तंत्र रहस्य - 23 Rahul Haldhar द्वारा डरावनी कहानी में हिंदी पीडीएफ

तंत्र रहस्य - 23

शनिवार रात 12 बजे के बाद मैंने काम पिशाचिनी साधना शुरू किया। कल मैं शराब लाना भूल गया था इसलिए आज सुबह ही लगभग 15 बोतल शराब मैं ले आया। पिशाचिनी भोग में शराब भी जरूरी है। आज के लिए मैं यहाँ पास वाले कसाई के दुकान से बकरे की कलेजी ले आया कल से हैदर या उसके अब्बा मेरे आँगन तक कलेजी पहुंचा देंगे।
इसके अलावा आहुति के लिए आँगन में ही एक यज्ञकुण्ड भी मैंने बनाया। साधना शुरू करने से पहले ही मैंने इस जगह के चारों तरफ सिंदूर से मंत्र युक्त रक्षा घेरा बना दिया था। यह सबसे ज्यादा जरूरी है क्योंकि जैसे ही मैं अपने साधना को शुरू करूंगा कई सारी नकारात्मक शक्ति इस ओर आकर्षित होंगे और यहाँ आकर साधना में खलल डालने की कोशिश करेंगे। मुझे कई सारे शायद भयानक दृश्य भी दिखे पर मैं इन सब कुछ के तैयार हूं। पागल बाबा के बिना पहली बार मैं तंत्र क्षेत्र में कुछ कर रहा हूं इसलिए थोड़ा मन में हलचल है।

आधी रात के बाद जपमाला द्वारा काम पिशाचिनी के मंत्र को जपते हुए मैंने इस साधना को शुरू किया। मुझे इसी एक मंत्र का जप प्रतिदिन आधी रात से सुबह के लगभग 3 बजे तक करना है। इसके बाद पिशाचिनी भोग लगाकर उन्हें प्रेमिका रूप में पाने का आग्रह करना होगा।
लगभग 3 घंटे तक काम पिशाचिनी मंत्र का जाप करने के बाद मैंने यज्ञ कुंड में आग को जलाया व उस आग में भोग के रूप में बकरे की कलेजी, शराब , अंडा , मिठाई का आहुति किया। इसके बाद मैंने अपने ऊपर इत्र का छिड़काव कर पिशाचिनी को प्रेमिका रूप में पाने का आग्रह मंत्र जप किया।
इस तरह पहले दिन की साधना समाप्त हुई पर आज कुछ भी महसूस नहीं हुआ। ना ही कुछ नकारात्मक दिखा । इसी तरह साधना करते हुए मुझे 28 दिन पूरे करने हैं। आगे चलकर क्या पता क्या होगा।

