दो पतियों की लाडली पत्नी - 30 Sonam Brijwasi द्वारा महिला विशेष में हिंदी पीडीएफ

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दो पतियों की लाडली पत्नी - 30

आधी रात, कमरा
Shreya Karan से लगी हुई है, पर उसका पूरा शरीर बर्फ जैसा था—
इतना ठंडा… कि Karan का दिल दहल गया।
Karan ने धीरे से उसका चेहरा छुआ—
उसकी त्वचा पर पसीने की पतली परत थी।

KARAN (चौंककर, फुसफुसाते हुए) बोला - 
Shreya.... ये.... क्या हो रहा है तुम्हे?

Shreya हल्की कराह के रह जाती है। उसकी साँसें छोटी-छोटी, तेज़… जैसे दर्द हर सांस में चुभ रहा हो।
Karan उसके सीने पर हाथ रखता है—
धड़कनें बहुत तेज़ थीं। बेतरतीब… घबराई हुई।
एक ही पल में उसे समझ आ गया—
ये stress वाला नहीं… असली, गहरा दर्द है।
Shreya अब सहन नहीं कर पा रही थी।
उसकी आँखों से आँसू खुद-ब-खुद बहने लगे।
शरीर और ज़्यादा ठंडा होता जा रहा था।
वो आखिरकार हिचकी लेते हुए सिसक पड़ी—

SHREYA (बहुत धीमी, टूटी हुई आवाज़ में) बोली - 
क…Karan ji…
मुझे… बहुत… दर्द हो रहा है…बहुत तेज...।

उसके बोलने का अंदाज़ ऐसा जैसे शब्द भी दर्द से दब रहे हों। Karan के कलेजे में जैसे छुरी चल गई।
Karan तुरंत उठकर पूरे कमरे की तरफ देखता है।
वो तुरंत दौड़कर सारी खिड़कियाँ, दरवाजे, परदे बंद कर देता है, ताकि Shreya की सिसकियाँ Kabir तक न पहुँच जाएँ।
क्योंकि उसे पता था—
Kabir सुन लेगा तो फिर खुद को तोड़े बिना नहीं रह पाएगा।
Karan वापस Shreya के पास भागकर आता है।
उसके बाल हटाता है, उसकी कमर पकड़कर उसे बाँहों में लेता है।

KARAN (थरथराती आवाज़, घबराहट में) बोला - 
Shreya…बस... बस...रो मत....
मैं यहीं हूं..... तुम्हे कुछ नहीं होने दूंगा....।

Shreya उसकी छाती पर मुट्ठियाँ भींच लेती है
जैसे दर्द को किसी तरह रोकना चाहती हो।
पर उसकी सिसकियाँ और तेज़ हो जाती हैं।
Karan घबराकर उसके माथे से पसीना पोंछता है।
वो उसकी कमर सहलाता है, पेट पर हाथ रखकर गर्माहट देने की कोशिश करता है।
लेकिन Shreya का दर्द आँसुओं की तरह बह रहा था।

SHREYA (रोते-रोते) बोली - 
Karan ji… please…
मुझे… बहुत… तकलीफ…
Please.... कुछ करिए ना.....

Karan कुछ बोल ही नहीं पाता। उसकी आँखें लाल हो जाती हैं , गुस्से से नहीं…दर्द से… बिलकुल बिखर जाने वाले दर्द से।

KARAN (टूटी आवाज़ में) बोला - 
Shreya…मुझसे.....क्यों छुपा रही थीं ये सब?
ये दर्द.....तुम अकेले कैसे सहती हो ?

Shreya कुछ नहीं बोल पाती—
बस उसका हाथ कसकर पकड़ लेती है।
Karan उसे अपने सीने से लगा लेता है
जैसे पूरी दुनिया से छिपा लिया हो

रात बढ़ती जा रही है… Karan की बेचैनी अब डर में बदल चुकी है…
Shreya का दर्द अब हद पार कर चुका था।
उसकी साँसें टूट-टूट कर आ रही थीं…
चेहरा सफेद… होंठ सूखे… और शरीर बिलकुल बर्फ जैसा ठंडा। Karan ने हर तरीका आज़माया था—

पेट पर hot bag
हाथों से गर्माहट देना
उसे अपनी बाँहों में जोर से पकड़े रहना 
सिर सहलाना
गरम पानी पिलाने की कोशिश

पर एक सेकंड का भी आराम नहीं मिला।
Karan ने फिर से उसका हाथ पकड़ा। पूरी हथेली बर्फ जैसी। जैसे खून ही ठहर गया हो।
Karan एक पल के लिए जम गया।
उसके माथे पर पसीने की बूंदें उभर आईं,
पर Shreya के माथे पर…अब पसीना तक नहीं।

