसूस कर रहा हो।
श्रेया सो नहीं रही थी। बस डर की वजह से हिली नहीं।
कबीर ने बहुत हिचकते हु उसके सर के पास हाथ रखा।

कबीर (बहुत धीमी टूटी आवाज़ में) बोला - 
डरो मत… मैं हूं ना...।

श्रेया की आँखों से आँसू बह निकले।
पर उसने आवाज़ दबा ली।
कबीर ने महसूस कर लिया।
पर उसने खुद को और पास जाने नहीं दिया।
वह कबीर—
जो पहले हँसी का कारण था… अब उसके डर का कारण बन गया था।
और जो पहले पास रहने के लिए लड़ता था…
अब दूरी बनाए रखने के लिए खुद से लड़ रहा था।

आधी रात, कमरा अँधेरा…
कमरे में एक हल्की सी नीली रोशनी जल रही है।
कबीर अपनी साइड में करवट लेकर लेटा है—
उस जैसे भारी साँसें ले रहा था।
अचानक, उसके सीने में एक तेज़ दर्द उठता है।
वह छाती पकड़कर हल्का-सा झुक जाता है।

कबीर (दबी, टूटी, चिढ़ी हुई आवाज़ में) बोला - 
Uff… साला… ये दर्द भी खत्म क्यों नहीं होता…!

उसकी आवाज़ गुस्से में थी, इतनी कड़वी कि पास में लेटी shreya पूरा सहम गई।
वह धीरे से आँखें खोलती है। कुछ नहीं बोलती।
बस चुपचाप उसे देखती रह जाती है।
कबीर दर्द में था—
पर उसे पता ही नहीं चला कि उसके शब्द श्रेया को काट गए।

श्रेया को अचानक करन की याद आने लगती है।
वो रातें…जब करन गुस्से में उठ जाता,
छाती दबाकर दर्द सहता, खिड़की के पास जाकर खड़ा हो जाता…दवाई की शीशी खोलकर
दो–दो, तीन–तीन गोलियाँ खा लेता… और फिर अपने ही हाथ से दीवार पर मुक्के मारकर खामोश हो जाता।
उस दर्द को उसने नज़दीक से देखा था—
वो चीखता नहीं था, बस अंदर ही अंदर टूटता जाता था। और आज… कबीर के गुस्से भरे शब्द उसे उसी दौर में वापस ले गए। वह और भी सहम गई।

कबीर अभी भी दर्द में करवट बदले पड़ा है।
सीना पकड़कर भारी साँस ले रहा था।
पर उसने पीछे मुड़कर एक बार भी नहीं देखा कि उसकी एक ही बात से श्रेया के दिल पर क्या बीती।
श्रेया एकदम चुप… कंबल को मुट्ठियों में दबाए हुए।
दिल ऐसी धड़क रहा जैसे कहीं बाहर छलक न जाए।

वह बोलना चाहती थी—
कबीर जी… आपको दर्द हो रहा है…?
मैं गरम पानी ले आऊं?
सीने से लगा लूं?

पर वह एक शब्द भी नहीं बोल पाई। डर ने उसके होंठ सी दिए थे। उस रात दो लोग दर्द में थे—
एक को सीने का दर्द काट रहा था, दूसरे को दिल का डर। कबीर ने अपने दर्द को गुस्से से छुपा लिया…
और श्रेया ने अपने डर को खामोशी से।
दोनों एक-दूसरे से बस कुछ इंच दूर लेटे थे, पर उनके बीच सालों की दूरी खड़ी थी।