Shreya अब भी Karan से थोड़ा-सा सिहर कर दूर बैठी थी।
Karan ने उसे देखा…उसकी आँखों में वही डर था—
जो वो कभी नहीं देखना चाहता था।
ये डर उसे कहीं भीतर तक तोड़ देता है।
KARAN (मन में, टूटता हुआ) बोला -
बस… अब वो मेरे पास कभी नहीं आएगी…।
रात हो गई।
Shreya धीरे-धीरे नींद में खो जाती है।
दवाइयाँ, कमजोरी, दर्द — सब मिलकर उसे गहरी नींद में ले जाते हैं।
Karan उसके पास बैठा, बस वो आखिरी रात उसे देखता रहता है।
घड़ी की टिक-टिक कमरे की खामोशी को चीर रही है।
11:50 PM…
11:57 PM…
11:59 PM…
Karan बार-बार घड़ी देखता है, सांसें मुश्किल से ले पा रहा है।
और जैसे ही 12 बजे,
वो धीरे से उठता है।
Karan उसके पास आता है, उसे देखता है, जैसे ये उसका आखिरी मौका हो।
वो उसके चेहरे को बार बार चूमता है।
फिर बहुत नरमी से…बहुत संभलकर… Shreya को अपनी बाहों में उठा लेता है।
Shreya गहरी नींद में है, उसका सर Karan के सीने पर टिका हुआ। Karan की सांसें तेज हो जाती हैं—
जैसे ये पल उसका दिल चीर रहा हो।
KARAN (फुसफुसाकर, टूटी आवाज़ में) बोला -
बस एक रात और... फिर तुम अपने kabir के पास....जहां तुम belong करती हो....।
Karan की आँखें लाल थीं।
वो खुद को मजबूती का ढोंग दिखा रहा था—
पर अंदर से बिखर चुका था।
Kabir गहरी नींद में था। उसके माथे से बाल चिपके हुए…चेहरे पर तनाव… जैसे वो भी रात भर खुद के रोने से थक गया हो।
Karan कमरे में अँधेरे में खड़ा उसे देखता है। दोनों भाई, एक टूटा हुआ, और एक टूटने से बचा हुआ।
फिर वो Shreya को Kabir के बगल में बिछे कवर पर धीरे से लिटा देता है।
Shreya का हाथ नींद में ही Kabir के सीने पर गिर जाता है।
Kabir की भौंहें हल्की सी सिकुड़ती हैं—
जैसे उसे Shreya की मौजूदगी का एहसास हुआ हो।
Karan यह दृश्य देख कर जम जाता है…।
Karan झुकता है।
Shreya के चेहरे को धीरे— धीरे बार-बार चूमता है।
हर चुम्बन में एक दर्द था,एक विदाई थी, एक अधूरा प्यार था।
KARAN (बहुत धीमे, कांपती आवाज़ में) बोला -
खुश रहना....दोनों के साथ.....,
मैं ज्यादा नहीं रोक सकता तुम्हें....
तुम्हें कभी मेरा नहीं होना था... पर कभी मेरी थीं भी तो.....।
उसकी आँखें डबडबा जाती हैं।
Karan जाने के लिए मुड़ता है—
पर तभी… Shreya, जो गहरी नींद में थी,
अचानक अपनी उंगलियां बढ़ाकर Karan का हाथ कसकर पकड़ लेती है।
Karan रुक जाता है। उसका दिल रुक सा जाता है।
Shreya आँखें बंद किए हुए, नींद में बड़बड़ाती है—
Karan ji… मत जाइए…।
Karan की आँख से आँसू गिर पड़ता है। वो थोड़ा झुककर उसे देखता है। Shreya की पकड़ बहुत हल्की, पर बहुत सच्ची थी।
वो उसी पल टूट जाता है। उसका हाथ काँप रहा था।
वो चाहकर भी Shreya को पकड़ नहीं पाया—
उसे याद था, आज आखिरी दिन है।
धीरे-धीरे, कांपते हुए, वो Shreya की उंगली अपने हाथ से अलग करता है।
KARAN (बहुत कठिनाई से, टूटी फुसफुसाहट से) बोला -
मुझे मत रोको.....
