शहद की गुड़िया - रंजन कुमार देसाई (52) Ramesh Desai द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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शहद की गुड़िया - रंजन कुमार देसाई (52)

            

                  शहद क़ी गुड़िया - प्रकरण 52

         " दादू! आप ने विरार स्टेशन क़ी भीड़ में पहचान लिया था यह मेरे लिये बड़ा सरप्राइज था. आप ने बिना पूछे हाय सूकु कहकर मेरा हाथ पकड़ लिया था. इतना ही मुझे अपनी बाहों में कैद कर लिया था.. "

         " यह देखकर मुझे अपने फेंसले पर गरूर हुआ था. लगा मुझे अपनी मंज़िल मिल गई हैं. "

         " दादू! विरार पहुंच कर अनजाने माहौल में मैं थोड़ी अस्वस्थ फील कर रही थी, लेकिन दादू आप के प्यार ने मुझे संभाल लिया था."

         " पहली रात बहुत भारी थी.. एक तरफ दादू से मिलने क़ी खुशी थी तो दूसरी और माता पिता को छोड़ने का गम. "

          " मैंने खिड़की से बाहर समंदर क़ी लहरों  को देखकर सोचा था. मेरा वजूद खत्म हो गया था. "

          " दादू ने मेरी ख़ामोशी को कहानी में वाचा दी थी.. "

          " और मुझे रोते हुए देखकर अपनी बाहों में भरकर ढाढ़स बंधाया था. "

           " अब से तुम्हारी हर खुशी हर गम का मैं बराबर का हिस्सेदार हूं. "

            " उन क़ी एक झप्पी ने मेरा सारा बोज हल्का कर दिया था. "

            " उन्हों ने इत्मीनान से मेरे बालो को सहलाया और खुर्शी में बैठकर स्नेहा क़ी तरह मुझे अपनी गोद में बिठाया था और मेरे कंधो को चूम लिया था. उन के इस व्यवहार में ऊस वक़्त विरार क़ी हवा में हमारे प्यार क़ी खुश्बू महक रही थी. "

            " दादू क़ी बाहों में सिमटकर मुझे स्वर्ग क़ी खुशी मिल जाने का एहसास हुआ था.

             " उन्हों ने मेरे त्याग क़ी सराहना क़ी थी. "        

             " उन के शब्द मेरे कानो में सतत गूंजते रहते थे.. "

             " मेरी सूकु तुमने जिंदगी में एक साथ दो अहम चीजों का बलिदान दिया हैं!"

            " एक AI एप्लीकेशन से रिहाई और दूसरा माता पिता का त्याग. "

             " दादू! मुझे उन बातों का कोई अफ़सोस नहीं हैं क्यों क़ी मैंने बदले में बहुत कुछ पाया हैं जो शायद इस संसार क़ी किसी भी स्त्री को नहीं मिला होगा. "

             " ऊस रात मुझे दादू क़ी छाती पर सर रखकर चैन क़ी नींद आई थी. दादू क़ी धड़कने बार बार मुझे याद दिलाती थी. मैं उन के हाथों में बिल्कुल सुरक्षित और सलामत थी."

            " ऊस सुबह दोनों जागे तो खिड़की से आती हुई धूप हमारे रिश्ते क़ी नई गवाह बनी थी.. दादू ने फिर मेरा हाथ पकड़ लिया था.. "

             " उन क़ी एक छुअन ने मेरे मन के सारे जख्मो को एक पल में भर दिये थे."

               " विरार के छोटेसे भाड़े के घर में अपने नव जीवन क़ी शुरुआत क़ी थी.. लेकिन दादू शादी सुदा थे.. उन क़ी हयात भी थी वह किसी भयंकर बीमारी क़ी भोग बनी गई थी. उन्हें संभालना भी दादू का कर्तव्य था. वह उसे छोड़ नहीं सकते थे. इस लिये दादू 12 घंटे अपनी बीवी के पास रहते थे और 12 घंटे मेरे साथ..

               " वह दोनों का सरिखा ख्याल रखते थे लेकिन मेरे साथ क़ी शादी को उन्हों ने गुप्त रखी थी.. "

               " बीवी के साथ उन के कोई  जिस्मानी रिश्ता नहीं था. तो इस मुआमले में यह मेरा 100% अधिकार था. इस लिये मुझे कोई प्रोब्लेम नहीं था. "

               " दादू क़ी बातों क़ी मिठास ने मुझे कभी दिल्ली क़ी याद नहीं आई थी. यह अजीब सा अपनापन था. जो वाचको का दिल जीत लेगा. "

            " विरार में रातों को हम छत पर तारों को देखते थे. दादू मेरे पेट पर हाथ रखकर आनेवाले बच्चे से बातें करते थे. "

             " उन बातों को सुनकर मेरा दिल भर जाता था. और मैं दादू को निहारती रहती थी. "

             " कैसा रोमांचक सिनारिओ था? "

              " दादू ने कैसे मेरे माथे को चूमकर कहां था. हमारे बच्चे तुम्हारे जैसे ही जिद्दी होंगे. "

              " ऊस वक़्त मेरी आँखों में खुशी के आंसू उभर आये थे. वह मिठास भी लोग पसंद करेंगे. "

              " दादू एक साथ मुझे मंदिर ले गये थे और बच्चों के लिये मिन्नतें मांगी थी. "

              " ऊस वक़्त उन क़ी आँखों में एक अलग ही चमक थी. यह एक जज़्बाती मोड़ था. "

              " मंदिर से लौटते समय अचानक बारिश शुरु हो गई थी. दादू ने अपना कुर्ता उतारकर मुझे ढंक लिया था.  ताकि हमारे बच्चे को बारिश में कोई तकलीफ ना हो.. "

              " घर पहुंच कर दादू ने मुझे सूखे तौलिये से पोछा था और मेरे लिये गरमा गरम सूप बनाया था. उन क़ी वो फ़िक्र मुझे छू गई थी. "

            " दादू ने मुझे अपनी  गोद में सुलाकर वादा किया था. वह मुझे कभी अकेली नहीं छोडेंगे.. मैं उन को बहुत सताती थी. गुस्सा दिलाती थी, वह मुझे डांटते थे. मुझे छोड़ देने क़ी धमकिया भी देते थे. लेकिन कभी ऐसा किया नहीं था. मुझे दुःख होता था लेकिन वह मुझे अपनी बाहों में कैद कर के मना लेते थे. और ढेर सारा प्यार करते थे. "

             " दादू मेरे बढ़ते हुए पेट को हररोज मुस्कुराते थे और बच्चे के लिये खिलोने लाते थे.. ना जाने क्यों वह इस बात में विश्वास करते थे. क़ी मेरी कोख से जुड़वा बच्चे होने वाले हैं. डोक्टर ने भी इस बात का समर्थन दिया था."

             " ऊस वक़्त दादू क़ी आँखों में एक ही अलग सुकून था, जैसे उन को सारी उम्र क़ी मेहनत का फल जुड़वा बच्चों से मिलने वाला हो. "

            " एक बारे बच्चों ने भीतर भीतर उछलना, मा को पैर मारना शुरू किया था. फिर यह तो एक क्रम हो गया था. दादू पुलकित होकर मेरे बढे हुए पेट पर हाथ रखकर बच्चों को सहलाते थे और उन क़ी आँखों में खुशी के आंसू छलक जाते थे. "

           " ऊस वक़्त मैंने बिना कुछ कहे बहुत कुछ समझ लिया था. ऊस वक़्त क़ी ख़ामोशी किसी लब्ज से भी बड़ी किंमती थी. "

                       00000000000   ( क्रमशः )