तंत्र रहस्य - 22 Rahul Haldhar द्वारा डरावनी कहानी में हिंदी पीडीएफ

तंत्र रहस्य - 22

काम पिशाचिनी साधना,

उस रात पिशाचिनी से और कोई बात नहीं हुई। उसने मुझसे कहा कि मैं उसकी साधना कर उसे प्राप्त करूँ तभी तो मेरे हर बात को मानेगी। मैं यही चाहता हूं कि वह चली जाए लेकिन वह ऐसा नहीं करने वाली , क्योंकि पागल बाबा नें उसे मेरे पास रहने का आदेश दिया है।

उस रात के अगले दो दिन तक मैं यही सोचता रहा कि यह साधना करूँ या ना करुं। वैसे भी मुझे इस साधना के बारे में कुछ भी नहीं पता। पिशाचिनी ने कहा था कि मैं बस एक बार शुरू करुं,, मुझे सबकुछ पता है।
मैंने निश्चय किया कि इस साधना को करूंगा पर उससे पहले मुझे अपने तांत्रिक गुरु से इसकी आज्ञा लेनी होगी। किसी भी साधना करने से पहले मुझे ऐसा करना जरूरी है। तंत्र साधना में सबकुछ एक साधक के गुरु से ही जुड़ा हुआ है। गुरु के आशीर्वाद के बिना तंत्र साधना कभी पूर्ण नहीं हो सकता।

वैसे मेरे गुरु पागल बाबा तो यहाँ थे नहीं पर उनसे ध्यान के द्वारा सम्पर्क मैंने एक बार किया, शायद फिर कर सकता हूं।
पागल बाबा ने महाश्मशान में ध्यान व साधना के लिए एक उपयुक्त जगह बताया था। महाश्मशान में जाकर मैं उसी जगह पर बैठकर पागल बाबा के द्वारा प्रदान किये हुए गुरु मंत्र द्वारा उनका शरण ध्यान करने लगा। मेरे मन में पहले से ही यह सवाल था कि क्या मुझे यह साधना करना चाहिए या नहीं? और अगर हाँ तो इस साधना को कैसे करूँ ?
कुछ देर तक पागल बाबा का ध्यान करने के बाद भी कुछ नहीं हुआ। आज मानो पागल बाबा से जुड़ाव नहीं हुआ। पर दिमाग़ में बहुत सारी बातें चल रही है। मानो किसी ने अभी अभी मेरे दिमाग़ में कई क्रिया - प्रक्रिया व बातों को डाल दिया है । हाँ , यह सभी बातें ' काम पिशाचिनी ' के लिए ही थी। इस साधना को कैसे करना है , इसमें क्या - क्या सामग्री लगेगी , मुझे क्या करना है , अचानक ही सबकुछ मेरे दिमाग़ में अपने आप ही आ गया था। दिल से आवाज आ रही थी कि हाँ पागल बाबा ने इसकी अनुमति दे दिया है। एक तंत्र साधक अपने गुरु के विचार समझ जाता है। इतना सब कुछ जानने के बाद मैं महाश्मशान से अपने कमरे में चला आया।

