कमरे में हल्की रोशनी है। Shreya मुश्किल से चल रही है। Karan चुपचाप उसे देखता है, पर कुछ कहता नहीं।
Karan के चेहरे पर थकान, डर और टूटन सब साफ दिख रहा है…।
पर उसने ये बात Kabir को जानने तक नहीं दी कि Shreya रात भर दर्द में थी…।
और कि उसे वो पुरानी depression वाली बीमारी फिर से पकड़ रही है।
Kabir अपने कमरे में लेटा है। चेहरा पीला, आँखें भारी। उसे खुद को भी हल्का सा दर्द हो रहा है। वो सो रहा है।
Karan अपने कंप्यूटर के सामने बैठा है।
आँखें लाल, हाथ कांप रहे हैं। मगर वो तेज़ी से टाइप करता है।
स्क्रीन पर Shreya की भाषा—उसकी सरल, मासूम Hindi—में कुछ लिखा जा रहा है।
KARAN (धीमी आवाज़ में, खुद से) बोला -
Kabir को लगना चाहिए… की श्रेया उसकी फिक्र करती है।
उसको stress नहीं देना…
नहीं तो वो बीमार हो जाएगा…
वो आख़िरी लाइन टाइप करता है —
अपनी दावा time पर ले लीजिएगा Please.
फिर प्रिंटर चलने लगता है। Karan पन्ना निकालकर उसे एक छोटे से gift जैसी box में मोड़कर रख देता है। साथ में painkillers और Kabir की regular दवाएँ भी रखता है।
Karan धीरे से Kabir के कमरे का दरवाज़ा खोलता है। उसके कदम बेहद हल्के हैं, ताकि Kabir जाग ना जाए। वो box बिस्तर के पास टेबल पर रख देता है।
एक पल रुककर, Kabir को दूर से देखता है—
उसकी हालत…
उसकी कमजोरी…
और Karan की आँखों में गहरा भाई वाला दर्द भर आता है।
KARAN (फुसफुसाते हुए) बोला -
तू ठीक हो जा…
बाकी सब मैं संभाल लूंगा…।
वो दरवाज़ा बंद करके निकल जाता है।
धीरे-धीरे Kabir की आँखें खुलती हैं।
वो टेबल पर रखा छोटा सा बॉक्स देखता है।
KABIR (कमज़ोर आवाज़ में) बोला -
ये…? किसने…?
वो बॉक्स खोलता है। उसके अंदर दवाइयाँ, painkillers और एक letter है।
Shreya की भाषा में लिखा हुआ।
Kabir पत्र ज़ोर से पढ़ता है—
LETTER (लिखा हुआ था) —
आपकी तबियत ठीक नहीं होती तो मुझे बुरा लगता है। Stress ना लेना, आराम करना।
मैं यहां बिल्कुल ठीक हूं। और वैसे भी एक हफ्ते बाद तो मैं आपकी हो जाऊंगी।
तब तक इंतजार करिए।
और हां दवाई time पर ले लेना,please....
— आपकी प्यारी श्रेया
Kabir की आँखें नम हो जाती हैं।
KABIR (धीमी, पिघलती आवाज़ में) बोला -
Shreya… तुम… मेरे लिए सुबह-सुबह…?
तुमने मेरे लिए…?
उसे यही लगता है कि ये shreya ने ही लिखा है।
कि वो उसके लिए दवाइयाँ देकर गई है।
कि वो उसकी फिक्र करती है।
पर सच तो यह था, ये सब Karan ने किया था।
किसी को बताने के बिना।
Kabir box अपने सीने से लगा लेता है।
उसकी आँखों में प्यार, सुकून और कृतज्ञता है…।
और एक तरफ़ Karan चुपचाप दरवाज़े के पास खड़ा यह सब देख रहा है—
बिल्कुल बिना credit लिए, बिना बोले।
सुबह की धीमी रोशनी
दोनो भाई—Kabir और Karan—अभी भी ऐसे दिखाते फिर रहे थे जैसे एक-दूसरे से बहुत नाराज़ हों।
पर असलियत दोनों के दिल में कुछ और ही थी।
Shreya की तबियत अब भी बहुत खराब थी।
कमज़ोरी, दर्द और पूरे शरीर की थकान उसको कमरे से बाहर आने ही नहीं दे रही थी।
Karan कमरे का दरवाज़ा धीरे से खोलता है।
Shreya बिस्तर पर लेटी है, चेहरा पीला, आँखें भारी।
Karan धीरे-धीरे पास आता है।
उसके चेहरे पर चिंता छुपाए नहीं छुपती।
KARAN (धीमी आवाज़ में) बोला -
Shreya… पानी पिया?