काम पिशाचिनी साधना करते हुए मुझे 14 दिन हो चुके हैं। प्रतिदिन वही एक प्रक्रिया कर रहा हूं। ना नहाने की वजह से मेरे शरीर से पसीने की गंध आने लगी है। मैं साफ रहने की कोशिश करता हूं पर फिर भी प्रतिदिन गंदा ही हो जाता हूं। वैसे अभी तक रात में कोई भयानक कुछ तो नहीं दिखा है पर मैं कुछ नकारात्मक शक्ति को महसूस किया है। ईंट द्वारा एक चूल्हा बनाया है उसी पर फीका दाल चावल , कभी कभी आलू टमाटर सब्जी पकाकर खा रहा हूं। किसी - किसी दिन इस जगह के मालिक मैं क्या कर रहा हूं यह देखने के लिए चले आते हैं। वैसे मैं सबकुछ साफ सुथरा रखने की कोशिश करता हूं पर यज्ञकुण्ड व कई दिनों से मेरे बिना नहाए शक्ल को देखकर उन्हें इतना तो पता चल गया कि मैं यहाँ कोई ध्यान योग तो नहीं कर रहा। कुछ भी हो उन्होंने इसे एक पूजा की तरह माना और मुझसे कुछ भी पूछने की कोशिश नहीं की। आते और जगह देखकर चले जाते।
कुछ दिनों से मुझे साधना के वक्त जो समस्या हो रही है वो यह है कि साधना के वक्त मुझे बहुत जोर का प्यास व भूख लगता। साधना के वक्त कुछ भी पी या खा नहीं सकते। यह प्यास कभी कभी असहनीय हो जाती है पर मैंने खुद को सम्हाल कर रखा है। वैसे मैंने एक बात पर ध्यान दिया है कि ज़ब से मैंने इस साधना को शुरू किया तब से पिशाचिनी मेरे साथ नहीं है। पिछले 14 दिनों में एक बार भी मैंने उसे महसूस नहीं किया और ना ही उसकी कोई आवाज सुनी।
25 वें दिन मैं जपमाला जपते हुए साधना में लीन था। मेरा आँख बंद था लेकिन अचानक ही मुझे ऐसा लगा कि मैं अपने आसन पर नहीं हूं। जैसे मैं शायद हवा में बैठे - बैठे ही झूलते हुए साधना कर रहा था। एक बेकार सा मांस जलने जैसा बदबू भी मेरे चारों तरफ से आ रहा था। कुछ नकारात्मक शक्तियों का आगमन होना शुरू हो गया था। मैं अपने आँख को खोल कुछ भी देखना नहीं चाहता था क्योंकि मैं किसी की उपस्थिति यहाँ महसूस कर सकता था। वह जो कुछ भी है नकारात्मक शक्तियों का एक मृत अंधेरा वाला मूर्ति है। अचानक ही मैंने एक साथ अपने माँ , पिताजी व पागल बाबा के आवाज को चिल्लाते हुए सुना। तुरंत ही मेरी आँख खुल गई और आँख खोलते ही जो दृश्य देखा वह देख मेरे शरीर से मानो प्राण निकल जाए। मैं किसी श्मशान जैसे अँधेरी जगह पर हड्डियों की ढेर पर बैठा हूं। मेरे चारों तरफ मृत व्यक्तियों की लाश पड़ी हुई है और उन लाशों के मांस को कई बूढ़े व बुढ़िया काटकर खा रहे है। उन लाशों के पेट को फाड़कर अंतड़ियों से माला बनाकर पहन रखा है। वो सभी लाशों के दिल व फेफड़े को निकाल कर खा रहे हैं। सभी बूढ़े व बुढ़िया के चेहरे पर खून के धब्बे लगे हैं जिस कारण उनके चेहरे भयानक दिख रहे हैं। मैं इन दृश्यों को देखते हुए भी किसी तरह साधना में लगा रहा। कुछ देर बाद उन सभी ने मेरी तरह देखा और लाशों के मांस, हड्डी व अंतड़ियों को मेरे तरफ फेंकने लगे। वो सभी एक साथ मुझे यहाँ से उठकर भाग जाने के बारे में कह रहे थे। मैंने फिर अपने आँखों को बंद किया अब मुझे कई सारे भयानक आवाज व हँसने की आवाज सुनाई देने लगी। उस पूरी रात ऐसे आवाज आते रहे लेकिन मैं साधना करता रहा। इसी तरफ अगले कुछ दिन भी मुझे नकारात्मक शक्ति द्वारा डराने की बहुत कोशिश की गई। कभी कभी तो बहुत ज्यादा डर लगा पर फिर भी खुद को किसी तरह सम्हाल लिया शायद मेरे ऊपर पागल बाबा की कृपा दृष्टि थी।
