Shreya का कमरा। पर्दे हल्के-हल्के हिल रहे हैं। सुबह की हल्की धूप कमरे में गिरती है। Shreya अब भी बेहोष-सी नींद में है। चेहरा लाल, सांस हल्की-हल्की चल रही है। Karan बिस्तर के किनारे बैठा है। उसके हाथ कांप रहे हैं। आँखें भरी हुई हैं।
KARAN (बहुत धीमी, टूटी आवाज़ में) बोला– Shreya… तुम बिल्कुल परी जैसी हो … पर मैं…
मैं सिर्फ दर्द देता हूं ना?
वह दवाई की एक बड़ी स्ट्रिप उठाता है। उसमें से 4–5 गोलियाँ निकालकर बिना पानी के निगल लेता है। उसके हाथ और ज़्यादा कांपने लगते हैं।
किसी को पता नहीं था… Karan depression की दवाई कई गुना ज़्यादा लेता रहता था ताकि अंदर का तूफान दब जाए। पर आज… वो खुद को टूटने से रोक नहीं पा रहा था।
Karan झुककर Shreya के माथे को देखता है। उसका पसीने से भीगा चेहरा Karan का कलेजा चीर देता है।
KARAN (फुसफुसाकर) बोला –
कल रात तुम पूरी रात रोईं… दर्द में थीं… और मैं तुम्हे संभाल भी नहीं पाया।
(आँखें बंद कर लेता है)–
बस कुछ दिन और Shreya… फिर तुम Kabir की हो जाओगी … एक महीने के लिए ही सही… पर मेरी तरफ से तुम पर कोई बोझ नहीं होगा ।
वह Shreya के गाल को बहुत प्यार और दर्द से चूमता है। बार-बार। जैसे हर किस में माफी छिपी हो।
KARAN बोला -
तुम कितनी मासूम हो… और मैं…
(आँसू गिरते हैं)–
मैं बस तुमसे चिपक कर जीना चाहता हूं पर तुम्हे तकलीफ देने का डर....मुझे खत्म कर देता है, shreya...
वह थककर उसके बिल्कुल बगल में लेट जाता है। मगर दूर नहीं… इतना पास कि Shreya की सांस उसकी गर्दन को छूती है, लेकिन इतना दूर भी कि उसे जगाने की हिम्मत न करे।
Karan की आँखें छत पर टिक जाती हैं। दिमाग में हजारों ख्याल दौड़ रहे हैं – Shreya का उलझा रिश्ता, Kabir की चुप्पी, उसका खुद का डर… और वो सच जो किसी से कह नहीं पाता।
KARAN (मन में) बोला–
Shreya… अगर तुम्हे कभी पता चला कि मैं तुम्हे खो देने से कितना डरता हूं.... तो शायद तुम मुझे कभी आंख उठा के ना देख पाओ।
Karan धीरे से Shreya के हाथ को पकड़ लेता है, जैसे खुद को स्थिर करने की आखिरी कोशिश हो।
KARAN बोला–
तुम सो रही हो… इसलिए कह रहा हूं…
मैं तुमसे प्यार करता हूं shreya....बहुत ज्यादा....पर तुम दोनों बीच फंसी हुई हो.... और मैं तुम्हें और दर्द नहीं देना चाहता।
उसकी आँखें बंद हो जाती हैं। गोलियों का असर शुरू हो रहा है। वह आधा बेहोश-सा Shreya के कंधे पर सिर रख देता है।
Shreya को कुछ पता नहीं था… कि उसके बिल्कुल पास लेटा Karan टूट रहा था… हर पल।
सुबह का कमरा। हल्की ठंड। Shreya धीरे-धीरे नींद से उठती है।
Karan उसके पास ही बेहोश-सा पड़ा है। उसका चेहरा थका हुआ, आँखों के नीचे काले घेरे… जैसे कई दिनों से ठीक से सोया ही न हो।
Shreya (धीमे से) बोली–
Karan जी…?
Karan जवाब नहीं देता. उसकी साँसें भारी हैं। दवाई का गहरा असर पड़ा है।
अचानक Karan नींद में ही बड़बड़ाने लगता है—
KARAN (sleep talking, टूटी आवाज़ में) बोला – Shreya… I love you यार… तुम बहुत प्यारी हो…
(हल्की मुस्कान उसके होठों पर)–
पर… मैं तुम्हे दर्द नहीं दे सकता… कभी नहीं…
Shreya का दिल एकदम रुक जाता है। वह अविश्वास में उसे देखती रह जाती है।
Karan फिर बड़बड़ाता है—
और कबीर… तू मेरी जान है भाई… तुझे मैं कुछ होने नहीं दूंगा… मरते दम तक…।
Shreya सुनकर सन्न। उसकी आँखें फैल जाती हैं।
Shreya ने कभी नहीं सुना था कि Karan इतने टूटे हुए, इतने सच्चे दिल से ये शब्द बोलेगा।
उसकी आँखों से आँसू बहने लगते हैं। उसके सामने दो सच्चाइयाँ खड़ी थीं, Karan का प्यार… और दो भाइयों के बीच का दर्द।
Shreya कांपती हुई Karan के पास झुकती है। उसके चेहरे को धीरे से छूती है।
Shreya (फुसफुसाकर) बोली–
Karan जी… आप… आप मुझसे…
आँसू गिरते हैं Karan के गाल पर।
Shreya उसके माथे को पकड़कर गहराई से चूम लेती है , इतने प्यार से, जैसे वो पहली बार किसी सच को स्वीकार कर रही हो।
लेकिन… उसी पल उसके पेट में तेज मरोड़ उठती है।
वह घबराकर उठती है।
SHREYA कराहती है–
Aahh…
वह लड़खड़ाते हुए बाथरूम की ओर भागती है। दरवाजा बंद होते ही अंदर से उल्टियों की आवाज़ आने लगती है.