मुझे अब इस साधना के बारे में सभी मन्त्र व सभी प्रक्रिया पता है। पर इस साधना में जो कुछ भी मुझे करना है ऐसा कुछ मैंने पहले कभी नहीं किया। मुझे लगभग एक महीने तक एक सुनसान जगह पर रहकर साधना करनी है। लोगों से लगभग मिल ही नहीं सकता। इन एक महीने ब्रह्मश्चर्य का पालन करना होगा। एक महीने मैंनहा नहीं सकता, ना ही किसी देवी - देवताओं की पूजा कर सकता हूं। खुद से ही खाना बनाकर खाना होगा।
एक बार तो सोचा कि क्यों यह सब करुं पर फिर भी अगले दिन साधना के लिए सामान व एक सुनसान जगह ढूंढने मैं निकल पड़ा। साधना करके देख ही लूँ क्या होता है क्योंकि वैसे भी मैं इस रास्ते पर ही हूं।
एक ऐसी जगह ढूंढनी है जहां मैं रह सकूँ व वहीं साधना भी कर सकूं। उस जगह से बाहर मैं साधना के दिनों में नहीं जा सकता।
दोपहर तक ढूंढने पर भी मुझे कोई ऐसा खास रहने लायक सुनसान जगह नहीं दिखा। शाम को ऐसे ही टहलते वक्त मुझे एक जगह दिखी जो शायद मेरे लिए सही था। उस जगह के पास ही एक कसाई का दुकान भी था। मैं ऐसी ही एक जगह की तलाश कर रहा था जो कि कसाई के दुकान के पास ही हो। कसाई का दुकान इसीलिए क्योंकि मुझे प्रतिदिन काम पिशाचिनी भोग के लिए बकरे की कलेजी चाहिए।
एक आधा झोपड़ी व आधा पक्का घर है तथा उसके सामने आँगन। आँगन में नल , शौचालय इत्यादि है। यह जगह मेरे साधना के लिए एकदम सही है। काम पिशाचिनी साधना श्मशान , नदी किनारे, किसी सुनसान जगह पर कहीं भी कर सकते हैं। अब मैं श्मशान या नदी किनारे जाकर तो
रह नहीं सकता तो कोई सुनसान जगह ही मेरे लिए सही है। वैसे भी इस घर के आसपास घर नहीं है।
इस जगह के बारे में आसपास पूछ कर पता चला कि इस जगह का मालिक इसे बेच रहा है इसलिए यह खाली है। इस जगह के मालिक का घर भी कुछ ही दूरी पर है इसीलिए मैं उनसे यहाँ लगभग एक महीना रहने के लिए इजाजत मांगने चल पड़ा। उस जगह के मालिक से मिलकर मैंने वहाँ रहने की बात कही। उनसे पता चला कि अभी यह जमीन बिक ही नहीं रही है। कोई खरीदना चाहता भी है तो दाम कम दे रहा है। वैसे वो किसी तरह राजी हुए पर वो इस बात को सोच रहे थे कि आखिर एक महीने मैं उस जगह क्यों रहना चाहता हूं। होटल , लॉज कई जगह मैं रह सकता हूं। फिर मैंने उनसे बताया कि मैं एक शांत जगह कि तलाश में हूं जहां मैं थोड़ा ईश्वर ध्यान व मनशांति योग कर सकूं। मेरे बातों से उन्हें पता चल गया कि मैं भगवान साधना में रूचि रखता हूं और वो भी धार्मिक चर्चा वाले व्यक्ति थे इसीलिए मान गए। वहाँ एक महीने रहने के लिए मुझे उन्हें 1500 रूपए देने होंगे। जोकि मैंने तुरंत ही उन्हें दे दिया।
अगले दिन मैं अपने बैग को लेकर उस जगह रहने पहुंच गया। यह जगह तारापीठ मंदिर से दूर है।
आधे पक्के व झोपड़ी वाले उस घर में एक खटिया व एक कुर्सी व धूल जमे हुए कुछ पुराने सामान ही थे। इधर - उधर थोड़ा झाड़ू लगाकर मैं बाहर इस साधना को करने का सामान व मेरे खाने के लिए कुछ सब्जी , दाल , चावल , आटा , कुछ बर्तन इत्यादि लेने चला गया। आज गुरुवार है परसों रात यानि शनिवार रात से मुझे इस साधना को शुरू करना होगा।