तुम दोनों को सिर्फ एक दूसरे का सहारा चाहिए....।
वो खुद को ज़बरदस्ती पीछे खींचता है… मुड़कर एक आखिरी बार दोनों को देखता है…और फिर, बिना आवाज़ किए, दरवाजा बंद कर देता है।
Karan के जाते ही Shreya का हाथ खाली हवा को पकड़ता रह जाता है… जैसे उसकी आत्मा समझ गई हो कि कोई गया है।
वो नींद में कबीर के सीने में सिमट जाती है। जैसे वो कबीर नहीं करण हो। वो नींद में उसकी शर्ट पकड़ लेती है। और एक हाथ से उसे और करीब कर लेती है।
सुबह का कोमल दृश्य। पर्दों से हल्की धूप छनकर कमरे में फैल रही है। शांति इतनी गहरी है कि केवल घड़ी की टिक-टिक सुनाई दे रही है।
श्रेया धीरे-धीरे अपनी आँखें खोलती है।
जैसे ही उसकी पलकें पूरी तरह उठती हैं…
वह अचानक ठिठक जाती है।
वह करण की नहीं… बल्कि कबीर की बाँहों में सिमटी हुई लेटी है। कबीर की बाँह उसके कमर से लगी हुई है और श्रेया का चेहरा अनजाने में उसकी छाती पर टिका है। कुछ क्षणों तक श्रेया समझ ही नहीं पाती कि वह यहाँ कैसे आई।
उसका दिल अचानक ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगता है।
उसके चेहरे पर हल्की-सी घबराहट, आँखों में
उलझन… और मन में बार-बार एक ही सवाल—
श्रेया ( बहुत धीरे से )बोली -
मैं… यहाँ? मैं तो कल तक…
फिर उसे अचानक याद आता है—
आज पूरा एक महीना हो चुका है।
जिस एक महीने की शर्त, डर और मजबूरी के कारण वह करण के कमरे में थी…
जिसकी हर रात दर्द, घबराहट और भय में बीतती रही…और कल रात… वह सोते-सोते किसी का मजबूत और सुरक्षित स्पर्श महसूस कर रही थी—
पर उसे पता नहीं था कि उसे उठाकर कौन ले जा रहा है। अब सब समझ आ रहा था—
करण ने ही उसे रात बारह बजते ही कबीर के कमरे में छोड़ दिया होगा।
क्योंकि इन दोनों भाइयों के बीच वही एक महीना तय हुआ था।
श्रेया का दिल एक पल को टूट जाता है, एक पल को हल्का भी हो जाता है—
डर भी…सुकून भी… और ढेर सारी उलझन भी।
उसी समय कबीर की नींद खुलने लगती है।
वह करवट लेते की कोशिश करता है।… तभी उसे किसी की गर्माहट का अहसास हुआ। किसी के नर्म से शरीर का अहसास हुआ। श्रेया की खुशबू का अहसास हुआ.....और उसकी निगाह अचानक श्रेया पर पड़ती है। पहले तो वह चौंकता है—
फिर आँखें बड़ी कर देता है, जैसे किसी राज़ पर रोशनी पड़ गई हो।
कबीर (हैरानी से, धीरे-से खुद से) बोला -
ये… यहाँ कैसे? कल तो ये करण भैया के कमरे में थी…
वह कुछ देर सोचा करता है। फिर अचानक उसे याद आता है—
आज ठीक एक महीना पूरा हो गया।
