दानी की कहानी Pranava Bharti द्वारा बाल कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

दानी की कहानी

दानी की कहानी

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दानी की ज़िंदगी में छोटे बच्चे बड़ी अहमियत रखते हैं | वैसे ये कोई नई बात नहीं है |

एक उम्र के बाद बच्चों का साथ ही स्वर्ग लगता है |

ये वही बात है न 'मूल से ज़्यादा ब्याज़ प्यारा '

"अच्छा दानी एक बात बताइए ---" मीनू अब बड़ी हो रही थी |

और बच्चों के साथ मीनू भी दानी की कहानियों,लोरियों के बीच बड़ी हो रही थी |

'टीन-एज' की अपनी एक उड़ान होती है |

नए -नए पंख मिल रहे होते हैं ,उड़ान के लिए सीमा में बंधी इजाज़त मिली होती है |

बस--मीनू की यही आयु थी जिसमें सैंकड़ों प्रश्न पगडंडी बनाकर सामने थे |

मीनू के मन में एक प्रश्न उठता ,उसका उत्तर ठीक से समझ भी नहीं पाती कि दूसरा प्रश्न मुँह फाड़कर खड़ा हो जाता |

उस दिन न जाने कहाँ से मीनू सुनकर आई थी 'कन्यादान'

"दानी ये कन्यादान क्या और क्यों होता है ?" दानी खाने के लिए उसकी प्रतीक्षा करती थीं |

मीनू स्कूल से आती तब ही उसके साथ वे गरम खाना खातीं | महाराज उसी समय खाना बना रहे होते थे |

दानी और मीनू गर्मागर्म खाना खा लेते ,फिर सब लोग अपनी सुविधानुसार खाते |

हर रोज़ दानी के साथ खाना खाते हुए मीनू कोई न कोई प्रश्न दानी के सामने परोस ही देती |

कई बार तो दादी को भी समझ में न आता उसकी बातों का उत्तर क्या और कैसे दें ?

उन्हें बात घुमानी पड़ती |

"बताइए न दानी ये 'कन्यादान' क्यों करते हैं ?

दानी को चुप देखकर मीनू ने फिर से पूछा |

"बेटा ! अभी तुम्हें यह जानने की क्या ज़रूरत पड़ गई ?"

"दानी ! मेरी जो दोस्त है न ऋतु ,आप जानती हैं न उसे ?"

"हाँ,बेटा --अच्छी तरह से जानती हूँ | क्या हुआ उसे ?"

"उसे कुछ नहीं हुआ दानी ---उसकी बड़ी दीदी हैं न --रेखा दीदी ! उनकी शादी होने वाली है |"

"तो ---"

"आप सुनिए तो ---" मीनू को लग रहा था दानी उसकी बात ही नहीं सुन रही हैं |

"ठीक है --बोलो " दानी चुप हो गईं | उन्हें लगा बच्ची की बात पूरी होने दें फिर उत्तर देंगी |

"रेखा दीदी की शादी है न ! तो वो इस बात पर गुस्सा हैं कि उन्हें 'कन्यादान' नहीं करवाना है | ऋतु ने बताया मुझे कि दीदी बहुत नाराज़ हैं और कह रही हैं कि उनकी 'कोर्ट-मैरेज'कर दी जाए|"

"हाँ ,इसमें भी कोई बुराई नहीं है ,समय के अनुसार मूल्यों में बदलाव आते ही हैं |"

"वही तो मैं आपसे पूछ रही हूँ कि कन्यादान का मतलब क्या है आख़िर? "

"बेटा ! पहले ज़माने में लड़की की शादी करके कन्यादान कर देते थे ,इसका मतलब होता था कि शादी के बाद बेटी के घर का कुछ खाना-पीना नहीं है क्योकि लड़की का दान किया जा चुका है |"

"तो दानी ! ये गलत बात नहीं है क्या ?लड़की कोई चीज़ है या पैसा है जिसे दान कर देना ठीक है ?"

"नहीं बेटा ! इसके पीछे भी कई कारण होते थे | आज हमारे विचार बदल गए हैं | लड़कियाँ भी अपने पैरों पर खड़ी हो रही हैं इसलिए रिवाज़ों में बदलाव आ रहे हैं |"

"तो यह कन्यादान भी छूटना चाहिए न ! पता है दानी ,रेखा दीदी कितनी रो रही थीं ---" मीनू दुखी थी |

"हाँ।बदलने तो चाहिए ,समय के अनुसार सभी चीज़ों में बदलाव आता ही है लेकिन हम कई बार अपनी रूढ़ियों को पकड़कर खड़े रहते हैं |"

"तो दानी ,आप जैसे बड़े लोगों को ये रूढ़ियाँ तोड़नी चाहिए न ?" मीनू ने खाना ख़त्म करते हुए कहा |

वैसे आज के समय में काफ़ी बदलाव आ चुके हैं फिर भी दानी के मस्तिष्क में एक विचार ने जन्म ले लिया था कि इस विषय पर अपनी आगे की पीढ़ी के साथ मिलकर चर्चा करने से शायद और बेहतर परिणाम निकाल सकते हैं |

डॉ. प्रणव भारती

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Pranava Bharti मातृभारती सत्यापित 7 महीना पहले