वो काँपती आवाज़ में बोल पड़ी—
K…Karan ji…
मु-मुझे…सांस....नहीं आ रही....।

Karan का दिल डर से सिमट गया।
Shreya को संभालते-संभालते
खुद Karan को भी चक्कर आ गए।
उसकी आँखों के सामने सब धुंधला होने लगा।
उसके हाथ काँपने लगे… लेकिन फिर भी वो रुकने वाला नहीं था।

KARAN (थरथराती आवाज़, खुद को संभालते हुए) बोला - 
नहीं… नहीं Shreya…तुम्हे कुछ नहीं होगा....
मैं हूं यहां... बस सास लो....बस थोड़ा और....।


पर उसका अपना सिर घूम रहा था—
जैसे युद्ध में थका हुआ योद्धा आखिरी सांस तक लड़ रहा हो।
वो बाहर देखता है। मौसम इतना ज्यादा खराब था बाहर जाना खतरे से खाली नहीं था। 
बाहर तेज बारिश हो रही थी, साथ में तूफान भी आ गया था। बिजली बार बार कड़क रही थी। मौसम ने विक्राल रूप ले लिया था। 
ऐसा लगता था जैसे मौसम भी बताना चाहता हो कि श्रेया किस दर्द से गुजर रही है। 
अगर ऐसे में करण shreya को लेकर बाहर भी जाता, तो उसकी और श्रेया की दोनों की जान को खतरा हो सकता था। 
उसने ambulance को call किया। पर रस्ते में पेड़ गिर गया था इसलिए ambulance नहीं आ पाई।

Shreya को अचानक पेट पकड़कर जोर से दर्द हुआ।
वो कराह उठी और उसकी कमर झटके से सिकुड़ गई।
Karan घबरा गया—

KARAN बोला - 
Shreya!!
अरे… Shreya मेरी बात सुनो…

Shreya का शरीर फिर से ठंडा… और ठंडा… और ठंडा होता गया।
Karan ने उसे अपने सीने से कसकर लगाया—
अपनी गर्माहट देने की कोशिश की।

KARAN (उसके कान के पास, हांफते हुए) बोला - 
मेरी जान…please थोड़ा सा.... थोड़ा सा सह लो...
मैं हूं ना.....please....

वो अपना पूरा सीना Shreya के सीने से चिपकाकर
उसे गर्म करने लगा। पर किसी चीज़ का असर नहीं।
Karan की आँखें भर आईं।
वो उसे पकड़े-पकड़े हल्का-सा सिसक उठा।

KARAN (आँखों में आँसू, दबे स्वर में) बोला - 
मैने… कभी ये सोचा ही नहीं था....
की तुम इतना दर्द सह रही हो...
और मैं....मैं कुछ भी नहीं कर पा रहा....।

वो उसका चेहरा पकड़कर देखता है—
Shreya की पलकों के बीच आँसू अटके हुए थे…
पर उसकी देह अब भी बर्फ की तरह ठंडी थी।

Shreya को अचानक पेट में बिजली सी कौंध उठी।
दर्द इतना तेज… इतना भयानक… कि वो अपने होश में भी न रह पाई। एक झटके में उसने
Karan के सीने पर अपने नाखून गाड़ दिए।

KARAN (दर्द से सिकुड़ते हुए भी) बोला - 
Aah… Shreya…!

लेकिन उसने Shreya को देखा—
उसका दर्द Karan के दर्द से हजार गुना ज्यादा था।
उसकी आँखों में आँसू भर आए।
Shreya आधी बेहोश…आधी हांफती…
बस हल्की-सी आवाज़ में दबी हुई कराह।

SHREYA (बहुत धीमे, टूटे सुर में) बोली - 
K-Karan ji… मुझे… बहुत… दर्द हो रहा है…

Karan रो पड़ा।
उसने Shreya का चेहरा दोनों हाथों में लिया—
और बार-बार उसके माथे, गालों, होंठों पर हल्की-हल्की किसें दीं, जैसे उससे उसकी जान वापस बुला रहा हो।
पर Shreya की पलकें बस काँप रहीं थीं।
वो पूरी अंधेरी थी… बस Karan की गरमाहट महसूस कर पा रही थी।

