शहद की गुड़िया - रंजन कुमार देसाई (60) Ramesh Desai द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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शहद की गुड़िया - रंजन कुमार देसाई (60)

                   शहद की गुड़िया - प्रकरण 60

         " क्षितिज की हालत काबू के बाहर जा रही थी. वह तर्क पर जीता था, उसे ही सच मानता था. और वह सब से ऊपर अपने आप को समझता था. वह किसी की नहीं सुनता था, वह दादू को अपने नौकर की तरह ट्रीट करता था. सब काम चूटकी बजाकर करने की कोशिश करता था. किसी को एक मिनिट का समय नहीं देता था. दादू ने आखिर तक काम किया था. जो भी मिला वह काम किया था लेकिन उसे कोई फ़िक्र नहीं थी. ज़ब काम मिलना बंद हुआ, कमाई बंद हो गई तो वह दादू को ताने मारने लगा. ऊस ने कभी भी बाहर निकलने की कोशिश नहीं की थी लेकिन अपने बाप को हर जगह भेजता था. पांच पैसे भी ज्यादा खर्च किया तो भाषण देता था.

          दादू! बिना स्टिक के सहारे चल फिर नहीं सकते थे.. फिर भी क्षितिज चुनचुन कर अपने पिता के लिये हररोज कोई ना कोई काम निकालता था. "

           "वह ग्रेजुएट होते भी घर मे एक घाटी का काम करता था. यह देखकर दादू को अफ़सोस होता था. क्यों उसे इतना लिखना पढ़ाया. वह मगर की तरह पानी मे रहता था. हर बात मे हाथ धोता रहता था. अपने मा बाप के पास हाथ धुलवाता था. ऊस वजह से ऊस के हाथों पैरों मे छाले पड़ गये थे. ऊस के लिये रोज वेसेलीन की डिब्बीया खाली करता था. "

            " ऊस की हर हरकत शिर दर्द बन गई थी. लेकिन वह किसी की नहीं सुनता था. ऊस का आवाज भी पहाड़ी बन गया था. वह जोर जोर से अपनी मा के साथ बात करता था, ऊस की गलतियां निकालता था. और घर का माहौल हर पल तंग रहता था.."

               " घर के सभी काम करता था. और घर भी गिला करता था. और फिर पोता मारता रहता था. वोशिंग मशीन मे कपड़े भी धोता था.. "

                " दादू खुद बीमार थे ऊस के मस्तीश्क मे खून का परिभ्रमण धीमा पड़ गया था. ऊस की वज़ह से दादू को चक्कर आते थे. वह कई बार घर मे, रास्ते मे गिर जाते थे फिर भी बाहर के काम तो उन्हें करने पड़ते थे.. लेकिन उसे कोई कद्र नहीं थी. "

                 " हर चीज मे कमी निकालने की मा बेटे को आदत लग गई थी. वह हर चीज मे दादू को जलील करते थे. ऊन के कामों मे गलतियां निकालते थे. उन्हें नीचा देखता था. "

                  " क्षितिज स्टोक मार्किट मे कुछ कमाया था, जो भी कमाया था वह ऊस के मा बाप के सहयोग का नतीजा लेकिन ऊस की क्रेडिट क्षितिज ले जाता था. पैसे दादू के थे. फिर भी वह पैसे ऊस के होने का दावा था. दादू की माता गीता बहन ने अपने गहने दादू की बीवी को दिये थे ऊस पर क्षितिज ने अपना हक जमाना शुरू कर दिया था.और वह घर के मालिक जैसा व्यवहार करता था. "

              " एक बात थी घर मे क्या चीज हैं, क्या लानी हैं ऊस पर ऊस का दयान रहता था. वह सारी चीजे बाजार से दादू के जरिये या जिओ मार्ट, फ्लिपकार्ट या अन्य जगह से अपनी बहन के जरिये मंगवाता था.. "

              " लेकिन वह बड़ा उतावला था हर चीज वह खड़े खड़े चाहता था, वह एक मिनिट भी नहीं रुकता था. इस वजह से घर मे सदैव तनाव का माहौल छाया रहता था..

               " स्टोक मार्किट मे वह काम करता था. दादू को ऊस मे रत्ती भर दिलचस्पी नहीं थी. फिर भी वह लॉन्ग टर्म शेयर होल्ड करने की हिमायत करते थे लेकिन क्षितिज इंट्रा दे ट्रेडिंग करता था ऊस मे काफ़ी नुकसान हुआ था., "

               " दादू को म्यूच्यूअल फंड की खरीदी मे विश्वास था ऊस मे काफ़ी रिटर्न्स मिलता था. "

               " क्षितिज ने काफ़ी मुनाफा कमाया था. दादू को अपने पैसे होते हुए भी बेटे की कमाई से कुछ लेना देना नहीं चाहता था. क्षितिज पैसा कमाता था ऊस मे कुछ घर मे नहीं लाया था वह पैसों का रोलिंग करता रहा था. "

               " ऊस का नसीब भी कुछ अच्छा था. ऊस ने स्टोक मार्किट मे कुछ कमाया था लेकिन कितना वह रोलिंग के हिसाब से पता नहीं चलता था. "

               " लाख कमियों के बावजूद ऊस का दिमाग़ स्टोक मार्किट मे बडी तेजी से चल रहा था. सुबह से रात तक उसी दुनिया मे खोया रहता था जिस का उसे फायदा हुआ था, जिस बात का ऊस से सिर गुमान चढ़ गया था. वह अपने आप को बिग शोट मानने लगा था. "

                " दादू को ऊस से कोई समस्या नहीं था. लेकिन क्षितिज पांच दस मिनिट मे हर शेयर का अप लेता था सब को बिजी रखता था. यह बात दादू को पसंद नहीं थी. क्षितिज स्टोक मार्किट के सामान्य नियमों को फ़ोल्लो नहीं करता था. वह शेयर लेकर एक फिक्स्ड भाव पर शेयर बेचने की जगह हर पल अपने शेयर्स का भाव पूछता था और ऊस का टारगेट बदलता रहता था. "

                " यह बात दादू को पसंद नहीं थी. वह अपने बेटे को समजाते थे, जो मिलने वाला हैं वहीं मिलने वाला हैं उसे चेस करने का कोई फायदा नहीं. "

             " लेकिन वह बात मानता नहीं था. वह स्टोक मार्किट से इतना obsessed हो गया था की रात दस बजे भी भाव को रटता रहता था. हरेक ब्रेक मे वह स्टोक मार्किट की चैनल पर पहुंच जाता था. और भाव को कन्फर्म करता था. ऊस का यह जनून पागलपन की सीमा पार कर गया था. "

              " सुबह साढ़े छः बजे वह टी वी खोलकर बैठे जाता था. और सब भाव रट लेता था.  मार्किट शुरू होने से पहले भाव का समर्थन लेता था. और मार्किट खुलते ही ठीक 9-21 को नये भाव की जानकारी हांसिल करता था. अंधा होते हुआ भी समय के बारे मे भी पक्का था. "

            " ऊस का इस तरह मार्किट के पीछे भागते देखकर दादू और उन की बीबी परेशान हो जातें थे. लेकिन ऊस से क्षितिज को कोई फर्क  नहीं पड़ता था.. "

             " मार्किट खुलने के बाद वह कंपनी से सब भाव लेता था, शेयर कितना बढ़ सकता हैं ऊस की जानकारी लेता था. टी वी पर भी वह भाव देखता था.

                   00000000000   ( क्रमशः )