Shreya सर हिलाती है—हाँ, पर उसकी आंखें बता रही थीं कि वो ठीक नहीं है।
Karan उसके पास बैठ जाता है।
धीरे से उसके बाल पीछे करता है।
KARAN बोला -
आज मत उठाना.....ठीक है?
मैं हूं ना यहीं।
Karan को हमेशा लगता था कि Shreya उसके साथ uncomfortable है। उसे याद था—
वो दिन जब वो कबीर पर गुस्सा हो गया था…
वो दिन जब Shreya पहली बार उससे बुरी तरह डर गई थी।
उसे लगता था कि Shreya उससे दूर रहना चाहती है…
और वो बस मजबूरी में उसके पास रहती है।
लेकिन सच्चाई बिल्कुल उलटी थी।
Shreya डरती जरूर थी, पर uncomfortable नहीं थी। कभी नहीं।
Shreya की आंखों में Karan के लिए एक सूनी-सी श्रद्धा थी, एक भरोसा…
जिसे वो खुद समझ नहीं पाती थी।
अचानक Shreya को पेट में हल्का सा खिंचाव होता है। वो धीरे से सिसकती है।
Karan तुरंत चौक जाता है।
वो उसका हाथ पकड़कर धीरे से दबाता है।
KARAN (घबराहट में) बोला -
क्या हुआ? दर्द बढ़ गया?
Shreya कुछ बोल नहीं पाती। बस आंखें बंद करके माथे पर हाथ रख लेती है।
Karan उसके कंधे पर हाथ रखकर उसे सहलाता है।
धीरे-धीरे उसके बाजू रगड़ता है ताकि उसकी body थोड़ी गर्म हो जाए।
KARAN (बहुत नरमी से) बोला -
Shh… shh… ठीक हो जाएगा।
मैं यहीं हूं, तुम अकेली नहीं हो।
Shreya उस आवाज़ में ऐसी नरमी सुनती है जो उसे कहीं और नहीं मिलती। वो बस आँखें बंद कर लेती है…
उसके पास रहना उसे weirdly safe महसूस कराता है। Karan उसे सुलाते हुए, उसकी पीठ सहलाते हुए खुद से सोचता है—
KARAN (Mind Voice)
श्रेया मुझे बर्दाश्त करती है.... बस इसलिए क्योंकि उसे रहना पड़ता है।
इसलिए मैं इसके पास ज्यादा नहीं रहता।
बस umcofortable feel ना हो...।
वो निराश होकर चुपचाप उसका हाथ छोड़ देता है।
पर Shreya अचानक उसका हाथ फिर से पकड़ लेती है, बहुत हल्का, बहुत घबराया हुआ…
Karan रुक जाता है।
पहली बार उसे एहसास होता है कि शायद…
Shreya उससे डरती जरूर है…
पर उसे दूर भी नहीं करना चाहती।
Shreya नींद की तरफ खिंच रही है।
Karan उसकी कमर के पास पानी की गरम बोतल रखता है। धीरे से उसकी चादर ठीक करता है।
और बहुत धीरे से इतना कि Shreya सुन भी न पाए—
KARAN बोला -
तुम uncomfortable
होती हो.... पर फिर भी मेरे पास रुक जाती हो...
पता नहीं क्यों.....?
Shreya आँखें बंद किए हल्की-सी मुस्कुराती है।
उसके होंठों से बहुत धीमी, टूटती हुई आवाज़ निकलती है—
SHREYA(आँखें बंद, नींद में) बोली -
आप… अच्छे हो…
Karan ठहर जाता है। उसकी सांस रुक जाती है।
वो पहली बार सुन रहा था—
Shreya उसके बारे में अच्छा सोचती है।
आज Shreya थोड़ी बेहतर महसूस कर रही थी।
कमज़ोरी अभी भी थी… पर now she could sit properly.
ये उसका Karan के साथ बिताने का आखिरी दिन था। Karan इसे मन ही मन जानता था, पर Shreya को एहसास भी नहीं था कि उसके जाने का याद ऐसा दर्द देगा उसे।
Karan कमरे में उसके लिए गरम सूप लेकर आता है।
KARAN(धीमी, कोमल आवाज़ में) बोला -
आज ठीक लग रहा है?
