बिल्ली जो इंसान बनती थी - 20 Sonam Brijwasi द्वारा नाटक में हिंदी पीडीएफ

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बिल्ली जो इंसान बनती थी - 20

सुबह के बाद शानवी के मन में एक ही बात बार-बार घूम रही थी—
कार्तिकेय को हमेशा के लिए इंसान बनाना होगा। अब उसे सिर्फ़ टुक-टुक की आदतों से प्यार नहीं था…बल्कि उसके दर्द का हल भी चाहिए था।वो बिना देर किए मंदिर की ओर निकल पड़ी। 🌿
मंदिर के शांत वातावरण में घंटियों की आवाज़ गूंज रही थी।
शानवी ने अंदर जाकर पंडित जी से मुलाकात की।

शानवी (गंभीर होकर) बोली - 
पंडित जी… मुझे एक श्राप के बारे में जानना है…
एक ऐसा इंसान जो रात में इंसान बनता है और दिन में बिल्ली…

पंडित जी कुछ पल चुप रहे। फिर उनकी आँखों में हल्की चिंता आई।

पंडित जी बोले - 
ये कोई साधारण बात नहीं है बेटी…

वो शानवी को मंदिर के पीछे बने पुराने पुस्तकालय में ले गए। 📚
वहाँ बहुत सारी पुरानी, धूल भरी किताबें रखी थीं।
हर किताब में जैसे कोई पुरानी कहानी दबी हुई थी—तंत्र, शाप, और अधूरी आत्माओं की कहानियाँ।

पंडित जी ने एक भारी सी किताब खोलकर कहा—
जिस श्राप की तुम बात कर रही हो…वो आत्मा और प्रेम दोनों से जुड़ा है…

शानवी ध्यान से सुन रही थी।

पंडित जी (धीरे से) बोले - 
कभी एक आत्मा को अधूरा प्रेम और धोखे के कारण दो हिस्सों में बाँट दिया गया था…।
एक हिस्सा इंसान बना रहा…और दूसरा… एक जानवर के रूप में बंद कर दिया गया…।

शानवी के हाथ ठंडे पड़ गए। 🥶

शानवी (धीरे) बोली - 
तो… इसका इलाज?

पंडित जी ने गंभीर होकर उसकी तरफ देखा।

पंडित जी बोले - 
इलाज आसान नहीं है…जिसे तुम प्यार कह रही हो… वही उसकी सबसे बड़ी परीक्षा है…अगर सच्चा प्रेम और विश्वास पूरा हुआ…
तो शाप टूट सकता है…।

शानवी की आँखों में एक नई रोशनी आ गई। ✨अब उसे समझ आ चुका था ये लड़ाई सिर्फ़ तंत्र की नहीं…दिल और भरोसे की भी थी। कमरे के बाहर हवा तेज़ हो गई थी…जैसे कोई नया मोड़ कहानी का इंतज़ार कर रहा हो। 🌙🔥

रात के 10 बजे थे। मुंबई का आसमान काला और भारी लग रहा था, जैसे आने वाले खतरे को पहले ही महसूस कर रहा हो। 🌙
शानवी घर पहुंची ही थी कि उसके मन में एक अजीब बेचैनी फिर से उठने लगी। टुक-टुक अभी भी उसके साथ था… लेकिन आज उसका व्यवहार पहले जैसा नहीं था। वो धीरे-धीरे कमरे में घूम रहा था, जैसे किसी अनहोनी को महसूस कर रहा हो।

तभी…दरवाज़े पर ज़ोर से दस्तक हुई। 🔥 और अगले ही पल—
परितोष अंदर आ धमका। शानवी का दिल एकदम बैठ गया।

परितोष (ठंडी मुस्कान के साथ) बोला - 
कहाँ तक भागेगी, जानेमन?

वो तेज़ी से आगे बढ़ा और शानवी का हाथ पकड़ लिया।

परितोष (खतरनाक स्वर में) बोला - 
अब तो चलना पड़ेगा…बलि जो चढ़ानी है… वो तुम्हारी है।

शानवी चीख पड़ी—
छोड़ो मुझे!

टुक-टुक तुरंत दौड़कर आया। 🐾उसने परितोष के हाथ पर जोर से खरोंच मारी। लेकिन परितोष बहुत ताकतवर था…उसने गुस्से में टुक-टुक को उठाया और दूर फेंक दिया। 

परितोष बोला - 
हट... बिल्ले....!

💥 टुक-टुक ज़मीन पर गिरा…उसकी साँसें तेज़ थीं…आँखों में दर्द और बेबसी थी। 😢 वो उठ नहीं पा रहा था…
बस धीरे-धीरे—म्याऊँ… म्याऊँ… करता रहा। शानवी ने ये देखा तो उसकी चीख निकल गई।

शानवी (रोते हुए) बोली - 
टुक-टुक!!!

उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। लेकिन परितोष ने उसे कसकर पकड़ लिया और खींचते हुए बाहर ले जाने लगा।

परितोष (ठंडी आवाज़ में) बोला - 
अब खेल खत्म… अमावस्या का बलिदान शुरू।

टुक-टुक वहीं ज़मीन पर पड़ा रह गया…बेबस, घायल… और टूटे हुए दिल के साथ। 🐾💔 उसकी आँखों से आँसू गिर रहे थे…
लेकिन वो कुछ कर नहीं पा रहा था।

बस एक ही आवाज़ बार-बार निकल रही थी—
म्याऊँ… 😢

टुक-टुक ज़मीन पर ही पड़ा था। उसके शरीर में इतनी ताकत भी नहीं बची थी कि वो ठीक से खड़ा हो सके। 🐾💔 लेकिन फिर भी…वो बार-बार कोशिश कर रहा था।

“म्याऊँ… म्याऊँ…”

उसकी आवाज़ रात के अंधेरे में घुलती जा रही थी… पर इस बार कोई सुनने वाला नहीं था।पूरा शहर जैसे सो चुका था… और किस्मत जाग चुकी थी। 🌙

परितोष शानवी को घसीटते हुए एक पुराने, डरावने ठिकाने पर ले आया। दीवारों पर अजीब से चिन्ह बने थे… हवा में धूप और राख की मिली-जुली गंध थी। वहां एक कोने में बैठा था… तांत्रिक।
उसकी आँखें शानवी को देखते ही चमक उठीं।

तांत्रिक (धीरे, डरावनी मुस्कान के साथ) बोला - 
बिल्कुल वही चेहरा…जैसा मेरी बेटी का था…।

शानवी का दिल बैठ गया। 😨 तांत्रिक आगे बढ़ा और उसके चेहरे को गौर से देखने लगा।

तांत्रिक (ठंडी आवाज़ में) बोला - 
अफ़सोस… इस बार भी तेरी ही बलि चढ़ेगी…
कार्तिकेय से प्यार करने का अंजाम… यही होता है।

शानवी की आँखों में आँसू भर आए।

शानवी (रोते हुए) बोली - 
मुझे छोड़ दो… प्लीज़…

लेकिन उसकी आवाज़ दीवारों से टकराकर रह गई। किसी ने उसकी बात नहीं सुनी…परितोष बस खड़ा मुस्कुरा रहा था। 😈
धीरे-धीरे कमरे में तैयारी शुरू हो गई। दीवारों पर बने चिन्ह और गहरे हो गए। दीये जलाए गए… और हवा और भारी हो गई।
तांत्रिक ने हाथ उठाया।

तांत्रिक बोला - 
अब… अमरता का समय आ गया है…

दूर कहीं…टुक-टुक अभी भी कोशिश कर रहा था उठने की…उसकी आँखों में दर्द था…लेकिन अब उसमें एक और चीज़ जाग रही थी डर नहीं… गुस्सा। 🐾🔥

शानवी ज़मीन पर बैठी थी… कांपती हुई। 😢 उसकी आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे। उसके बाल बिखरे हुए थे…और उसके माथे पर लाल सिंदूर लगा दिया गया था, जैसे कोई अनचाही रस्म पूरी की जा रही हो। चारों तरफ़ एक अजीब सा घेरा बना दिया गया था। 🔥 दीये जल रहे थे, और हवा में तांत्रिक मंत्रों की गूंज थी।

तांत्रिक आँखें बंद करके लगातार मंत्र पढ़ रहा था। उसकी आवाज़ गहराई में जाती हुई लग रही थी… जैसे किसी और दुनिया को बुला रही हो। परितोष आगे आया। 😈 उसने एक खंजर उठाया… और अपनी उंगली काट दी। खून की बूंदें टपकने लगीं…और वो उन्हें शानवी के चारों तरफ़ गिराने लगा।
टप… टप… टप…

हर बूंद के साथ मंत्र और तेज़ हो रहे थे। शानवी की सांसें तेज़ हो गईं। 😨 उसका शरीर डर से जमने लगा। वो धीरे-धीरे समझ चुकी थी कि अब ये सिर्फ़ डराने की बात नहीं है…अब ये सच में उसकी जान लेने की तैयारी थी। तभी तांत्रिक ने अपनी आँखें खोलीं।
और उसके हाथ में एक बड़ी, चमकती हुई कटार (तलवार) थी। ⚔️🔥 शानवी ने उसे देखते ही काँपना शुरू कर दिया।

शानवी (रोते हुए, कांपती आवाज़ में) बोली - 
नहीं… नहीं…

तांत्रिक धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ने लगा। हर कदम के साथ घेरा और भारी होता जा रहा था। हवा रुक-सी गई थी… दीयों की लौ कांप रही थी…और कटार धीरे-धीरे उसके बहुत पास आ रही थी… ⚔️😨

🌑🔥 To Be Continued…