प्यार की निशानी Wajid Husain द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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प्यार की निशानी


क़ाज़ी वाजिद की कहानी - प्रेमकथा

‌‌‌‌‌वह ‌‌‌‌‌सुंदर और घुंघराले बालों वाली नर्स थी, जिसे रोगी और स्टाफ ‌‌‌‌सभी प्यार करते थे।‌ यहां तक कि बदमिजाज़ लोग भी उसकी ‌‌‌‌नाजु़क मुस्कुराहट के आगे झुक ‌‌‌‌जाते और वह जो कुछ भी करने को कहती, करने को तैयार हो जाते। इसके अलावा उसकी नीली आंखें इतनी सुंदर थी, वह जिसकी ओर भी देखती, वह अपने भाग्य को सराहता। अस्पताल के 50 वर्षीय ‌सी. एम. ओ, रूखे और करेले की तरह ‌‌‌‌कड़वे, जिन्हें काली काफी ‌नमकीन केक और अपने कुत्ते को छोड़ कर डॉक्टर, मरीज, नर्स सबसे--- चिढ़ थी। वह भी नर्स मधु को पसंद करते थे।
नवंबर की एक खूबसूरत शाम, उन्होंने दीवाली मेले ‌में आक्समिक सेवा के लिए, मेरे साथ इस नर्स की ड्यूटी लगाई ‌और उसे सुरक्षित लाने व ले जाने की जिम्मेदारी मुझे सौपी। ‌मैं शाम 6 बजे सरकारी गाड़ी से ‌उसके हॉस्टल गया। वह शालीन वेशभूषा में, गेट पर खड़ी, मेरा इंतेज़ार कर रही थी। उसने मुस्कुराकर थैंक यू डॉक्टर अविनाश कहा ‌और मेरे बराबर की सीट पर बैठ गई।
मेले में हमारे लिए आक्समिक चिकित्सा सेवा के कमरे में बैठने की व्यवस्था की गई थी। वहाँ हमारे अलावा और कोई नही था। बोरियत दूर करने के ‌लिए वह मुझ से बातें करने लगी। वह इतनी अच्छी बातें कर रही थी कि मेरा मन कर रहा था, उन्हें सुनता रहूं। मेरी एकाग्रता टूटी जब मंच से मेरा और उसका नाम बेस्ट कपिल यानी सबसे सुंदर जोड़ी के लिए पुकारा गया। मैं ‌हक्का बक्का रह गया, ‌‌‌‌‌‌मेरी उससे शादी नहीं हुई थी, परंतु मैं उसके आकर्षण की गिरफ्त में आ चुका था और ‌‌वह भी मुझ में रुचि लेने लगी थी। अत: हजारों की भीड़ के सामने उसे अपनी पत्नी न कहकर रुसवा नहीं करना चाहता था। इनाम में मिली नटराज की सुंदर मूर्ति लेकर, मैं शीघ्रता से गेट पर गया और अपनी गाड़ी में बैठ गया।
रास्ते में मैंने उससे कहा," जानती हो आयोजक हमें क्या समझ रहे थे?" "वे समझ रहे थे कि हम पति पत्नी हैं।"
उसका चेहरा लाल हो गया ‌‌और मुंह से निकला- " शायद"
” तो तुम्हारा मतलब है ‌‌कि इस पर तुम्हें एतराज़ नहीं है?"
" किस बात पर?"
"यही जो आयोजकों ने समझा--- अगर इनकी बात सच हो जाए तो? मतलब हम शादी कर ले तो?"
उसनें घड़ी की ओर देखा," हॉस्टल का गेट बंद होने का समय हो गया है, मेरी जान निकल रही है और आपको मज़ाक सूझ रही है।" मैंने ड्राइवर से गाड़ी तेज चलाने को कहा ‌‌और वह समय रहते हॉस्टल पहुंच गई।
एक दोपहर में डाइनिंग हॉल से बाहर निकला तो सीधा उसके कमरे की ओर बढ़ा। उससे पूछा--" क्या तुम व्यस्त हो?"
"जी नहीं, फुर्सत में हूं, आज मेरा ऑफ है।"
"तो क्या करोगी?"
"कुछ सोचा नहीं है डॉक्टर।"
"क्या मैं तुम्हें कोई सलाह दूं?"