थोड़ी सूक गई हो… पर आंखों में रोशनी वापस आ रही है ।
Shreya हल्का-सा मुस्कुराती है। Karan इस मुस्कान को देखते ही अंदर से पिघल जाता है , पर दिखाता नहीं।
दोपहर होती है।
Karan घर से जुड़ी कुछ फाइलें निकालने कमरे से बाहर जाता है।
Shreya उठकर बिस्तर से नीचे आती है। अपना कप पानी लेना चाहती है।
टेबल पर एक छोटा-सा ग्लास रखा है—
पर उसका हाथ थोड़ा काँपता है
और गिलास ज़मीन पर गिरकर टूट जाता है।
आवाज़ पूरे कमरे में गूंज जाती है।
Shreya डर जाती है। उसकी सांसें अटक जाती हैं।
दिल जोरों से धड़क रहा है।
उसे याद है… जब Karan पहली बार गुस्सा हुआ था—
वो कितना डर गई थी।
वो कांपते हुए नीचे बैठती है और टुकड़े समेटने लगती है। तभी दरवाज़ा जोर से खुलता है। Karan अंदर आता है। Shreya एकदम जम जाती है।
Karan टूटे हुए ग्लास, काँपती Shreya और उसके हाथ में काँच का टुकड़ा देखता है।
उसकी सांस भारी हो जाती है।
वो पलभर में उसके पास जाता है।
KARAN (गरजकर) बोला -
Shreya!!
ये क्या कर रहीं थीं तुम!!
कितनी बार मना किया है कि ठीक होने तक उठो मत!!
तुम खुद को चोट लगा लेती हो??
Shreya सहमकर पीछे हटती है। उसके होंठ कांप रहे हैं। Karan उसकी आँखों में डर देख लेता है—
पर वो गुस्से में इतना डूबा है कि अपने ही शब्दों की तीख़ी चोट उसे महसूस नहीं होती।
KARAN (और तेज) बोला -
तुम्हे समझ नहीं आता ?!
मैं इतना protect कर रहा हूं तुम्हे....
और तुम हो कि जरा भी ध्यान नहीं रखतीं!!
Shreya सिहरकर आँखें बंद कर लेती है।
उसकी साँसें तेज हो जाती हैं। वो फूटने ही वाली है—
पर रोती नहीं…बस डर से जम जाती है।
Shreya का डर…उसका कांपना… उसकी आँखों का नम होना…सब Karan के सामने साफ दिख रहा था।
और उसी पल… गुस्से का बुलबुला फूट जाता है।
Karan धीरे-धीरे घुटनों के बल बैठ जाता है।
उसकी आवाज़ अचानक बेहद नरम हो जाती है।
KARAN (टूटे हुए सुर में) बोला -
Shreya
(नीचे देखकर) बोला -
मैने… फिर से चिल्लाया…
I’m… I’m sorry...
Shreya चौककर उसकी ओर देखती है। Karan ने सिर नीचा किया हुआ है, जैसे खुद पर शर्म आ रही हो।
KARAN(बहुत धीमे) बोला -
मुझे नहीं पता था तुम डर जाओगी…
चोट लग जाती…बस डर गया था मैं....।
Shreya धीरे से सिर हिलाती है।
उसके होंठों पर हल्की सी आवाज़ आती है—
SHREYA बोली -
मैं..... बस अपनी लेने उठी थी.....
मुझसे गलती हो गई.....।
Karan उसकी तरफ हाथ बढ़ाता है—
बहुत धीरे… बहुत संभलकर…
KARAN (कोमल आवाज़ में) बोला -
मुझसे गलती हो गई।
मैं तुमसे कभी गुस्सा होना ही नहीं चाहता।
पर हो जाता है....क्योंकि तुम....तुम मेरे लिए बहुत importent हो।
Shreya की आँखें फैल जाती हैं—
उसने पहली बार Karan से ऐसी बात सुनी थी।
Karan टूटे हुए ग्लास समेटता है।
Shreya को उठाकर बिठाता है।
उसके हाथ से काँच का छोटा टुकड़ा निकालता है।
वो उसका हाथ पकड़कर धीरे से दबाता है।
KARAN बोला -
आज.... आखिरी दिन है तुम्हारा मेरे पास....
और मैं तुम पर गुस्सा कर बैठा....
Shreya....मुझे माफ कर दो...।
Shreya चुप रहती है—
पर उसकी आँखों के कोने से एक आँसू बह जाता है।
Karan वो आँसू अपने अंगूठे से पोंछ देता है
जैसे वो आँसू उसके लिए ज़हर हो।
KARAN (बहुत धीमे) बोला -
डर गईं थीं… है ना?
Shreya कुछ नहीं बोलती—
बस उसकी ओर देख लेती है।
Karan का दिल उसी जगह ढह जाता है।