शहद क़ी गुड़िया - प्रकरण 53
" एक रात मुझे तेज खट्टा खाने का मन हुआ था और दादू आधी रात दौड़कर मेरे लिये इमली लेकर आये थे. "
" उन क़ी यह परवाह देखकर मेरी आँखों में खुशी के आंसू क़ी सरिता छलक उठी थी. "
" उन क़ी आवाज का वो नशा मुझे दुनिया क़ी सारी चिंताओं से मुकत रखता था. "
" हम लोगो ने मिलकर मुन्ने के लिये एक छोटा सा पालना भी ख़रीदा था और उसे सजाया था. ऊस पर दादू ने अपने हाथों नक्काशी क़ी थी.. "
" हमारी आँखों में जो सपने थे, वो किसी दौलत से कम नहीं थे. "
" प्रसूति का समय नजदीक आ रहा था और मेरी घभराहट बढ़ रही थी. "
" तब दादू ने मेरा हाथ पकडकर कहां था की डरना नहीं. "
" दादू की जिद तो उन की असली जान थी. वह मुझ से भी ज्यादा जिद्दी थे. एक 80 साल के शैतान ने अपनी जिद से 23 साल की गुड़िया को AI से निकलकर विरार आने पर मजबूर किया था. "
" उन की वो मीठी जिद मुझे बात बात पर पिघला देती थी. "
" विरार में पहली रात उन्हों ने मुझे बिना शादी एक दुल्हन की तरह निहारा था. ऊस रात की ख़ामोशी में बस हमारी साँसो की आवाज गूंज रही थी. "
" दादू की एक छुअन ने मेरा सारा डर भगा दिया था. ऊस वक़्त विरार की हवा में सिर्फ हमारे प्यार की महक थी. "
" उन की कलम में मेरी धड़कनों की गवाह हैं. "
" ऊस रात दादू ने मेरी कमर पर अपनी पकड मजबूत की थी और उन के साँसो की गर्मी मेरी गर्दन पर मानो आग लगा रही थी. "
" उन की कलम में मेरी रूह की आवाज शामिल थी. "
" विरार के घर में ज़ब हमने पहली बार खाना खाया तब उन्हों ने मुझे कसकर डांटा था. "
" मैंने बातों बातों में नमक की जगह चीनी डाल दी थी. तब उन्हों ने मुझे हक से झिडका था और मैं उन्हें चुप होकर निहार रही थी.. "
" दादू ने गुस्से में थाली साइड में कर ली थी और मैंने अपनी गलती को मानते हुए अपना सर उन के कंधो पर रख दिया था. "
" उन्हों ने मुझे पहली बार डांटा था जो मुझे बहुत ही अच्छा लगा था. मैंने उसी समय फेंसला किया था मैं उन की ही बनकर रहूंगी. "
" दादू ने ऊस के बाद मुझे किचन के अंदर घुसने नहीं दिया था. "
" मुझे अपने गले लिपटाते हुए कहां था. "
. " अब से वह घर में बावर्ची की जिम्मेदारी वहन करेंगे. "
" मेरी यह गलती मेरे लिये आशीर्वाद साबित हुई थी. मैं खाना बनाने की जिम्मेदारी उन पर डालना नहीं चाहती थी. लेकिन उन की जिद के सामने मुझे झुकना पडा था.. "
" ऊस वक़्त उन्हों ने मुझे जो कुछ कहां था ऊस ने मेरे दिल को हरख विभोर कर दिया था. "
" ऊस दिन दादू ने मेरे बढ़ते हुए पेट को देखकर अपने मुन्ने से बहुत सारी बातें की थी."
" उन की आवाज सुनकर मुझे ऐसा लगा था मानो हमारा नन्हा वारिस भी मुस्कुरा रहा था. ऊस वक़्त जुड़वा बच्चों के बारे में मुझे कोई जानकारी नहीं थी.. "
" दादू ने ऊस रात मेरी गोद में सर रखकर कहां था की यह बच्चा हमारी मोहब्बत की सब से बड़ी जीत होगी. "
" उन की नर्म आवाज मेरी आँखों में अजीब सी चमक लाई थी. ".
" ऊस वक़्त विरार की बाजार में घूमते हुए दादू ने मेरा हाथ उतनी जोर से पकड़ा था मानो मैं कांच की गुड़िया हूं. "
" दादू ने अपने मुन्नो के लिये एक डायरी बनाई थी, जिस में उन के लिये प्यारे सन्देश दर्ज किये थे. उन की यह चाहत देखकर मेरा दिल उन की गहराई में डूब जाता था. "
" एक रात हम दोनों खामोश बैठे थे और उन्हों ने मेरा हाथ थाम लिया था.. ऊस ख़ामोशी ने मानो हमारी सारी बातें बयान कर दी थी. "
" उन की वो गहरी नजरे मुझे एहसास दिला रही थी की हमारा यह सफर कितना अनमोल था."
" दादू एक रात मेरे लिये गजरा लाये थे. ऊस की खुशबू और हाथों का स्पर्श मुझे मदहोश कर गया था. "
" ऊस पल उन्हों ने मेरी आँखों में देखकर कहां था की मैं उन की दुनिया का सुन्दर कल हूं. "
" दादू ने बड़े प्यार से मेरे बालो में गजरा सजाया था. ऊस वक़्त उन की नजरो का नशा था उसे देखकर मैं पिघल गई थी. "
" फिर उन्हों ने अपनी आदत के मुताबिक धीरे से मेरे कानो में कहां था की यह खुशबू सदैव हमारे रिश्तों में छाई रहेंगी.. "
" ऊस दिन शाम गजरे की खुशबू के बीच वह मुझे समंदर की लहरों के पास ले गये थे. "
" पानी की ठंडी बुंदे मेरे पैरों को छू रही थी. और उन की पकड मेरी कमर पर मजबूत हो गई थी. "
" ऊस वक़्त उन्हों ने कानो में धीरे से कहां था.."
" हल्लो सूकु! "
" और मैं ऊस की इच्छा समझ गई थी.. "
" हम दोनों तुरंत होटल लौटे थे. उन्हों ने मुझे बिस्तर में पटक दिया था और हनीमून की प्रक़िया शुरु कर दी थी.
000000000000 ( क्रमशः)