"जी मेहरबानी होगी।"
" पर सलाह तुम्हें तभी मिलेगी,जब ‌‌ इसके एवज़ में मुझे फीस मिलेगी---‌‌‌‌‌‌उसने मेरी ओर देखा और हंसी फिर मैंने कहा, "चलो हम ‌‌‌‌‌घूमने चलते हैं।"
उसने हंसते हुए सहमति दे दी। मैंने कहा," अच्छा मैं कुछ काम निपटा कर आता हूं, फिर वह अपने कमरे में चली गई और मैं अपनी ड्यूटी पर। कुछ समय बाद में उसे लेने पहुंचा तो वह तैयार हो रही थी। वह बहुत सुंदर दिख रही थी। मैं ‌‌‌‌‌उसके कमरे में गया। इस डर से ‌‌‌‌‌कि कहीं कोई गंभीर मरीज न आ ‌‌‌‌‌जाए और मुझे बुलवा न लिया जाए, मैं बोला," चलो, ‌‌‌‌‌अब बस जल्दी निकल चलो।"
हम बस स्टॉप की ओर बढ़े। पहली बस में मधु चढ़ गई, लेकिन मुझे जगह नहीं मिली। वह भी नीचे उतर गई
और तब हम दूसरी बस का इंतजार करने लगे। मैंने खुद से कहा, कुछ लोग कहते हैं कि बस और लड़की के पीछे नहीं भागना चाहिए। एक जाएगी तो दूसरी आ जाएगी। पर वे लोग मूर्ख हैं। क्या मधु जैसी लड़की फिर मिलेगी?
आख़िर एक बस में हमें जगह मिल गई। बस एक पार्क के आगे जाकर रूकी। हम उतरे और सड़क पार की। मैंने अपनी बाहें फैला दी ‌‌‌‌और उससे कहा," चलो हम अस्पताल और दुनिया की बातें भुलाकर कुछ और बातें करें।" उसकी खूबसूरती, सादगी और बेहिसाब बातों ‌ने मेरे मन को बांध लिया था। पार्क में चिड़ियों की तरह इधर से उधर फुदकती मधु की अल्हडता और शोखी की तरफ ‌‌मैं खिंचता चला जा रहा था।
हम पार्क की बेंच पर बैठकर, एक-दूसरे का हाथ थामे घंटो तक ‌‌‌‌‌‌अपनी कहानियां सुनाते रहे। अब हम अकेले नहीं थे। हमने एक-दूसरे में अपना सही साथी तलाश कर लिया था ‌‌‌‌‌‌ फिर उसने अपनी आंखें मेरी ओर ‌‌‌‌‌‌उठाई। उसने सीधे मेरी आंखों में झांक कर पूछा,"तुम्हें पता है--- तुम से पहले मेरी दोस्ती किसी और के साथ थी?" मेरे बदन में ठंडी- सी लहर- सी दौड़ गई। मैं चुप लगा गया ‌‌‌‌‌‌और बाहर से सामान्य बना रहा। इस क्षण भी वह मुझे प्यारी लगी। वह भी इस बात को समझी ‌‌‌‌‌‌और उसके होठों पर प्यारी सी मुस्कान आई। मैंने पूछा," कौन था वह?" मैं यह बात सिर्फ जानने के लिए पूछ रहा हूं। उसने कहा,” पैथोलॉजिस्ट सुरेश।"
"तुमने उससे विवाह क्यों नहीं किया?"
वह न जाने किस सोच में डूब गई, फिर धीमे से बोली," वह धन लोभी था, पैसे के लिए, किसी के जीवन से खिलवाड़ करने से भी नहीं चूकता था।"
फिर एक छुट्टी के दिन, मैं उसके कमरे पर गया। वह बरामदे में खड़ी थी और उदास नजरों से आसमान की ओर ताक रही थी। मुझे देखकर, उसका चेहरा और उदास हो गया, गाल पर आंसू ढुलकने लगे। मैंने उससे पूछा," सब ठीक तो है?" उसने मुझे वह वीडियो दिखाया, जो वायरल हो रहा था। वीडियो में मेरा फोटो छपा था और नीचे लिखा था," भ्रूण हत्या का सरगना डॉ अविनाश।"
उसे समझाने के, सारे प्रयास निरर्थक रहे। जो लोग मुझे करीब से जानते थे, उन्हें छोड़कर सभी ने मुझे भ्रष्ट मान लिया। उनमें से एक मधु भी थी। हमारा पवित्र रिश्ता बिखर गया। कहने सुनने को कुछ नहीं बचा था। मेरा और उसका प्यार कहीं खो गया, आखिर वह दिन भी आ गया ‌‌कि मेरे और उसके ‌रास्ते बदल गए। दोनों दिल में ‌टीस लिए, अपने-अपने कमरों में बंद हो गए। वक्त तेजी से बीत रहा था, पर मेरी दुनिया मानो कहीं ठहर सी गई थी।
बाहरी तौर पर, मैं उससे अलग हो गया था, ‌‌‌‌परंतु उसकी हंसी आज भी मेरे दिल में कैद थी। उसकी नीली आंखें मुझे अब भी दिखती थी। कभी-कभी रात में उठ कर, बैठ जाता ‌‌‌‌‌‌‌हूं‌‌‌‌‌‌‌‍‌‍ और नटराज की मूर्ति से बातें करने लगता हूं, वही तो उसके प्यार की निशानी मेरे पास है।
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