उसकी आँखों में शर्मिंदगी, खुद पर गुस्सा और थोड़ी-सी कसक उभरती है।
उसे याद आता है कि इस एक महीने में श्रेया ने क्या-क्या सहा होगा।
और कैसे उसने कभी उसे रोकने, समझने या साथ देने की कोशिश नहीं की।
कबीर श्रेया के चेहरे को धीरे से देखता है—
वह अब भी उलझन में है, उसका मन साफ़ साफ़ झलक रहा है।
कबीर धीरे-धीरे बाँह पीछे खींचता है ताकि श्रेया को असहज न लगे।
श्रेया यह महसूस कर लेती है और हल्की-सी पीछे हट जाती है। कमरे में कुछ पल की चुप्पी भर जाती है।
कबीर (धीरे, संयमित आवाज़ में) बोली -
तुम… डरो मत। शायद करण भैया ने… तुम्हें रात को यहाँ लाकर रखा है।
क्योंकि—
वो महीना… पूरा हो गया है।
श्रेया का सिर झुक जाता है। उसके होंठ काँपते हैं—
मानो वह कुछ कहना चाहती हो लेकिन शब्द बाहर नहीं आते। कबीर उसकी हालत देख लेता है।
वह खुद को सँभालता है और थोड़ा-सा मुस्कुरा देता है… एक ऐसी मुस्कान जो बताती है कि वह अब सब समझ रहा है।
कबीर (धीरे से) बोला -
तुम चाहो तो उठकर तैयार हो सकती हो।
मैं बाहर इंतज़ार करता हूँ…कोई जल्दी नहीं है।
वह इतनी नरमी से बोलता है कि श्रेया की आँखें हल्की-सी नम हो जाती हैं।
यह पहली बार था, जब उसने कबीर की आवाज़ में गुस्सा नहीं… बल्कि सचमुच की कोमलता सुनी।
कबीर उठकर बाहर चला जाता है।
दरवाज़ा धीरे-से बंद कर देता है।
श्रेया कुछ देर यूँ ही बैठी रहती है,
अपने ही विचारों में खोई हुई।
उसे समझ नहीं आता—
डरना चाहिए…रोना चाहिए… या राहत महसूस करनी चाहिए। पर एक बात वह साफ़ समझ जाती है—
कल रात उसे डर से नहीं, किसी की चिंता से यहाँ लाया गया है। और वह कोई था, करण।
अब कहानी एक नए मोड़ पर आने वाली थी…
क्योंकि अगले कुछ घंटों में तीनों के रिश्तों की दिशा बदलने वाली थी।
कबीर का कमरा। शांत, उदास, लगभग सूना-सा।
श्रेया धीरे-धीरे कमरे के दरवाज़े पर आती है।
उसे याद आता है—
आज से उसे एक महीने तक कबीर के साथ रहना है।
पर जैसे ही वह अंदर कदम रखती है…
वह ठिठक जाती है।
कबीर खिड़की के पास बैठा है।
पीछे से हल्की धूप उसकी परछाई को और गहरा कर रही है। उसका चेहरा एकदम शांत… पर उस शांति में दर्द की मोटी दीवार छिपी है।
वह अब वह पुराना कबीर नहीं था—
जो हँसी-मज़ाक करता, जो आधी-अधूरी बातों में भी शायरियाँ बोल देता, जो हर वक्त खिलखिलाहट फैलाता।
यह कबीर… टूटा हुआ था।
उसकी आँखें लाल, चेहरा थका हुआ, आवाज़ में कड़वाहट… जैसे मुस्कुराना वो भूल चुका हो।
श्रेया (धीरे से) बोली -
मैं… अंदर आ जाऊँ?