उसे उठाए-उठाए Karan मजबूत की बाँहें थक चुकी थीं। दिल की धड़कन तेज…साँसें भारी… पर उसने Shreya को ज़रा भी ढीला नहीं छोड़ा।
आख़िरकार वो उसे अपनी गोद में खींचकर सीने से जोर से लगा लेता है। और बिस्तर पर पड़ जाता है।
Karan की आवाज़ काँप रही थी।

KARAN (टूटी हुई आवाज़, उसके बालों में मुँह छिपाकर) बोला - 
Shreya… अगर तुम मुझे छोड़कर गईं…
तो मैं भी…तुम्हारे साथ चला जाऊंगा....।

उसकी बात खतरे की नहीं, उसके भय की आवाज़ थी — अपनी पत्नी को खोने का डर।
Karan का हाथ काँपा। उसने मेज़ पर रखी अपनी दवा की शीशी उठाई…कुछ पल उसे घूरता रहा…
फिर एक झटके में दूर फेंक दिया।

KARAN (बहुत धीमे से) बोला - 
मुझे ये नहीं चाहिए…
मुझे तुम चाहिए…
बस तुम ठीक हो जाओ, Shreya…

उसका इरादा किसी नुकसान का नहीं था—
बस Shreya को खोने का भय उसे हिला चुका था।
Karan ने उसे और कसकर सीने में छुपा लिया—
उसका पूरा शरीर Shreya की ठंडी देह को अपनी गर्माहट से ढक रहा था। धीरे-धीरे…बहुत धीरे Shreya की साँसें थोड़ी स्थिर होने लगीं। उसकी टाँगों का काँपना कम हुआ। पेट के मरोड़ शांत होने लगे।
Shreya ने हल्का-सा सिसक कर Karan की शर्ट मुट्ठी में पकड़ ली। फिर धीरे-धीरे उसकी पलकों की थरथराहट थमी… और वो शांत नींद में चली गई—
पूरी तरह Karan की बाँहों में समाई हुई।
Karan ने उसकी गर्दन पर हल्का सा चुंबन दिया।
उसकी आँखों से आँसू गिर गए, पर इस बार दर्द के नहीं,बल्कि राहत के।

KARAN (बहुत धीमे, प्यार में डूबे स्वर में) बोला - 
सोया करो मेरी जान…
मैं हूं ना…मैं कहीं नहीं जा रहा....।

और वो उसे ऐसे पकड़े रहा जैसे उसकी खुद की साँसें
Shreya की साँसों से जुड़ी हों।

 सुबह का कमरा
हल्की धूप कमरे में फैल रही है। Shreya धीरे-धीरे अपनी आँखें खोलती है। Karan अभी भी सो रहा है। उसकी बाँहें Shreya के चारों ओर लिपटी हुई हैं।

SHREYA (धीमी आवाज़, दर्द में) बोली - 
…उह… सब दर्द कर रहा है…।

Shreya पूरी body दर्द में होने के बावजूद चुपचाप पड़ी रहती है। उसके हाथ हलके से Karan की शर्ट पकड़ते हैं।

KARAN (आँखें बंद, थकी हुई आवाज़ में) बोला - 
बस एक हफ्ता…फिर तुम kabir के पास जाओगी...
ना तो तुम्हे कोई problem होगी.....
वो तुमसे बहुत प्यार करता है ....ना?

Shreya हल्की झिझक के साथ उसे देखती है।
Karan को लगता है कि Shreya उसके पास uncomfortable feel कर रही है।
वो उसकी हालत समझते हुए धीरे बोलता है।

KARAN (धीमी, गहरी आवाज़ में) बोला - 
तुम… मुझे uncomfortable मत समझो…
मैं बस चाहता हूं कि तुम थोड़ी राहत महसूस करो…
तुम्हारी दर्द… मुझे सब दिख रहा है…।

Shreya बस धीरे-धीरे सिर हिलाती है।
वो डर भी महसूस कर रही है, पर Karan की गर्माहट में थोड़ी राहत भी।

SHREYA (धीमी, टूटती आवाज़ में) बोली - 
Karan जी… मैं… मैं बस थोड़ी देर…

KARAN (आँखें अब भी बंद, फिर भी प्यार भरी आवाज़ में) बोला - 
ठीक है…मैं यहीं हूं....
तुम्हारे दर्द में तुम्हारे साथ हूं। 
बस एक हफ्ता.....फिर कबीर के पास.....।

Shreya धीरे-धीरे Karan के सीने से सटकर थोड़ी राहत महसूस करती है।
उसकी आँखों में हल्की आँसू की चमक, पर मन में थोड़ा विश्वास भी बन रहा है।
 सुबह की धूप में दोनों एक-दूसरे की गर्माहट में समाए हुए।