पहले पानी…फिर फिर से उल्टी…और फिर—
लाल खून की धारें washbasin में गिरने लगती हैं।
Shreya डर के मारे चिल्ला नहीं पाती, बस सहमी हुई टॉयलेट सीट पकड़कर बैठ जाती है।
उसकी सांसें तेज… हाथ कांप रहे… चेहरा सफेद।
SHREYA (हांफते हुए) बोली–
ये… क्या हो रहा है मुझे…?
वह रोने लगती है…कमज़ोरी के कारण उठ भी नहीं पा रही।उधर कमरे में…Karan बेहोश पड़ा है। उसने कुछ नहीं सुना… कुछ नहीं देखा…
एक तरफ Karan का दवा का असर उसे बेहोश कर रहा था…और दूसरी तरफ Shreya के शरीर में एक नया तूफान उठा था…जो किसी बड़ी मुसीबत की शुरुआत होने वाला था।
रात 11 बजे —
कमरे में आधी रोशनी। बाहर हल्की बारिश की आवाज़। Shreya बाथरूम से बाहर आती है — चेहरा पीला, होंठ सूखे, आँखें नम। उसकी साड़ी का निचला हिस्सा हल्का सा लाल हो चुका था। Periods की शुरुआत हो चुकी थी… और वो पहले से ही बेहद कमज़ोर थी।
Karan अभी भी बेहोशी से उठने लगा था।
वो आँखें मलते हुए Shreya को देखता है —
थकी हुई, दर्द में झुकी हुई, पर चेहरे पर नकली मुस्कान।
KARAN (धीरे, थका हुआ) बोला -
Shreya… तुम ठीक हो?
Shreya तुरंत अपनी साड़ी ठीक करती है और दर्द छुपाकर मुस्करा देती है।
SHREYA (धीमी, टूटी मुस्कान लिए) बोली -
हां… मैं बिल्कुल ठीक हूं!
लेकिन उसकी आवाज़ में कंपन साफ था।
सबने चुपचाप खाना खाया।
Shreya ने मुश्किल से दो निवाले खाए…उसका पेट मरोड़ रहा था…कमर टूट रही थी…सिर ऐसा दुख रहा था जैसे कोई अंदर हथौड़े मार रहा हो। हर कदम पर उसका मन उल्टी जैसा होने लगता था।
देर रात, कमरा (11:45 PM)
Karan और Shreya लेटे हैं।
कमरे में सन्नाटा।
लेकिन Shreya के अंदर एक तूफान मचल रहा है।
वह बिस्तर पर सीधी लेटी है, आँखें बंद…
पर दर्द लगातार चुभता है —
पेट में तेज मरोड़,
सीने में जलन,
कमर में ऐंठन,
सिर में माइग्रेन…
और शरीर में खून की कमी से कांपना।
Shreya हल्का सा कराहती है, पर आवाज़ दबा लेती है। Karan उसे देखता है।
उसे लगता है Shreya बस emotional stress में है। उसे असल दर्द का अंदाज़ा नहीं।
Shreya धीरे-धीरे खिसककर Karan की तरफ आती है। वो उसके सीने से लग जाती है —
जैसे कोई बच्चा दर्द से बचना चाहता हो।
KARAN (हैरानी से) बोला -
Shreya…?
तुम… इतनी पास…?
Shreya उसकी शर्ट पकड़ लेती है ताक़त से।
आँखें बंद। साँसें भारी।
Karan को लगता है —
“शायद उसे emotional comfort चाहिए।”
वो कुछ नहीं कहता, बस उसके सिर पर हाथ रख देता है। लेकिन Shreya का दर्द बढ़ता ही जाता है।
वो अंदर ही अंदर टूट रही थी…
पर बाहर…एक शब्द भी नहीं।
Shreya के लिए ये रात किसी परीक्षा से कम नहीं थी।
पेट का दर्द ऐसा जैसे कोई अंदर से पकड़कर मरोड़ रहा हो…।
कमर का दर्द जैसे किसी ने रीढ़ तोड़ दी हो…।
माइग्रेन जैसे दिमाग में कोई तेज धारदार चीज़ घूम रही हो…।
सीने में भारीपन जैसे साँस ही रुक जाएगी…।
खून की कमी से पूरा शरीर बरफ जैसा ठंडा पड़ रहा था।
Shreya का चेहरा पसीने से भीग गया था।
उसके हाथ कांप रहे थे। पर वो Karan से एक शब्द नहीं बोल रही… क्योंकि उसे पता था—
अगर Karan को सच पता चला…तो वो खुद टूट जाएगा।
Shreya धीरे-धीरे Karan की बाँहों में और सिमट जाती है। दर्द छुपाते हुए…सिसकते हुए।
Karan समझ ही नहीं पा रहा था —
कि उसके सीने से लगी ये लड़की
अंदर ही अंदर हर तरह के दर्द से झुलस रही है।