कबीर बिना उसकी ओर देखे बस इतना बोलता है—
तुम्हारा कमरा अब यही है।
अंदर आने की इजाज़त माँगने की ज़रूरत नहीं।
उसकी आवाज़ में ठंडापन था, जैसे हर शब्द किसी पत्थर से गिरा हो।
श्रेया को उसके हर लहज़े से डर लगने लगता है।
वह धीरे से कमरे के एक कोने में खड़ी हो जाती है।
कबीर तब भी उसकी तरफ़ नहीं देखता।
कुछ समय बीतता है।
कबीर अचानक उठता है।
टेबल पर रखी फाइल उठाकर ज़ोर से पटक देता है।
आवाज़ से श्रेया डरकर काँप जाती है।
कबीर उसका काँपना नोटिस करता है… पर कुछ कहता नहीं। बस आँखें बंद कर लेता है—
मानो खुद को काबू कर रहा हो।
कबीर (भारी आवाज़ में) बोला -
डरती क्यों हो?
मैं तुम्हें हाथ भी नहीं लगाऊँगा…।
तुम्हारी तरफ़ देख भी नहीं सकता।
उसकी बात सुनकर श्रेया और असमंजस में पड़ जाती है। क्या वह नफ़रत करता है?
क्या उसके बदलने की वजह वही है?
क्या वजह एक महीना है?
या कुछ और?
पर श्रेया कुछ पूछ नहीं पाती।
रात का दृश्य।
कमरे में हल्की अँधेरी।
कबीर अपनी तरफ़ सोता है, पीठ श्रेया की तरफ़ किए हुए। श्रेया बिस्तर के दूसरे कोने पर सिमटी हुई, एकदम चुपचाप।
कबीर की साँसें भारी और अनियमित हैं—
जैसे उसके अंदर कई दर्द जाग रहे हों।
अचानक कबीर के सीने में तेज़ दर्द उठता है।
वह कराह उठता है।
कबीर (दबी आवाज़ में) बोला -
आह… साला…!
श्रेया घबरा जाती है। वह झटके से उठकर उसके पास जाती है।
श्रेया (डरी हुई, धीरे से) बोली -
Kabir जी… क्या हुआ? आप ठीक तो हैं?
कबीर उसकी ओर देखता है—
उसकी आँखों में दर्द भी है और गुस्सा भी, पर गुस्सा खुद से, न कि श्रेया से।
कबीर (रुखेपन से) बोला -
कुछ नहीं!
दूर हटो!
श्रेया एक पल रुकती है—
फिर धीरे से उसके हाथ को पकड़ लेती है।
कबीर का हाथ छूट जाता है…
पर उसकी आँखों में एक पल के लिए कंपकंपी आ जाती है, जैसे वह इस स्पर्श का आदी नहीं रहा अब।
श्रेया (धीरे, हिम्मत जुटाकर) बोली -
दर्द हो रहा है ना ?
मैं doctor को बुला दूं ?
कबीर का चेहरा कठोर हो जाता है।
कबीर बोला -
तुम्हें मेरी परवाह करने का हक़ नहीं है…
और मुझे तुम्हारी परवाह चाहिए भी नहीं।
ये कहते ही वह करवट बदल लेता है।
श्रेया चुप हो जाती है—
पर उसके मन में एक सच धीरे-धीरे साफ़ होने लगता
है, यह गुस्सा श्रेया पर नहीं,बल्कि खुद अपनी जिंदगी पर है। अपने टूटे विश्वासों पर… और उन यादों पर… जिनके बारे में वह कुछ नहीं कहता।
अगले दिन सुबह।
कबीर तैयार होकर बाहर जाता है।
जाते-जाते बस इतना बोलता है—
कबीर:
कमरे में रहो।
करन भैया से कोई बात करने की जरूरत नहीं।
मुझसे भी नहीं....।
और वह दरवाज़ा बंद कर देता है।
श्रेया उसके जाते ही बिस्तर पर बैठ जाती है।
उसके दिल में एक गहरी टीस उठती है।
वह समझ चुकी थी—
कबीर अब गुस्से वाला नहीं, बल्कि अंदर से टूटा हुआ इंसान है।
और इस टूटन की वजह क्या है…
यह अब तक किसी ने उसे नहीं बताया था।