शाम तक पिशाचिनी साधना की कुछ जरूरी समान जैसे इत्र , अंडा , जपमाला , मिठाई , अगरबत्ती , सिन्दूर के साथ - साथ अपने लिए भी बहुत सारा चावल , दाल , आलू , प्याज़ इत्यादि खाने का सामान ले आया। इतना ले आया कि लगभग 20 - 25 दिन पेट भर के भी खा सकूँगा। थोड़ा बहुत खाना बनाना जनता ही हूं। एक ही तो महीना थोड़ा रूखा - सूखा ही सही। अब इस पथ पर उतरा हूं तो इतना तो करना ही होगा।
बकरे का मांस बेचने वाले चचा से बात कर उन्हें बताया कि प्रतिदिन मुझे कैसे भी बकरे की कलेजी चाहिए। उनके मन के सवालों से ज्यादा भारी मेरा पैसा था जिस ओर सभी झुकते हैं। उन्होंने मुझसे वादा किया कि प्रतिदिन मुझे वो कहीं से भी हो बकरे की कलेजी लाकर देंगे। इसके अलावा मुझे 28 वें दिन आहुति के लिए 51 कलेजी चाहिए। इस बारे में भी मैंने उनसे कहा कि आप बस कलेजी लाकर दीजिये पैसे मैं तो दूंगा ही। उनके एक छोटे लड़के हैदर से मेरी बात हुई वह मेरे उस साधना वाले जगह तक प्रतिदिन कलेजी लाकर देगा। साधना के दिनों में अपने साधना स्थल से दूर लोगों से मिलने की मनाही है। शनिवार से प्रतिदिन दोपहर तक मुझे बकरे की कलेजी चाहिए यह बोलकर मैं चला आया।
शाम को महाश्मशान पहुंच गया क्योंकि मुझे वहां पड़ी कई सारी चिता जलाने वाले लकड़ी जो कि अधजले हैं व श्मशान में पड़े लकड़ियों को एकत्रित करके ले जाना था। इन्हीं लकड़ियों से मुझे अपना भोजन पकाना होगा। रात भर मैं बहुत सारी अधजली व श्मशान के सूखे पेड़ों से लकड़ी एकत्रित करके अपने साधना स्थल तक ले जाता रहा। और भी कई सारी सामग्री मुझे महाश्मशान से एकत्रित करनी पड़ी जैसे श्मशान में पड़ी एक हड्डी का टुकड़ा , किसी पक्षी का पँख , चिता राख , मृत व्यक्ति को जिस कपड़े में लपेटकर लाया गया है उस कपड़े का टुकड़ा इत्यादि। रात भर मैंने महाश्मशान से सबकुछ खोजकर जुगाड़ कर लिया। वैसे श्मशान में पड़ी हड्डी के लिए मुझे वहीं रहने वाले एक तांत्रिक बाबा से सम्पर्क करना पड़ा उन्होंने मुझे एक हड्डी दिया। यह एक अकाल मृत्यु में मरी महिला के पसलियों की हड्डी थी जोकि तंत्र के छेत्र में बहुत उपयोगी है।
अगले दिन तक मैंने साधना के लिए सबकुछ सामग्री का जुगाड़ कर लिया। कुछ ऐसे सामान जो मुझे आसानी से नहीं मिल सकते थे पर आसानी से मिल गए। वैसे इन पूरे समय पिशाचिनी मेरे साथ ज्यादा नहीं थी। अब मैं उसे अपने आसपास कुछ समय के लिए महसूस करता हूं, अक्सर आधी रात के वक्त ही वह मेरे बहुत करीब होती है।
अब केवल मुझे कल यानि शनिवार रात से इस साधना को शुरू करने का इंतजार है।

क्या मैं यह साधना व इतना मेहनत केवल इसलिए कर रहा हूं कि पिशाचिनी को अपने पास से चले जाने को कहूँ या इसमें भी मेरा स्वार्थ है? मुझे नहीं पता पर यह साधना मैं कर रहा हूं। कहीं मैं पिशाचिनी के इन बातों में तो नहीं आ गया कि अगर मैं उसे सिद्ध कर लूँ तो वह मेरे सभी कार्य को कर देगी? वह भी यही चाहती है कि मैं उसकी साधना करके उसे प्रसन्न करूँ आखिर क्यों ?...

अगला भाग क्रमशः..

रेट व् टिपण्णी करें

Indu Beniwal

Indu Beniwal 2 महीना पहले

Himanshu P

Himanshu P 2 महीना पहले

Hema Patel

Hema Patel 2 महीना पहले

Minaz Shaikh

Minaz Shaikh 3 महीना पहले

SUNIL ANJARIA

SUNIL ANJARIA मातृभारती सत्यापित 3 महीना पहले