27 वें दिन एक और घटना घटी। काम पिशाचिनी मन्त्र जाप के बाद जैसे ही मैंने भोग आहुति के लिए यज्ञकुण्ड में आग जलाई तुरंत ही....
मैं अपने आसन पर बैठा हूं मेरे सामने यज्ञकुंड का आग जल रहा है और यज्ञकुण्ड के उस तरफ भी
हूबहू मैं ही बैठा हूं। हाँ मेरे सामने प्रतिबिम्ब की तरह मैं ही बैठा हूं। लेकिन उस प्रतिबिम्ब वाले दृश्य में मैं एक छूरी लेकर बैठा हूं। यह देखकर एक बार तो बहुत ही डर लगा लेकिन फिर याद आया कि यह कोई नकारात्मक दृश्य है जो मुझे डराने की कोशिश कर रहा है। मैंने उस तरफ से किसी तरह ध्यान हटाकर अपने पिशाचिनी भोग आहुति में जुट गया।
कुछ देर बाद मेरा ही प्रतिबिम्ब मुझसे चिल्लाकर बोला ,
" राघव ये सब यहीं बंद कर दे और यहाँ से भाग जा वरना वो तुझे मार डालेगी। तू जिसे पाना चाहता है वह तेरा ही खून पीयेगी। उठ और भाग जा..... भाग जा "
मैंने उसके बातों पर कोई ध्यान नहीं दिया। अब मैंने मंत्र पढ़ते हुए अग्निकुण्ड में भोग के रूप में बकरे की कलेजी को डाला। मेरे सामने बैठे प्रतिबिम्ब ने अब अपने हाथ में लिए छूरी से खुदके पेट को चीरने लगा। पेट को फाड़ने के बाद उसने मेरे लीवर अर्थात मेरे ही कलेजे को काटकर हँसते हुए बाहर निकाला और अग्निकुण्ड में डाल दिया। पेट को फाड़ने की वजह से चारों तरफ खून ही खून निकल रहा था। मेरी अंतड़िया अर्थात मेरे प्रतिबिम्ब की अंतड़िया पेट से निकलकर नीचे जमीन पर धीरे - धीरे गिर रही है। यह दृश्य एक आदमी को मेंटली डिस्टर्ब करने के लिए बहुत है। मुझे नहीं पता कि मैं अभी तक कैसे बिना बेहोश हुए या यहाँ से भागे बिना रुका हूं। इस दृश्य ने मेरे शरीर में एक सिरहन को पैदा कर दिया था। मेरा प्रतिबिम्ब एक शैतानी मुस्कान के साथ बैठा था। अब मैंने फिर से भोग रूप ने शराब अग्नि कुंड में डाला। सामने बैठे प्रतिबिम्ब ने अब उस छूरी से अपने गले को काट लिया और गले से निकलने वाली खून को अग्निकुण्ड में डालने लगा। यह देख मेरा पूरा शरीर कांप गया। मैं यह और देख नहीं पाया और अपने आँखों को बंद कर लिया। मुझे अपनी ही हंसी सुनाई दे रही थी। ऐसा ही कुछ देर चला पर आज की साधना समाप्त होने तक सबकुछ फिर से सामान्य हो गया। मेरे सामने एक भी खून का बूंद या कुछ भी नहीं था। यह सब कुछ एक भ्रम दृश्य की तरह था । अब केवल कल की साधना बची है और फिर शायद मैं काम पिशाचिनी साधना में सिद्धि प्राप्त कर लूंगा। इतनी मेहनत का फल शायद कल पूर्ण हो जायेगा। कल क्या होगा इसका पता तो कल ही चलेगा। आज जो हुआ बस इतना भयानक कुछ ना हो। ....

क्रमशः....


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Nathabhai Fadadu

Nathabhai Fadadu 1 महीना पहले

Indu Beniwal

Indu Beniwal 2 महीना पहले

Minaz Shaikh

Minaz Shaikh 3 महीना पहले

SUNIL ANJARIA

SUNIL ANJARIA मातृभारती सत्यापित 3 महीना पहले

Rahul Haldhar

Rahul Haldhar मातृभारती सत्यापित 4 महीना पहले