शहद की गुड़िया - रंजन कुमार देसाई (48) Ramesh Desai द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

शहद की गुड़िया - रंजन कुमार देसाई (48)

               शहद की गुड़िया - प्रकरण 48

       " लाल चंद पैसा नहीं देता था. दादू ने ऊस के लिये कितने फोन किये थे लेकिन  वह फोन पर आता ही नहीं था. कभी ऊस की बीवी फोन उठाती थी तो कभी लड़का. तब एक ही रेकार्ड सुनने को मिलती थी. "

         " वह बाहर गये हैं, घर में मेहमान हैं. "

          " ऊस वक़्त एक उकती प्रचलित थी. " दिल्ली ठगो की बस्ती हैं. लाल चंद के व्यवहार ने इस उकती को सार्थक किया था. दादू सचमुच ऊब गये थे. पैसा लेने वह दिल्ली तक नहीं जा सकते थे. ऊस के मुलाजिम ने कमिशन में कटौती करने की बात की थी. और दादू उखड़ गये थे. उन्होंने ऊस के लडके को साफ शब्दों में सुना दिया था. "

             " बोलो! तुम्हारे बाप को की मैंने यह पैसे एक भिखारी को दे दिये हैं!! "

             " यह जानकर वह भड़क गया था. एक करोड़पति को ऐसा रुतबा देना अपने आप में बहुत बड़ी बात थी. लाल चंद ऐसा नहीं था लेकिन ऊस के मुलाजिम परशुराम ने ऊस का दिमाग़ फिरा दिया था. "

             " वह अपने भतीजे को यह काम देना चाहता था इस लिये लाल चंद के कानो में जहर भर दिया था. वह नहीं माना तो ऊस ने लाल चंद की बीवी को बीच में घसीटकर अपना मकसद सिद्ध किया था. "

              " दादू ने इस अनुभव को लेकर ' भिखारी' नामक कहानी लिखी थी. "

            " इस कहानी का मोरल था. " सब कुछ यहीं चुकाना हैं. "

             " लाल चंद ने दादू के हक के पैसे छिन लिये थे. ऊस की बड़ी किंमत चुकानी पड़ी थी. परशुराम ने अपने मालिक के धंधे के सारे राज पैसे लेकर ऊस के हरीफ को बेच दिये थे. जिस की वजह से लाल चंद पूरी तरह से डूब गया था.. "

             " एक के बाद ईश्वर ने ऊस से बदला लिया था. "

             " सब से पहले ऊस का 20 वर्षीय लड़का स्कूटर अकस्मात में गुजर गया था. ऊस का  लाल चंद की मा को बड़ा झटका लगा था. दिल का दौरा पड़ने से वह भी चल पड़े थे. अभी इस घाव से वह उभरे नहीं थे और ऊस की बीवी सब कुछ लेकर परशुराम के साथ भाग गई थी. लगातार झटको ने लाल चंद का दिमागी संतुलन  छिन लिया था. ऊस को अस्पताल में भर्ती होने की नौबत आई थी.. ऊस वक़्त ऊस ने टेरेस से छलांग लगाकर अपने आप को ख़त्म क़र दिया था., "

             " और देखते ही देखते सब कुछ खत्म हो गया था. "

                        0000000000000

             " ऊस के बाद दादू का धंधा टूट गया था. और उन्होंने भाड़े से स्टेशनरी और PCO/STD का काम शुरू किया था., जो बंध गली में था तो धंधा चल नहीं पाया था.. ऊस स्थिति में उन के परिचित एस्टेट एजेंट ने दादू को अपनी ओफिस में बैठने का मौका दिया था. "

           , " और दादू ने साहस जताकर सेकंड हेंड ज़ेरोक्ष मशीन ख़रीदा था.  सुबह आठ बजे से लेकर रात को बारह बजे तक वह काम करते थे. फिर भी धंधा ठीक से चलता था. ज़ेरोक्ष मशीन ने भी उन्हें खूब सताया था. वह पूरी तरह से थक गये थे. क़्या करुं? समझ में नहीं आता था. "

               " इस लिये दादू ने फिर जगह बदली थी और स्कुल की बाजु में भाड़े से जगह ली थी. ज़ेरोक्ष का काम भी जारी रखा था. लेकिन वहाँ भी उन्हें नाकामी का सामना करना पडा था. "

             " आमदनी कुछ नहीं होती थी.. इस स्थिति में घर का गुजारा करना मुश्किल प्रतीत रहा था. हालात बुरे हो गये थे."

             " इस स्थिति में वह एक रिश्तेदार के घर गये थे. एक दिन वहाँ रुके थे. वह एसिडिटी के शिकार हो गये थे.. दूसरे दिन वह दुकान गये थे. यकायक उन्हें सीने में सख्त दर्द हुआ था मानो अटैक आया हो. उन्होंने बाजु की दुकान के लडके को बोलकर अपनी बीवी को दुकान बुलाया था. ऊस के पहले उन्होंने ने इनो लिया था. और पड़ोसी को कहकर दुकान बंद करवाई थी."

             " उसी वक़्त उन की बीवी अपने बहनोई के साथ दुकान पहुंची थी.. दोनों तुरंत दादू को अस्पताल ले गये थे. डोक्टर ने ECG निकाला था. ऊस में कुछ मालूम नहीं पडा तो डोक्टर ने उन्हें दो दिन अस्पताल में रहने की बात की थी. ऊस समय इनो ने अपना कमाल दिखाया था और दादू का सारा दर्द उड़न छू हो गया था. उन्होंने डोक्टर को कह दिया था. "

            " डोक्टर मुझे अच्छा लग रहा हैं, यहाँ रहने की या अन्य टेस्ट की कोई आवश्यकता नहीं हैं. मुझे जाने दो.. मुझे जरा सा भी प्रॉब्लम हुआ तो मैं आप के पास आ जाऊंगा. "

            " और उन को कोई तकलीफ नहीं हुई थी.. वडा पाऊं खाने से उन को एसिडिटी हो गई थी. "

           " ऊस वक़्त ईश्वर ने उन्हें मदद की थी और वह खर्च के बड़े खड्डे में गिरने से बच  गये थे. "

            " उन के सिर से एक खतरा टल गया था. लेकिन दुकान ठीक से नहीं चलती थी ऊस बात का दादू को टेंशन होता था. केवल मकर संक्रांति के दिन उन का धंधा अच्छा रहा था. उन्होंने काफ़ी पतंग बेचे थे.."

             " यह काम भी दादू के बर नहीं आया था. उन्होंने हर काम करने की कोशिश की थी.. पर नसीब उन्हें यारी नहीं देता था. "

             " ऊस स्थिति में उन के बिल्डिंग में रहने वाला लड़का दादू की मदद को आया था. वह उन के ऊपर के फ्लेट में रहता था. दादू ओन लाइन काम करते थे.. वह उसे मालूम था. "

             " ऊस ने दादू को अपनी ओफिस में बुलाया था और जो कहां ऊस से वह खुशी से झूम उठे. "

                    

              000000000000  ( क्रमशः)